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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 514 · गूजरी

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अंग
514
गूजरी
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  1. नानक मन ही ते मनु मानिआ ना किछु मरै न जाइ ॥2॥
  2. काइआ कोटु अपारु है मिलणा संजोगी ॥
  3. वाहु वाहु आपि अखाइदा गुर सबदी सचु सोइ ॥
  4. वाहु वाहु करती रसना सबदि सुहाई ॥
  5. बजर कपाट काइआ गड़॑ भीतरि कूड़ु कुसतु अभिमानी ॥
  6. वाहु वाहु करतिआ रैणि सुखि विहाइ ॥
  7. वाहु वाहु बाणी सचु है गुरमुखि लधी भालि ॥
  8. ए मना अति लोभीआ नित लोभे राता ॥
  9. वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सचा गहिर गंभीरु ॥

नानक मन ही ते मनु मानिआ ना किछु मरै न जाइ ॥2॥

अंग 513 से चला आ रहा अंश

नानक मन ही ते मनु मानिआ ना किछु मरै न जाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: (इस तरह) हे नानक ! मन अंदर से ही (प्रभू के नाम में) पतीज जाता है। फिर इसका ना कुछ मरता है ना पैदा होता है। 2।

काइआ कोटु अपारु है मिलणा संजोगी ॥

पउड़ी ॥
काइआ कोटु अपारु है मिलणा संजोगी ॥
काइआ अंदरि आपि वसि रहिआ आपे रस भोगी ॥
आपि अतीतु अलिपतु है निरजोगु हरि जोगी ॥
जो तिसु भावै सो करे हरि करे सु होगी ॥
हरि गुरमुखि नामु धिआईऐ लहि जाहि विजोगी ॥13॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। मनुष्य का शरीर (मानो) एक बड़ा किला है जो मनुष्य को भाग्यों से मिलता है। इस शरीर में प्रभू स्वयं बस रहा है और (कहीं तो) रस भोग रहा है। (कहीं) खुद जोगी प्रभू विरक्त है। माया के असर से परे है और निरबंध है। जो उसको अच्छा लगता है वह वही करता है। जो कुछ प्रभू करता है वही होता है (जीवों का ‘रस भोगी’ बनाने वाला भी वह स्वयं ही है और ‘अतीतु अलिपत’ विरक्त बनाने वाला भी खुद)। अगर। गुरू के सन्मुख हो के प्रभू का नाम सिमरें तो (मायावी रस-रूप) सारे विछोड़े (भाव। प्रभू से विछोड़े का मूल) दूर हो जाते हैं। 13।

वाहु वाहु आपि अखाइदा गुर सबदी सचु सोइ ॥

सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु आपि अखाइदा गुर सबदी सचु सोइ ॥
वाहु वाहु सिफति सलाह है गुरमुखि बूझै कोइ ॥
वाहु वाहु बाणी सचु है सचि मिलावा होइ ॥
नानक वाहु वाहु करतिआ प्रभु पाइआ करमि परापति होइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ वह सच्चा प्रभू खुद ही सतिगुरू के शबद के माध्यम से (मनुष्य से) ‘वाहु वाहु’ कहलवाता है (भाव। सिफत सालाह कराता है) कोई (विरला) मनुष्य समझता है कि ‘वाह वाह’ कहना परमात्मा की सिफत सालाह करनी है। परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी परमात्मा का रूप है। (इससे) परमात्मा में मेल होता है। हे नानक ! (प्रभू की) सिफत सालाह करते हुए प्रभू मिल पड़ता है; (पर। ये सिफत सालाह) प्रभू की मेहर से मिलती है। 1।

वाहु वाहु करती रसना सबदि सुहाई ॥

मः 3 ॥
वाहु वाहु करती रसना सबदि सुहाई ॥
पूरै सबदि प्रभु मिलिआ आई ॥
वडभागीआ वाहु वाहु मुहहु कढाई ॥
वाहु वाहु करहि सेई जन सोहणे तिन॑ कउ परजा पूजण आई ॥
वाहु वाहु करमि परापति होवै नानक दरि सचै सोभा पाई ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ गुरू के शबद द्वारा ‘वाहु वाहु’ कहती जीभ सुंदर लगती है। प्रभू मिलता ही गुरू के पूरन शबद द्वारा है। बड़े भाग्यों वालों के मुंह में से प्रभू ‘वाहु वाहु’ कहलवाता है। जो मनुष्य ‘वाहु वाहु’ करते हैं। वह सुंदर लगते हैं और सारी दुनिया उनके चरण परसने आती है। हे नानक ! प्रभू की मेहर से प्रभू की सिफत सालाह होती है और सच्चे दर पर शोभा मिलती है। 2।

