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अंग 54

अंग
54
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गणत गणावणि आईआ सूहा वेसु विकारु ॥
पाखंडि प्रेमु न पाईऐ खोटा पाजु खुआरु ॥1॥
हरि जीउ इउ पिरु रावै नारि ॥
तुधु भावनि सोहागणी अपणी किरपा लैहि सवारि ॥1॥ रहाउ ॥
गुर सबदी सीगारीआ तनु मनु पिर कै पासि ॥
दुइ कर जोड़ि खड़ी तकै सचु कहै अरदासि ॥
लालि रती सच भै वसी भाइ रती रंगि रासि ॥2॥
प्रिअ की चेरी कांढीऐ लाली मानै नाउ ॥
साची प्रीति न तुटई साचे मेलि मिलाउ ॥
सबदि रती मनु वेधिआ हउ सद बलिहारै जाउ ॥3॥
सा धन रंड न बैसई जे सतिगुर माहि समाइ ॥
पिरु रीसालू नउतनो साचउ मरै न जाइ ॥
नित रवै सोहागणी साची नदरि रजाइ ॥4॥
साचु धड़ी धन माडीऐ कापड़ु प्रेम सीगारु ॥
चंदनु चीति वसाइआ मंदरु दसवा दुआरु ॥
दीपकु सबदि विगासिआ राम नामु उर हारु ॥5॥
नारी अंदरि सोहणी मसतकि मणी पिआरु ॥
सोभा सुरति सुहावणी साचै प्रेमि अपार ॥
बिनु पिर पुरखु न जाणई साचे गुर कै हेति पिआरि ॥6॥
निसि अंधिआरी सुतीए किउ पिर बिनु रैणि विहाइ ॥
अंकु जलउ तनु जालीअउ मनु धनु जलि बलि जाइ ॥
जा धन कंति न रावीआ ता बिरथा जोबनु जाइ ॥7॥
सेजै कंत महेलड़ी सूती बूझ न पाइ ॥
हउ सुती पिरु जागणा किस कउ पूछउ जाइ ॥
सतिगुरि मेली भै वसी नानक प्रेमु सखाइ ॥8॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पर, जो अपने श्रृंगार का दिखावा मान करती हैं उनका गाढ़ा लाल पहिरावा भी विकार (ही) पैदा करता है। क्योकि, दिखावा करने से प्रभू का प्यार नहीं मिलता। (अंदर खोट हो और बाहर से प्रेम का दिखावा हो) यह खोटा दिखावा खुआर (नाश) ही करता है।1। हे प्रभू जी ! वह जीव-सि्त्रयां सुहाग भाग वालियां हैं जो आपको अच्छी लगती हैं। जिनको आप अपनी मेहर से खुद सुचज्जियां बना लेता है, यह श्रद्धा धारी प्रभु पति जीव-सि्त्रयों को प्यार करता है।1।रहाउ। पर, जो जीव स्त्री गुरू के शबद के द्वारा (अपने जीवन को) संवारती है, जिसका शरीर पति प्रभु के हवाले है, जिसका मन पति प्रभू के हवाले है (भाव, जिसका मन और जिसकी ज्ञानेद्रियां प्रभू की याद से अलग कुराहे नहीं जाते), जो दोनों हाथ जोड़ के पूरी श्रद्धा से (प्रभू पति का आसरा ही) देखती है, जो सदा स्थिर प्रभू को ही याद करती है और उसके दर पे अरजोईयां करती है, वह प्रभू प्रीतम (के प्यार) में रंगी रहती है। वह सदा स्थिर प्रभू के डर अदब में टिकी रहती है, वह प्रभू के प्रेम में रंगी रहती है, तथा उस के रंग में रसी रहती है।2। जो (प्रभू चरणों की) सेविका प्रभू के नाम को मानती है (प्रभू के नाम को ही अपनी जिंदगी का आसरा बनाती है) वह प्रभू पति की दासी कही जाती है, प्रभू के साथ उसकी प्रीति सदा कायम रहती है,सदा स्थिर प्रभू की संगति में (चरणों में) उसका मिलाप बना रहता है। प्रभू की सिफति सलाह के शबद में वह रंगी रहती है, उसका मन परोया रहता है। मैं ऐसी जीव स्त्री से कुर्बान हूँ।