अंग
50
सिरी राग
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश
सतिगुरु गहिर गभीरु है सुख सागरु अघखंडु ॥
सतिगुरु गहिर गभीरु है सुख सागरु अघखंडु ॥
जिनि गुरु सेविआ आपणा जमदूत न लागै डंडु ॥
गुर नालि तुलि न लगई खोजि डिठा ब्रहमंडु ॥
नामु निधानु सतिगुरि दीआ सुखु नानक मन महि मंडु ॥4॥20॥90॥
जिनि गुरु सेविआ आपणा जमदूत न लागै डंडु ॥
गुर नालि तुलि न लगई खोजि डिठा ब्रहमंडु ॥
नामु निधानु सतिगुरि दीआ सुखु नानक मन महि मंडु ॥4॥20॥90॥
हिन्दी अर्थ: सतगुरु (मानों, एक) गहरा (समुंद्र) है, गुरू बड़े जिगरे वाला है, गुरू सारे सुखों का समुंद्र है। गुरू पापों का नाश करने वाला है। जिस मनुष्य ने अपने गुरू की सेवा की है यमदूतों का डंडा (उस के सिर पे) नहीं बजता। मैंने सारा संसार ढूंढ के देख लिया है, कोई भी गुरू के बराबर का नहीं। हे नानक ! सतिगुरू ने जिस मनुष्य को परमातमा का नाम खजाना दिया हे, उसने आत्मिक आनन्द (सदा के लिए) अपने मन में पिरो लिया है ।4।20।90।
मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥
सिरीरागु महला 5 ॥
मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥
भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥
जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥1॥
मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥
जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥
लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥
काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥2॥
माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥
त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥
जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥3॥
अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥
जिस नो रखै सो रहै संम्रिथु पुरखु अपारु ॥
हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥4॥21॥91॥
मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥
भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥
जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥1॥
मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥
जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥
लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥
काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥2॥
माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥
त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥
जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥3॥
अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥
जिस नो रखै सो रहै संम्रिथु पुरखु अपारु ॥
हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥4॥21॥91॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ जीव दुनिया के पदार्थो को स्वाद-दार समझ के इस्तेमाल करता है पर, इन (भोगों) का स्वाद (अंत में) कड़वा (दुखदाई) साबित होता है (विकार और रोग पैदा हो जाते हैं)। मनुष्य (जगत में) भाई-मित्र-दोस्त आदि बनाता है और (यह) माया का झगड़ा खड़ा किये रखता है। पर आश्चर्य की बात यह है कि परमात्मा के नाम के बिना किसी भी चीज के नाश होने में समय नहीं लगता।1। हे मेरे मन ! गुरू की (बताई हुई) सेवा में व्यस्त रह। (हे भाई!) अपने मन के पीछे चलना छोड़ दे और (दुनिया के पदार्थों का मोह त्याग, क्योंकि) जो कुछ दिख रहा है सभ नाशवंत है।1।रहाउ। जैसे हलकाया कुक्ता दौड़ता है और हर तरफ को दौड़ता है। (उसी तरह) लोभी जीव को भी कुछ नहीं सूझता, अच्छी-बुरी हरेक चीज खा लेता है। काम के और क्रोध के नशे में फंसा हुआ मनुष्य मुड़-मुड़ योनियों में पड़ता रहता है।2। माया के विषयों का चोगा जाल में तैयार करके वह जाल बिखेरा हुआ है। माया की तृष्णा ने जीव पक्षी को (उस जाल में) फंसाया हुआ है। हे (मेरी) मां ! (जीव उस जाल में से) छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता, (क्योंकि) जिस ईश्वर ने (यह सभ कुछ) पैदा किया है उस से सांझ नहीं डालता, और बार बार पैदा होता मरता रहता है।3। इस जगत को (माया के) अनेकों किस्म के रूपों रंगों में कई तरीकों से मोह रखा है। इस में से वही बच सकता है, जिसको सर्व समर्थ बेअंत अकाल-पुरख खुद बचाए। (परमात्मा की मेहर से) परमात्मा के भगत ही परमात्मा (के चरनों) में सुरति जोड़ के बचते हैं। हे नानक ! आप सदा उस परमात्मा से सदके रह।४।२१।९१।
गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु डंफु पसारु ॥
सिरीरागु महला 5 घरु 2 ॥
गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु डंफु पसारु ॥
मुहलति पुंनी चलणा तूं संमलु घर बारु ॥1॥
