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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 515 · गूजरी

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अंग
515
गूजरी
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  1. वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सभ महि रहिआ समाइ ॥
  2. वाहु वाहु गुरमुख सदा करहि मनमुख मरहि बिखु खाइ ॥
  3. हरि कै भाणै गुरु मिलै सेवा भगति बनीजै ॥
  4. वाहु वाहु से जन सदा करहि जिन॑ कउ आपे देइ बुझाइ ॥
  5. वाहु वाहु साहिबु सचु है अंम्रितु जा का नाउ ॥
  6. हरि जीउ सचा सचु है सची गुरबाणी ॥
  7. वाहु वाहु बाणी निरंकार है तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥

गुरु अमर दास जी · गूजरी की वार, सलोक · राग गूजरी

वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सभ महि रहिआ समाइ ॥

अंग 514 से चला आ रहा अंश

वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सभ महि रहिआ समाइ ॥
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि देदा रिजकु सबाहि ॥
नानक वाहु वाहु इको करि सालाहीऐ जि सतिगुर दीआ दिखाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: उसकी सिफत सालाह करनी चाहिए। (जो अपने भक्तों को) गुण बख्शने वाला है और अडोल मत वाला है। उसकी सिफत सालाह करनी चाहिए। जो सारे जीवों में व्यापक है और सबको रिजक पहुँचाता है। हे नानक! उसको ला-शरीक जान के उसकी उपमा करें। उसके दर्शन सतिगुरू ही करवाता है। 1।

गुरु अमर दास जी · गूजरी की वार, सलोक · राग गूजरी

वाहु वाहु गुरमुख सदा करहि मनमुख मरहि बिखु खाइ ॥

मः 3 ॥
वाहु वाहु गुरमुख सदा करहि मनमुख मरहि बिखु खाइ ॥
ओना वाहु वाहु न भावई दुखे दुखि विहाइ ॥
गुरमुखि अंम्रितु पीवणा वाहु वाहु करहि लिव लाइ ॥
नानक वाहु वाहु करहि से जन निरमले त्रिभवण सोझी पाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख हैं। वह सदा प्रभू की सिफत सलाह करते हैं; पर, मनमर्जी करने वाले मनुष्य माया-रूपी जहर खा के मरते हैं। उन्हें सिफत सालाह अच्छी नहीं लगती। इस लिए उनकी सारी उम्र दुख में ही व्यतीत होती है। गुरमुखों का जलपान ही नाम-अमृत है (भाव, गुरमुखों के लिए नाम-अमृत जीवन का आसरा है)। वे सुरति जोड़ के सिफत करते हैं। हे नानक! जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करते हैं वह पवित्र हो जाते हैं। उन्हें तीनों भवनों (में व्यापक प्रभू की) सूझ पड़ जाती है। 2।

गुरु अमर दास जी · गूजरी की वार, पउड़ी · राग गूजरी

हरि कै भाणै गुरु मिलै सेवा भगति बनीजै ॥

पउड़ी ॥
हरि कै भाणै गुरु मिलै सेवा भगति बनीजै ॥
हरि कै भाणै हरि मनि वसै सहजे रसु पीजै ॥
हरि कै भाणै सुखु पाईऐ हरि लाहा नित लीजै ॥
हरि कै तखति बहालीऐ निज घरि सदा वसीजै ॥
हरि का भाणा तिनी मंनिआ जिना गुरू मिलीजै ॥16॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अगर प्रभू की रजा हो तो (मनुष्य को) गुरू मिलता है और (उसके वास्ते) प्रभू के सिमरन व भक्ति (की युक्ति) बनती है। प्रभू मन में आ बसता है और अडोल अवस्था में (टिका हुआ) नाम-रस पीता है। (आत्मा को) सुख मिलता है और (जीव-व्यापारी को) सदा नाम-रूप नफा मिलता है। उस पवित्र पुरुष को हरि के राजसिंहासन पर विराजमान किया जाता है और वह सदा अपने घर में रहता है। जिन मनुष्यों को सतिगुरू मिल जाता है। वे मनुष्य परमात्मा की रजा को (मीठा करके) मानते हैं। 16।

