हउ ता माइआ मोहिआ फिरि फिरि आवा जाइ ॥
नानक हुकमु न जातो खसम का जि रहा सचि समाइ ॥1॥
एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥
इसु धन कउ तसकरु जोहि न सकई ना ओचका लै जाइ ॥
इहु हरि धनु जीऐ सेती रवि रहिआ जीऐ नाले जाइ ॥
पूरे गुर ते पाईऐ मनमुखि पलै न पाइ ॥
धनु वापारी नानका जिन॑ा नाम धनु खटिआ आइ ॥2॥
मेरा साहिबु अति वडा सचु गहिर गंभीरा ॥
सभु जगु तिस कै वसि है सभु तिस का चीरा ॥
गुर परसादी पाईऐ निहचलु धनु धीरा ॥
किरपा ते हरि मनि वसै भेटै गुरु सूरा ॥
गुणवंती सालाहिआ सदा थिरु निहचलु हरि पूरा ॥7॥
ध्रिगु तिन॑ा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥
मनमुख अगिआनी माइआ मोहि विआपे तिन॑ बूझ न काई पाइ ॥
हलति पलति ओइ सुखु न पावहि अंति गए पछुताइ ॥
गुर परसादी को नामु धिआए तिसु हउमै विचहु जाइ ॥
नानक जिसु पूरबि होवै लिखिआ सो गुर चरणी आइ पाइ ॥1॥
मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥
सकती अंदरि वरतदा कूड़ु तिस का है उपाउ ॥
तिस का अंदरु चितु न भिजई मुखि फीका आलाउ ॥
ओइ धरमि रलाए ना रलनि॑ ओना अंदरि कूड़ु सुआउ ॥
नानक करतै बणत बणाई मनमुख कूड़ु बोलि बोलि डुबे गुरमुखि तरे जपि हरि नाउ ॥2॥
बिनु बूझे वडा फेरु पइआ फिरि आवै जाई ॥
सतिगुर की सेवा न कीतीआ अंति गइआ पछुताई ॥
आपणी किरपा करे गुरु पाईऐ विचहु आपु गवाई ॥
त्रिसना भुख विचहु उतरै सुखु वसै मनि आई ॥
सदा सदा सालाहीऐ हिरदै लिव लाई ॥8॥
जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥
सभना उपावा सिरि उपाउ है हरि नामु परापति होइ ॥
अंतरि सीतल साति वसै जपि हिरदै सदा सुखु होइ ॥
अंम्रितु खाणा अंम्रितु पैनणा नानक नामु वडाई होइ ॥1॥
ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(शरीर तो मिट्टी समझो) ज्ञानहीन है (झूठ बोल-बोल के इसको पालने का क्या लाभ आखिर लेखा तो जीवात्मा से ही माँगा जाता है)।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।