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- काइआ मिटी अंधु है पउणै पुछहु जाइ ॥
- एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥
- मेरा साहिबु अति वडा सचु गहिर गंभीरा ॥
- ध्रिगु तिन॑ा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥
- मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥
- बिनु बूझे वडा फेरु पइआ फिरि आवै जाई ॥
- जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥
- ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥
काइआ मिटी अंधु है पउणै पुछहु जाइ ॥
काइआ मिटी अंधु है पउणै पुछहु जाइ ॥
हउ ता माइआ मोहिआ फिरि फिरि आवा जाइ ॥
नानक हुकमु न जातो खसम का जि रहा सचि समाइ ॥1॥
हउ ता माइआ मोहिआ फिरि फिरि आवा जाइ ॥
नानक हुकमु न जातो खसम का जि रहा सचि समाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: (शरीर तो मिट्टी समझो) ज्ञानहीन है (झूठ बोल-बोल के इसको पालने का क्या लाभ आखिर लेखा तो जीवात्मा से ही माँगा जाता है)। जीवात्मा को अगर पूछो (कि ये शरीर पालने में ही क्यों लगी रही। तो इसका उत्तर ये है कि) मैं माया के मोह में फंसा बार-बार जनम-मरन में पड़ा रहा। हे नानक ! मैंने खसम का हुकम ना पहचाना जिसकी बरकति से मैं सच्चे प्रभू में टिका रहता। 1।
एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥
मः 3 ॥
एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥
इसु धन कउ तसकरु जोहि न सकई ना ओचका लै जाइ ॥
इहु हरि धनु जीऐ सेती रवि रहिआ जीऐ नाले जाइ ॥
पूरे गुर ते पाईऐ मनमुखि पलै न पाइ ॥
धनु वापारी नानका जिन॑ा नाम धनु खटिआ आइ ॥2॥
एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥
इसु धन कउ तसकरु जोहि न सकई ना ओचका लै जाइ ॥
इहु हरि धनु जीऐ सेती रवि रहिआ जीऐ नाले जाइ ॥
पूरे गुर ते पाईऐ मनमुखि पलै न पाइ ॥
धनु वापारी नानका जिन॑ा नाम धनु खटिआ आइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ परमात्मा का नाम ही एक ऐसा धन है जो सदा ही कायम रहता है। और धन कभी मिला और कभी नाश हो गया; इस धन की ओर कोई चोर आँख उठा के नहीं देख सकता। कोई उचक्का इसे छीन नहीं सकता। परमात्मा का नाम-रूप ये धन जीवात्मा के साथ ही रहता है जीवात्मा के साथ ही जाता है। ये धन पूरे गुरू से मिलता है। पर जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उसे नहीं मिलता। हे नानक ! भाग्यशाली हैं वे बन्जारे। जिन्होंने जगत में आकर नाम-रूपी धन कमाया है। 2।
मेरा साहिबु अति वडा सचु गहिर गंभीरा ॥
पउड़ी ॥
मेरा साहिबु अति वडा सचु गहिर गंभीरा ॥
सभु जगु तिस कै वसि है सभु तिस का चीरा ॥
गुर परसादी पाईऐ निहचलु धनु धीरा ॥
किरपा ते हरि मनि वसै भेटै गुरु सूरा ॥
गुणवंती सालाहिआ सदा थिरु निहचलु हरि पूरा ॥7॥
मेरा साहिबु अति वडा सचु गहिर गंभीरा ॥
सभु जगु तिस कै वसि है सभु तिस का चीरा ॥
गुर परसादी पाईऐ निहचलु धनु धीरा ॥
किरपा ते हरि मनि वसै भेटै गुरु सूरा ॥
गुणवंती सालाहिआ सदा थिरु निहचलु हरि पूरा ॥7॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मेरा मालिक प्रभू बहुत ही बड़ा है। सदा कायम रहने वाला है। गहरा है और धैर्यवान है। सारा संसार उसके वश में है। सारा जगत उसके आसरे है। उस प्रभू का नाम-धन सदा कायम रहने वाला है। अटॅल है। और गुरू की कृपा से मिलता है। प्रभू की मेहर से सूरमा गुरू मिलता है और हरी-नाम मन में बसता है। वह सदा-स्थिर अडोल और पूरे प्रभू को गुणवानों ने सलाहा है। 7।
ध्रिगु तिन॑ा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥
सलोकु मः 3 ॥
ध्रिगु तिन॑ा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥
मनमुख अगिआनी माइआ मोहि विआपे तिन॑ बूझ न काई पाइ ॥
हलति पलति ओइ सुखु न पावहि अंति गए पछुताइ ॥
गुर परसादी को नामु धिआए तिसु हउमै विचहु जाइ ॥
नानक जिसु पूरबि होवै लिखिआ सो गुर चरणी आइ पाइ ॥1॥
ध्रिगु तिन॑ा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥
मनमुख अगिआनी माइआ मोहि विआपे तिन॑ बूझ न काई पाइ ॥
हलति पलति ओइ सुखु न पावहि अंति गए पछुताइ ॥
गुर परसादी को नामु धिआए तिसु हउमै विचहु जाइ ॥
