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अंग 515

अंग
515
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सभ महि रहिआ समाइ ॥
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि देदा रिजकु सबाहि ॥
नानक वाहु वाहु इको करि सालाहीऐ जि सतिगुर दीआ दिखाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: उसकी सिफत सालाह करनी चाहिए।(जो अपने भक्तों को) गुण बख्शने वाला है और अडोल मत वाला है। उसकी सिफत सालाह करनी चाहिए।जो सारे जीवों में व्यापक है और सबको रिजक पहुँचाता है। हे नानक ! उसको ला-शरीक जान के उसकी उपमा करें।उसके दर्शन सतिगुरू ही करवाता है। 1।
मः 3 ॥
वाहु वाहु गुरमुख सदा करहि मनमुख मरहि बिखु खाइ ॥
ओना वाहु वाहु न भावई दुखे दुखि विहाइ ॥
गुरमुखि अंम्रितु पीवणा वाहु वाहु करहि लिव लाइ ॥
नानक वाहु वाहु करहि से जन निरमले त्रिभवण सोझी पाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख हैं।वह सदा प्रभू की सिफत सलाह करते हैं; पर।मनमर्जी करने वाले मनुष्य माया-रूपी जहर खा के मरते हैं। उन्हें सिफत सालाह अच्छी नहीं लगती।इस लिए उनकी सारी उम्र दुख में ही व्यतीत होती है। गुरमुखों का जलपान ही नाम-अमृत है (भाव।गुरमुखों के लिए नाम-अमृत जीवन का आसरा है)।वे सुरति जोड़ के सिफत करते हैं। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करते हैं वह पवित्र हो जाते हैं।उन्हें तीनों भवनों (में व्यापक प्रभू की) सूझ पड़ जाती है। 2।
पउड़ी ॥
हरि कै भाणै गुरु मिलै सेवा भगति बनीजै ॥
हरि कै भाणै हरि मनि वसै सहजे रसु पीजै ॥
हरि कै भाणै सुखु पाईऐ हरि लाहा नित लीजै ॥
हरि कै तखति बहालीऐ निज घरि सदा वसीजै ॥
हरि का भाणा तिनी मंनिआ जिना गुरू मिलीजै ॥16॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अगर प्रभू की रजा हो तो (मनुष्य को) गुरू मिलता है और (उसके वास्ते) प्रभू के सिमरन व भक्ति (की युक्ति) बनती है। प्रभू मन में आ बसता है और अडोल अवस्था में (टिका हुआ) नाम-रस पीता है। (आत्मा को) सुख मिलता है और (जीव-व्यापारी को) सदा नाम-रूप नफा मिलता है। उस पवित्र पुरुष को हरि के राजसिंहासन पर विराजमान किया जाता है और वह सदा अपने घर में रहता है। जिन मनुष्यों को सतिगुरू मिल जाता है।वे मनुष्य परमात्मा की रजा को (मीठा करके) मानते हैं। 16।
सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु से जन सदा करहि जिन॑ कउ आपे देइ बुझाइ ॥
वाहु वाहु करतिआ मनु निरमलु होवै हउमै विचहु जाइ ॥
वाहु वाहु गुरसिखु जो नित करे सो मन चिंदिआ फलु पाइ ॥
वाहु वाहु करहि से जन सोहणे हरि तिन॑ कै संगि मिलाइ ॥
वाहु वाहु हिरदै उचरा मुखहु भी वाहु वाहु करेउ ॥
नानक वाहु वाहु जो करहि हउ तनु मनु तिन॑ कउ देउ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिन मनुष्यों को प्रभू स्वयं ही सुमति बख्शता है वे सदा प्रभू की सिफत सालाह करते हैं। प्रभू की सिफत सालाह करने से मन पवित्र होता है और मन में से अहंकार दूर होता है। जो भी मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के प्रभू की सिफत सालाह करता है।उसे मन-इच्छित फल मिलता है। जो मनुष्य सिफत सालाह करते हैं वह (देखने में भी) सुंदर लगते हैं।हे प्रभू ! मुझे उनकी संगति में रख। ता कि मैं अपने हृदय में आपकी सिफत करूँ और मुंह से भी आपके गुण गाऊँ। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करते हैं।मैं अपना तन-मन उनके आगे भेट कर दूँ। 1।
