लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 51 · सिरी राग

इस पृष्ठ पर
अंग
51
सिरी राग
अंग बदलें या अंश चुनें · 5 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. नानक धंनु सोहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥4॥23॥93॥
  2. करण कारण एकु ओही जिनि कीआ आकारु ॥
  3. संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार ॥
  4. दुक्रित सुक्रित मंधे संसारु सगलाणा ॥
  5. तेरै भरोसै पिआरे मै लाड लडाइआ ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · सिरी राग

नानक धंनु सोहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥4॥23॥93॥

अंग 50 से चला आ रहा अंश

नानक धंनु सोहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥4॥23॥93॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! वह वह जीवस्त्री सुहाग-भाग वाली है जिनका पति प्रभू से प्यार (बन गया) है। 4। 23। 93।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · सिरी राग

करण कारण एकु ओही जिनि कीआ आकारु ॥

सिरीरागु महला 5 घरु 6 ॥
करण कारण एकु ओही जिनि कीआ आकारु ॥
तिसहि धिआवहु मन मेरे सरब को आधारु ॥1॥
गुर के चरन मन महि धिआइ ॥
छोडि सगल सिआणपा साचि सबदि लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
दुखु कलेसु न भउ बिआपै गुर मंत्रु हिरदै होइ ॥
कोटि जतना करि रहे गुर बिनु तरिओ न कोइ ॥2॥
देखि दरसनु मनु साधारै पाप सगले जाहि ॥
हउ तिन कै बलिहारणै जि गुर की पैरी पाहि ॥3॥
साधसंगति मनि वसै साचु हरि का नाउ ॥
से वडभागी नानका जिना मनि इहु भाउ ॥4॥24॥94॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 घरु 6 ॥ हे मेरे मन! जिस परमात्मा ने यह दिखाई देता जगत बनाया है, सिर्फ वही सृष्टि का रचनहार है, और जीवों का रचनहार है, तथा जीवों का आसरा है, उसी को सदा सिमरते रहें। 1। (हे भाई!) गुरू के चरण अपने मन में टिका के रखें (भाव, अहम् को छोड़ के गुरू में श्रद्धा बनाएँ)। (अपनी) सारी चतुराईयां छोड़ दें। गुरू के शबद द्वारा सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में सुरति जोड़ें। 1। रहाउ। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू का उपदेश (सदा) बसता है। उसको कोई दुख कोई कलेश कोई डर सता नहीं सकता। लोग करोडों (और और) यत्न करके थक जाते हैं, पर गुरू की शरण के बिनां (उन दुख कलेशों से) कोई मनुष्य पार नहीं लांघ सकता। 2। गुरू का दर्शन करके जिस मनुष्य का मन (गुरू का) आसरा पकड़ लेता है, उसके सारे (पहले किए) पाप नाश हो जाते हैं। मैं उन (भाग्यशाली) लोगों से कुर्बान जाता हूँ जो गुरू के चरणों में गिर पड़ते हैं। 3। साध-संगति में रहने से सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम मन में बस जाता है। हे नानक! वह लोग भाग्यशाली हैं, जिनके मन में (साध-संगति में टिकने का) यह प्रेम है। 4। 24। 94।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · सिरी राग

संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार ॥

सिरीरागु महला 5 ॥
संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार ॥
जिनि तूं साजि सवारिआ हरि सिमरि होइ उधारु ॥1॥
जपि मन नामु एकु अपारु ॥
प्रान मनु तनु जिनहि दीआ रिदे का आधारु ॥1॥ रहाउ ॥
कामि क्रोधि अहंकारि माते विआपिआ संसारु ॥
पउ संत सरणी लागु चरणी मिटै दूखु अंधारु ॥2॥
सतु संतोखु दइआ कमावै एह करणी सार ॥
आपु छोडि सभ होइ रेणा जिसु देइ प्रभु निरंकारु ॥3॥
जो दीसै सो सगल तूंहै पसरिआ पासारु ॥
कहु नानक गुरि भरमु काटिआ सगल ब्रहम बीचारु ॥4॥25॥95॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ (हे भाई!) परमात्मा का नाम धन इकट्ठा करें। अपने गुरू का आदर सत्कार हृदय में बसाएँ (और इस तरह) सारे विकार छोड़ें। जिस परमात्मा ने आपको पैदा करके सुंदर बनाया है, उसका सिमरन करें, (विकारों से आपका) बचाव हो जाएगा। 1। हे मन! उस परमात्मा का नाम जपें। जो एक खुद ही खुद है और जो बेअंत है। जिसने ये जीवात्मा दी है मन दिया है और शरीर दिया है, जो सभ जीवों के हृदय का आसरा है। 1। रहाउ। जिन लोगों पे जगत का मोह दबाव डाले रखता है, वह काम में, क्रोध में, अहंकार में मस्त रहते हैं। (इन विकारों से बचने के लिए, हे भाई!) गुरू की शरण पड़ें, गुरू की चरणी लग (गुरू का आसरा लेने से अज्ञानता का) घोर अंधकार रूप दुख मिट जाता है। 2। वह सेवा, संतोख व दया (की कमाई) कमाता है, और यही है श्रेष्ठ करणी है। जिस (भाग्यशाली मनुष्य) को निरंकार प्रभू (अपने नाम की दात) देता है, वह स्वै भाव छोड़के सभ की चरण धूड़ बनता है। 3। हे प्रभू! जो ये जगत दिखाई देता है सारा आपका ही रूप दिखता है। आपका ही पसारा हुआ ये पसारा दिखता है। हे नानक! कहें, गुरू ने जिस मनुष्य के मन की भटकन दूर कर दी है, उस को, यही सोच बनी रहती है कि हर जगह आप ही आप हैं। 4। 25। 95।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · सिरी राग

