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अंग 511

अंग
511
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
काइआ मिटी अंधु है पउणै पुछहु जाइ ॥
हउ ता माइआ मोहिआ फिरि फिरि आवा जाइ ॥
नानक हुकमु न जातो खसम का जि रहा सचि समाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: (शरीर तो मिट्टी समझो) ज्ञानहीन है (झूठ बोल-बोल के इसको पालने का क्या लाभ आखिर लेखा तो जीवात्मा से ही माँगा जाता है)। जीवात्मा को अगर पूछो (कि ये शरीर पालने में ही क्यों लगी रही।तो इसका उत्तर ये है कि) मैं माया के मोह में फंसा बार-बार जनम-मरन में पड़ा रहा। हे नानक ! मैंने खसम का हुकम ना पहचाना जिसकी बरकति से मैं सच्चे प्रभू में टिका रहता। 1।
मः 3 ॥
एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥
इसु धन कउ तसकरु जोहि न सकई ना ओचका लै जाइ ॥
इहु हरि धनु जीऐ सेती रवि रहिआ जीऐ नाले जाइ ॥
पूरे गुर ते पाईऐ मनमुखि पलै न पाइ ॥
धनु वापारी नानका जिन॑ा नाम धनु खटिआ आइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ परमात्मा का नाम ही एक ऐसा धन है जो सदा ही कायम रहता है। और धन कभी मिला और कभी नाश हो गया; इस धन की ओर कोई चोर आँख उठा के नहीं देख सकता।कोई उचक्का इसे छीन नहीं सकता। परमात्मा का नाम-रूप ये धन जीवात्मा के साथ ही रहता है जीवात्मा के साथ ही जाता है। ये धन पूरे गुरू से मिलता है।पर जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उसे नहीं मिलता। हे नानक ! भाग्यशाली हैं वे बन्जारे।जिन्होंने जगत में आकर नाम-रूपी धन कमाया है। 2।
पउड़ी ॥
मेरा साहिबु अति वडा सचु गहिर गंभीरा ॥
सभु जगु तिस कै वसि है सभु तिस का चीरा ॥
गुर परसादी पाईऐ निहचलु धनु धीरा ॥
किरपा ते हरि मनि वसै भेटै गुरु सूरा ॥
गुणवंती सालाहिआ सदा थिरु निहचलु हरि पूरा ॥7॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मेरा मालिक प्रभू बहुत ही बड़ा है।सदा कायम रहने वाला है।गहरा है और धैर्यवान है। सारा संसार उसके वश में है।सारा जगत उसके आसरे है। उस प्रभू का नाम-धन सदा कायम रहने वाला है।अटॅल है।और गुरू की कृपा से मिलता है। प्रभू की मेहर से सूरमा गुरू मिलता है और हरी-नाम मन में बसता है। वह सदा-स्थिर अडोल और पूरे प्रभू को गुणवानों ने सलाहा है। 7।
सलोकु मः 3 ॥
ध्रिगु तिन॑ा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥
मनमुख अगिआनी माइआ मोहि विआपे तिन॑ बूझ न काई पाइ ॥
हलति पलति ओइ सुखु न पावहि अंति गए पछुताइ ॥
गुर परसादी को नामु धिआए तिसु हउमै विचहु जाइ ॥
नानक जिसु पूरबि होवै लिखिआ सो गुर चरणी आइ पाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ धिक्कार है उनका जीना।जो परमात्मा के नाम का आनंद बिल्कुल ही त्याग देते हैं और अहंकार में पाप करके दुख सहते हैं। ऐसे जाहिल मन के पीछे चलते हैं।और माया के मोह में जकड़े रहते हैं।उन्हें कोई अक्ल नहीं होती। उन्हें ना इस लोक में ना ही परलोक में कोई सुख मिलता है।मरने के वक्त भी हाथ मलते ही जाते हैं। जो मनुष्य गुरू की कृपा से प्रभू का नाम सिमरता है उसके अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। हे नानक ! जिसके माथे पर धुर से भाग्य हों वह मनुष्य सतिगुरू के चरणों में आ पड़ता है। 1।
