Lulla Family

अंग 514

अंग
514
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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नानक मन ही ते मनु मानिआ ना किछु मरै न जाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (इस तरह) हे नानक ! मन अंदर से ही (प्रभू के नाम में) पतीज जाता है।फिर इसका ना कुछ मरता है ना पैदा होता है। 2।
पउड़ी ॥
काइआ कोटु अपारु है मिलणा संजोगी ॥
काइआ अंदरि आपि वसि रहिआ आपे रस भोगी ॥
आपि अतीतु अलिपतु है निरजोगु हरि जोगी ॥
जो तिसु भावै सो करे हरि करे सु होगी ॥
हरि गुरमुखि नामु धिआईऐ लहि जाहि विजोगी ॥13॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। मनुष्य का शरीर (मानो) एक बड़ा किला है जो मनुष्य को भाग्यों से मिलता है। इस शरीर में प्रभू स्वयं बस रहा है और (कहीं तो) रस भोग रहा है। (कहीं) खुद जोगी प्रभू विरक्त है।माया के असर से परे है और निरबंध है। जो उसको अच्छा लगता है वह वही करता है।जो कुछ प्रभू करता है वही होता है (जीवों का ‘रस भोगी’ बनाने वाला भी वह स्वयं ही है और ‘अतीतु अलिपत’ विरक्त बनाने वाला भी खुद)। अगर। गुरू के सन्मुख हो के प्रभू का नाम सिमरें तो (मायावी रस-रूप) सारे विछोड़े (भाव।प्रभू से विछोड़े का मूल) दूर हो जाते हैं। 13।
सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु आपि अखाइदा गुर सबदी सचु सोइ ॥
वाहु वाहु सिफति सलाह है गुरमुखि बूझै कोइ ॥
वाहु वाहु बाणी सचु है सचि मिलावा होइ ॥
नानक वाहु वाहु करतिआ प्रभु पाइआ करमि परापति होइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ वह सच्चा प्रभू खुद ही सतिगुरू के शबद के माध्यम से (मनुष्य से) ‘वाहु वाहु’ कहलवाता है (भाव।सिफत सालाह कराता है) कोई (विरला) मनुष्य समझता है कि ‘वाह वाह’ कहना परमात्मा की सिफत सालाह करनी है। परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी परमात्मा का रूप है।(इससे) परमात्मा में मेल होता है। हे नानक ! (प्रभू की) सिफत सालाह करते हुए प्रभू मिल पड़ता है; (पर।ये सिफत सालाह) प्रभू की मेहर से मिलती है। 1।
मः 3 ॥
वाहु वाहु करती रसना सबदि सुहाई ॥
पूरै सबदि प्रभु मिलिआ आई ॥
वडभागीआ वाहु वाहु मुहहु कढाई ॥
वाहु वाहु करहि सेई जन सोहणे तिन॑ कउ परजा पूजण आई ॥
वाहु वाहु करमि परापति होवै नानक दरि सचै सोभा पाई ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ गुरू के शबद द्वारा ‘वाहु वाहु’ कहती जीभ सुंदर लगती है। प्रभू मिलता ही गुरू के पूरन शबद द्वारा है। बड़े भाग्यों वालों के मुंह में से प्रभू ‘वाहु वाहु’ कहलवाता है। जो मनुष्य ‘वाहु वाहु’ करते हैं।वह सुंदर लगते हैं और सारी दुनिया उनके चरण परसने आती है। हे नानक ! प्रभू की मेहर से प्रभू की सिफत सालाह होती है और सच्चे दर पर शोभा मिलती है। 2।
पउड़ी ॥
बजर कपाट काइआ गड़॑ भीतरि कूड़ु कुसतु अभिमानी ॥
भरमि भूले नदरि न आवनी मनमुख अंध अगिआनी ॥
उपाइ कितै न लभनी करि भेख थके भेखवानी ॥
गुर सबदी खोलाईअनि॑ हरि नामु जपानी ॥
