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अंग 518

अंग
518
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिसु सिमरत सुखु होइ सगले दूख जाहि ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जिसको सिमरने से सुख मिलता है और सारे दुख दूर हो जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
अकुल निरंजन पुरखु अगमु अपारीऐ ॥
सचो सचा सचु सचु निहारीऐ ॥
कूड़ु न जापै किछु तेरी धारीऐ ॥
सभसै दे दातारु जेत उपारीऐ ॥
इकतु सूति परोइ जोति संजारीऐ ॥
हुकमे भवजल मंझि हुकमे तारीऐ ॥
प्रभ जीउ तुधु धिआए सोइ जिसु भागु मथारीऐ ॥
तेरी गति मिति लखी न जाइ हउ तुधु बलिहारीऐ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे परमात्मा ! आपकी कोई खास कुल नहीं।माया की कालिख आपको लग नहीं सकती।(आप) सब में मौजूद है।अपहुँच और बेअंत है। आप सदा ही कायम रहने वाला और सच-मुच हस्ती वाला देखने में आता है। सारी सृष्टि आपकी ही रची हुई है (इसमें भी) कोई चीज फर्जी (भाव।मनघड़ंत) नहीं प्रतीत होती। (जितनी भी) सृष्टि प्रभू ने पैदा की है (इस में) सब जीवों को दातार प्रभू (दातें) देता है; सब को एक ही (हुकम रूपी) धागे में परो के (सब में उसने अपनी) ज्योति मिलाई हुई है; अपने हुकम के अंदर ही (उसने जीवों को) संसार समुंद्र में (फसाया हुआ है और) हुकम के अंदर ही (इस में से) पार लंघाता है। हे प्रभू जी ! आपको वही मनुष्य सिमरता है।जिसके माथे पर भाग्य हों; ये बात बयान नहीं की जा सकती कि आप कैसा है और कितना बड़ा है।मैं आपसे सदके हूँ। 1।
सलोकु मः 5 ॥
जा तूं तुसहि मिहरवान अचिंतु वसहि मन माहि ॥
जा तूं तुसहि मिहरवान नउ निधि घर महि पाहि ॥
जा तूं तुसहि मिहरवान ता गुर का मंत्रु कमाहि ॥
जा तूं तुसहि मिहरवान ता नानक सचि समाहि ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे मेहरवान प्रभू ! अगर आप प्रसन्न हैं जाए तो आप सहज सुभाय ही (जीवों के) मन में आ बसता है। जीव।मानो। नौ खजाने (हृदय) घर में ही पा लेते हैं; सतिगुरू का शबद कमाने लग पड़ते हैं। और। हे नानक ! जीव सत्य में लीन हो जाते हैं। 1।
मः 5 ॥
किती बैहनि॑ बैहणे मुचु वजाइनि वज ॥
नानक सचे नाम विणु किसै न रहीआ लज ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! (इस जगत में) बेअंत जीव इन जगहों पर बैठ गए हैं और बहुत बाजे बजा गए हैं। पर सच्चे नाम से वंचित रह के किसी की भी इज्जत नहीं रही। 2।
पउड़ी ॥
तुधु धिआइनि॑ बेद कतेबा सणु खड़े ॥
गणती गणी न जाइ तेरै दरि पड़े ॥
ब्रहमे तुधु धिआइनि॑ इंद्र इंद्रासणा ॥
संकर बिसन अवतार हरि जसु मुखि भणा ॥
पीर पिकाबर सेख मसाइक अउलीए ॥
ओति पोति निरंकार घटि घटि मउलीए ॥
कूड़हु करे विणासु धरमे तगीऐ ॥
जितु जितु लाइहि आपि तितु तितु लगीऐ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! (तौरेत।जंबूर।अंजील।कुरान) कतेबों समेत वेद (भाव।हिंदू मुसलमान आदि सारे मतों के धर्म-पुस्तक) आपको खड़े सिमर रहे हैं। इतने जीव आपके दर पर गिरे हुए हैं कि उनकी गिनती नहीं गिनी जा सकती। कई ब्रहमा और सिहांसनों वाले कई इंद्र आपको ध्याते हैं। हे हरी ! कई शिव और विष्णु के अवतार आपका यश मुँह से उचार रहे हैं। कई पीर।पैग़ंबर। बेअंत शेख और वली (आपके गुण गा रहे हैं)। हे निरंकार ! ताने-पेटे की तरह हरेक शरीर में आप मौल रहा है। (हे प्रभू !) झूठ के कारण (जीव अपने आप का) नाश कर लेता है।धर्म के द्वारा (आपके साथ जीवों की) आखिर तक निभ जाती है। पर।जिधर जिधर आप स्वयं लगाता है।उधर उधर ही लग सकते हैं (जीवों के वश की बात नहीं है)। 2।
