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अंग 50

अंग
50
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सतिगुरु गहिर गभीरु है सुख सागरु अघखंडु ॥
जिनि गुरु सेविआ आपणा जमदूत न लागै डंडु ॥
गुर नालि तुलि न लगई खोजि डिठा ब्रहमंडु ॥
नामु निधानु सतिगुरि दीआ सुखु नानक मन महि मंडु ॥4॥20॥90॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सतगुरु (मानों, एक) गहरा (समुंद्र) है, गुरू बड़े जिगरे वाला है, गुरू सारे सुखों का समुंद्र है। गुरू पापों का नाश करने वाला है। जिस मनुष्य ने अपने गुरू की सेवा की है यमदूतों का डंडा (उस के सिर पे) नहीं बजता। मैंने सारा संसार ढूंढ के देख लिया है, कोई भी गुरू के बराबर का नहीं। हे नानक ! सतिगुरू ने जिस मनुष्य को परमातमा का नाम खजाना दिया हे, उसने आत्मिक आनन्द (सदा के लिए) अपने मन में पिरो लिया है ।4।20।90।
सिरीरागु महला 5 ॥
मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥
भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥
जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥1॥
मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥
जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥
लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥
काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥2॥
माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥
त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥
जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥3॥
अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥
जिस नो रखै सो रहै संम्रिथु पुरखु अपारु ॥
हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥4॥21॥91॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ जीव दुनिया के पदार्थो को स्वाद-दार समझ के इस्तेमाल करता है पर, इन (भोगों) का स्वाद (अंत में) कड़वा (दुखदाई) साबित होता है (विकार और रोग पैदा हो जाते हैं)। मनुष्य (जगत में) भाई-मित्र-दोस्त आदि बनाता है और (यह) माया का झगड़ा खड़ा किये रखता है। पर आश्चर्य की बात यह है कि परमात्मा के नाम के बिना किसी भी चीज के नाश होने में समय नहीं लगता।1। हे मेरे मन ! गुरू की (बताई हुई) सेवा में व्यस्त रह। (हे भाई!) अपने मन के पीछे चलना छोड़ दे और (दुनिया के पदार्थों का मोह त्याग, क्योंकि) जो कुछ दिख रहा है सभ नाशवंत है।1।रहाउ। जैसे हलकाया कुक्ता दौड़ता है और हर तरफ को दौड़ता है। (उसी तरह) लोभी जीव को भी कुछ नहीं सूझता, अच्छी-बुरी हरेक चीज खा लेता है। काम के और क्रोध के नशे में फंसा हुआ मनुष्य मुड़-मुड़ योनियों में पड़ता रहता है।2। माया के विषयों का चोगा जाल में तैयार करके वह जाल बिखेरा हुआ है। माया की तृष्णा ने जीव पक्षी को (उस जाल में) फंसाया हुआ है। हे (मेरी) मां ! (जीव उस जाल में से) छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता, (क्योंकि) जिस ईश्वर ने (यह सभ कुछ) पैदा किया है उस से सांझ नहीं डालता, और बार बार पैदा होता मरता रहता है।3। इस जगत को (माया के) अनेकों किस्म के रूपों रंगों में कई तरीकों से मोह रखा है। इस में से वही बच सकता है, जिसको सर्व समर्थ बेअंत अकाल-पुरख खुद बचाए। (परमात्मा की मेहर से) परमात्मा के भगत ही परमात्मा (के चरनों) में सुरति जोड़ के बचते हैं। हे नानक ! आप सदा उस परमात्मा से सदके रह।4।25।91।
सिरीरागु महला 5 घरु 2 ॥
गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु डंफु पसारु ॥
मुहलति पुंनी चलणा तूं संमलु घर बारु ॥1॥
हरि गुण गाउ मना सतिगुरु सेवि पिआरि ॥
