अंग
52
राग Siree Raag
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ਬੰਧਨ ਮੁਕਤੁ ਸੰਤਹੁ ਮੇਰੀ ਰਾਖੈ ਮਮਤਾ ॥੩॥
ਭਏ ਕਿਰਪਾਲ ਠਾਕੁਰ ਰਹਿਓ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਨਾਨਕ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਣਾ ॥੪॥੨੭॥੯੭॥
ਭਏ ਕਿਰਪਾਲ ਠਾਕੁਰ ਰਹਿਓ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਨਾਨਕ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਣਾ ॥੪॥੨੭॥੯੭॥
बंधन मुकतु संतहु मेरी राखै ममता ॥३॥
भए किरपाल ठाकुर रहिओ आवण जाणा ॥
गुर मिलि नानक पारब्रहमु पछाणा ॥४॥२७॥९७॥
भए किरपाल ठाकुर रहिओ आवण जाणा ॥
गुर मिलि नानक पारब्रहमु पछाणा ॥४॥२७॥९७॥
हिन्दी अर्थ: हे संत जनों ! पिता प्रभू मुझे माया के बंधनों से आजाद करने वाला है। वह मुझे अपना जानता है।3। हे नानक ! पालणहार प्रभू जी जिस मनुष्य पर दया करते हैं~ उसके जनम-मरन का चक्कर खत्म हो जाता है। गुरू को मिल के ही वह मनुष्य उस बेअंत परमात्मा के साथ गहरी सांझ पा लेता है।4।27।97।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧ ॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਮਿਲਿ ਭਾਈਆ ਕਟਿਅੜਾ ਜਮਕਾਲੁ ॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵੁਠਾ ਹੋਆ ਖਸਮੁ ਦਇਆਲੁ ॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਬਿਨਸਿਆ ਸਭੁ ਜੰਜਾਲੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰਾ ਹਉ ਤੁਧੁ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥
ਤੇਰੇ ਦਰਸਨ ਕਉ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਤੁਸਿ ਦਿਤਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨ ਤੂੰ ਸੇਵਿਆ ਭਾਉ ਕਰਿ ਸੇਈ ਪੁਰਖ ਸੁਜਾਨ ॥
ਤਿਨਾ ਪਿਛੈ ਛੁਟੀਐ ਜਿਨ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਦਾਤਾ ਕੋ ਨਹੀ ਜਿਨਿ ਦਿਤਾ ਆਤਮ ਦਾਨੁ ॥੨॥
ਆਏ ਸੇ ਪਰਵਾਣੁ ਹਹਿ ਜਿਨ ਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਸੁਭਾਇ ॥
ਸਚੇ ਸੇਤੀ ਰਤਿਆ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਜਾਇ ॥
ਕਰਤੇ ਹਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇ ॥੩॥
ਸਚੁ ਕਰਤਾ ਸਚੁ ਕਰਣਹਾਰੁ ਸਚੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਟੇਕ ॥
ਸਚੋ ਸਚੁ ਵਖਾਣੀਐ ਸਚੋ ਬੁਧਿ ਬਿਬੇਕ ॥
ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਜੀਵੈ ਏਕ ॥੪॥੨੮॥੯੮॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਮਿਲਿ ਭਾਈਆ ਕਟਿਅੜਾ ਜਮਕਾਲੁ ॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵੁਠਾ ਹੋਆ ਖਸਮੁ ਦਇਆਲੁ ॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਬਿਨਸਿਆ ਸਭੁ ਜੰਜਾਲੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰਾ ਹਉ ਤੁਧੁ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥
ਤੇਰੇ ਦਰਸਨ ਕਉ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਤੁਸਿ ਦਿਤਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨ ਤੂੰ ਸੇਵਿਆ ਭਾਉ ਕਰਿ ਸੇਈ ਪੁਰਖ ਸੁਜਾਨ ॥
ਤਿਨਾ ਪਿਛੈ ਛੁਟੀਐ ਜਿਨ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਦਾਤਾ ਕੋ ਨਹੀ ਜਿਨਿ ਦਿਤਾ ਆਤਮ ਦਾਨੁ ॥੨॥
ਆਏ ਸੇ ਪਰਵਾਣੁ ਹਹਿ ਜਿਨ ਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਸੁਭਾਇ ॥
ਸਚੇ ਸੇਤੀ ਰਤਿਆ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਜਾਇ ॥
ਕਰਤੇ ਹਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇ ॥੩॥
