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अंग 510

अंग
510
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
इहु जीउ सदा मुकतु है सहजे रहिआ समाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: फिर ये आत्मा सदा (माया-मोह से) आजाद रहती है और अडोल अवस्था में टिकी रहती है। 2।
पउड़ी ॥
प्रभि संसारु उपाइ कै वसि आपणै कीता ॥
गणतै प्रभू न पाईऐ दूजै भरमीता ॥
सतिगुर मिलिऐ जीवतु मरै बुझि सचि समीता ॥
सबदे हउमै खोईऐ हरि मेलि मिलीता ॥
सभ किछु जाणै करे आपि आपे विगसीता ॥4॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू ने जगत पैदा करके अपने वश में रखा हुआ है (पर ये बात भुला के कि जगत प्रभू के वश में है। और माया की ही) विचारें करने से प्रभू नहीं मिलता।माया में ही भटकते हैं। गुरू मिलने से अगर मनुष्य जीवित (माया की ओर से) मर जाए तो (ये अस्लियत है कि संसार प्रभू के वश में है) समझो कि सच्चे प्रभू के मेल में मिल जाता है। शब्द के माध्यम से अहंकार मिट जाता है और प्राणी हरि के मिलन में मिल जाता है। (ये समझ आ जाती है कि) प्रभू खुद ही सब कुछ जानता है।खुद ही करता है।और खुद ही (देख के) खुश होता है।
सलोकु मः 3 ॥
सतिगुर सिउ चितु न लाइओ नामु न वसिओ मनि आइ ॥
ध्रिगु इवेहा जीविआ किआ जुग महि पाइआ आइ ॥
माइआ खोटी रासि है एक चसे महि पाजु लहि जाइ ॥
हथहु छुड़की तनु सिआहु होइ बदनु जाइ कुमलाइ ॥
जिन सतिगुर सिउ चितु लाइआ तिन॑ सुखु वसिआ मनि आइ ॥
हरि नामु धिआवहि रंग सिउ हरि नामि रहे लिव लाइ ॥
नानक सतिगुर सो धनु सउपिआ जि जीअ महि रहिआ समाइ ॥
रंगु तिसै कउ अगला वंनी चड़ै चड़ाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ अगर गुरू के साथ चित्त ना लगाया और प्रभू का नाम मन में ना बसा। तो धिक्कार है ऐसा जीना ! मानस जनम में आ के क्या कमाया। माया तो खोटी पूँजी है।इसका दिखावा तो एक पल में उतर जाता है। अगर ये गायब हो जाए (तो इसके गम से) शरीर काला हो जाता है और मुंह कुम्हला जाता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के साथ चित्त जोड़ा उनके मन में शांति आ बसती है। वे प्यार से प्रभू का नाम सिमरते हैं।प्रभू नाम में सुरति जोड़े रखते हैं। हे नानक ! ये नाम-धन प्रभू ने सतिगुरू को सौंपा है।ये धन गुरू की आत्मा में रचा हुआ है; (जो मनुष्य गुरू से नाम-धन लेता है) उसी को नाम-रंग बहुत चढ़ता है।और ये रंग नित्य चमकता है (दूना-चौगुना होता है)। 1।
मः 3 ॥
माइआ होई नागनी जगति रही लपटाइ ॥
इस की सेवा जो करे तिस ही कउ फिरि खाइ ॥
गुरमुखि कोई गारड़ू तिनि मलि दलि लाई पाइ ॥
नानक सेई उबरे जि सचि रहे लिव लाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ माया नागिन बनी हुई है जगत में (हरेक जीव को) चिपकी हुई है। जो इसका गुलाम बनता है उसी को मार डालती है। कोई विरला मनुष्य होता है जो इस माया सँपनी के जहर का मंत्र जानता है।उसने इसको अच्छी तरह मल के पैरों के नीचे फेंक लिया है। हे नानक ! इस माया सँपनी से वही बचे हैं जो सच्चे प्रभू में सुरति जोड़ते हैं। 2।
पउड़ी ॥
ढाढी करे पुकार प्रभू सुणाइसी ॥
अंदरि धीरक होइ पूरा पाइसी ॥
जो धुरि लिखिआ लेखु से करम कमाइसी ॥