बजर कपाट काइआ गड़॑ भीतरि कूड़ु कुसतु अभिमानी ॥

पउड़ी ॥
बजर कपाट काइआ गड़॑ भीतरि कूड़ु कुसतु अभिमानी ॥
भरमि भूले नदरि न आवनी मनमुख अंध अगिआनी ॥
उपाइ कितै न लभनी करि भेख थके भेखवानी ॥
गुर सबदी खोलाईअनि॑ हरि नामु जपानी ॥
हरि जीउ अंम्रित बिरखु है जिन पीआ ते त्रिपतानी ॥14॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अहंकारी मनुष्यों के शरीर-रूपी किले में झूठ और फरेब रूपी कड़े फाटक लगे हुए हैं। पर अंधे और अज्ञानीमनुष्यों के भरम में भूले होने के कारण उन्हें दिखते नहीं। भेख करने वाले मनुष्य भेख कर करके थक गए हैं। पर उन्हें भी किसी उपाय करने से (ये फाटक) नहीं दिखे। (हां) जो मनुष्य हरी का नाम जपते हैं। उनके कपाट सतिगुरू के शबद की बरकति से खुलते हैं। प्रभू (का नाम) अमृत का वृक्ष है। जिन्होंने (इसका) रस पीया है वे तृप्त हो गए हैं। 14।

वाहु वाहु करतिआ रैणि सुखि विहाइ ॥

सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु करतिआ रैणि सुखि विहाइ ॥
वाहु वाहु करतिआ सदा अनंदु होवै मेरी माइ ॥
वाहु वाहु करतिआ हरि सिउ लिव लाइ ॥
वाहु वाहु करमी बोलै बोलाइ ॥
वाहु वाहु करतिआ सोभा पाइ ॥
नानक वाहु वाहु सति रजाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे मेरी माँ ! प्रभू की सिफत सालाह करते हुए (मनुष्य जनम रूपी) रात सुखी गुजरती है और सदा मौज बनी रहती है। प्रभू की सिफत सलाह करते हुए प्रभू के साथ सुरति जुड़ती है। पर। कोई विरला मनुष्य प्रभू की मेहर से प्रभू का प्रेरा हुआ ‘वाहु वाहु’ की बाणी उचारता है। प्रभू की सिफत सालाह करते हुए शोभा मिलती है। और हे नानक ! ये सिफत सालाह (मनुष्य को) प्रभू की रजा में जोड़े रखती है। 1।

वाहु वाहु बाणी सचु है गुरमुखि लधी भालि ॥

मः 3 ॥
वाहु वाहु बाणी सचु है गुरमुखि लधी भालि ॥
वाहु वाहु सबदे उचरै वाहु वाहु हिरदै नालि ॥
वाहु वाहु करतिआ हरि पाइआ सहजे गुरमुखि भालि ॥
से वडभागी नानका हरि हरि रिदै समालि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ प्रभू की सिफत सालाह की बाणी प्रभू (का रूप ही) है। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख है उसने तलाश के ढूँढ ली है। गुरू के शबद द्वारा वह ‘वाहु वाहु’ कहता है और हृदय से (परो के रखता है)। गुरमुखों ने सहज ही तलाश करके प्रभू की सिफत सालाह करते हुए प्रभू को पा लिया है। हे नानक ! वह मनुष्य बड़े भाग्यों वाले हैं जो प्रभू के नाम को अपने हृदय में संभालते हैं। 2।

ए मना अति लोभीआ नित लोभे राता ॥

पउड़ी ॥
ए मना अति लोभीआ नित लोभे राता ॥
माइआ मनसा मोहणी दह दिस फिराता ॥
अगै नाउ जाति न जाइसी मनमुखि दुखु खाता ॥
रसना हरि रसु न चखिओ फीका बोलाता ॥
जिना गुरमुखि अंम्रितु चाखिआ से जन त्रिपताता ॥15॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे सदा लोभ में रते हुए लोभी मन ! मोहनी माया की चाह के कारण आप दसों दिशाओं में भटकते फिरते हैं। हे मनमुख (मन !) दरगाह में बड़ा नाम और ऊँची जाति। साथ नहीं जाएंगे। (इनमें भूला हुआ) दुख भोगेगा। जीभ से आपने प्रभू के नाम का स्वाद नहीं चखा और फीका (माया संबंधी वचन ही) बोलता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के सन्मुख हो के (नाम-रूप) अमृत चखा है वे तृप्त हो गए हैं। 15।

वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सचा गहिर गंभीरु ॥

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सलोकु मः 3 ॥
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सचा गहिर गंभीरु ॥
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि गुणदाता मति धीरु ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ वाह-वाह उसे कहना चाहिए जो सत्यस्वरूप एवं गहन-गंभीर है। उसकी सिफत सालाह करनी चाहिए। जो प्रभू सदा कायम रहने वाला है और बड़े जिगरे वाला है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 514 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।