दुक्रित सुक्रित मंधे संसारु सगलाणा ॥

सिरीरागु महला 5 ॥
दुक्रित सुक्रित मंधे संसारु सगलाणा ॥
दुहहूं ते रहत भगतु है कोई विरला जाणा ॥1॥
ठाकुरु सरबे समाणा ॥
किआ कहउ सुणउ सुआमी तूं वड पुरखु सुजाणा ॥1॥ रहाउ ॥
मान अभिमान मंधे सो सेवकु नाही ॥
तत समदरसी संतहु कोई कोटि मंधाही ॥2॥
कहन कहावन इहु कीरति करला ॥
कथन कहन ते मुकता गुरमुखि कोई विरला ॥3॥
गति अविगति कछु नदरि न आइआ ॥
संतन की रेणु नानक दानु पाइआ ॥4॥26॥96॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ (हे भाई!) सारा जगत (शास्त्रों के अनुसार नीयत) बुरे कर्मों और अच्छे कर्मों (की विचार) में ही डूबा हुआ है। परमात्मा की भगती करने वाला मनुष्य इन दोनों विचारों से ही मुक्त रहता है (कि शास्त्रों अनुसार ‘दुक्रित’ कौन से हैं और ‘सुक्रित’ कौन से हैं), पर ऐसा कोई विरला ही मिलता है। 1। हे स्वामी! आप सब जीवों में समाए हुए हैं और सबको पालने वाले हैं। आप सबसे बड़े हैं, सब में व्यापक हैं। सबके दिल की जानने वाले हैं। (हे स्वामी! इससे ज्यादा आपके बाबत) मैं (क्या) कहूँ और क्या सुनूँ? 1। रहाउ। जो मनुष्य (जगत में मिलते) आदर या निरादरी (के अहसास) में फंसा रहता है, वह परमात्मा का असल सेवक नहीं (कहला सकता)। हे संत जनों! हर जगह जगत के मूल-प्रभू को देखने वाला और सभी को एक-सी प्रेम निगाह से देखने वाला करोड़ों में कोई एक होता है। 2। (ज्ञान आदि की बातें निरी) कहनी या कहलानी, ये रास्ता है दुनिया से शोभा कमाने का। गुरू की शरण पड़ा हुआ कोई विरला ही मनुष्य होता है जो (ज्ञान की यह जबानी जबानी बातें) कहने से आजाद रहता है। 3। उसे इस बात की ओर ध्यान ही नहीं होता कि मुक्ति क्या है और ना-मुक्ति क्या है (उसे प्रभू ही हर जगह दिखता है, प्रभू की याद ही उस का निशाना है) हे नानक! जिस मनुष्य ने संत जनों के चरणों की धूल (का) दान प्राप्त कर लिया है। 4। 26। 96।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · सिरी राग

तेरै भरोसै पिआरे मै लाड लडाइआ ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

सिरीरागु महला 5 घरु 7 ॥
तेरै भरोसै पिआरे मै लाड लडाइआ ॥
भूलहि चूकहि बारिक तूं हरि पिता माइआ ॥1॥
सुहेला कहनु कहावनु ॥
तेरा बिखमु भावनु ॥1॥ रहाउ ॥
हउ माणु ताणु करउ तेरा हउ जानउ आपा ॥
सभ ही मधि सभहि ते बाहरि बेमुहताज बापा ॥2॥
पिता हउ जानउ नाही तेरी कवन जुगता ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 घरु 7 ॥ हे प्यारे (प्रभू-पिता)! आपके प्यार के भरोसे पे मैंने लाडों में ही दिन गुजार दिए हैं। (मुझे यकीन है कि) आप हमारे माता-पिता हैं, और बच्चे भूल-चूक करते ही रहते हैं। 1। (यह) कहना और कहलाना आसान है (कि हम आपका भाणा मानते हैं)। पर हे प्रभू! आपका भाणा मानना (आपकी रजा में रहना, आपकी मर्जी में चलना) कठिन है। 1। रहाउ। हे मेरे बे-मुथाज पिता (प्रभू)! मैं आपका (ही) मान (गर्व) करता हूं (मुझे ये फखर है कि आप मेरे सिर पर हैं), मैं आपका ही आसरा रखता हूं। मैं जानता हूं कि आप मेरे अपने हैं। आप सब जीवों के अंदर बसते हैं, और सभी से बाहर भी हैं (निरलेप भी हैं)। 2। हे पिता प्रभू! मुझे पता नहीं कि आपको प्रसंन्न करने का तरीका क्या है?

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 51 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।