साधसंगि नानक जसु गाइओ जो प्रभ की अति पिआरी ॥8॥1॥8॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाथ नरहर दीन बंधव पतित पावन देव ॥
भै त्रास नास क्रिपाल गुण निधि सफल सुआमी सेव ॥1॥
हरि गोपाल गुर गोबिंद ॥
चरण सरण दइआल केसव तारि जग भव सिंध ॥1॥ रहाउ ॥
काम क्रोध हरन मद मोह दहन मुरारि मन मकरंद ॥
जनम मरण निवारि धरणीधर पति राखु परमानंद ॥2॥
जलत अनिक तरंग माइआ गुर गिआन हरि रिद मंत ॥
छेदि अहंबुधि करुणा मै चिंत मेटि पुरख अनंत ॥3॥
सिमरि समरथ पल महूरत प्रभ धिआनु सहज समाधि ॥
दीन दइआल प्रसंन पूरन जाचीऐ रज साध ॥4॥
मोह मिथन दुरंत आसा बासना बिकार ॥
रखु धरम भरम बिदारि मन ते उधरु हरि निरंकार ॥5॥
धनाढि आढि भंडार हरि निधि होत जिना न चीर ॥
खल मुगध मूड़ कटाख्य स्रीधर भए गुण मति धीर ॥6॥
जीवन मुकत जगदीस जपि मन धारि रिद परतीति ॥
जीअ दइआ मइआ सरबत्र रमणं परम हंसह रीति ॥7॥
देत दरसनु स्रवन हरि जसु रसन नाम उचार ॥
अंग संग भगवान परसन प्रभ नानक पतित उधार ॥8॥1॥2॥5॥1॥1॥2॥57॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 3 ॥
इहु जगतु ममता मुआ जीवण की बिधि नाहि ॥
गुर कै भाणै जो चलै तां जीवण पदवी पाहि ॥
ओइ सदा सदा जन जीवते जो हरि चरणी चितु लाहि ॥
नानक नदरी मनि वसै गुरमुखि सहजि समाहि ॥1॥
अंदरि सहसा दुखु है आपै सिरि धंधै मार ॥
दूजै भाइ सुते कबहि न जागहि माइआ मोह पिआर ॥
नामु न चेतहि सबदु न वीचारहि इहु मनमुख का आचारु ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे करतार ! हे स्वामी ! हमारी (आपके पैदा किए हुए जीवों की) क्या बिसात है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।