ਸਚੁ ਕਰਤਾ ਸਚੁ ਕਰਣਹਾਰੁ ਸਚੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਟੇਕ ॥
ਸਚੋ ਸਚੁ ਵਖਾਣੀਐ ਸਚੋ ਬੁਧਿ ਬਿਬੇਕ ॥
ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਜੀਵੈ ਏਕ ॥੪॥੨੮॥੯੮॥
सिरीरागु महला ५ घरु १ ॥
संत जना मिलि भाईआ कटिअड़ा जमकालु ॥
सचा साहिबु मनि वुठा होआ खसमु दइआलु ॥
पूरा सतिगुरु भेटिआ बिनसिआ सभु जंजालु ॥१॥
मेरे सतिगुरा हउ तुधु विटहु कुरबाणु ॥
तेरे दरसन कउ बलिहारणै तुसि दिता अंम्रित नामु ॥१॥ रहाउ ॥
जिन तूं सेविआ भाउ करि सेई पुरख सुजान ॥
तिना पिछै छुटीऐ जिन अंदरि नामु निधानु ॥
गुर जेवडु दाता को नही जिनि दिता आतम दानु ॥२॥
आए से परवाणु हहि जिन गुरु मिलिआ सुभाइ ॥
सचे सेती रतिआ दरगह बैसणु जाइ ॥
करते हथि वडिआईआ पूरबि लिखिआ पाइ ॥३॥
सचु करता सचु करणहारु सचु साहिबु सचु टेक ॥
सचो सचु वखाणीऐ सचो बुधि बिबेक ॥
सरब निरंतरि रवि रहिआ जपि नानक जीवै एक ॥४॥२८॥९८॥
संत जना मिलि भाईआ कटिअड़ा जमकालु ॥
सचा साहिबु मनि वुठा होआ खसमु दइआलु ॥
पूरा सतिगुरु भेटिआ बिनसिआ सभु जंजालु ॥१॥
मेरे सतिगुरा हउ तुधु विटहु कुरबाणु ॥
तेरे दरसन कउ बलिहारणै तुसि दिता अंम्रित नामु ॥१॥ रहाउ ॥
जिन तूं सेविआ भाउ करि सेई पुरख सुजान ॥
तिना पिछै छुटीऐ जिन अंदरि नामु निधानु ॥
गुर जेवडु दाता को नही जिनि दिता आतम दानु ॥२॥
आए से परवाणु हहि जिन गुरु मिलिआ सुभाइ ॥
सचे सेती रतिआ दरगह बैसणु जाइ ॥
करते हथि वडिआईआ पूरबि लिखिआ पाइ ॥३॥
सचु करता सचु करणहारु सचु साहिबु सचु टेक ॥
सचो सचु वखाणीऐ सचो बुधि बिबेक ॥
सरब निरंतरि रवि रहिआ जपि नानक जीवै एक ॥४॥२८॥९८॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ घरु १॥ संत जन भाईयों से मिल के उसकी आत्मिक मौत का खतरा दूर हो जाता है। पति परमेश्वर उस पर दयावान होता है और सदा स्थिर मालिक प्रभू उसके मन में आ बसता है (जिस मनुष्य को) पूरा गुरू मिल जाता है~ उसका सारा माया मोह का जाल नाश हो जाता है। ।1। हे मेरे सतिगुरू ! मैं तूझसे कुर्बान जाता हूं~ मैं तेरे दर्शनों से सदके जाता हूं। तूने प्रसन्न हो के मुझे (प्रभु का) आत्मिक जीवन देने वाला नाम बख्शा है।1।रहाउ। (हे प्रभू !) जिन्होंने प्रेम से तुझे सिमरा है~ वही सयाने मनुष्य हैं। जिन के हृदय में (तेरा) नाम खजाना बसता है। उन की ही शरन पड़ के (विकारों से बच जाते हैं)। (पर नाम की यह दात गुरू से ही मिलती है)। गुरू जितना और कोई दाता नहीं है क्योंकि उसने आत्मिक जीवन की दात दी है।2। जिनको प्यार की बरकति से गुरू आ मिलता है~ जगत में आए हुउ वही कबूल हैं। (गुरू की सहायता से) सदा स्थिर प्रभु (के नाम) में रंग के उनको परमात्मा की हजूरी में बैठने को जगह मिल जाती है। (पर यह सभ) आदर-सत्कार परमात्मा के (अपने) हाथ में हैं (जिस पे वह मेहर करता है~ वह मनुष्य) पहले जनम में की गई नेक कमाई का लिखा लेख प्राप्त कर लेता है।3। जगत का कर्ता जो सब कुछ करने के स्मर्थ है और सबका मालिक है। सदा ही कायम रहने वाला है~ वही सबका सहारा है। हरेक जीव उसी को ही सदा स्थिर रहने वाला कहता है। वह सदा स्थिर प्रभू ही (असली) परख की बुद्धि रखने वाला है~ सभ जीवों के अंदर व्यापक है, हे नानक! जो मनुष्य उस एक प्रभू (का नाम) जपता है उसको आत्मिक जीवन प्राप्त होता है।4।28।98।