अंम्रित हरि का नाउ सदा धिआइआ ॥
संत जना कै संगि दुखु मिटाइआ ॥
नानक भए अचिंतु हरि धनु निहचलाइआ ॥20॥
खेति मिआला उचीआ घरु उचा निरणउ ॥
महल भगती घरि सरै सजण पाहुणिअउ ॥
बरसना त बरसु घना बहुड़ि बरसहि काहि ॥
नानक तिन॑ बलिहारणै जिन॑ गुरमुखि पाइआ मन माहि ॥1॥
मिठा सो जो भावदा सजणु सो जि रासि ॥
नानक गुरमुखि जाणीऐ जा कउ आपि करे परगासु ॥2॥
प्रभ पासि जन की अरदासि तू सचा सांई ॥
तू रखवाला सदा सदा हउ तुधु धिआई ॥
जीअ जंत सभि तेरिआ तू रहिआ समाई ॥
जो दास तेरे की निंदा करे तिसु मारि पचाई ॥
चिंता छडि अचिंतु रहु नानक लगि पाई ॥21॥
आसा करता जगु मुआ आसा मरै न जाइ ॥
नानक आसा पूरीआ सचे सिउ चितु लाइ ॥1॥
आसा मनसा मरि जाइसी जिनि कीती सो लै जाइ ॥
नानक निहचलु को नही बाझहु हरि कै नाइ ॥2॥
आपे जगतु उपाइओनु करि पूरा थाटु ॥
आपे साहु आपे वणजारा आपे ही हरि हाटु ॥
आपे सागरु आपे बोहिथा आपे ही खेवाटु ॥
आपे गुरु चेला है आपे आपे दसे घाटु ॥
जन नानक नामु धिआइ तू सभि किलविख काटु ॥22॥1॥ सुधु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 5 ॥
अंतरि गुरु आराधणा जिहवा जपि गुर नाउ ॥
नेत्री सतिगुरु पेखणा स्रवणी सुनणा गुर नाउ ॥
सतिगुर सेती रतिआ दरगह पाईऐ ठाउ ॥
कहु नानक किरपा करे जिस नो एह वथु देइ ॥
जग महि उतम काढीअहि विरले केई केइ ॥1॥
रखे रखणहारि आपि उबारिअनु ॥
गुर की पैरी पाइ काज सवारिअनु ॥
होआ आपि दइआलु मनहु न विसारिअनु ॥
साध जना कै संगि भवजलु तारिअनु ॥
साकत निंदक दुसट खिन माहि बिदारिअनु ॥
तिसु साहिब की टेक नानक मनै माहि ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर सतिगुरू के हुकम में चलें तो (जैसे) सारे फल मिल जाते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।