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अंग 508

अंग
508
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिउ बोलावहि तिउ बोलह सुआमी कुदरति कवन हमारी ॥
साधसंगि नानक जसु गाइओ जो प्रभ की अति पिआरी ॥8॥1॥8॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे करतार ! हे स्वामी ! हमारी (आपके पैदा किए हुए जीवों की) क्या बिसात है।जैसे आप हमें बोलाता है वैसे ही हम बोलते हैं। हे नानक ! (कह, करतार की प्रेरणा से ही मनुष्य ने) साध-संगति में टिक के प्रभू की सिफत-सालाह की है।ये सिफत-सालाह प्रभू को बड़ी प्यारी लगती है। 8। 1। 8।
गूजरी महला 5 घरु 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाथ नरहर दीन बंधव पतित पावन देव ॥
भै त्रास नास क्रिपाल गुण निधि सफल सुआमी सेव ॥1॥
हरि गोपाल गुर गोबिंद ॥
चरण सरण दइआल केसव तारि जग भव सिंध ॥1॥ रहाउ ॥
काम क्रोध हरन मद मोह दहन मुरारि मन मकरंद ॥
जनम मरण निवारि धरणीधर पति राखु परमानंद ॥2॥
जलत अनिक तरंग माइआ गुर गिआन हरि रिद मंत ॥
छेदि अहंबुधि करुणा मै चिंत मेटि पुरख अनंत ॥3॥
सिमरि समरथ पल महूरत प्रभ धिआनु सहज समाधि ॥
दीन दइआल प्रसंन पूरन जाचीऐ रज साध ॥4॥
मोह मिथन दुरंत आसा बासना बिकार ॥
रखु धरम भरम बिदारि मन ते उधरु हरि निरंकार ॥5॥
धनाढि आढि भंडार हरि निधि होत जिना न चीर ॥
खल मुगध मूड़ कटाख्य स्रीधर भए गुण मति धीर ॥6॥
जीवन मुकत जगदीस जपि मन धारि रिद परतीति ॥
जीअ दइआ मइआ सरबत्र रमणं परम हंसह रीति ॥7॥
देत दरसनु स्रवन हरि जसु रसन नाम उचार ॥
अंग संग भगवान परसन प्रभ नानक पतित उधार ॥8॥1॥2॥5॥1॥1॥2॥57॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 घरु 4 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे जगत के मालिक ! हे नरहर ! हे दीनों के सहायक ! हे विकारियों को पवित्र करने वाले ! हे प्रकाश-स्वरूप ! हे सारे डरों-सहमों के नाश करने वाले ! हे कृपालु ! हे गुणों के खजाने ! हे स्वामी ! आपकी सेवा-भक्ति जीवन को कामयाब बना देती है। 1। हे हरी ! हे गोपाल ! हे गुर गोबिंद ! हे दयालु ! हे केशव ! अपने चरणों की शरण में रख के मुझे इस संसार समुंद्र में से पार लंघा ले। 1।रहाउ। हे काम-क्रोध को दूर करने वाले ! हे मोह के नशे को जलाने वाले ! हे मन को (जीवन-) सुगंधि देने वाले मुरारी प्रभू ! हे धरती के आसरे ! हे सबसे श्रेष्ठ आनंद के मालिक ! (जगत के विकारों में। मेरी) लाज रख।मेरे जनम-मरण का चक्कर खत्म कर। 2। हे हरी ! माया-अग्नि की बेअंत लहरों में जल रहे जीवों के हृदय में गुरू के ज्ञान का मंत्र टिका। हे तरस-स्वरूप हरी ! हे सर्व व्यापक बेअंत प्रभू ! (हमारा) अहंकार दूर कर (हमारे दिलों में से) चिंता मिटा दे। 3। हे समर्थ प्रभू ! हर पल हर घड़ी (आपका नाम) सिमर के मैं अपनी सुरति आत्मिक अडोलता की समाधि में जोड़े रखूँ। हे दीनों पर दया करने वाले ! हे सदा खिले रहने वाले ! सर्व-व्यापक ! (आपके दर से आपके) संत-जनों की चरण-धूड़ (ही सदा) मांगनी चाहिए। 