नानक जिसु पूरबि होवै लिखिआ सो गुर चरणी आइ पाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ धिक्कार है उनका जीना। जो परमात्मा के नाम का आनंद बिल्कुल ही त्याग देते हैं और अहंकार में पाप करके दुख सहते हैं। ऐसे जाहिल मन के पीछे चलते हैं। और माया के मोह में जकड़े रहते हैं। उन्हें कोई अक्ल नहीं होती। उन्हें ना इस लोक में ना ही परलोक में कोई सुख मिलता है। मरने के वक्त भी हाथ मलते ही जाते हैं। जो मनुष्य गुरू की कृपा से प्रभू का नाम सिमरता है उसके अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। हे नानक ! जिसके माथे पर धुर से भाग्य हों वह मनुष्य सतिगुरू के चरणों में आ पड़ता है। 1।
मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥
मः 3 ॥
मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥
सकती अंदरि वरतदा कूड़ु तिस का है उपाउ ॥
तिस का अंदरु चितु न भिजई मुखि फीका आलाउ ॥
ओइ धरमि रलाए ना रलनि॑ ओना अंदरि कूड़ु सुआउ ॥
नानक करतै बणत बणाई मनमुख कूड़ु बोलि बोलि डुबे गुरमुखि तरे जपि हरि नाउ ॥2॥
मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥
सकती अंदरि वरतदा कूड़ु तिस का है उपाउ ॥
तिस का अंदरु चितु न भिजई मुखि फीका आलाउ ॥
ओइ धरमि रलाए ना रलनि॑ ओना अंदरि कूड़ु सुआउ ॥
नानक करतै बणत बणाई मनमुख कूड़ु बोलि बोलि डुबे गुरमुखि तरे जपि हरि नाउ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (जैसे) उल्टा कमल का फूल है। इसमें ना भक्ति है ना सिमरन। ये माया के असर तहत ही कार-विहार करता है। झूठ (माया) ही इस का प्रयोजन (जिंदगी का निशाना) है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का अंदर भीगता नहीं। सुतुष्टि नहीं होती। मुंह से भी फीके बोल ही बोलता है। ऐसे लोग धरम में जोड़े नहीं जुड़ते क्योंकि उनके अंदर झूठ की खुदगर्जी है। हे नानक ! करतार ने ऐसी खेल रची है कि मन के पीछे चलने वाले लोग तो झूठ बोल-बोल के ग़र्क होते हैं और गुरू के सन्मुख रहने वाले नाम जपके (माया की बाढ़ में से) तैर जाते हैं। 2।
बिनु बूझे वडा फेरु पइआ फिरि आवै जाई ॥
पउड़ी ॥
बिनु बूझे वडा फेरु पइआ फिरि आवै जाई ॥
सतिगुर की सेवा न कीतीआ अंति गइआ पछुताई ॥
आपणी किरपा करे गुरु पाईऐ विचहु आपु गवाई ॥
त्रिसना भुख विचहु उतरै सुखु वसै मनि आई ॥
सदा सदा सालाहीऐ हिरदै लिव लाई ॥8॥
बिनु बूझे वडा फेरु पइआ फिरि आवै जाई ॥
सतिगुर की सेवा न कीतीआ अंति गइआ पछुताई ॥
आपणी किरपा करे गुरु पाईऐ विचहु आपु गवाई ॥
त्रिसना भुख विचहु उतरै सुखु वसै मनि आई ॥
सदा सदा सालाहीऐ हिरदै लिव लाई ॥8॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (ये बात) समझे बिना (कि ‘गुर परसादी पाईअै’। मनुष्य को) जनम मरण का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। मनुष्य बार-बार पैदा होता है मरता है। गुरू की सेवा (सारी उम्र ही) नहीं करता (भाव। सारी उम्र गुरू के कहे पर नहीं चलता) आखिर (मरने के वक्त) हाथ मलता जाता है। जब प्रभू अपनी मेहर करता है तो गुरू मिलता है। अंदर से स्वैभाव दूर होता है। माया की तृष्णा-भूख खत्म होती है। मन में सुख आ बसता है। और सुरति जोड़ के सदा हृदय में प्रभू सिमरा जा सकता है। 8।
जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥
सलोकु मः 3 ॥
जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥
सभना उपावा सिरि उपाउ है हरि नामु परापति होइ ॥
अंतरि सीतल साति वसै जपि हिरदै सदा सुखु होइ ॥
अंम्रितु खाणा अंम्रितु पैनणा नानक नामु वडाई होइ ॥1॥
जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥
सभना उपावा सिरि उपाउ है हरि नामु परापति होइ ॥
अंतरि सीतल साति वसै जपि हिरदै सदा सुखु होइ ॥
अंम्रितु खाणा अंम्रितु पैनणा नानक नामु वडाई होइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो मनुष्य अपने गुरू के कहे पर चलता है। हरेक बंदा उसका आदर करता है। सो (जगत में भी सम्मान हासिल करने के लिए) सभी उपायों में बड़ा उपाय यही है कि प्रभू का नाम मिल जाए। ‘नाम’ जपने से हृदय में सुख होता है। मन में ठंड और शांति बसती है। (गुरू की आज्ञा में चल के ‘नाम’ जपने वाले बंदे की) खुराक और खुराक अमृत ही हो जाती है (भाव। प्रभू का नाम ही उसकी जिंदगी का आसरा हो जाता है) हे नानक ! नाम ही उसके लिए आदर-मान है। 1।
ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥
मः 3 ॥
ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥
ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे मेरे मन ! सतिगुरू की शिक्षा सुन (भाव। शिक्षा पर चल) आपको गुणों का खजाना प्रभू मिल जाएगा;
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 511 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।