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸੁਰੁ ਪੂਜੀਐ ਮਨਿ ਤਨਿ ਲਾਇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਜੀਅ ਕਾ ਸਭਸੈ ਦੇਇ ਅਧਾਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨ ਕਮਾਵਣੇ ਸਚਾ ਏਹੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਬਿਨੁ ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਰਤਿਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਛਾਰੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਸਾਜਨ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਪੂਰਨ ਹੋਵੈ ਘਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰੁ ਸਮਰਥੁ ਅਪਾਰੁ ਗੁਰੁ ਵਡਭਾਗੀ ਦਰਸਨੁ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰੁ ਅਗੋਚਰੁ ਨਿਰਮਲਾ ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰੁ ਕਰਤਾ ਗੁਰੁ ਕਰਣਹਾਰੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਿਛੁ ਨਹੀ ਗੁਰੁ ਕੀਤਾ ਲੋੜੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥੨॥
ਗੁਰੁ ਤੀਰਥੁ ਗੁਰੁ ਪਾਰਜਾਤੁ ਗੁਰੁ ਮਨਸਾ ਪੂਰਣਹਾਰੁ ॥
ਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੇਇ ਉਧਰੈ ਸਭੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰੁ ਸਮਰਥੁ ਗੁਰੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਗੁਰੁ ਊਚਾ ਅਗਮ ਅਪਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਅਗਮ ਹੈ ਕਿਆ ਕਥੇ ਕਥਨਹਾਰੁ ॥੩॥
ਜਿਤੜੇ ਫਲ ਮਨਿ ਬਾਛੀਅਹਿ ਤਿਤੜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
ਪੂਰਬ ਲਿਖੇ ਪਾਵਣੇ ਸਾਚੁ ਨਾਮੁ ਦੇ ਰਾਸਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣੀ ਆਇਆਂ ਬਾਹੁੜਿ ਨਹੀ ਬਿਨਾਸੁ ॥
ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਕਦੇ ਨ ਵਿਸਰਉ ਏਹੁ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਤੇਰਾ ਸਾਸੁ ॥੪॥੨੯॥੯੯॥
ਗੁਰੁ ਪਰਮੇਸੁਰੁ ਪੂਜੀਐ ਮਨਿ ਤਨਿ ਲਾਇ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਜੀਅ ਕਾ ਸਭਸੈ ਦੇਇ ਅਧਾਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨ ਕਮਾਵਣੇ ਸਚਾ ਏਹੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਬਿਨੁ ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਰਤਿਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਛਾਰੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਸਾਜਨ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਪੂਰਨ ਹੋਵੈ ਘਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰੁ ਸਮਰਥੁ ਅਪਾਰੁ ਗੁਰੁ ਵਡਭਾਗੀ ਦਰਸਨੁ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰੁ ਅਗੋਚਰੁ ਨਿਰਮਲਾ ਗੁਰ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰੁ ਕਰਤਾ ਗੁਰੁ ਕਰਣਹਾਰੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਿਛੁ ਨਹੀ ਗੁਰੁ ਕੀਤਾ ਲੋੜੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥੨॥
ਗੁਰੁ ਤੀਰਥੁ ਗੁਰੁ ਪਾਰਜਾਤੁ ਗੁਰੁ ਮਨਸਾ ਪੂਰਣਹਾਰੁ ॥
ਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੇਇ ਉਧਰੈ ਸਭੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰੁ ਸਮਰਥੁ ਗੁਰੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਗੁਰੁ ਊਚਾ ਅਗਮ ਅਪਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਅਗਮ ਹੈ ਕਿਆ ਕਥੇ ਕਥਨਹਾਰੁ ॥੩॥
ਜਿਤੜੇ ਫਲ ਮਨਿ ਬਾਛੀਅਹਿ ਤਿਤੜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
ਪੂਰਬ ਲਿਖੇ ਪਾਵਣੇ ਸਾਚੁ ਨਾਮੁ ਦੇ ਰਾਸਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣੀ ਆਇਆਂ ਬਾਹੁੜਿ ਨਹੀ ਬਿਨਾਸੁ ॥
ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਕਦੇ ਨ ਵਿਸਰਉ ਏਹੁ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਤੇਰਾ ਸਾਸੁ ॥੪॥੨੯॥੯੯॥
सिरीरागु महला ५ ॥
गुरु परमेसुरु पूजीऐ मनि तनि लाइ पिआरु ॥
सतिगुरु दाता जीअ का सभसै देइ अधारु ॥
सतिगुर बचन कमावणे सचा एहु वीचारु ॥
बिनु साधू संगति रतिआ माइआ मोहु सभु छारु ॥१॥
मेरे साजन हरि हरि नामु समालि ॥
साधू संगति मनि वसै पूरन होवै घाल ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु समरथु अपारु गुरु वडभागी दरसनु होइ ॥
गुरु अगोचरु निरमला गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥
गुरु करता गुरु करणहारु गुरमुखि सची सोइ ॥
गुर ते बाहरि किछु नही गुरु कीता लोड़े सु होइ ॥२॥
गुरु तीरथु गुरु पारजातु गुरु मनसा पूरणहारु ॥
गुरु दाता हरि नामु देइ उधरै सभु संसारु ॥
गुरु समरथु गुरु निरंकारु गुरु ऊचा अगम अपारु ॥
गुर की महिमा अगम है किआ कथे कथनहारु ॥३॥
जितड़े फल मनि बाछीअहि तितड़े सतिगुर पासि ॥
पूरब लिखे पावणे साचु नामु दे रासि ॥
सतिगुर सरणी आइआं बाहुड़ि नही बिनासु ॥
हरि नानक कदे न विसरउ एहु जीउ पिंडु तेरा सासु ॥४॥२९॥९९॥
गुरु परमेसुरु पूजीऐ मनि तनि लाइ पिआरु ॥
सतिगुरु दाता जीअ का सभसै देइ अधारु ॥
सतिगुर बचन कमावणे सचा एहु वीचारु ॥
बिनु साधू संगति रतिआ माइआ मोहु सभु छारु ॥१॥
मेरे साजन हरि हरि नामु समालि ॥
साधू संगति मनि वसै पूरन होवै घाल ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु समरथु अपारु गुरु वडभागी दरसनु होइ ॥
गुरु अगोचरु निरमला गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥
गुरु करता गुरु करणहारु गुरमुखि सची सोइ ॥
गुर ते बाहरि किछु नही गुरु कीता लोड़े सु होइ ॥२॥
गुरु तीरथु गुरु पारजातु गुरु मनसा पूरणहारु ॥
गुरु दाता हरि नामु देइ उधरै सभु संसारु ॥
गुरु समरथु गुरु निरंकारु गुरु ऊचा अगम अपारु ॥
गुर की महिमा अगम है किआ कथे कथनहारु ॥३॥
जितड़े फल मनि बाछीअहि तितड़े सतिगुर पासि ॥
पूरब लिखे पावणे साचु नामु दे रासि ॥
सतिगुर सरणी आइआं बाहुड़ि नही बिनासु ॥
हरि नानक कदे न विसरउ एहु जीउ पिंडु तेरा सासु ॥४॥२९॥९९॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ गुरू परमात्मा (का रूप) है। (गुरू के वास्ते अपने) मन में हृदय में प्यार बना के (उसको) अपने हृदय में आदर की जगह देनी चाहिए। गुरू आत्मिक जीवन देने वाला है। (गुरू) हरेक (शरण आए) जीव को (परमात्मा के नाम का) आसरा देता है। सबसे उक्तम यही है कि गुरू के बचन कमाए जाएं (गुरू के उपदेश के अनुसार जीवन का सृजना की जाए)। गुरू की संगति में प्यार पाए बिना (यह) माया का मोह (जो) सारे का सारा व्यर्थ है (जीव पर अपना जोर डाले रखता है)।1। हे मेरे मित्र ! परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसा (और गुरू चरणों में टिका रह)। गुरू की संगति में रहने से (परमात्मा का नाम) मन में बसता है~ और मेहनत सफल हो जाती है।1।रहाउ। गुरू सभ ताकतों का मालिक है~ गुरू बेअंत (गुणों वाला) है। सौभाग्यशाली मनुष्य को (ही) गुरू का दर्शन प्राप्त होता है। गुरू (उस प्रभू का रूप है जो) ज्ञानेंद्रियों की पहुँच से परे हैं~ गुरू पवित्र स्वरूप है। गुरू जितना बड़ा (व्यक्तित्व वाला) और कोई नही है। गुरू करतार (का रूप) है। गुरू (उस परमात्मा का रूप है जो) सब कुछ करने के स्मर्थ है। गुरू की शरण पड़ने से सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है। गुरू से बे-मुख हो के (आकी हो के) कोई काम नहीं किया जा सकता। जो कुछ गुरू करना चाहता है वही होता है (भाव~ गुरू उस प्रभू का रूप है जिससे कोई आकी नहीं हो सकता~ और जो कुछ वह करना चाहता है वही होता है)।