आपणा आपु उपाइओनु तदहु होरु न कोई ॥
मता मसूरति आपि करे जो करे सु होई ॥
तदहु आकासु न पातालु है ना त्रै लोई ॥
तदहु आपे आपि निरंकारु है ना ओपति होई ॥
जिउ तिसु भावै तिवै करे तिसु बिनु अवरु न कोई ॥1॥
साहिबु मेरा सदा है दिसै सबदु कमाइ ॥
ओहु अउहाणी कदे नाहि ना आवै ना जाइ ॥
सदा सदा सो सेवीऐ जो सभ महि रहै समाइ ॥
अवरु दूजा किउ सेवीऐ जंमै तै मरि जाइ ॥
निहफलु तिन का जीविआ जि खसमु न जाणहि आपणा अवरी कउ चितु लाइ ॥
नानक एव न जापई करता केती देइ सजाइ ॥1॥
सचा नामु धिआईऐ सभो वरतै सचु ॥
नानक हुकमु बुझि परवाणु होइ ता फलु पावै सचु ॥
कथनी बदनी करता फिरै हुकमै मूलि न बुझई अंधा कचु निकचु ॥2॥
संजोगु विजोगु उपाइओनु स्रिसटी का मूलु रचाइआ ॥
हुकमी स्रिसटि साजीअनु जोती जोति मिलाइआ ॥
जोती हूं सभु चानणा सतिगुरि सबदु सुणाइआ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु त्रै गुण सिरि धंधै लाइआ ॥
माइआ का मूलु रचाइओनु तुरीआ सुखु पाइआ ॥2॥
सो जपु सो तपु जि सतिगुर भावै ॥
सतिगुर कै भाणै वडिआई पावै ॥
नानक आपु छोडि गुर माहि समावै ॥1॥
गुर की सिख को विरला लेवै ॥
नानक जिसु आपि वडिआई देवै ॥2॥
माइआ मोहु अगिआनु है बिखमु अति भारी ॥
पथर पाप बहु लदिआ किउ तरीऐ तारी ॥
अनदिनु भगती रतिआ हरि पारि उतारी ॥
गुर सबदी मनु निरमला हउमै छडि विकारी ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ हरि हरि निसतारी ॥3॥
कबीर मुकति दुआरा संकुड़ा राई दसवै भाइ ॥
मनु तउ मैगलु होइ रहा निकसिआ किउ करि जाइ ॥
ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥
मुकति दुआरा मोकला सहजे आवउ जाउ ॥1॥
नानक मुकति दुआरा अति नीका नान॑ा होइ सु जाइ ॥
हउमै मनु असथूलु है किउ करि विचु दे जाइ ॥
सतिगुर मिलिऐ हउमै गई जोति रही सभ आइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! उन्हें परमात्मा का नाम नसीब नहीं हुआ।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।