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अंग 529

अंग
529
राग Dayv Gandhaaree
राग: Dayv Gandhaaree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
देवगंधारी ॥
माई सुनत सोच भै डरत ॥
मेर तेर तजउ अभिमाना सरनि सुआमी की परत ॥1॥ रहाउ ॥
जो जो कहै सोई भल मानउ नाहि न का बोल करत ॥
निमख न बिसरउ हीए मोरे ते बिसरत जाई हउ मरत ॥1॥
सुखदाई पूरन प्रभु करता मेरी बहुतु इआनप जरत ॥
निरगुनि करूपि कुलहीण नानक हउ अनद रूप सुआमी भरत ॥2॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ हे माँ ! (पति प्रभू की शरण ना पड़ने वालियों की दशा) सुन के मुझे चिंता छा जाती है।मुझमें डर-सहम व्याप्तता है।मैं डरती हूँ (कि कहीं मेरा भी ऐसा हाल ना हो। इस वास्ते मेरा सदा ही ये तमन्ना रहती है कि) मालिक-प्रभू की शरण पड़ी रहके मैं (अपने अंदर से) मेर-तेर गवा दूँ।अहंकार त्याग दूँ। 1।रहाउ। हे माँ ! प्रभू-पति जो जो हुकम करता है।मैं उसी में भला समझती हूँ।मैं (उसकी मर्जी के बारे में) कोई उल्टा बोल नहीं बोलती। (हे माँ ! मेरी सदैव ये प्रार्थना है कि) पलक झपकने जितने समय के लिए भी वह प्रभू-पति मेरे हृदय से ना बिसरे।(उसको) भूलने से मुझे आत्मिक मौत आ जाती है। 1। हे माँ ! वह सर्व-व्यापक कर्ता-प्रभू (मुझे) सारे सुख देने वाला है।मेरे अंजानेपन को वह बहुत बर्दाश्त करता रहता है। हे नानक ! (कह, हे माँ !) मैं गुण-हीन हूँ।मैं कुरूप हूँ।मेरी कुल भी श्रेष्ठ नहीं है; पर मेरा पति-प्रभू सदा खिले माथे (आनंदमयी) रहने वाला है। 2। 3।
देवगंधारी ॥
मन हरि कीरति करि सदहूं ॥
गावत सुनत जपत उधारै बरन अबरना सभहूं ॥1॥ रहाउ ॥
जह ते उपजिओ तही समाइओ इह बिधि जानी तबहूं ॥
जहा जहा इह देही धारी रहनु न पाइओ कबहूं ॥1॥
सुखु आइओ भै भरम बिनासे क्रिपाल हूए प्रभ जबहू ॥
कहु नानक मेरे पूरे मनोरथ साधसंगि तजि लबहूं ॥2॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ हे (मेरे) मन ! सदा ही परमात्मा की सिफत सालाह करता रह। (सिफत सालाह के गीत) गाने वालों को।सुनने वालों को।नाम जपने वालों को।सभी को (चाहे वह) ऊँची जाति वाले (हों।चाहे) नीच जाति वाले – सबको परमात्मा संसार समुंद्र से बचा लेता है। 1।रहाउ। (हे मेरे मन ! जब सिफत सालाह करते रहें) तब ही ये बिधि समझ में आती है कि जिस प्रभू से जीव पैदा होता है (सिफत सालाह की बरकति से) उसी में लीन हो जाता है। (हे मन !) जहाँ जहाँ भी परमात्मा ने शरीर-रचना की है।कभी भी कोई सदा यहाँ टिका नहीं रह सकता। 1। (हे मेरे मन ! सदा सिफत सालाह करता रह) परमात्मा जब दयावान होता है (उसकी मेहर से) आनंद (हृदय में) आ बसता है।और।सारे डर भ्रम नाश हो जाते हैं। हे नानक ! कह, साध-संगति में (सिफत-सालाह की बरकति से) लालच त्याग के सारे मनोरथ पूरे हो गए हैं। 2। 4।
देवगंधारी ॥
मन जिउ अपुने प्रभ भावउ ॥
नीचहु नीचु नीचु अति नान॑ा होइ गरीबु बुलावउ ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक अडंबर माइआ के बिरथे ता सिउ प्रीति घटावउ ॥
जिउ अपुनो सुआमी सुखु मानै ता महि सोभा पावउ ॥1॥
दासन दास रेणु दासन की जन की टहल कमावउ ॥
सरब सूख बडिआई नानक जीवउ मुखहु बुलावउ ॥2॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ हे मेरे मन ! जैसे भी हो सके मैं अपने उस प्रभू को अच्छा लगने लग जाऊँ। मैं नीचों से भी नीच हो के।बहुत छोटा हो के।निमाणा हो के।गरीब बन के।अपने प्रभ के आगे अरजोई करता रहता हूँ। 1।रहाउ। हे मेरे मन ! माया के ये अनेकों पसारे व्यर्थ हैं (क्योंकि इनसे साथ टूट जाना है)।मैं इनसे अपना प्यार घटाए जा रहा हूँ। (मैं यही समझता हूँ कि) जैसे मेरा अपना मालिक प्रभू सुख मानता है।मैं भी उसी में (सुख मान के) इज्जत प्राप्त करता हूँ। 1। हे नानक ! (कह) मैं अपने दासों के दासों की चरण-धूड़ मांगता हूँ।मैं प्रभू के सेवकों की सेवा करता हूँ। सारे सुख सारे बड़प्पन मैं इसी में ही समझता हूँ।जब मैं अपने प्रभू को मुँह से बुलाता हूँ मैं आत्मिक जीवन हासिल कर लेता हूँ। 2। 5।