जा होवै खसमु दइआलु ता महलु घरु पाइसी ॥
सो प्रभु मेरा अति वडा गुरमुखि मेलाइसी ॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जब मनुष्य ढाढी बन के अरदास करता है और प्रभू को सुनाता है तो इसके अंदर धैर्य आता है (माया-मोह और अहंकार दूर होते हैं) और पूरा प्रभू इसको मिलता है। धुर से (पिछली की हुई सिफत सालाह के अनुसार) जो (भगती का) लेख माथे पर उघड़ता है और वैसे (भाव।सिफत-सालाह वाले) काम करता है। (इस तरह) जब खसम दयाल होता है तो इसे प्रभू का महल-रूप असल घर मिल जाता है। पर। मेरा वह प्रभू है बहुत बड़ा।गुरू के माध्यम से ही मिलता है। 5।
सलोक मः 3 ॥
सभना का सहु एकु है सद ही रहै हजूरि ॥
नानक हुकमु न मंनई ता घर ही अंदरि दूरि ॥
हुकमु भी तिन॑ा मनाइसी जिन॑ कउ नदरि करेइ ॥
हुकमु मंनि सुखु पाइआ प्रेम सुहागणि होइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ सब (जीव-सि्त्रयों) का पति एक परमात्मा है जो सदा ही इनके अंग-संग रहता है।पर। हे नानक ! जो (जीव-स्त्री) उसका हुकम नहीं मानती (उसकी रजा में नहीं चलती) उसको वह पति हृदय-घर में बसता हुआ भी कहीं दूर बसता लगता है। हुकम भी उन्हीं (जीव सि्त्रयों) से मनाता है जिन पर मेहर की नजर करता है; जिसने हुकम मान के सुख हासिल किया है। वह प्रेम वाली अच्छे भाग्यों वाली हो जाती है। 1।
मः 3 ॥
रैणि सबाई जलि मुई कंत न लाइओ भाउ ॥
नानक सुखि वसनि सोुहागणी जिन॑ पिआरा पुरखु हरि राउ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिस जीव-स्त्री ने कंत प्रभू से प्यार नहीं किया।वह (जिंदगी रूपी) सारी रात जल मरी (उसकी सारी उम्र दुखों में गुजरी)।पर। हे नानक ! जिनका प्यारा अकाल पुरख (खसम) है वह भाग्यशाली सुख की नींद सोती हैं (जिंदगी की रात सुख से गुजारती हैं)। 2।
पउड़ी ॥
सभु जगु फिरि मै देखिआ हरि इको दाता ॥
उपाइ कितै न पाईऐ हरि करम बिधाता ॥
गुर सबदी हरि मनि वसै हरि सहजे जाता ॥
अंदरहु त्रिसना अगनि बुझी हरि अंम्रित सरि नाता ॥
वडी वडिआई वडे की गुरमुखि बोलाता ॥6॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मैंने सारा संसार टोल के देख लिया है।एक परमात्मा ही सारे जीवों को दातें देने वाला है; जीवों के कर्मों की बिधि बनाने वाला वह प्रभू किसी चतुराई-सियानप से नहीं मिलता; सिर्फ गुरू के शबद द्वारा हृदय में बसता है और आसानी से ही पहचाना जा सकता है। जो मनुष्य प्रभू के नाम-अमृत सरोवर में नहाता है उसके अंदर से तृष्णा की आग बुझ जाती है; यह उसी महानतम् की महानता है कि (जीव से) गुरू के माध्यम से अपनी सिफत सालाह करवाता है। 6।
सलोकु मः 3 ॥
काइआ हंस किआ प्रीति है जि पइआ ही छडि जाइ ॥
एस नो कूड़ु बोलि कि खवालीऐ जि चलदिआ नालि न जाइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ शरीर और आत्मा का कच्चा सा प्यार है।(अंत के समय।ये आत्मा शरीर को) गिरे हुए को छोड़ के चली जाती है; जब (आखिर) चलने के वक्त ये शरीर के साथ नहीं जाती तो इसे झूठ बोल-बोल के पालने का क्या लाभ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “फिर ये आत्मा सदा (माया-मोह से) आजाद रहती है और अडोल अवस्था में टिकी रहती है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।