किआ थोड़ड़ी बात गुमानु ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे रैणि पराहुणे उठि चलसहि परभाति ॥
किआ तूं रता गिरसत सिउ सभ फुला की बागाति ॥2॥
मेरी मेरी किआ करहि जिनि दीआ सो प्रभु लोड़ि ॥
सरपर उठी चलणा छडि जासी लख करोड़ि ॥3॥
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ॥
नानक नामु समालि तूं सो दिनु नेड़ा आइओइ ॥4॥22॥92॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 घरु 2 ॥ (मुसीबत के समय थोड़े समय के लिए) गुजॅर (अपने माल-मवेशी ले के) किसी चरने वाली जगह पे चला जाता है, वहां उसे अपने किसी बड़ेपन का दिखावा-पसारा शोभा नहीं देता। (वैसे ही, हे जीव! जब आपका यहां जगत में रहने के लिए) मिला हुआ समय समाप्त हैं जाएगा, आप (यहां से) चल पड़ेगा। (इसलिए, अपना असली) घर घाट संभाल (याद रख)।1। हे मेरे मन ! परमात्मा के गुण गाया कर, प्यार से गुरू की (बताई) सेवा करा कर। थोड़ी जितनी बात के पीछे (इस थोड़े से जीवन समय के वास्ते) क्यूँ गुमान करता है?1।रहाउ। जैसे रात के समय (किसी के घर आए हुए) मेहमान दिन चढ़ने पे (वहां से उॅठ के) चल पड़ेंगे। (उसी तरह, हे जीव ! जिंदगी की रात खत्म होने पर आप भी इस जगत से चल पड़ेगा)। आप इस गृहस्थ से (बाग परिवार से) क्यूँ मस्त हुआ पड़ा है? यह सारी फूलों की बगीची के समान है।2। यह चीज मेरी है, यह जयदाद मेरी है, क्यूं ऐसा गुमान कर रहा है? जिस परमात्मा ने यह सभ कुछ दिया है, उसको ढूंढ। यहां से जरूर कूच कर जाना है। (लाखों करोड़ों का मालिक भी) लाखों करोड़ों रूपए छोड़ के चला जाएगा।3। (हे भाई !) चौरासी लाख जूनियों में भटक भटक के अब ये मानस जन्म बड़ी मुश्किल से मिला है। हे नानक! (परमात्मा का) नाम हृदय में बसा, वह दिन नजदीक (जब यहां से कूच करना है)।4।22।92।
सिरीरागु महला 5 ॥
तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥
जा साथी उठी चलिआ ता धन खाकू रालि ॥1॥
मनि बैरागु भइआ दरसनु देखणै का चाउ ॥
धंनु सु तेरा थानु ॥1॥ रहाउ ॥
जिचरु वसिआ कंतु घरि जीउ जीउ सभि कहाति ॥
जा उठी चलसी कंतड़ा ता कोइ न पुछै तेरी बात ॥2॥
पेईअड़ै सहु सेवि तूं साहुरड़ै सुखि वसु ॥
गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु ॥3॥
सभना साहुरै वंञणा सभि मुकलावणहार ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ हे काया ! आप उतना समय ही सुखी बसेगी, जितना समय (जीवात्मा आपका) साथी (आपके) साथ है। जब (आपका) साथी (जीवात्मा) उॅठ के चल पड़ेगा, तब, हे काया ! आप मिट्टी में मिल जाएगी।1। (वह मनुष्य भाग्यवान है जिसके) मन में आपका प्यार पैदा हैं गया है। जिसके मन में आपके दर्शन की तड़प पैदा हुई है (हे हरी !) वह शरीर भाग्यशाली है जिसमें आपका निवास है (जहां आपको याद किया जा रहा है)।1।रहाउ। हे काया ! जितने समय आपका पति (जीवात्मा आपके) घर में बसता है, सभी लोग आपको ‘जी’ ‘जी’ करते हैं (सारे आपका आदर करते हैं)। पर जब निमाणी कंत (जीवात्मा) उठ के चल पड़ेगा, तब कोई भी आपकी बात नहीं पूछता।2। (हे जीवात्मा ! जब तक आप) पेके घर में (संसार में है, तब तक) पति प्रभू को सिमरती रह। ससुराल में (परलोक में जाकर) आप सुखी बसेगी। (हे जीवात्मा !) गुरू को मिल के जीवन जाच सीख, अच्छा आचरण बनाना सीख, आपको कभी कोई दुख नहीं व्यापेगा।3। (हे मन !) उद्यम कर के परमात्मा का नाम सिमर। बड़े भाग्यों से परमात्मा का नाम धन इकट्ठा कर।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सतगुरु (मानों, एक) गहरा (समुंद्र) है, गुरू बड़े जिगरे वाला है, गुरू सारे सुखों का समुंद्र है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।