जिनि गुरु सेविआ आपणा जमदूत न लागै डंडु ॥
गुर नालि तुलि न लगई खोजि डिठा ब्रहमंडु ॥
नामु निधानु सतिगुरि दीआ सुखु नानक मन महि मंडु ॥4॥20॥90॥
मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥
भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥
जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥1॥
मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥
जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥
लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥
काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥2॥
माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥
त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥
जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥3॥
अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥
जिस नो रखै सो रहै संम्रिथु पुरखु अपारु ॥
हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥4॥21॥91॥
गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु डंफु पसारु ॥
मुहलति पुंनी चलणा तूं संमलु घर बारु ॥1॥
हरि गुण गाउ मना सतिगुरु सेवि पिआरि ॥
किआ थोड़ड़ी बात गुमानु ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे रैणि पराहुणे उठि चलसहि परभाति ॥
किआ तूं रता गिरसत सिउ सभ फुला की बागाति ॥2॥
मेरी मेरी किआ करहि जिनि दीआ सो प्रभु लोड़ि ॥
सरपर उठी चलणा छडि जासी लख करोड़ि ॥3॥
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ॥
नानक नामु समालि तूं सो दिनु नेड़ा आइओइ ॥4॥22॥92॥
तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥
जा साथी उठी चलिआ ता धन खाकू रालि ॥1॥
मनि बैरागु भइआ दरसनु देखणै का चाउ ॥
धंनु सु तेरा थानु ॥1॥ रहाउ ॥
जिचरु वसिआ कंतु घरि जीउ जीउ सभि कहाति ॥
जा उठी चलसी कंतड़ा ता कोइ न पुछै तेरी बात ॥2॥
पेईअड़ै सहु सेवि तूं साहुरड़ै सुखि वसु ॥
गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु ॥3॥
सभना साहुरै वंञणा सभि मुकलावणहार ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सतगुरु (मानों, एक) गहरा (समुंद्र) है, गुरू बड़े जिगरे वाला है, गुरू सारे सुखों का समुंद्र है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।