राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
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भाई रे साची सतिगुर सेव ॥ सतिगुर तुठै पाईऐ पूरन अलख अभेव ॥1॥ रहाउ ॥ सतिगुर विटहु वारिआ जिनि दिता सचु नाउ ॥ अनदिनु सचु सलाहणा सचे के गुण गाउ ॥ सचु खाणा सचु पैनणा सचे सचा नाउ ॥2॥ सासि गिरासि न विसरै सफलु मूरति गुरु आपि ॥ गुर जेवडु अवरु न दिसई आठ पहर तिसु जापि ॥ नदरि करे ता पाईऐ सचु नामु गुणतासि ॥3॥ गुरु परमेसरु एकु है सभ महि रहिआ समाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ सेई नामु धिआइ ॥ नानक गुर सरणागती मरै न आवै जाइ ॥4॥30॥100॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! गुरू की सेवा जरूर फल देती है। (क्योंकि) गुरू प्रसन्न हो जाए तो वह परमात्मा मिल जाता है जो सब में व्यापक है जो अदृष्ट है और जिस का भेद नहीं पाया जा सकता।1।रहाउ। हे भाई ! मैं उस गुरू के सदके जाता हूँ, जिस ने (मुझे) सदा कायम रहने वाला हरि नाम दिया है। (जिस गुरू की कृपा से) मैं हर वक्त सदा स्थिर प्रभू को सलाहता रहता हूँ और सदा स्थिर प्रभू के गुण गाता रहता हूँ। (हे भाई! गुरू की मेहर से अब) सदा स्थिर हरि नाम (मेरी आत्मिक) खुराक बन गया है। सदा स्थिर हरि नाम (मेरी) पोशाक हो चुका है (आदर-सत्कार का कारण बन चुका है)। (अब मैं) सदा कायम रहने वाले प्रभू का सदा स्थिर नाम (हर वक्त जपता हूँ)।2। हे भाई ! गुरू वह व्यक्तित्व है (सख्शियत है) जो सारे फल देने के स्मर्थ है (गुरू की शरण पड़ने से हरेक) श्वास के साथ (हरेक) ग्रास के साथ (कभी भी परमात्मा) नहीं भूलता। हे भाई ! गुरू के बराबर और कोई (दाता) नहीं दिखता, आठों पहर उस (गुरू को) याद रख। जब गुरू मेहर की निगाह करता है, तो सारे गुणों के खजाने परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम प्राप्त हो जाता है।3। हे भाई ! जो परमात्मा सारी सृष्टि में व्यापक है, वह और गुरू एक रूप हैं। जिन मनुष्यों की पूर्व जन्म की नेक कमाई के संसकारों का लेखा अंकुरित होता है वही मनुष्य (गुरू की शरण पड़ के) परमात्मा का नाम सिमर के (ये श्रद्धा बनाते हैं कि परमात्मा सभ में व्यापक है)। हे नानक! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह मनुष्य आत्मिक मौत नहीं मरता। वह जनम मरण के चक्कर में नहीं पड़ता।4।30।100।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीरागु महला 1 घरु 1 असटपदीआ ॥ आखि आखि मनु वावणा जिउ जिउ जापै वाइ ॥ जिस नो वाइ सुणाईऐ सो केवडु कितु थाइ ॥ आखण वाले जेतड़े सभि आखि रहे लिव लाइ ॥1॥ बाबा अलहु अगम अपारु ॥ पाकी नाई पाक थाइ सचा परवदिगारु ॥1॥ रहाउ ॥ तेरा हुकमु न जापी केतड़ा लिखि न जाणै कोइ ॥ जे सउ साइर मेलीअहि तिलु न पुजावहि रोइ ॥ कीमति किनै न पाईआ सभि सुणि सुणि आखहि सोइ ॥2॥ पीर पैकामर सालक सादक सुहदे अउरु सहीद ॥ सेख मसाइक काजी मुला दरि दरवेस रसीद ॥ बरकति तिन कउ अगली पड़दे रहनि दरूद ॥3॥ पुछि न साजे पुछि न ढाहे पुछि न देवै लेइ ॥ आपणी कुदरति आपे जाणै आपे करणु करेइ ॥ सभना वेखै नदरि करि जै भावै तै देइ ॥4॥ थावा नाव न जाणीअहि नावा केवडु नाउ ॥ जिथै वसै मेरा पातिसाहु सो केवडु है थाउ ॥ अंबड़ि कोइ न सकई हउ किस नो पुछणि जाउ ॥5॥ वरना वरन न भावनी जे किसै वडा करेइ ॥ वडे हथि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥ हुकमि सवारे आपणै चसा न ढिल करेइ ॥6॥ सभु को आखै बहुतु बहुतु लैणै कै वीचारि ॥ केवडु दाता आखीऐ दे कै रहिआ सुमारि ॥ नानक तोटि न आवई तेरे जुगह जुगह भंडार ॥7॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्री राग महला 1 घरु 1 असटपदीआ ॥ ज्यों ज्यों किसी जीव को (प्रभू के गुणों) को बोलने की समझ पड़ती है (त्यों त्यों ये समझ भी आती जाती है कि उसके गुण) बयान कर कर के मन को खपाना ही है। जिस प्रभू को बोल के सुनाते हैं (जिस प्रभु के गुणों के बारे में बोल के औरों को बताते हैं, उसकी बाबत ये तो पता ही नहीं लगता कि) वह कितना बड़ा है और किस जगह पे (निवास रखता) है। वह सारे बयान करते थक जाते हैं, (गुणों में) सुरति जोड़ते रह जाते हैं।1। हे भाई! परमात्मा के गुणों तक पहुँच नहीं हो सकती, उसके गुणों का परला छोर नहीं ढूंढा जा सकता। उसकी उपमा पवित्र है, वह पवित्र स्थान पर (शोभायमान) है। वह सदा कायम रहने वाला प्रभू (सब जीवों को) पालने वाला है।1।रहाउ ॥ हे प्रभू ! किसी को भी ये समझ नहीं पड़ी कि आपका हुकम कितना अटॅल है। कोई भी आपके हुकम को बयान नहीं कर सकता। अगर सौ कवि भी एकत्र कर लिए जाएंतो भी वह बयान करने का व्यर्थ प्रयत्न करके आपके गुणों तक एक तिल मात्र नहीं पहुँच सकते। किसी भी जीव ने आपका मुल्य नहीं पाया, सारे जीव आपकी बाबत (दूसरों से) सुन सुन के ही कह देते हैं।2। (दनिया में) अनेकों पीर पैग़ंबर, औरों को जीवन राह बताने वाले, अनेकों शेख, काजी, मुल्ला और आपके दरवाजे तक पहुंचे हुए दरवेश आए (किसी को, हे प्रभू! आपके गुणों का अंत नहीं मिला, हाँ सिर्फ) उनको बहुत बरकति मिली, (उनके ही भाग्य जागे) जो (आपके दर पे) दुआ (अरजोई) करते रहते हैं।3। प्रभू ये जगत ना किसी से सलाह ले के बनाता है ना ही पूछ के नाश करता है। ना ही किसी की सलाह से शरीर में जीवात्मा डालता है, ना निकालता है। परमात्मा अपनी कुदरति स्वयं ही जानता है, स्वयं ही यह जगत रचना करता है। मेहर की निगाह करके सब जीवों की संभाल स्वयं ही करता है। जो उसे भाता है, उसको (अपने गुणों की कद्र) बख्शता है।4। (बेअंत पुरियां, धरतियां आदि हैं। इतनी बेअंत रचना है कि) सब जगहों के (पदार्थों के) नाम जाने नहीं जा सकते। बेअंत नामों में से वह कौन सा नाम हो सकता है जो इतना बड़ा हो कि परमात्मा के असल बडेपन को बयान कर सके? यह बात कोई नहीं बता सकता कि जहां सुष्टि का पातशाह प्रभु बसता है, वह जगह कितनी बड़ी है। किसी से भी ये पूछा नहीं जा सकता, क्योंकि, कोई जीव उस अवस्था तक पहुँच ही नहीं सकता (जहां वह परमात्मा की बुजुर्गी सही सही बता सके)।5। (ये भी नहीं कहा जा सकता कि) परमात्मा को कोई खास ऊँची या नीची जाति भाती है या नहीं भाती और इस तरह वह किसी एक जाति को ऊंचा कर देता है। सब वडिआईआं बड़े प्रभू के अपने हाथ में हैं। जो जीव उसे अच्छा लगता है उसे वडिआई बख्श देता है। अपनी रजा में ही वह जीव के जीवन को संवार देता है, रॅती भर भी ढील नहीं करता।6। परमात्मा से दातें लेने के ख्याल से हरेक जीव बहुत बहुत मांगे मांगता है। यह बताया नहीं जा सकता कि परमात्मा कितना बड़ा दाता है। वह दातें दे रहा है, पर दातें गिनती से परे हैं। हे नानक! (कह, हे प्रभू!) आपके खजाने सदा ही भरे रहते हैं, इनमें कभी भी कमी नहीं आ सकती।7।1।
महला 1 ॥ सभे कंत महेलीआ सगलीआ करहि सीगारु ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ सारी जीव-सि्त्रयां प्रभु पति की ही हैं, सारी ही (उस प्रभू पति को प्रसन्न करने के लिए) श्रृंगार करती हैं।
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! गुरू की सेवा जरूर फल देती है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।