3। अगर, जीव स्त्री गुरू (के शबद) में सुरति जोड़ के रखे, तो वह कभी विधवा (हो के) नहीं बेठती। (भाव, खसम सांई का हाथ सदा उसके सिर पर टिका रहता है, फिर वह) खसम (भी ऐसा है जो) आनंद का स्रोत है (जिसका प्यार नित्य) नया है, (जो) सदा कायम रहने वाला (है, जो) ना मरता है ना पैदा होता है। वह अपनी सदा स्थिर मेहर की नजर से अपनी रजा के मुताबिक सदा उस सुहागन जीव स्त्री को प्यार करता है।4। जो जीव-स्त्री सदा स्थिर प्रभू (की याद अपने हृदय में टिकाती है, यह मानो, पति प्रभू को प्रसन्न करने के लिए) केसों की लटें संवारती है, प्रभू के प्यार को (सुंदर) कपड़ा और (गहनों का) श्रृंगार बनाती है, जिसने प्रभू को अपने चित्त में बसाया है (और यह जैसे उसके माथे पर) चंदन (का टीका लगाया) है, जिसने अपने दसवें द्वार (दिमाग, चिक्त-आकाश) को (पति प्रभू के रहने के लिए) सुंदर घर बनाया है। जो गुरू के शबद द्वारा (अपने हृदय को) हिलोरों में ले आई है। (और यह जैसे, उसके हृदय में) दीआ (जलाया है), जिसने परमात्मा के नाम को अपने गले का हार बना लिया है।5। जिसने अपने माथे पर प्रभू के प्यार का जड़ाऊ टिका लगाया हुआ है। जिसने सदा स्थिर रहने वाले बेअंत प्रभू के प्रेम में अपनी सुरति (जोड़ के) खबसूरति बना ली है (और, इसको वह अपनी) शोभा समझती है। वह जीव स्त्री और जीव सि्त्रयों (जानी मानी) खूबसूरति है, वह अपने गुरू के शबद के प्रेम प्यार में रह के सदा स्थिर सर्व-व्यापक प्रभू पति के बिना और किसी से जान-पहिचान नहीं डालती।6। माया के मोह की काली अंधियारी रात में सो रही जीव-स्त्री ! प्रभू पति के मिलाप के बगैर जिंदगी की रात आसान नहीं गुजर सकती। जल जाए वह हृदय और वह शरीर (जिसमें प्रभू की याद नहीं)। प्रभू की याद के बिना मन (विकारों में) जल-बल जाता है, माया धन भी व्यर्थ ही जाता है। अगर, जीव स्त्री को प्रभू पति ने प्यार नहीं किया, तो उसकी जवानी व्यर्थ ही चली जाती है।7। भाग्यहीन जीव स्त्री खसम प्रभू की सेज पर सो रही है, पर उसे ये समझ नहीं (कि हृदय सेज पर जीवात्मा और परमात्मा का इकट्ठा निवास है, पर माया के मोह में ग्रसित जीवात्मा को इस की सार नहीं है)। हे प्रभू पति ! मैं जीव-स्त्री (माया की मोह की नींद में) सोई रहती हूँ, आप पति सदा जागता है (आपको माया व्याप नहीं सकती); मैं किससे जा के पूछूँ (कि मैं किस तरह माया की नींद में से जाग के आपको मिल सकती हूँ) ? हे नानक! जिस जीव-स्त्री को सतिगुरू ने (प्रभू के चरणों में) मिला लिया है, वह परमात्मा के भय-अदब में रहती है, परमात्मा का प्यार उसका (जीवन) साथी बन जाता है।8।2।
सिरीरागु महला 1 ॥
आपे गुण आपे कथै आपे सुणि वीचारु ॥