सलोकु मः 5 ॥
चंगिआइंी आलकु करे बुरिआइंी होइ सेरु ॥
नानक अजु कलि आवसी गाफल फाही पेरु ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (गाफल मनुष्य) अच्छे कामों में आलस करता है और बुरे कामों में शेर होता है; पर। हे नानक ! गाफल का पैर जल्दी ही मौत की फाही में आ जाता है (भाव।मौत आ दबोचती है)। 1।
मः 5 ॥
कितीआ कुढंग गुझा थीऐ न हितु ॥
नानक तै सहि ढकिआ मन महि सचा मितु ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक के प्रभू ! हमारे कई खोटे कर्म और खोटे कर्मों का लेख आपसे छुपा नहीं हुआ; आप ही हमारे मन में सच्चा मित्र है (भाव।आप ही हमें सच्चा मित्र दिखता है)।तूने हमारे उन खोटे कर्मों पर पर्दा डाल रखा है (भाव।हमें जगत में बदनाम नहीं होने देता)। 2।
पउड़ी ॥
हउ मागउ तुझै दइआल करि दासा गोलिआ ॥
नउ निधि पाई राजु जीवा बोलिआ ॥
अंम्रित नामु निधानु दासा घरि घणा ॥
तिन कै संगि निहालु स्रवणी जसु सुणा ॥
कमावा तिन की कार सरीरु पवितु होइ ॥
पखा पाणी पीसि बिगसा पैर धोइ ॥
आपहु कछू न होइ प्रभ नदरि निहालीऐ ॥
मोहि निरगुण दिचै थाउ संत धरम सालीऐ ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे दया के घर प्रभू ! मैं आपसे (ये) माँगता हूँ (कि मुझे अपने) दासों का दास बना ले; आपका नाम उचारने से ही मैं जीता हूँ।(और।जैसे।)नौ खजाने और (धरती का) राज पा लेता हूँ। ये अमृत-नाम रूपी खजाना आपके सेवकों के घर में बहुत है; जब मैं उनकी संगति में (बैठ के। अपने) कानों से (आपका) जस सुनता हूँ।मैं निहाल हैं जाता हूँ। (ज्यों ज्यों) मैं उनकी सेवा करता हूँ।(मेरा) शरीर पवित्र हो जाता है। (उन्हें) पंखा करके (उनके लिए) पानी ढो के।(चक्की) पीस के।(और उनके) पैर धो के मैं खुश होता हूँ। पर। हे प्रभू ! मुझसे अपने आप से कुछ नहीं हैं सकता।आप ही मेरी तरफ मेहर की नजर से देख। और मुझ गुण-हीन को संतों की संगति में जगह दे। 3।
सलोक मः 5 ॥
साजन तेरे चरन की होइ रहा सद धूरि ॥
नानक सरणि तुहारीआ पेखउ सदा हजूरि ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे सज्जन ! मैं सदा आपके पैरों की ख़ाक होया रहूँ। हे नानक ! (ऐसे कह।कि)मैं आपकी शरण पड़ा रहूँ और आपको अपने अंग संग देखूँ। 1।
मः 5 ॥
पतित पुनीत असंख होहि हरि चरणी मनु लाग ॥
अठसठि तीरथ नामु प्रभ जिसु नानक मसतकि भाग ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (विकारों में) गिरे हुए भी बेअंत जीव पवित्र हो जाते हैं अगर उनका मन प्रभू के चरणों में लग जाए। प्रभू का नाम ही अढ़सठ तीर्थ है।पर।हे नानक ! (ये नाम उस मनुष्य को मिलता है) जिसके माथे पर भाग्य (लिखे) हैं। 2।
पउड़ी ॥
नित जपीऐ सासि गिरासि नाउ परवदिगार दा ॥
जिस नो करे रहंम तिसु न विसारदा ॥
आपि उपावणहार आपे ही मारदा ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (हे भाई !) पालनहार प्रभू का नाम साँस लेते हुए खाते हुए हर वक्त जपना चाहिए। वह प्रभू जिस बंदे पर मेहर करता है उसको (अपने मन में से) नहीं भुलाना। वह स्वयं जीवों को पैदा करने वाला है और स्वयं ही मारता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिसको सिमरने से सुख मिलता है और सारे दुख दूर हो जाते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।