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अंग 519

अंग
519
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सभु किछु जाणै जाणु बुझि वीचारदा ॥
अनिक रूप खिन माहि कुदरति धारदा ॥
जिस नो लाइ सचि तिसहि उधारदा ॥
जिस दै होवै वलि सु कदे न हारदा ॥
सदा अभगु दीबाणु है हउ तिसु नमसकारदा ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: वह अंतरजामी (जीवों के दिल की) हरेक बात जानता है और उसको समझ के (उस पर) विचार भी करता है। एक पलक में कुदरत के अनेकों रूप बना देता है। जिस मनुष्य को वह सच में जोड़ता है उसको (विकारों से) बचा लेता है। प्रभू जिस जीव के पक्ष में हो जाता है वह जीव (विकारों के मुकाबले और मानस जनम की बाजी) कभी नहीं हारता। उस प्रभू का दरबार सदा अटॅल है।मैं उसको नमस्कार करता हूँ। 4।
सलोक मः 5 ॥
कामु क्रोधु लोभु छोडीऐ दीजै अगनि जलाइ ॥
जीवदिआ नित जापीऐ नानक साचा नाउ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! काम क्रोध और लोभ (आदि विकार) छोड़ देने चाहिए।(इन्हें) आग में जला दें। जब तक जीवित हैं (प्रभू का) सच्चा नाम सदा सिमरते रहें। 1।
मः 5 ॥
सिमरत सिमरत प्रभु आपणा सभ फल पाए आहि ॥
नानक नामु अराधिआ गुर पूरै दीआ मिलाइ ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ प्यारा प्रभू सिमर के उसने सारे फल हासिल कर लिए हैं (भाव।दुनियावी सारी ही वासनाएं उसकी समाप्त हो गई हैं)। हे नानक ! जिस मनुष्य ने पूरे गुरू के द्वारा प्रभू का नाम सिमरा है।गुरू ने उसको प्रभू के साथ मिला दिया है।2।
पउड़ी ॥
सो मुकता संसारि जि गुरि उपदेसिआ ॥
तिस की गई बलाइ मिटे अंदेसिआ ॥
तिस का दरसनु देखि जगतु निहालु होइ ॥
जन कै संगि निहालु पापा मैलु धोइ ॥
अंम्रितु साचा नाउ ओथै जापीऐ ॥
मन कउ होइ संतोखु भुखा ध्रापीऐ ॥
जिसु घटि वसिआ नाउ तिसु बंधन काटीऐ ॥
गुर परसादि किनै विरलै हरि धनु खाटीऐ ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस मनुष्य को सतिगुरू ने उपदेश दिया है वह जगत में (रहता हुआ ही माया के बंधनों से) आजाद है; उसकी बिपता दूर हो जाती है।उसके फिक्र मिट जाते हैं। उसका दर्शन करके (सारा) जगत निहाल हो जाता है। उस जन की संगत में जीव पापों की मैल धो के निहाल होता है; उसकी संगति में अमर करने वाला सच्चा नाम सिमरते हैं। तृष्णा का मारा हुआ बंदा भी वहाँ तृप्त हो जाता है।उसके मन को संतोष आ जाता है। जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू का नाम आ बसता है उसके (माया वाले) बंधन काटे जाते हैं।पर। किसी विरले मनुष्य ने गुरू की कृपा से नाम-धन कमाया है। 5।
सलोक मः 5 ॥
मन महि चितवउ चितवनी उदमु करउ उठि नीत ॥
हरि कीरतन का आहरो हरि देहु नानक के मीत ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ मैं अपने मन में (ये) सोचता हूँ कि नित्य (सवेरे) उठ के उद्यम करूँ। हे नानक के मित्र ! मुझे अपनी सिफत सालाह का आहर बख्श। 1।
मः 5 ॥
द्रिसटि धारि प्रभि राखिआ मनु तनु रता मूलि ॥
नानक जो प्रभ भाणीआ मरउ विचारी सूलि ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ उनकोप्रभू ने मेहर की नजर करके रख लिया है और उनका मन और तन प्रभू में रंगा रहता है। जो (जीव-सि्त्रयां) प्रभू को भा गई हैं।पर हे नानक !मैं अभागिन दुख में मर रही हूँ (हे प्रभू ! मेरे पर कृपा कर)।