देवगंधारी ॥
प्रभ जी तउ प्रसादि भ्रमु डारिओ ॥
तुमरी क्रिपा ते सभु को अपना मन महि इहै बीचारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि पराध मिटे तेरी सेवा दरसनि दूखु उतारिओ ॥
नामु जपत महा सुखु पाइओ चिंता रोगु बिदारिओ ॥1॥
कामु क्रोधु लोभु झूठु निंदा साधू संगि बिसारिओ ॥
माइआ बंध काटे किरपा निधि नानक आपि उधारिओ ॥2॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ हे प्रभू जी ! आपकी मेहर से मैंने अपने मन की भटकना दूर कर ली है। आपकी कृपा से मैंने अपने मन में ये इरादा कर लिया है कि (आपका पैदा किया हुआ) हरेक प्राणी मेरा अपना ही है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपकी सेवा भक्ति करने से मेरे (पहले किए हुए) करोड़ों ही पाप मिट गए हैं।आपके दर्शनों से मैंने (अपने अंदर के हरेक) दुख दूर कर लिए हैं। आपका नाम जपते हुए मैंने बड़ा आनंद लिया है।और।चिंता रोग (अपने मन में से) हटा दिया है। 1। हे प्रभू ! गुरू की संगति में टिक के मैंने काम।क्रोध।लोभ।झूठ।निंदा (आदि विकारों को अपने मन में से) भुला लिया है। हे नानक ! (कह) हे कृपा के खजाने प्रभू ! तूने मेरे माया के बंधन काट दिए हैं।तूने खुद ही मुझे (संसार समुंद्र में से) बचा लिया है। 2। 6।
देवगंधारी ॥
मन सगल सिआनप रही ॥
करन करावनहार सुआमी नानक ओट गही ॥1॥ रहाउ ॥
आपु मेटि पए सरणाई इह मति साधू कही ॥
प्रभ की आगिआ मानि सुखु पाइआ भरमु अधेरा लही ॥1॥
जान प्रबीन सुआमी प्रभ मेरे सरणि तुमारी अही ॥
खिन महि थापि उथापनहारे कुदरति कीम न पही ॥2॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ हे नानक ! (कह) हे मेरे मन !उसकी (अपनी) सारी चतुराई खत्म हो जाती है। जो मनुष्य सब कुछ कर सकने और सब कुछ (जीवों से) करा सकने वाले परमात्मा मालिक का आसरा लेता है 1।रहाउ। हे मेरे मन ! गुरू की बताई हुई यह (अपनी चतुराई-समझदारी छोड़ देने वाली) शिक्षा जिन मनुष्यों ने ग्रहण की।और।जो स्वैभाव मिटा के प्रभू की शरण आ पड़े। उन्होंने प्रभू की रजा मान के आत्मिक आनंद पाया।उनके अंदर से भ्रम (-रूपी) अंधकार दूर हो गया। 1। हे सुजान और समझदार मालिक ! हे मेरे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। हे एक छिन में पैदा करके नाश करने की ताकत रखने वाले प्रभू ! (किसी तरफ से भी) आपकी ताकत का मूल्य नहीं पड़ सकता। 1। 7।
देवगंधारी महला 5 ॥
हरि प्रान प्रभू सुखदाते ॥
गुर प्रसादि काहू जाते ॥1॥ रहाउ ॥
संत तुमारे तुमरे प्रीतम तिन कउ काल न खाते ॥
रंगि तुमारै लाल भए है राम नाम रसि माते ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी महला 5 ॥ हे जीवन देने वाले हरी ! हे सुख देने वाले प्रभू ! किसी विरले मनुष्य ने गुरू की कृपा से आपके साथ गहरी सांझ डाल ली है। 1।रहाउ। हे प्रीतम प्रभू ! जो आपके संत आपके ही बने रहते हैं।आत्मिक मौत उनके स्वच्छता भरे जीवन को समाप्त नहीं कर सकती। हे प्रभू ! वह आपके संत आपके प्रेम रंग में लाल हुए रहते हैं।वह आपके नाम-रस में मस्त रहते हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “देवगंधारी ॥ हे माँ ! (पति प्रभू की शरण ना पड़ने वालियों की दशा) सुन के मुझे चिंता छा जाती है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।