हरि जीउ अंम्रित बिरखु है जिन पीआ ते त्रिपतानी ॥14॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अहंकारी मनुष्यों के शरीर-रूपी किले में झूठ और फरेब रूपी कड़े फाटक लगे हुए हैं। पर अंधे और अज्ञानीमनुष्यों के भरम में भूले होने के कारण उन्हें दिखते नहीं। भेख करने वाले मनुष्य भेख कर करके थक गए हैं।पर उन्हें भी किसी उपाय करने से (ये फाटक) नहीं दिखे। (हां) जो मनुष्य हरी का नाम जपते हैं।उनके कपाट सतिगुरू के शबद की बरकति से खुलते हैं। प्रभू (का नाम) अमृत का वृक्ष है।जिन्होंने (इसका) रस पीया है वे तृप्त हो गए हैं। 14।
सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु करतिआ रैणि सुखि विहाइ ॥
वाहु वाहु करतिआ सदा अनंदु होवै मेरी माइ ॥
वाहु वाहु करतिआ हरि सिउ लिव लाइ ॥
वाहु वाहु करमी बोलै बोलाइ ॥
वाहु वाहु करतिआ सोभा पाइ ॥
नानक वाहु वाहु सति रजाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे मेरी माँ ! प्रभू की सिफत सालाह करते हुए (मनुष्य जनम रूपी) रात सुखी गुजरती है और सदा मौज बनी रहती है। प्रभू की सिफत सलाह करते हुए प्रभू के साथ सुरति जुड़ती है। पर। कोई विरला मनुष्य प्रभू की मेहर से प्रभू का प्रेरा हुआ ‘वाहु वाहु’ की बाणी उचारता है। प्रभू की सिफत सालाह करते हुए शोभा मिलती है। और हे नानक ! ये सिफत सालाह (मनुष्य को) प्रभू की रजा में जोड़े रखती है। 1।
मः 3 ॥
वाहु वाहु बाणी सचु है गुरमुखि लधी भालि ॥
वाहु वाहु सबदे उचरै वाहु वाहु हिरदै नालि ॥
वाहु वाहु करतिआ हरि पाइआ सहजे गुरमुखि भालि ॥
से वडभागी नानका हरि हरि रिदै समालि ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ प्रभू की सिफत सालाह की बाणी प्रभू (का रूप ही) है।जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख है उसने तलाश के ढूँढ ली है। गुरू के शबद द्वारा वह ‘वाहु वाहु’ कहता है और हृदय से (परो के रखता है)। गुरमुखों ने सहज ही तलाश करके प्रभू की सिफत सालाह करते हुए प्रभू को पा लिया है। हे नानक ! वह मनुष्य बड़े भाग्यों वाले हैं जो प्रभू के नाम को अपने हृदय में संभालते हैं। 2।
पउड़ी ॥
ए मना अति लोभीआ नित लोभे राता ॥
माइआ मनसा मोहणी दह दिस फिराता ॥
अगै नाउ जाति न जाइसी मनमुखि दुखु खाता ॥
रसना हरि रसु न चखिओ फीका बोलाता ॥
जिना गुरमुखि अंम्रितु चाखिआ से जन त्रिपताता ॥15॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे सदा लोभ में रते हुए लोभी मन ! मोहनी माया की चाह के कारण आप दसों दिशाओं में भटकता फिरता है। हे मनमुख (मन !) दरगाह में बड़ा नाम और ऊँची जाति।साथ नहीं जाएंगे।(इनमें भूला हुआ) दुख भोगेगा। जीभ से तूने प्रभू के नाम का स्वाद नहीं चखा और फीका (माया संबंधी वचन ही) बोलता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के सन्मुख हो के (नाम-रूप) अमृत चखा है वे तृप्त हो गए हैं। 15।
सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सचा गहिर गंभीरु ॥
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि गुणदाता मति धीरु ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ वाह-वाह उसे कहना चाहिए जो सत्यस्वरूप एवं गहन-गंभीर है। उसकी सिफत सालाह करनी चाहिए। जो प्रभू सदा कायम रहने वाला है और बड़े जिगरे वाला है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इस तरह) हे नानक ! मन अंदर से ही (प्रभू के नाम में) पतीज जाता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।