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- सभु किछु जाणै जाणु बुझि वीचारदा ॥
- कामु क्रोधु लोभु छोडीऐ दीजै अगनि जलाइ ॥
- सिमरत सिमरत प्रभु आपणा सभ फल पाए आहि ॥
- सो मुकता संसारि जि गुरि उपदेसिआ ॥
- मन महि चितवउ चितवनी उदमु करउ उठि नीत ॥
- द्रिसटि धारि प्रभि राखिआ मनु तनु रता मूलि ॥
- जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि ॥
- लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥
- बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥
- पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥
सभु किछु जाणै जाणु बुझि वीचारदा ॥
सभु किछु जाणै जाणु बुझि वीचारदा ॥
अनिक रूप खिन माहि कुदरति धारदा ॥
जिस नो लाइ सचि तिसहि उधारदा ॥
जिस दै होवै वलि सु कदे न हारदा ॥
सदा अभगु दीबाणु है हउ तिसु नमसकारदा ॥4॥
अनिक रूप खिन माहि कुदरति धारदा ॥
जिस नो लाइ सचि तिसहि उधारदा ॥
जिस दै होवै वलि सु कदे न हारदा ॥
सदा अभगु दीबाणु है हउ तिसु नमसकारदा ॥4॥
हिन्दी अर्थ: वह अंतरजामी (जीवों के दिल की) हरेक बात जानता है और उसको समझ के (उस पर) विचार भी करता है। एक पलक में कुदरत के अनेकों रूप बना देता है। जिस मनुष्य को वह सच में जोड़ता है उसको (विकारों से) बचा लेता है। प्रभू जिस जीव के पक्ष में हो जाता है वह जीव (विकारों के मुकाबले और मानस जनम की बाजी) कभी नहीं हारता। उस प्रभू का दरबार सदा अटॅल है। मैं उसको नमस्कार करता हूँ। 4।
कामु क्रोधु लोभु छोडीऐ दीजै अगनि जलाइ ॥
सलोक मः 5 ॥
कामु क्रोधु लोभु छोडीऐ दीजै अगनि जलाइ ॥
जीवदिआ नित जापीऐ नानक साचा नाउ ॥1॥
कामु क्रोधु लोभु छोडीऐ दीजै अगनि जलाइ ॥
जीवदिआ नित जापीऐ नानक साचा नाउ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! काम क्रोध और लोभ (आदि विकार) छोड़ देने चाहिए। (इन्हें) आग में जला दें। जब तक जीवित हैं (प्रभू का) सच्चा नाम सदा सिमरते रहें। 1।
सिमरत सिमरत प्रभु आपणा सभ फल पाए आहि ॥
मः 5 ॥
सिमरत सिमरत प्रभु आपणा सभ फल पाए आहि ॥
नानक नामु अराधिआ गुर पूरै दीआ मिलाइ ॥2॥
सिमरत सिमरत प्रभु आपणा सभ फल पाए आहि ॥
नानक नामु अराधिआ गुर पूरै दीआ मिलाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ प्यारा प्रभू सिमर के उसने सारे फल हासिल कर लिए हैं (भाव। दुनियावी सारी ही वासनाएं उसकी समाप्त हो गई हैं)। हे नानक ! जिस मनुष्य ने पूरे गुरू के द्वारा प्रभू का नाम सिमरा है। गुरू ने उसको प्रभू के साथ मिला दिया है।2।
सो मुकता संसारि जि गुरि उपदेसिआ ॥
पउड़ी ॥
सो मुकता संसारि जि गुरि उपदेसिआ ॥
तिस की गई बलाइ मिटे अंदेसिआ ॥
तिस का दरसनु देखि जगतु निहालु होइ ॥
जन कै संगि निहालु पापा मैलु धोइ ॥
अंम्रितु साचा नाउ ओथै जापीऐ ॥
मन कउ होइ संतोखु भुखा ध्रापीऐ ॥
जिसु घटि वसिआ नाउ तिसु बंधन काटीऐ ॥
गुर परसादि किनै विरलै हरि धनु खाटीऐ ॥5॥
सो मुकता संसारि जि गुरि उपदेसिआ ॥
तिस की गई बलाइ मिटे अंदेसिआ ॥
तिस का दरसनु देखि जगतु निहालु होइ ॥
जन कै संगि निहालु पापा मैलु धोइ ॥
अंम्रितु साचा नाउ ओथै जापीऐ ॥
मन कउ होइ संतोखु भुखा ध्रापीऐ ॥
