प्रभि संसारु उपाइ कै वसि आपणै कीता ॥
गणतै प्रभू न पाईऐ दूजै भरमीता ॥
सतिगुर मिलिऐ जीवतु मरै बुझि सचि समीता ॥
सबदे हउमै खोईऐ हरि मेलि मिलीता ॥
सभ किछु जाणै करे आपि आपे विगसीता ॥4॥
सतिगुर सिउ चितु न लाइओ नामु न वसिओ मनि आइ ॥
ध्रिगु इवेहा जीविआ किआ जुग महि पाइआ आइ ॥
माइआ खोटी रासि है एक चसे महि पाजु लहि जाइ ॥
हथहु छुड़की तनु सिआहु होइ बदनु जाइ कुमलाइ ॥
जिन सतिगुर सिउ चितु लाइआ तिन॑ सुखु वसिआ मनि आइ ॥
हरि नामु धिआवहि रंग सिउ हरि नामि रहे लिव लाइ ॥
नानक सतिगुर सो धनु सउपिआ जि जीअ महि रहिआ समाइ ॥
रंगु तिसै कउ अगला वंनी चड़ै चड़ाइ ॥1॥
माइआ होई नागनी जगति रही लपटाइ ॥
इस की सेवा जो करे तिस ही कउ फिरि खाइ ॥
गुरमुखि कोई गारड़ू तिनि मलि दलि लाई पाइ ॥
नानक सेई उबरे जि सचि रहे लिव लाइ ॥2॥
ढाढी करे पुकार प्रभू सुणाइसी ॥
अंदरि धीरक होइ पूरा पाइसी ॥
जो धुरि लिखिआ लेखु से करम कमाइसी ॥
जा होवै खसमु दइआलु ता महलु घरु पाइसी ॥
सो प्रभु मेरा अति वडा गुरमुखि मेलाइसी ॥5॥
सभना का सहु एकु है सद ही रहै हजूरि ॥
नानक हुकमु न मंनई ता घर ही अंदरि दूरि ॥
हुकमु भी तिन॑ा मनाइसी जिन॑ कउ नदरि करेइ ॥
हुकमु मंनि सुखु पाइआ प्रेम सुहागणि होइ ॥1॥
रैणि सबाई जलि मुई कंत न लाइओ भाउ ॥
नानक सुखि वसनि सोुहागणी जिन॑ पिआरा पुरखु हरि राउ ॥2॥
सभु जगु फिरि मै देखिआ हरि इको दाता ॥
उपाइ कितै न पाईऐ हरि करम बिधाता ॥
गुर सबदी हरि मनि वसै हरि सहजे जाता ॥
अंदरहु त्रिसना अगनि बुझी हरि अंम्रित सरि नाता ॥
वडी वडिआई वडे की गुरमुखि बोलाता ॥6॥
काइआ हंस किआ प्रीति है जि पइआ ही छडि जाइ ॥
एस नो कूड़ु बोलि कि खवालीऐ जि चलदिआ नालि न जाइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “फिर ये आत्मा सदा (माया-मोह से) आजाद रहती है और अडोल अवस्था में टिकी रहती है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।