रागु देवगंधारी महला 4 घरु 1 ॥
सेवक जन बने ठाकुर लिव लागे ॥
जो तुमरा जसु कहते गुरमति तिन मुख भाग सभागे ॥1॥ रहाउ ॥
टूटे माइआ के बंधन फाहे हरि राम नाम लिव लागे ॥
हमरा मनु मोहिओ गुर मोहनि हम बिसम भई मुखि लागे ॥1॥
सगली रैणि सोई अंधिआरी गुर किंचत किरपा जागे ॥
जन नानक के प्रभ सुंदर सुआमी मोहि तुम सरि अवरु न लागे ॥2॥1॥
मेरो सुंदरु कहहु मिलै कितु गली ॥
हरि के संत बतावहु मारगु हम पीछै लागि चली ॥1॥ रहाउ ॥
प्रिअ के बचन सुखाने हीअरै इह चाल बनी है भली ॥
लटुरी मधुरी ठाकुर भाई ओह सुंदरि हरि ढुलि मिली ॥1॥
एको प्रिउ सखीआ सभ प्रिअ की जो भावै पिर सा भली ॥
नानकु गरीबु किआ करै बिचारा हरि भावै तितु राहि चली ॥2॥2॥
मेरे मन मुखि हरि हरि हरि बोलीऐ ॥
गुरमुखि रंगि चलूलै राती हरि प्रेम भीनी चोलीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
हउ फिरउ दिवानी आवल बावल तिसु कारणि हरि ढोलीऐ ॥
कोई मेलै मेरा प्रीतमु पिआरा हम तिस की गुल गोलीऐ ॥1॥
सतिगुरु पुरखु मनावहु अपुना हरि अंम्रितु पी झोलीऐ ॥
गुर प्रसादि जन नानक पाइआ हरि लाधा देह टोलीऐ ॥2॥3॥
अब हम चली ठाकुर पहि हारि ॥
जब हम सरणि प्रभू की आई राखु प्रभू भावै मारि ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ऑकार एक है, उसका नाम सत्य है, वह सम्पूर्ण सृष्टि को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह निडर है,वह कालातीत, वह जन्म-मरण के चक्र से रहित है, वह स्वतः प्रकाशमान हुआ है और उसकी लब्ध।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।