मः 3 ॥
मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥
सकती अंदरि वरतदा कूड़ु तिस का है उपाउ ॥
तिस का अंदरु चितु न भिजई मुखि फीका आलाउ ॥
ओइ धरमि रलाए ना रलनि॑ ओना अंदरि कूड़ु सुआउ ॥
नानक करतै बणत बणाई मनमुख कूड़ु बोलि बोलि डुबे गुरमुखि तरे जपि हरि नाउ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (जैसे) उल्टा कमल का फूल है।इसमें ना भक्ति है ना सिमरन। ये माया के असर तहत ही कार-विहार करता है।झूठ (माया) ही इस का प्रयोजन (जिंदगी का निशाना) है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का अंदर भीगता नहीं।सुतुष्टि नहीं होती।मुंह से भी फीके बोल ही बोलता है। ऐसे लोग धरम में जोड़े नहीं जुड़ते क्योंकि उनके अंदर झूठ की खुदगर्जी है। हे नानक ! करतार ने ऐसी खेल रची है कि मन के पीछे चलने वाले लोग तो झूठ बोल-बोल के ग़र्क होते हैं और गुरू के सन्मुख रहने वाले नाम जपके (माया की बाढ़ में से) तैर जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
बिनु बूझे वडा फेरु पइआ फिरि आवै जाई ॥
सतिगुर की सेवा न कीतीआ अंति गइआ पछुताई ॥
आपणी किरपा करे गुरु पाईऐ विचहु आपु गवाई ॥
त्रिसना भुख विचहु उतरै सुखु वसै मनि आई ॥
सदा सदा सालाहीऐ हिरदै लिव लाई ॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (ये बात) समझे बिना (कि ‘गुर परसादी पाईअै’।मनुष्य को) जनम मरण का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है।मनुष्य बार-बार पैदा होता है मरता है। गुरू की सेवा (सारी उम्र ही) नहीं करता (भाव।सारी उम्र गुरू के कहे पर नहीं चलता) आखिर (मरने के वक्त) हाथ मलता जाता है। जब प्रभू अपनी मेहर करता है तो गुरू मिलता है।अंदर से स्वैभाव दूर होता है। माया की तृष्णा-भूख खत्म होती है।मन में सुख आ बसता है। और सुरति जोड़ के सदा हृदय में प्रभू सिमरा जा सकता है। 8।
सलोकु मः 3 ॥
जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥
सभना उपावा सिरि उपाउ है हरि नामु परापति होइ ॥
अंतरि सीतल साति वसै जपि हिरदै सदा सुखु होइ ॥
अंम्रितु खाणा अंम्रितु पैनणा नानक नामु वडाई होइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो मनुष्य अपने गुरू के कहे पर चलता है।हरेक बंदा उसका आदर करता है। सो (जगत में भी सम्मान हासिल करने के लिए) सभी उपायों में बड़ा उपाय यही है कि प्रभू का नाम मिल जाए। ‘नाम’ जपने से हृदय में सुख होता है।मन में ठंड और शांति बसती है। (गुरू की आज्ञा में चल के ‘नाम’ जपने वाले बंदे की) खुराक और खुराक अमृत ही हो जाती है (भाव।प्रभू का नाम ही उसकी जिंदगी का आसरा हो जाता है) हे नानक ! नाम ही उसके लिए आदर-मान है। 1।
मः 3 ॥
ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे मेरे मन ! सतिगुरू की शिक्षा सुन (भाव।शिक्षा पर चल) आपको गुणों का खजाना प्रभू मिल जाएगा;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(शरीर तो मिट्टी समझो) ज्ञानहीन है (झूठ बोल-बोल के इसको पालने का क्या लाभ आखिर लेखा तो जीवात्मा से ही माँगा जाता है)।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।