हरि गुण गाउ मना सतिगुरु सेवि पिआरि ॥
किआ थोड़ड़ी बात गुमानु ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे रैणि पराहुणे उठि चलसहि परभाति ॥
किआ तूं रता गिरसत सिउ सभ फुला की बागाति ॥2॥
मेरी मेरी किआ करहि जिनि दीआ सो प्रभु लोड़ि ॥
सरपर उठी चलणा छडि जासी लख करोड़ि ॥3॥
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ॥
नानक नामु समालि तूं सो दिनु नेड़ा आइओइ ॥4॥22॥92॥
गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु डंफु पसारु ॥
मुहलति पुंनी चलणा तूं संमलु घर बारु ॥1॥
हरि गुण गाउ मना सतिगुरु सेवि पिआरि ॥
किआ थोड़ड़ी बात गुमानु ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे रैणि पराहुणे उठि चलसहि परभाति ॥
किआ तूं रता गिरसत सिउ सभ फुला की बागाति ॥2॥
मेरी मेरी किआ करहि जिनि दीआ सो प्रभु लोड़ि ॥
सरपर उठी चलणा छडि जासी लख करोड़ि ॥3॥
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ॥
नानक नामु समालि तूं सो दिनु नेड़ा आइओइ ॥4॥22॥92॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 घरु 2 ॥ (मुसीबत के समय थोड़े समय के लिए) गुजॅर (अपने माल-मवेशी ले के) किसी चरने वाली जगह पे चला जाता है, वहां उसे अपने किसी बड़ेपन का दिखावा-पसारा शोभा नहीं देता। (वैसे ही, हे जीव! जब आपका यहां जगत में रहने के लिए) मिला हुआ समय समाप्त हो जाएगा, आप (यहां से) चल पड़ेंगे। (इसलिए, अपना असली) घर घाट सँभालें (याद रखें)।1। हे मेरे मन ! परमात्मा के गुण गाया करें, प्यार से गुरू की (बताई) सेवा किया करें। थोड़ी जितनी बात के पीछे (इस थोड़े से जीवन समय के वास्ते) क्यूँ गुमान करते हैं?1।रहाउ। जैसे रात के समय (किसी के घर आए हुए) मेहमान दिन चढ़ने पे (वहां से उॅठ के) चल पड़ेंगे। (उसी तरह, हे जीव ! जिंदगी की रात खत्म होने पर आप भी इस जगत से चल पड़ेंगे)। आप इस गृहस्थ से (बाग परिवार से) क्यूँ मस्त हुए पड़े हैं? यह सारी फूलों की बगीची के समान है।2। यह चीज मेरी है, यह जयदाद मेरी है, क्यूं ऐसा गुमान कर रहे हैं? जिस परमात्मा ने यह सभ कुछ दिया है, उसको ढूँढ़ें। यहां से जरूर कूच कर जाना है। (लाखों करोड़ों का मालिक भी) लाखों करोड़ों रूपए छोड़ के चला जाएगा।3। (हे भाई !) चौरासी लाख जूनियों में भटक भटक के अब ये मानस जन्म बड़ी मुश्किल से मिला है। हे नानक! (परमात्मा का) नाम हृदय में बसाएँ, वह दिन नजदीक (जब यहां से कूच करना है)।4।22।92।
तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥
सिरीरागु महला 5 ॥
तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥
जा साथी उठी चलिआ ता धन खाकू रालि ॥1॥
मनि बैरागु भइआ दरसनु देखणै का चाउ ॥
धंनु सु तेरा थानु ॥1॥ रहाउ ॥
जिचरु वसिआ कंतु घरि जीउ जीउ सभि कहाति ॥
जा उठी चलसी कंतड़ा ता कोइ न पुछै तेरी बात ॥2॥
पेईअड़ै सहु सेवि तूं साहुरड़ै सुखि वसु ॥
गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु ॥3॥
सभना साहुरै वंञणा सभि मुकलावणहार ॥
तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥
जा साथी उठी चलिआ ता धन खाकू रालि ॥1॥
मनि बैरागु भइआ दरसनु देखणै का चाउ ॥
धंनु सु तेरा थानु ॥1॥ रहाउ ॥
जिचरु वसिआ कंतु घरि जीउ जीउ सभि कहाति ॥
जा उठी चलसी कंतड़ा ता कोइ न पुछै तेरी बात ॥2॥
पेईअड़ै सहु सेवि तूं साहुरड़ै सुखि वसु ॥
गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु ॥3॥
सभना साहुरै वंञणा सभि मुकलावणहार ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ हे काया ! आप उतना समय ही सुखी बसेंगी, जितना समय (जीवात्मा आपका) साथी (आपके) साथ है। जब (आपका) साथी (जीवात्मा) उॅठ के चल पड़ेगा, तब, हे काया ! आप मिट्टी में मिल जाएँगी।1। (वह मनुष्य भाग्यवान है जिसके) मन में आपका प्यार पैदा हो गया है। जिसके मन में आपके दर्शन की तड़प पैदा हुई है (हे हरी !) वह शरीर भाग्यशाली है जिसमें आपका निवास है (जहां आपको याद किया जा रहा है)।1।रहाउ। हे काया ! जितने समय आपका पति (जीवात्मा आपके) घर में बसता है, सभी लोग आपको ‘जी’ ‘जी’ करते हैं (सारे आपका आदर करते हैं)। पर जब निमाणी कंत (जीवात्मा) उठ के चल पड़ेगा, तब कोई भी आपकी बात नहीं पूछता।2। (हे जीवात्मा ! जब तक आप) पेके घर में (संसार में हैं, तब तक) पति प्रभू को सिमरती रहें। ससुराल में (परलोक में जाकर) आप सुखी बसेंगी। (हे जीवात्मा !) गुरू को मिल के जीवन जाच सीखें, अच्छा आचरण बनाना सीखें, आपको कभी कोई दुख नहीं व्यापेगा।3। (हे मन !) उद्यम कर के परमात्मा का नाम सिमरें। बड़े भाग्यों से परमात्मा का नाम धन इकट्ठा करें।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ५० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।