आपे रतनु परखि तूं आपे मोलु अपारु ॥
साचउ मानु महतु तूं आपे देवणहारु ॥1॥
हरि जीउ तूं करता करतारु ॥
जिउ भावै तिउ राखु तूं हरि नामु मिलै आचारु ॥1॥ रहाउ ॥
आपे हीरा निरमला आपे रंगु मजीठ ॥
आपे मोती ऊजलो आपे भगत बसीठु ॥
गुर कै सबदि सलाहणा घटि घटि डीठु अडीठु ॥2॥
आपे सागरु बोहिथा आपे पारु अपारु ॥
साची वाट सुजाणु तूं सबदि लघावणहारु ॥
निडरिआ डरु जाणीऐ बाझु गुरू गुबारु ॥3॥
असथिरु करता देखीऐ होरु केती आवै जाइ ॥
आपे निरमलु एकु तूं होर बंधी धंधै पाइ ॥
गुरि राखे से उबरे साचे सिउ लिव लाइ ॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्रीरागु महला 1 ॥ प्रभू खुद ही (अपने) गुण है, खुद ही (अपने गुणों को) बयान करता है, खुद ही (अपनी सिफति सलाह) सुन के उस को विचारता है (उस में सुरति जोड़ता है)। हे प्रभू आप खुद ही (अपना नाम रूप) रत्न है। आप स्वयं ही उस रत्न का मुल्य डालने वाला है, आप स्वयं ही (अपने नाम रूपी रत्न का) बेअंत मूल्य है। आप स्वयं ही सदा कायम रहने वाला गर्व है, बड़प्पन है, आप स्वयं ही (जीवों को आदर सत्कार) देने वाला है।1। हे प्रभू जी! (हरेक चीज को) पैदा करने वाला आप स्वयं ही है। हे प्रभु! जैसे तूझे ठीक लगे, मुझे (अपने नाम में जोड़ के) रख। हे हरि! (मेहर कर) मुझे आपका नाम मिल जाए। आपका नाम ही मेरे वास्ते (बढ़िया से बढ़िया) कर्तव्य है।1।रहाउ। हे प्रभू ! आप खुद ही चमकता हीरा है, आप खंद ही मजीठ का रंग है, आप खुद ही चमकता मोती है, आप खुद ही (अपने) भक्तों का विचोला है। सत्गुरू के शबद से आपकी सिफत सलाह हैं सकती है। हरेक शरीर में आप ही दिखाई दे रहा है और आप ही अदृष्ट है।2। हे प्रभू! (यह संसार-) समुंद्र आप खुद ही है, (इस में से पार लंघाने वाला) जहाज़ भी आप खुद ही है। (इस संसार-समुंद्र का) इस पार का और उसपार का छोर भी आप स्वयं ही है। (हे प्रभू! आपकी भक्ति-रूप) मार्ग भी आप स्वयं ही है, आप सब कुछ जानता है। गुरू शबद के द्वारा (इस संसार समुंद्र में से भक्ति द्वारा) पार लंघाने वाला भी आप ही है। गुरू की शरण के बिना (ये जीवन-यात्रा, जीवों के लिए) घोर अंधेरा है। हे प्रभू ! जो जीव आपका डर-भय नही रखते, उनको दुनिया का सहम सहना पड़ता है।3। (इस जगत में) एक करतार ही सदा स्थिर रहने वाला दिखाई देता है, और बेअंत सृष्टि पैदा होती मरती रहती है। हे प्रभू ! एक आप ही (माया के मोह की) मैल से साफ है, बाकी सारी दुनिया (माया के मोह के) बंधन में बंधी हुई है। जिनको गुरू ने (इस मोह से) बचा लिया है, वह सदा स्थिर प्रभू (के चरणों) में सुरति जोड़ के बच गए हैं।4।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर, जो अपने श्रृंगार का दिखावा मान करती हैं उनका गाढ़ा लाल पहिरावा भी विकार (ही) पैदा करता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।