मः 3 ॥
वाहु वाहु साहिबु सचु है अंम्रितु जा का नाउ ॥
जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥
वाहु वाहु गुणी निधानु है जिस नो देइ सु खाइ ॥
वाहु वाहु जलि थलि भरपूरु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
वाहु वाहु गुरसिख नित सभ करहु गुर पूरे वाहु वाहु भावै ॥
नानक वाहु वाहु जो मनि चिति करे तिसु जमकंकरु नेड़ि न आवै ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिस मालिक प्रभू का नाम (जीवों को) आत्मिक बल देने वाला है उसकी सिफत सालाह उसी सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू का स्वरूप है। जिस जिस मनुष्य ने प्रभू को सिमरा है उस उस ने (नाम अमृत) फल प्राप्त कर लिया है।मैं ऐसे गुरमुखों से सदके हूँ। गुणों के खजाने प्रभू की सिफत उसका ही रूप है।प्रभू जिसको ये खजाना बख्शता है वही इसको बरतता है। सिफत का मालिक प्रभू पानी में धरती पर हर जगह व्यापक है।गुरू के राह पर चलते हुए वह प्रभू मिलता है। हे गुर-सिखो ! सारे सदा प्रभू के गुण गाओ।पूरे गुरू को प्रभू की सिफत सालाह मीठी लगती है। हे नानक ! जो मनुष्य एक मन हो के सिफत सालाह करता है उसको मौत का डर नहीं हो सकता। 2।
पउड़ी ॥
हरि जीउ सचा सचु है सची गुरबाणी ॥
सतिगुर ते सचु पछाणीऐ सचि सहजि समाणी ॥
अनदिनु जागहि ना सवहि जागत रैणि विहाणी ॥
गुरमती हरि रसु चाखिआ से पुंन पराणी ॥
बिनु गुर किनै न पाइओ पचि मुए अजाणी ॥17॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू सदा-स्थिर रहने वाला है।गुरू की बाणी उस सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह में है। गुरू के द्वारा उस प्रभू से जान-पहिचान बनती है और सदा-स्थिर अडोल अवस्था में टिक सकते हैं। वे हर समय सुचेत रहते हैं।(माया के मोह में) नहीं सोते।उनकी जिंदगी-रूपी सारी रात सुचेत रह के गुजरती है।पर। वह मनुष्य भाग्यशाली हैं जिन्होंने गुरू के राह पर चल कर प्रभू के नाम का रस चखा है। गुरू की शरण आए बिना किसी को प्रभू नहीं मिला।अंजान लोग (माया के मोह में) खप-खप के दुखी होते हैं। 17।
सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु बाणी निरंकार है तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥
वाहु वाहु अगम अथाहु है वाहु वाहु सचा सोइ ॥
वाहु वाहु वेपरवाहु है वाहु वाहु करे सु होइ ॥
वाहु वाहु अंम्रित नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥
वाहु वाहु करमी पाईऐ आपि दइआ करि देइ ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो प्रभू आकार रहित है; जिसके बराबर का और कोई नहीं है; जो अपहुँच है। जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती।उसकी सिफत सालाह उसी का रूप है। जिसको किसी की मुथाजी नहीं।जिसका किया हुआ ही सब कुछ हो रहा है। उसका नाम जीवों को आत्मि्क जीवन देने वाला है।पर उसकी प्राप्ति किसी गुरमुख को ही होती है। सिफत सालाह की दाति सौभाग्य से ही मिलती है।जिसको मेहर करके प्रभू स्वयं देता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।