जिसु घटि वसिआ नाउ तिसु बंधन काटीऐ ॥
गुर परसादि किनै विरलै हरि धनु खाटीऐ ॥5॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस मनुष्य को सतिगुरू ने उपदेश दिया है वह जगत में (रहता हुआ ही माया के बंधनों से) आजाद है; उसकी बिपता दूर हो जाती है। उसके फिक्र मिट जाते हैं। उसका दर्शन करके (सारा) जगत निहाल हो जाता है। उस जन की संगत में जीव पापों की मैल धो के निहाल होता है; उसकी संगति में अमर करने वाला सच्चा नाम सिमरते हैं। तृष्णा का मारा हुआ बंदा भी वहाँ तृप्त हो जाता है। उसके मन को संतोष आ जाता है। जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू का नाम आ बसता है उसके (माया वाले) बंधन काटे जाते हैं। पर। किसी विरले मनुष्य ने गुरू की कृपा से नाम-धन कमाया है। 5।
मन महि चितवउ चितवनी उदमु करउ उठि नीत ॥
सलोक मः 5 ॥
मन महि चितवउ चितवनी उदमु करउ उठि नीत ॥
हरि कीरतन का आहरो हरि देहु नानक के मीत ॥1॥
मन महि चितवउ चितवनी उदमु करउ उठि नीत ॥
हरि कीरतन का आहरो हरि देहु नानक के मीत ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ मैं अपने मन में (ये) सोचता हूँ कि नित्य (सवेरे) उठ के उद्यम करूँ। हे नानक के मित्र ! मुझे अपनी सिफत सालाह का आहर बख्श। 1।
द्रिसटि धारि प्रभि राखिआ मनु तनु रता मूलि ॥
मः 5 ॥
द्रिसटि धारि प्रभि राखिआ मनु तनु रता मूलि ॥
नानक जो प्रभ भाणीआ मरउ विचारी सूलि ॥2॥
द्रिसटि धारि प्रभि राखिआ मनु तनु रता मूलि ॥
नानक जो प्रभ भाणीआ मरउ विचारी सूलि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ उनकोप्रभू ने मेहर की नजर करके रख लिया है और उनका मन और तन प्रभू में रंगा रहता है। जो (जीव-सि्त्रयां) प्रभू को भा गई हैं। पर हे नानक !मैं अभागिन दुख में मर रही हूँ (हे प्रभू ! मेरे पर कृपा कर)।
जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि ॥
पउड़ी ॥
जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि ॥
छोडि सिआणप सगल मनु तनु अरपि धरि ॥
पूजहु गुर के पैर दुरमति जाइ जरि ॥
साध जना कै संगि भवजलु बिखमु तरि ॥
सेवहु सतिगुर देव अगै न मरहु डरि ॥
खिन महि करे निहालु ऊणे सुभर भरि ॥
मन कउ होइ संतोखु धिआईऐ सदा हरि ॥
सो लगा सतिगुर सेव जा कउ करमु धुरि ॥6॥
जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि ॥
छोडि सिआणप सगल मनु तनु अरपि धरि ॥
पूजहु गुर के पैर दुरमति जाइ जरि ॥
साध जना कै संगि भवजलु बिखमु तरि ॥
सेवहु सतिगुर देव अगै न मरहु डरि ॥
खिन महि करे निहालु ऊणे सुभर भरि ॥
मन कउ होइ संतोखु धिआईऐ सदा हरि ॥
सो लगा सतिगुर सेव जा कउ करमु धुरि ॥6॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) दिल का जो दुख हो वह अपने सतिगुरू के आगे विनती कर। अपनी सारी चतुराई छोड़ दे और मन तन गुरू के हवाले कर दे। सतिगुरू के पैर पूज (भाव। गुरू का आसरा ले। इस तरह) बुरी मति (रूपी ‘व्यथा) जल जाती है। गुरमुखों की संगति में ये मुश्किल संसार समुंद्र तैर जाते हैं। (हे भाई !) गुरू के बताए हुए राह पर चलो। परलोक में डर-डर के नहीं मरोगे। गुरू (गुणों से) विहीन बंदों को (गुणों से) नाको-नाक भर के एक पल में निहाल कर देता है। (गुरू के द्वारा अगर) सदा प्रभू को सिमरें तो मन को संतोष आता है। पर। गुरू की बताई सेवा में वही मनुष्य लगता है जिस पर धुर से बख्शिश हो। 6।
लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥
सलोक मः 5 ॥
लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥
नानक लहरी लख सै आन डुबण देइ न मा पिरी ॥1॥
लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥
नानक लहरी लख सै आन डुबण देइ न मा पिरी ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (मेरी प्रीत) अच्छे ठिकाने पर (भाव। प्यारे प्रभू के चरणों में) अच्छी तरह लग गई है जोड़नहार प्रभू ने खुद जोड़ी है। (जगत में) सैकड़ों और लाखों और और ही (विकारों की) लहरें चल रही हैं। पर। हे नानक ! मेरा प्यारा (मुझे इन लहरों में) डूबने नहीं देता। 1।
बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥
मः 5 ॥
बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥
बलि बलि जाई संत पिआरे नानक पूरन कामां ॥2॥
बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥
बलि बलि जाई संत पिआरे नानक पूरन कामां ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (संसार रूपी इस) डरावने जंगल में मुझे हरि नाम रूप एक ही साथी मिला है जो दुखों का नाश करने वाला है। हे नानक ! मैं प्यारे गुरू से सदके हूँ (जिसकी मेहर से मेरा ये) काम सिरे चढ़ा है। 2।
पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥
पउड़ी ॥
पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥
न होवी पछोताउ तुध नो जपतिआ ॥
पहुचि न सकै कोइ तेरी टेक जन ॥
गुर पूरे वाहु वाहु सुख लहा चितारि मन ॥
गुर पहि सिफति भंडारु करमी पाईऐ ॥
सतिगुर नदरि निहाल बहुड़ि न धाईऐ ॥
रखै आपि दइआलु करि दासा आपणे ॥
हरि हरि हरि हरि नामु जीवा सुणि सुणे ॥7॥
पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥
न होवी पछोताउ तुध नो जपतिआ ॥
पहुचि न सकै कोइ तेरी टेक जन ॥
गुर पूरे वाहु वाहु सुख लहा चितारि मन ॥
गुर पहि सिफति भंडारु करमी पाईऐ ॥
सतिगुर नदरि निहाल बहुड़ि न धाईऐ ॥
रखै आपि दइआलु करि दासा आपणे ॥
हरि हरि हरि हरि नामु जीवा सुणि सुणे ॥7॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) अगर आपके (प्यार के) रंग में रंगे जाएं तो। मानो सारे खजाने मिल जाते हैं; आपको सिमरते हुए (किसी बात से) पछताना नहीं पड़ता (भाव। कोई ऐसा बुरा काम नहीं कर सकते जिस कारण पछताना पड़े) जिन सेवकों को आपका आसरा होता है उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। पर। हे मन ! पूरे गुरू को शाबाश (कह। जिसके द्वारा ‘नाम’) सिमर के सुख मिलता है। सिफत सालाह का खजाना सतिगुरू के पास ही है। मिलता है परमात्मा की कृपा से। अगर सतिगुरू मेहर की नजर से देखे तो बारंबार नहीं भटकते। दया का घर प्रभू खुद अपने सेवक बना के (इस भटकना से) बचाता है। मैं भी उस प्रभू का नाम सुन सुन के जी रहा हूँ। 7।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 519 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।