पउड़ी ॥
जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि ॥
छोडि सिआणप सगल मनु तनु अरपि धरि ॥
पूजहु गुर के पैर दुरमति जाइ जरि ॥
साध जना कै संगि भवजलु बिखमु तरि ॥
सेवहु सतिगुर देव अगै न मरहु डरि ॥
खिन महि करे निहालु ऊणे सुभर भरि ॥
मन कउ होइ संतोखु धिआईऐ सदा हरि ॥
सो लगा सतिगुर सेव जा कउ करमु धुरि ॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) दिल का जो दुख हो वह अपने सतिगुरू के आगे विनती कर। अपनी सारी चतुराई छोड़ दे और मन तन गुरू के हवाले कर दे। सतिगुरू के पैर पूज (भाव।गुरू का आसरा ले।इस तरह) बुरी मति (रूपी ‘व्यथा) जल जाती है। गुरमुखों की संगति में ये मुश्किल संसार समुंद्र तैर जाते हैं। (हे भाई !) गुरू के बताए हुए राह पर चलो।परलोक में डर-डर के नहीं मरोगे। गुरू (गुणों से) विहीन बंदों को (गुणों से) नाको-नाक भर के एक पल में निहाल कर देता है। (गुरू के द्वारा अगर) सदा प्रभू को सिमरें तो मन को संतोष आता है।पर। गुरू की बताई सेवा में वही मनुष्य लगता है जिस पर धुर से बख्शिश हो। 6।
सलोक मः 5 ॥
लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥
नानक लहरी लख सै आन डुबण देइ न मा पिरी ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (मेरी प्रीत) अच्छे ठिकाने पर (भाव।प्यारे प्रभू के चरणों में) अच्छी तरह लग गई है जोड़नहार प्रभू ने खुद जोड़ी है। (जगत में) सैकड़ों और लाखों और और ही (विकारों की) लहरें चल रही हैं।पर।हे नानक ! मेरा प्यारा (मुझे इन लहरों में) डूबने नहीं देता। 1।
मः 5 ॥
बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥
बलि बलि जाई संत पिआरे नानक पूरन कामां ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (संसार रूपी इस) डरावने जंगल में मुझे हरि नाम रूप एक ही साथी मिला है जो दुखों का नाश करने वाला है। हे नानक ! मैं प्यारे गुरू से सदके हूँ (जिसकी मेहर से मेरा ये) काम सिरे चढ़ा है। 2।
पउड़ी ॥
पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥
न होवी पछोताउ तुध नो जपतिआ ॥
पहुचि न सकै कोइ तेरी टेक जन ॥
गुर पूरे वाहु वाहु सुख लहा चितारि मन ॥
गुर पहि सिफति भंडारु करमी पाईऐ ॥
सतिगुर नदरि निहाल बहुड़ि न धाईऐ ॥
रखै आपि दइआलु करि दासा आपणे ॥
हरि हरि हरि हरि नामु जीवा सुणि सुणे ॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) अगर आपके (प्यार के) रंग में रंगे जाएं तो।मानो सारे खजाने मिल जाते हैं; आपको सिमरते हुए (किसी बात से) पछताना नहीं पड़ता (भाव।कोई ऐसा बुरा काम नहीं कर सकते जिस कारण पछताना पड़े) जिन सेवकों को आपका आसरा होता है उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।पर। हे मन ! पूरे गुरू को शाबाश (कह।जिसके द्वारा ‘नाम’) सिमर के सुख मिलता है। सिफत सालाह का खजाना सतिगुरू के पास ही है।मिलता है परमात्मा की कृपा से। अगर सतिगुरू मेहर की नजर से देखे तो बारंबार नहीं भटकते। दया का घर प्रभू खुद अपने सेवक बना के (इस भटकना से) बचाता है। मैं भी उस प्रभू का नाम सुन सुन के जी रहा हूँ। 7।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह अंतरजामी (जीवों के दिल की) हरेक बात जानता है और उसको समझ के (उस पर) विचार भी करता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।