नानक नदरी पाईऐ ता अनदिनु लागै धिआनु ॥2॥
सतु संतोखु सभु सचु है गुरमुखि पविता ॥
अंदरहु कपटु विकारु गइआ मनु सहजे जिता ॥
तह जोति प्रगासु अनंद रसु अगिआनु गविता ॥
अनदिनु हरि के गुण रवै गुण परगटु किता ॥
सभना दाता एकु है इको हरि मिता ॥9॥
ब्रहमु बिंदे सो ब्राहमणु कहीऐ जि अनदिनु हरि लिव लाए ॥
सतिगुर पुछै सचु संजमु कमावै हउमै रोगु तिसु जाए ॥
हरि गुण गावै गुण संग्रहै जोती जोति मिलाए ॥
इसु जुग महि को विरला ब्रहम गिआनी जि हउमै मेटि समाए ॥
नानक तिस नो मिलिआ सदा सुखु पाईऐ जि अनदिनु हरि नामु धिआए ॥1॥
अंतरि कपटु मनमुख अगिआनी रसना झूठु बोलाइ ॥
कपटि कीतै हरि पुरखु न भीजै नित वेखै सुणै सुभाइ ॥
दूजै भाइ जाइ जगु परबोधै बिखु माइआ मोह सुआइ ॥
इतु कमाणै सदा दुखु पावै जंमै मरै फिरि आवै जाइ ॥
सहसा मूलि न चुकई विचि विसटा पचै पचाइ ॥
जिस नो क्रिपा करे मेरा सुआमी तिसु गुर की सिख सुणाइ ॥
हरि नामु धिआवै हरि नामो गावै हरि नामो अंति छडाइ ॥2॥
जिना हुकमु मनाइओनु ते पूरे संसारि ॥
साहिबु सेवनि॑ आपणा पूरै सबदि वीचारि ॥
हरि की सेवा चाकरी सचै सबदि पिआरि ॥
हरि का महलु तिन॑ी पाइआ जिन॑ हउमै विचहु मारि ॥
नानक गुरमुखि मिलि रहे जपि हरि नामा उर धारि ॥10॥
गुरमुखि धिआन सहज धुनि उपजै सचि नामि चितु लाइआ ॥
गुरमुखि अनदिनु रहै रंगि राता हरि का नामु मनि भाइआ ॥
गुरमुखि हरि वेखहि गुरमुखि हरि बोलहि गुरमुखि हरि सहजि रंगु लाइआ ॥
नानक गुरमुखि गिआनु परापति होवै तिमर अगिआनु अधेरु चुकाइआ ॥
जिस नो करमु होवै धुरि पूरा तिनि गुरमुखि हरि नामु धिआइआ ॥1॥
सतिगुरु जिना न सेविओ सबदि न लगो पिआरु ॥
सहजे नामु न धिआइआ कितु आइआ संसारि ॥
फिरि फिरि जूनी पाईऐ विसटा सदा खुआरु ॥
कूड़ै लालचि लगिआ ना उरवारु न पारु ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सुखों का दाता परमात्मा मन में आ बसेगा।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।