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अंग 51

अंग
51
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक धंनु सोहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥4॥23॥93॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक! वह वह जीवस्त्री सुहाग-भाग वाली है जिनका पति प्रभू से प्यार (बन गया) है।4।23।93।
सिरीरागु महला 5 घरु 6 ॥
करण कारण एकु ओही जिनि कीआ आकारु ॥
तिसहि धिआवहु मन मेरे सरब को आधारु ॥1॥
गुर के चरन मन महि धिआइ ॥
छोडि सगल सिआणपा साचि सबदि लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
दुखु कलेसु न भउ बिआपै गुर मंत्रु हिरदै होइ ॥
कोटि जतना करि रहे गुर बिनु तरिओ न कोइ ॥2॥
देखि दरसनु मनु साधारै पाप सगले जाहि ॥
हउ तिन कै बलिहारणै जि गुर की पैरी पाहि ॥3॥
साधसंगति मनि वसै साचु हरि का नाउ ॥
से वडभागी नानका जिना मनि इहु भाउ ॥4॥24॥94॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 घरु 6 ॥ हे मेरे मन ! जिस परमात्मा ने यह दिखाई देता जगत बनाया है, सिर्फ वही सृष्टि का रचनहार है, और जीवों का रचनहार है, तथा जीवों का आसरा है, उसी को सदा सिमरते रहो।1। (हे भाई !) गुरू के चरण अपने मन में टिका के रख (भाव, अहम् को छोड़ के गुरू में श्रद्धा बना)। (अपनी) सारी चतुराईयां छोड़ दे। गुरू के शबद द्वारा सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में सुरति जोड़।1।रहाउ। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू का उपदेश (सदा) बसता है। उसको कोई दुख कोई कलेश कोई डर सता नहीं सकता। लोग करोडों (और और) यत्न करके थक जाते हैं, पर गुरू की शरण के बिनां (उन दुख कलेशों से) कोई मनुष्य पार नहीं लांघ सकता।2। गुरू का दर्शन करके जिस मनुष्य का मन (गुरू का) आसरा पकड़ लेता है, उसके सारे (पहले किए) पाप नाश हो जाते हैं। मैं उन (भाग्यशाली) लोगों से कुर्बान जाता हूँ जो गुरू के चरणों में गिर पड़ते हैं।3। साध-संगति में रहने से सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम मन में बस जाता है। हे नानक! वह लोग भाग्यशाली हैं, जिनके मन में (साध-संगति में टिकने का) यह प्रेम है।4।24।94।
सिरीरागु महला 5 ॥
संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार ॥
जिनि तूं साजि सवारिआ हरि सिमरि होइ उधारु ॥1॥
जपि मन नामु एकु अपारु ॥
प्रान मनु तनु जिनहि दीआ रिदे का आधारु ॥1॥ रहाउ ॥
कामि क्रोधि अहंकारि माते विआपिआ संसारु ॥
पउ संत सरणी लागु चरणी मिटै दूखु अंधारु ॥2॥
सतु संतोखु दइआ कमावै एह करणी सार ॥
आपु छोडि सभ होइ रेणा जिसु देइ प्रभु निरंकारु ॥3॥
जो दीसै सो सगल तूंहै पसरिआ पासारु ॥
कहु नानक गुरि भरमु काटिआ सगल ब्रहम बीचारु ॥4॥25॥95॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ (हे भाई!) परमात्मा का नाम धन इकट्ठा कर। अपने गुरू का आदर सत्कार हृदय में बसा (और इस तरह) सारे विकार छोड़। जिस परमात्मा ने आपको पैदा करके सुंदर बनाया है, उसका सिमरन कर, (विकारों से आपका) बचाव हैं जाएगा।1। हे मन! उस परमात्मा का नाम जप। जो एक खुद ही खुद है और जो बेअंत है। जिसने ये जीवात्मा दी है मन दिया है और शरीर दिया है, जो सभ जीवों के हृदय का आसरा है।1।रहाउ। जिन लोगों पे जगत का मोह दबाव डाले रखता है, वह काम में, क्रोध में, अहंकार में मस्त रहते हैं। (इन विकारों से बचने के लिए, हे भाई!) गुरू की शरण पड़, गुरू की चरणी लग (गुरू का आसरा लेने से अज्ञानता का) घोर अंधकार रूप दुख मिट जाता है।2। वह सेवा, संतोख व दया (की कमाई) कमाता है, और यही है श्रेष्ठ करणी है। जिस (भाग्यशाली मनुष्य) को निरंकार प्रभू (अपने नाम की दात) देता है, वह स्वै भाव छोड़के सभ की चरण धूड़ बनता है।3। हे प्रभू ! जो ये जगत दिखाई देता है सारा आपका ही रूप दिखता है। आपका ही पसारा हुआ ये पसारा दिखता है। हे नानक ! कह, गुरू ने जिस मनुष्य के मन की भटकन दूर कर दी है, उस को, यही सोच बनी रहती है कि हर जगह आप ही आप है।4।25।95।
