अकुल निरंजन पुरखु अगमु अपारीऐ ॥
सचो सचा सचु सचु निहारीऐ ॥
कूड़ु न जापै किछु तेरी धारीऐ ॥
सभसै दे दातारु जेत उपारीऐ ॥
इकतु सूति परोइ जोति संजारीऐ ॥
हुकमे भवजल मंझि हुकमे तारीऐ ॥
प्रभ जीउ तुधु धिआए सोइ जिसु भागु मथारीऐ ॥
तेरी गति मिति लखी न जाइ हउ तुधु बलिहारीऐ ॥1॥
जा तूं तुसहि मिहरवान अचिंतु वसहि मन माहि ॥
जा तूं तुसहि मिहरवान नउ निधि घर महि पाहि ॥
जा तूं तुसहि मिहरवान ता गुर का मंत्रु कमाहि ॥
जा तूं तुसहि मिहरवान ता नानक सचि समाहि ॥1॥
किती बैहनि॑ बैहणे मुचु वजाइनि वज ॥
नानक सचे नाम विणु किसै न रहीआ लज ॥2॥
तुधु धिआइनि॑ बेद कतेबा सणु खड़े ॥
गणती गणी न जाइ तेरै दरि पड़े ॥
ब्रहमे तुधु धिआइनि॑ इंद्र इंद्रासणा ॥
संकर बिसन अवतार हरि जसु मुखि भणा ॥
पीर पिकाबर सेख मसाइक अउलीए ॥
ओति पोति निरंकार घटि घटि मउलीए ॥
कूड़हु करे विणासु धरमे तगीऐ ॥
जितु जितु लाइहि आपि तितु तितु लगीऐ ॥2॥
चंगिआइंी आलकु करे बुरिआइंी होइ सेरु ॥
नानक अजु कलि आवसी गाफल फाही पेरु ॥1॥
कितीआ कुढंग गुझा थीऐ न हितु ॥
नानक तै सहि ढकिआ मन महि सचा मितु ॥2॥
हउ मागउ तुझै दइआल करि दासा गोलिआ ॥
नउ निधि पाई राजु जीवा बोलिआ ॥
अंम्रित नामु निधानु दासा घरि घणा ॥
तिन कै संगि निहालु स्रवणी जसु सुणा ॥
कमावा तिन की कार सरीरु पवितु होइ ॥
पखा पाणी पीसि बिगसा पैर धोइ ॥
आपहु कछू न होइ प्रभ नदरि निहालीऐ ॥
मोहि निरगुण दिचै थाउ संत धरम सालीऐ ॥3॥
साजन तेरे चरन की होइ रहा सद धूरि ॥
नानक सरणि तुहारीआ पेखउ सदा हजूरि ॥1॥
पतित पुनीत असंख होहि हरि चरणी मनु लाग ॥
अठसठि तीरथ नामु प्रभ जिसु नानक मसतकि भाग ॥2॥
नित जपीऐ सासि गिरासि नाउ परवदिगार दा ॥
जिस नो करे रहंम तिसु न विसारदा ॥
आपि उपावणहार आपे ही मारदा ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिसको सिमरने से सुख मिलता है और सारे दुख दूर हो जाते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।