वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि देदा रिजकु सबाहि ॥
नानक वाहु वाहु इको करि सालाहीऐ जि सतिगुर दीआ दिखाइ ॥1॥
वाहु वाहु गुरमुख सदा करहि मनमुख मरहि बिखु खाइ ॥
ओना वाहु वाहु न भावई दुखे दुखि विहाइ ॥
गुरमुखि अंम्रितु पीवणा वाहु वाहु करहि लिव लाइ ॥
नानक वाहु वाहु करहि से जन निरमले त्रिभवण सोझी पाइ ॥2॥
हरि कै भाणै गुरु मिलै सेवा भगति बनीजै ॥
हरि कै भाणै हरि मनि वसै सहजे रसु पीजै ॥
हरि कै भाणै सुखु पाईऐ हरि लाहा नित लीजै ॥
हरि कै तखति बहालीऐ निज घरि सदा वसीजै ॥
हरि का भाणा तिनी मंनिआ जिना गुरू मिलीजै ॥16॥
वाहु वाहु से जन सदा करहि जिन॑ कउ आपे देइ बुझाइ ॥
वाहु वाहु करतिआ मनु निरमलु होवै हउमै विचहु जाइ ॥
वाहु वाहु गुरसिखु जो नित करे सो मन चिंदिआ फलु पाइ ॥
वाहु वाहु करहि से जन सोहणे हरि तिन॑ कै संगि मिलाइ ॥
वाहु वाहु हिरदै उचरा मुखहु भी वाहु वाहु करेउ ॥
नानक वाहु वाहु जो करहि हउ तनु मनु तिन॑ कउ देउ ॥1॥
वाहु वाहु साहिबु सचु है अंम्रितु जा का नाउ ॥
जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥
वाहु वाहु गुणी निधानु है जिस नो देइ सु खाइ ॥
वाहु वाहु जलि थलि भरपूरु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
वाहु वाहु गुरसिख नित सभ करहु गुर पूरे वाहु वाहु भावै ॥
नानक वाहु वाहु जो मनि चिति करे तिसु जमकंकरु नेड़ि न आवै ॥2॥
हरि जीउ सचा सचु है सची गुरबाणी ॥
सतिगुर ते सचु पछाणीऐ सचि सहजि समाणी ॥
अनदिनु जागहि ना सवहि जागत रैणि विहाणी ॥
गुरमती हरि रसु चाखिआ से पुंन पराणी ॥
बिनु गुर किनै न पाइओ पचि मुए अजाणी ॥17॥
वाहु वाहु बाणी निरंकार है तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥
वाहु वाहु अगम अथाहु है वाहु वाहु सचा सोइ ॥
वाहु वाहु वेपरवाहु है वाहु वाहु करे सु होइ ॥
वाहु वाहु अंम्रित नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥
वाहु वाहु करमी पाईऐ आपि दइआ करि देइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।