2। गुरू (ही असल) तीर्थ है। गुरू ही पारजात वृक्ष है~ गुरू ही सारी कामनाएं पूरी करने वाला है। गुरू ही (वह) दाता है (जो) परमात्मा का नाम देता है (जिसकी बरकति से) सारा संसार (विकारों से) वचता है। गुरू (उस परमात्मा का रूप है जो) सभ ताकतों का मालिक है~ जिसका कोई खास स्वरूप नहीं बताया जा सकता~ जो सबसे ऊँचा है~ अपहुंच है और बेअंत है। गुरू की उपमा तक (शब्दों द्वारा) पहुँचा नहीं जा सकता। कोई भी (विद्वान से विद्वान) बयान करने वाला बयान नहीं कर सकता।3। जितने भी पदार्थों की मन में इच्छा धारी जाए~ वह सारे गुरू से प्राप्त हो जाते हैं। पहिले जनम में की नेक कमाई के लिखे लेख अनुसार (गुरू की शरण पड़ने से) मिल जाते हैं। गुरू सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम की पूँजी देता है। अगर~ गुरू की शरण आ पड़ें~ तो उससे मिले आत्मिक जीवन का फिर कभी नाश नहीं होता। हे नानक ! (कह) हे हरी! (गुरू की शरण पड़ के) मैं तुझे कभी ना भुलाऊँ। मेरी ये जीवात्मा~ मेरा यह शरीर और (शरीर में आते) श्वास~ सभ तेरा ही दिया हुआ है।4।29।99।
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੰਤ ਜਨਹੁ ਸੁਣਿ ਭਾਈਹੋ ਛੂਟਨੁ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਸਰੇਵਣੇ ਤੀਰਥ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ॥
ਆਗੈ ਦਰਗਹਿ ਮੰਨੀਅਹਿ ਮਿਲੈ ਨਿਥਾਵੇ ਥਾਉ ॥੧॥
ਸੰਤ ਜਨਹੁ ਸੁਣਿ ਭਾਈਹੋ ਛੂਟਨੁ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਸਰੇਵਣੇ ਤੀਰਥ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ॥
ਆਗੈ ਦਰਗਹਿ ਮੰਨੀਅਹਿ ਮਿਲੈ ਨਿਥਾਵੇ ਥਾਉ ॥੧॥
सिरीरागु महला ५ ॥
संत जनहु सुणि भाईहो छूटनु साचै नाइ ॥
गुर के चरण सरेवणे तीरथ हरि का नाउ ॥
आगै दरगहि मंनीअहि मिलै निथावे थाउ ॥१॥
संत जनहु सुणि भाईहो छूटनु साचै नाइ ॥
गुर के चरण सरेवणे तीरथ हरि का नाउ ॥
आगै दरगहि मंनीअहि मिलै निथावे थाउ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ५ ॥ हे भाईयो ! हे संत जनों ! (ध्यान से) सुनो। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ने से ही (विकारों से) खलासी होती है। (पर यह नाम गुरू के पास से ही मिल सकता है) गुरू के चरण पूजने (भाव~ अहम् त्याग के गुरू की शरण पड़ना और गुरू के सन्मुख रह कर) परमात्मा का नाम (जपना) ही (सारे) तीर्थो (का तीर्थ) है। (इसकी बरकति से) परलोक में परमात्मा की दरगाह में (भाग्यशाली जीव) आदर पाते हैं। जिस मनुष्य को और कहीं भी आसरा नहीं मिलता~ उसको (प्रभू की दरगाह में) आसरा मिल जाता है।1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 52 है, राग Siree Raag का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
सीस-गंज साहिब के बाहर Chandni Chowk की भीड़ और अंदर का shrine, दोनों एक साथ।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 52” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Siree Raag राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 53 →, पीछे का: ← अंग 51।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।