4। हे हरी ! झूठे मोह से।बुरे अंत वाली आशा से।विकारों की वासनाओं से। हे हरी ! हे निरंकार ! मुझे (संसार समुंद्र से) बचा ले।मेरे मन से भटकना दूर कर दे मेरी लाज रख। 5। हे हरी ! जिनके पास (तन ढकने के लिए) कपड़े का टुकड़ा भी नहीं होता।वह आपके गुणों के खजाने प्राप्त करके (मानो) धनाढों के धनाढ बन जाते हैं। हे लक्ष्मी-पति ! महा-मूर्ख और दुष्ट आपकी मेहर की निगाह से गुणवान।बुद्धिमान।धैर्यवान बन जाते हैं। 6। हे मन ! जीवन-मुक्त करने वाले जगदीश का नाम जप।हे भाई ! दिल में उसके वास्ते श्रद्धा टिका। सब जीवों से दया-प्यार वाला सलूक रख।परमात्मा को सर्व-व्यापक जान- उच्च जीवन वाले हंस (मनुष्यों) की ये जीवन-जुगति है। 7। हे भाई ! परमात्मा खुद ही अपने दर्शन बख्शता है।कानों में अपनी सिफत-सालाह देता है।जीवों को अपने नाम का उच्चारण देता है। सदा अंग-संग बसता है। हे नानक ! (कह) हे हरी ! हे भगवान ! आपकी छूह विकारियों का भी पार-उतारा करने योग्य है। 8। 1। 2। 5। 1। 1। 2। 57।
गूजरी की वार महला 3 सिकंदर बिराहिम की वार की धुनी गाउणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 3 ॥
इहु जगतु ममता मुआ जीवण की बिधि नाहि ॥
गुर कै भाणै जो चलै तां जीवण पदवी पाहि ॥
ओइ सदा सदा जन जीवते जो हरि चरणी चितु लाहि ॥
नानक नदरी मनि वसै गुरमुखि सहजि समाहि ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गूजरी की वार महला 3 सिकंदर बिराहिम की वार की धुनी गाउणी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला 3॥ ये जगत (भाव।हरेक जीव) (ये चीज ‘मेरी’ बन जाए।ये चीज ‘मेरी’ हो जाए- इस) अपनत्व में इतना फसा पड़ा है कि इसे जीने की जाच (विधि) नहीं रही। जो जो मनुष्य सतिगुरू के कहने पर चलता है वह जीवन-जुगति सीख लेता है। जो मनुष्य प्रभू के चरणों में चित्त जोड़ता है।वह समझो सदा ही जीते हैं। (क्योंकि) हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने से मेहर का मालिक प्रभू मन में आ बसता है और गुरमुखि उस अवस्था में आ पहुँचते हैं जहाँ पदार्थों की ओर मन नहीं डोलता। 1।
मः 3 ॥
अंदरि सहसा दुखु है आपै सिरि धंधै मार ॥
दूजै भाइ सुते कबहि न जागहि माइआ मोह पिआर ॥
नामु न चेतहि सबदु न वीचारहि इहु मनमुख का आचारु ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ उनके मन में संशय और कलेश टिका रहता है।उन्होंने दुनिया के झमेलों का ये खपाना अपने सिर पर लिया हुआ है। जिन मनुष्यों का माया से मोह-प्यार है जो माया के प्यार में मस्त हो रहे हैं (इस गफ़लत में से) कभी जागते नहीं। अपने मन के पीछे चलने वाले लोगों की रहणी ये है कि वे कभी गुर-शबद नहीं विचारते।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे करतार ! हे स्वामी ! हमारी (आपके पैदा किए हुए जीवों की) क्या बिसात है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।