काइआ कोटु अपारु है मिलणा संजोगी ॥
काइआ अंदरि आपि वसि रहिआ आपे रस भोगी ॥
आपि अतीतु अलिपतु है निरजोगु हरि जोगी ॥
जो तिसु भावै सो करे हरि करे सु होगी ॥
हरि गुरमुखि नामु धिआईऐ लहि जाहि विजोगी ॥13॥
वाहु वाहु आपि अखाइदा गुर सबदी सचु सोइ ॥
वाहु वाहु सिफति सलाह है गुरमुखि बूझै कोइ ॥
वाहु वाहु बाणी सचु है सचि मिलावा होइ ॥
नानक वाहु वाहु करतिआ प्रभु पाइआ करमि परापति होइ ॥1॥
वाहु वाहु करती रसना सबदि सुहाई ॥
पूरै सबदि प्रभु मिलिआ आई ॥
वडभागीआ वाहु वाहु मुहहु कढाई ॥
वाहु वाहु करहि सेई जन सोहणे तिन॑ कउ परजा पूजण आई ॥
वाहु वाहु करमि परापति होवै नानक दरि सचै सोभा पाई ॥2॥
बजर कपाट काइआ गड़॑ भीतरि कूड़ु कुसतु अभिमानी ॥
भरमि भूले नदरि न आवनी मनमुख अंध अगिआनी ॥
उपाइ कितै न लभनी करि भेख थके भेखवानी ॥
गुर सबदी खोलाईअनि॑ हरि नामु जपानी ॥
हरि जीउ अंम्रित बिरखु है जिन पीआ ते त्रिपतानी ॥14॥
वाहु वाहु करतिआ रैणि सुखि विहाइ ॥
वाहु वाहु करतिआ सदा अनंदु होवै मेरी माइ ॥
वाहु वाहु करतिआ हरि सिउ लिव लाइ ॥
वाहु वाहु करमी बोलै बोलाइ ॥
वाहु वाहु करतिआ सोभा पाइ ॥
नानक वाहु वाहु सति रजाइ ॥1॥
वाहु वाहु बाणी सचु है गुरमुखि लधी भालि ॥
वाहु वाहु सबदे उचरै वाहु वाहु हिरदै नालि ॥
वाहु वाहु करतिआ हरि पाइआ सहजे गुरमुखि भालि ॥
से वडभागी नानका हरि हरि रिदै समालि ॥2॥
ए मना अति लोभीआ नित लोभे राता ॥
माइआ मनसा मोहणी दह दिस फिराता ॥
अगै नाउ जाति न जाइसी मनमुखि दुखु खाता ॥
रसना हरि रसु न चखिओ फीका बोलाता ॥
जिना गुरमुखि अंम्रितु चाखिआ से जन त्रिपताता ॥15॥
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सचा गहिर गंभीरु ॥
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि गुणदाता मति धीरु ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इस तरह) हे नानक ! मन अंदर से ही (प्रभू के नाम में) पतीज जाता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।