गुरु अमर दास जी · गूजरी की वार, सलोक · राग गूजरी

वाहु वाहु से जन सदा करहि जिन॑ कउ आपे देइ बुझाइ ॥

सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु से जन सदा करहि जिन॑ कउ आपे देइ बुझाइ ॥
वाहु वाहु करतिआ मनु निरमलु होवै हउमै विचहु जाइ ॥
वाहु वाहु गुरसिखु जो नित करे सो मन चिंदिआ फलु पाइ ॥
वाहु वाहु करहि से जन सोहणे हरि तिन॑ कै संगि मिलाइ ॥
वाहु वाहु हिरदै उचरा मुखहु भी वाहु वाहु करेउ ॥
नानक वाहु वाहु जो करहि हउ तनु मनु तिन॑ कउ देउ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिन मनुष्यों को प्रभू स्वयं ही सुमति बख्शता है वे सदा प्रभू की सिफत सालाह करते हैं। प्रभू की सिफत सालाह करने से मन पवित्र होता है और मन में से अहंकार दूर होता है। जो भी मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के प्रभू की सिफत सालाह करता है। उसे मन-इच्छित फल मिलता है। जो मनुष्य सिफत सालाह करते हैं वह (देखने में भी) सुंदर लगते हैं। हे प्रभू! मुझे उनकी संगति में रखें। ता कि मैं अपने हृदय में आपकी सिफत करूँ और मुंह से भी आपके गुण गाऊँ। हे नानक! जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करते हैं। मैं अपना तन-मन उनके आगे भेट कर दूँ। 1।

गुरु अमर दास जी · गूजरी की वार, सलोक · राग गूजरी

वाहु वाहु साहिबु सचु है अंम्रितु जा का नाउ ॥

मः 3 ॥
वाहु वाहु साहिबु सचु है अंम्रितु जा का नाउ ॥
जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥
वाहु वाहु गुणी निधानु है जिस नो देइ सु खाइ ॥
वाहु वाहु जलि थलि भरपूरु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
वाहु वाहु गुरसिख नित सभ करहु गुर पूरे वाहु वाहु भावै ॥
नानक वाहु वाहु जो मनि चिति करे तिसु जमकंकरु नेड़ि न आवै ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिस मालिक प्रभू का नाम (जीवों को) आत्मिक बल देने वाला है उसकी सिफत सालाह उसी सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू का स्वरूप है। जिस जिस मनुष्य ने प्रभू को सिमरा है उस उस ने (नाम अमृत) फल प्राप्त कर लिया है। मैं ऐसे गुरमुखों से सदके हूँ। गुणों के खजाने प्रभू की सिफत उसका ही रूप है। प्रभू जिसको ये खजाना बख्शता है वही इसको बरतता है। सिफत का मालिक प्रभू पानी में धरती पर हर जगह व्यापक है। गुरू के राह पर चलते हुए वह प्रभू मिलता है। हे गुर-सिखो! सारे सदा प्रभू के गुण गाएँ। पूरे गुरू को प्रभू की सिफत सालाह मीठी लगती है। हे नानक! जो मनुष्य एक मन हो के सिफत सालाह करता है उसको मौत का डर नहीं हो सकता। 2।

गुरु अमर दास जी · गूजरी की वार, पउड़ी · राग गूजरी

हरि जीउ सचा सचु है सची गुरबाणी ॥

पउड़ी ॥
हरि जीउ सचा सचु है सची गुरबाणी ॥
सतिगुर ते सचु पछाणीऐ सचि सहजि समाणी ॥
अनदिनु जागहि ना सवहि जागत रैणि विहाणी ॥
गुरमती हरि रसु चाखिआ से पुंन पराणी ॥
बिनु गुर किनै न पाइओ पचि मुए अजाणी ॥17॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू सदा-स्थिर रहने वाला है। गुरू की बाणी उस सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह में है। गुरू के द्वारा उस प्रभू से जान-पहिचान बनती है और सदा-स्थिर अडोल अवस्था में टिक सकते हैं। वे हर समय सुचेत रहते हैं। (माया के मोह में) नहीं सोते। उनकी जिंदगी-रूपी सारी रात सुचेत रह के गुजरती है। पर, वह मनुष्य भाग्यशाली हैं जिन्होंने गुरू के राह पर चल कर प्रभू के नाम का रस चखा है। गुरू की शरण आए बिना किसी को प्रभू नहीं मिला। अंजान लोग (माया के मोह में) खप-खप के दुखी होते हैं। 17।

गुरु अमर दास जी · गूजरी की वार, सलोक · राग गूजरी

वाहु वाहु बाणी निरंकार है तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥

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सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु बाणी निरंकार है तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥
वाहु वाहु अगम अथाहु है वाहु वाहु सचा सोइ ॥
वाहु वाहु वेपरवाहु है वाहु वाहु करे सु होइ ॥
वाहु वाहु अंम्रित नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥
वाहु वाहु करमी पाईऐ आपि दइआ करि देइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो प्रभू आकार रहित है; जिसके बराबर का और कोई नहीं है; जो अपहुँच है। जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती। उसकी सिफत सालाह उसी का रूप है। जिसको किसी की मुथाजी नहीं। जिसका किया हुआ ही सब कुछ हो रहा है। उसका नाम जीवों को आत्मि्क जीवन देने वाला है। पर उसकी प्राप्ति किसी गुरमुख को ही होती है। सिफत सालाह की दाति सौभाग्य से ही मिलती है। जिसको मेहर करके प्रभू स्वयं देता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 515 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।