सिरीरागु महला 5 ॥
दुक्रित सुक्रित मंधे संसारु सगलाणा ॥
दुहहूं ते रहत भगतु है कोई विरला जाणा ॥1॥
ठाकुरु सरबे समाणा ॥
किआ कहउ सुणउ सुआमी तूं वड पुरखु सुजाणा ॥1॥ रहाउ ॥
मान अभिमान मंधे सो सेवकु नाही ॥
तत समदरसी संतहु कोई कोटि मंधाही ॥2॥
कहन कहावन इहु कीरति करला ॥
कथन कहन ते मुकता गुरमुखि कोई विरला ॥3॥
गति अविगति कछु नदरि न आइआ ॥
संतन की रेणु नानक दानु पाइआ ॥4॥26॥96॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ (हे भाई!) सारा जगत (शास्त्रों के अनुसार नीयत) बुरे कर्मों और अच्छे कर्मों (की विचार) में ही डूबा हुआ है। परमात्मा की भगती करने वाला मनुष्य इन दोनों विचारों से ही मुक्त रहता है (कि शास्त्रों अनुसार ‘दुक्रित’ कौन से हैं और ‘सुक्रित’ कौन से हैं), पर ऐसा कोई विरला ही मिलता है।1। हे स्वामी ! आप सब जीवों में समाया हुआ है और सबको पालने वाला है। आप सबसे बड़ा है, सभ में व्यापक है। सबके दिल की जानने वाला है। (हे स्वामी! इससे ज्यादा आपके बाबत) मैं (क्या) कहूँ और क्या सुनूँ? ।1।रहाउ। जो मनुष्य (जगत में मिलते) आदर या निरादरी (के अहसास) में फंसा रहता है, वह परमात्मा का असल सेवक नहीं (कहला सकता)। हे संत जनों ! हर जगह जगत के मूल-प्रभू को देखने वाला और सभी को एक-सी प्रेम निगाह से देखने वाला करोड़ों में कोई एक होता है।2। (ज्ञान आदि की बातें निरी) कहनी या कहलानी- ये रास्ता है दुनिया से शोभा कमाने का। गुरू की शरण पड़ा हुआ कोई विरला ही मनुष्य होता है जो (ज्ञान की यह जबानी जबानी बातें) कहने से आजाद रहता है।3। उसे इस बात की ओर ध्यान ही नहीं होता कि मुक्ति क्या है और ना-मुक्ति क्या है (उसे प्रभू ही हर जगह दिखता है, प्रभू की याद ही उस का निशाना है) हे नानक! जिस मनुष्य ने संत जनों के चरणों की धूल (का) दान प्राप्त कर लिया है ।4।26।96।
सिरीरागु महला 5 घरु 7 ॥
तेरै भरोसै पिआरे मै लाड लडाइआ ॥
भूलहि चूकहि बारिक तूं हरि पिता माइआ ॥1॥
सुहेला कहनु कहावनु ॥
तेरा बिखमु भावनु ॥1॥ रहाउ ॥
हउ माणु ताणु करउ तेरा हउ जानउ आपा ॥
सभ ही मधि सभहि ते बाहरि बेमुहताज बापा ॥2॥
पिता हउ जानउ नाही तेरी कवन जुगता ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 घरु 7 ॥ हे प्यारे (प्रभू-पिता) ! आपके प्यार के भरोसे पे मैंने लाडों में ही दिन गुजार दिए हैं। (मुझे यकीन है कि) आप हमारा माता-पिता है, और बच्चे भूल-चूक करते ही रहते हैं।1। (यह) कहना और कहलाना आसान है (कि हम आपका भाणा मानते हैं)। पर हे प्रभू ! आपका भाणा मानना (आपकी रजा में रहना, आपकी मर्जी में चलना) कठिन है। 1।रहाउ। हे मेरे बे-मुथाज पिता (प्रभू) ! मैं आपका (ही) मान (गर्व) करता हूं (मुझे ये फखर है कि आप मेरे सिर पर है), मैं आपका ही आसरा रखता हूं। मैं जानता हूं कि आप मेरा अपना है। आप सभ जीवों के अंदर बसता है, और सभी से बाहर भी है (निरलेप भी है)।2। हे पिता प्रभू ! मुझे पता नहीं कि आपको प्रसंन्न करने का तरीका क्या है?

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक! वह वह जीवस्त्री सुहाग-भाग वाली है जिनका पति प्रभू से प्यार (बन गया) है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।