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अंग 527

अंग
527
राग Dayv Gandhaaree
राग: Dayv Gandhaaree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रागु देवगंधारी महला 4 घरु 1 ॥
सेवक जन बने ठाकुर लिव लागे ॥
जो तुमरा जसु कहते गुरमति तिन मुख भाग सभागे ॥1॥ रहाउ ॥
टूटे माइआ के बंधन फाहे हरि राम नाम लिव लागे ॥
हमरा मनु मोहिओ गुर मोहनि हम बिसम भई मुखि लागे ॥1॥
सगली रैणि सोई अंधिआरी गुर किंचत किरपा जागे ॥
जन नानक के प्रभ सुंदर सुआमी मोहि तुम सरि अवरु न लागे ॥2॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: ऑकार एक है, उसका नाम सत्य है, वह सम्पूर्ण सृष्टि को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह निडर है,वह कालातीत, वह जन्म-मरण के चक्र से रहित है, वह स्वतः प्रकाशमान हुआ है और उसकी लब्धि गुरु-कृपा से होती है। रागु देवगंधारी महला 4 घरु 1 ॥ (हे भाई !) जिन मनुष्यों की प्रीति मालिक प्रभू (के चरणों) से लग जाती है वह मालिक के (सच्चे) सेवक।(सच्चे) दास बन जाते हैं। (हे प्रभू !) जो मनुष्य गुरू की मति पर चल के आपकी सिफत सालाह करते हैं।उनके मुँह सुंदर भाग्यों वाले हैं जाते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा के नाम से जिन मनुष्यों की लगन लग जाती है।उन के माया (के मोह) के बंधन टूट जाते हैं।स्वतंत्र हो जाते हैं। (हे सखी ! मन को) मोह लेने वाले गुरू ने मेरा मन अपने प्यार में बाँध लिया है।उस सोहाने गुरू के दर्शन करके मैं मस्त हो गई हूँ।(इस वास्ते माया के मोह के रस्से मेरे पास नहीं फटकते)। 1। (हे सखी !) मैं (जिंदगी की) सारी रात माया के मोह के अंधेरे में सोई रही (आत्मिक जीवन के बारे में बेसुध रही)।अब गुरू की थोड़ी सी कृपा से मैं जाग पड़ी हूँ। हे दास नानक के सुंदर मालिक प्रभू ! मुझे (अब) आपके जैसा कोई और नहीं दिखता। 2। 1।
देवगंधारी ॥
मेरो सुंदरु कहहु मिलै कितु गली ॥
हरि के संत बतावहु मारगु हम पीछै लागि चली ॥1॥ रहाउ ॥
प्रिअ के बचन सुखाने हीअरै इह चाल बनी है भली ॥
लटुरी मधुरी ठाकुर भाई ओह सुंदरि हरि ढुलि मिली ॥1॥
एको प्रिउ सखीआ सभ प्रिअ की जो भावै पिर सा भली ॥
नानकु गरीबु किआ करै बिचारा हरि भावै तितु राहि चली ॥2॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ हे हरी के संत जनो ! मुझे बताओ।मेरा सोहाना प्रीतम किस गली में मिलेगा। मुझे (उस गली का) रास्ता बताओ (ता कि) मैं भी आपके पीछे-पीछे चली चलूँ। 1।रहाउ। (हे जिज्ञासु जीव स्त्री !) जिसके हृदय में प्यारे प्रभू की सिफत-सालाह के बचन सुखद बन जाते हैं।जिसको जीवन की चाल अच्छी लगने लग पड़ती है। वह (पहले चाहे) लटोर (थी) मदरी (थी।वह) मालिक प्रभू को प्यारी लगने लग पड़ती है।वह सुंदर जीव-स्त्री विनिम्रता धार के प्रभू चरणों में मिल जाती है। 1। (हे सखी !) एक परमात्मा ही सब का पति है।सारी सखियां (जीव-सि्त्रयां) उस प्यारे की ही हैं।पर जो पति-प्रभू को पसंद आ जाती है वह अच्छी बन जाती है। बिचारा गरीब नानक (उसके रास्ते पर चलने के लिए) क्या कर सकता है।जो जीव-स्त्री हरी-प्रभू को अच्छी लग जाए।वही उस रास्ते पर चल सकती है। 2।
देवगंधारी ॥
मेरे मन मुखि हरि हरि हरि बोलीऐ ॥
गुरमुखि रंगि चलूलै राती हरि प्रेम भीनी चोलीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
हउ फिरउ दिवानी आवल बावल तिसु कारणि हरि ढोलीऐ ॥
कोई मेलै मेरा प्रीतमु पिआरा हम तिस की गुल गोलीऐ ॥1॥
सतिगुरु पुरखु मनावहु अपुना हरि अंम्रितु पी झोलीऐ ॥
गुर प्रसादि जन नानक पाइआ हरि लाधा देह टोलीऐ ॥2॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ हे मेरे मन ! मुँह से सदा परमात्मा का नाम उचारना चाहिए। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर जो जीव-स्त्री (प्रभू-प्रेम के) गाढ़े रंग में रंगी जाती है उसकी हृदय-चोली प्रभू-प्रेम से तरो-तर रहती है। 1।रहाउ। हे भाई ! मैं उस प्यारे हरी-प्रभू को मिलने के वास्ते कमली हुई फिरती हूँ।झल्ली हुई फिरती हूँ। अगर कोई मुझे मेरा प्यारा प्रभू-प्रीतम मिला दे।तो मैं उसकी दासियों की दासी (बनने को तैयार हूँ)। 1। (हे जिज्ञासु जीव-स्त्री !) आप अपने गुरू सत्पुरख को प्रसन्न कर ले (गुरू के बताए हुए राह पर चलना शुरू कर।और उसका दिया हुआ) आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-जल प्रेम से पीती रह (यही तरीका है ढोल-हरी को मिलने का)। हे दास नानक ! गुरू की कृपा से ही परमात्मा मिलता है।और मिलता है अपने हृदय में ही तलाश करने से। 2। 3।
देवगंधारी ॥
अब हम चली ठाकुर पहि हारि ॥
जब हम सरणि प्रभू की आई राखु प्रभू भावै मारि ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: देवगंधारी ॥ अब मैं और सारे आसरे छोड़ के मालिक प्रभू की शरण आ गई हूँ। जब कि अब।हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आ गई हूँ।चाहे मुझे रख चाहे मार (जैसी आपकी रजा है मुझे उसी हाल रख)। 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ऑकार एक है, उसका नाम सत्य है, वह सम्पूर्ण सृष्टि को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह निडर है,वह कालातीत, वह जन्म-मरण के चक्र से रहित है, वह स्वतः प्रकाशमान हुआ है और उसकी लब्ध।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।