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507
गूजरी
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सनक सनंदन नारद मुनि सेवहि अनदिनु जपत रहहि बनवारी ॥
सनक सनंदन नारद मुनि सेवहि अनदिनु जपत रहहि बनवारी ॥
सरणागति प्रहलाद जन आए तिन की पैज सवारी ॥2॥
अलख निरंजनु एको वरतै एका जोति मुरारी ॥
सभि जाचिक तू एको दाता मागहि हाथ पसारी ॥3॥
भगत जना की ऊतम बाणी गावहि अकथ कथा नित निआरी ॥
सफल जनमु भइआ तिन केरा आपि तरे कुल तारी ॥4॥
मनमुख दुबिधा दुरमति बिआपे जिन अंतरि मोह गुबारी ॥
संत जना की कथा न भावै ओइ डूबे सणु परवारी ॥5॥
निंदकु निंदा करि मलु धोवै ओहु मलभखु माइआधारी ॥
संत जना की निंदा विआपे ना उरवारि न पारी ॥6॥
एहु परपंचु खेलु कीआ सभु करतै हरि करतै सभ कल धारी ॥
हरि एको सूतु वरतै जुग अंतरि सूतु खिंचै एकंकारी ॥7॥
रसनि रसनि रसि गावहि हरि गुण रसना हरि रसु धारी ॥
नानक हरि बिनु अवरु न मागउ हरि रस प्रीति पिआरी ॥8॥1॥7॥
सरणागति प्रहलाद जन आए तिन की पैज सवारी ॥2॥
अलख निरंजनु एको वरतै एका जोति मुरारी ॥
सभि जाचिक तू एको दाता मागहि हाथ पसारी ॥3॥
भगत जना की ऊतम बाणी गावहि अकथ कथा नित निआरी ॥
सफल जनमु भइआ तिन केरा आपि तरे कुल तारी ॥4॥
मनमुख दुबिधा दुरमति बिआपे जिन अंतरि मोह गुबारी ॥
संत जना की कथा न भावै ओइ डूबे सणु परवारी ॥5॥
निंदकु निंदा करि मलु धोवै ओहु मलभखु माइआधारी ॥
संत जना की निंदा विआपे ना उरवारि न पारी ॥6॥
एहु परपंचु खेलु कीआ सभु करतै हरि करतै सभ कल धारी ॥
हरि एको सूतु वरतै जुग अंतरि सूतु खिंचै एकंकारी ॥7॥
रसनि रसनि रसि गावहि हरि गुण रसना हरि रसु धारी ॥
नानक हरि बिनु अवरु न मागउ हरि रस प्रीति पिआरी ॥8॥1॥7॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! इस संसार समुंद्र से पार लंघाने के लिए) सनक सनंदन (आदि ऋषि) नारद (आदि) मुनी जगत के मालिक प्रभू की ही सेवा करते (रहे) हैं। हर समय (प्रभू का नाम ही) जपते (रहे) हैं। प्रहलाद (आदि जो जो) भगत परमात्मा की शरण आए। परमात्मा उनकी इज्जत बचाता रहा। 2। हे भाई ! सारे जगत में एक अदृश्य और निर्लिप परमात्मा ही बस रहा है। सारे संसार में परमात्मा का नूर ही प्रकाश कर रहा है। हे प्रभू ! एक आप ही (सब जीवों को) दातें देने वाले हैं। सारे जीव (आपके दर पे) मंगते हैं (आपके आगे) हाथ पसार के मांग रहे हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति करने वाले लोगों के वचन अमोलक हो जाते हैं। वह सदा उस परमात्मा की अनोखी सिफत सालाह के गीत गाते रहते हैं जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। (सिफत सलाह की बरकति से) उनका मानस जनम कामयाब हो जाता है। वह खुद (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। अपनी कुलों को भी लंघा लेते हैं। 4। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य दुचित्ता-पन में और बुरी मति (के प्रभाव) में फंसे रहते हैं। क्योंकि उनके हृदय में (माया के) मोह का अंधेरा पड़ा रहता है। (अपने मन के पीछे चलने वाले लोगों को) संत जनों की (की हुई परमात्मा की सिफत सालाह की) बात नहीं भाती (इस वास्ते) वह अपने परिवार समेत (विकार भरे संसार समुंद्र में) डूब जाते हैं। 5। हे भाई ! निंदा करने वाला मनुष्य (दूसरों की) निंदा कर करके (उनके किए बुरे कर्मों की) मैल तो धो देता है। पर वह खुद माया-ग्रसित मनुष्य पराई मैल खाने का आदी बन जाता है। हे भाई ! जो मनुष्य संत जनों की निंदा करने में फंसे रहते हैं वह (इस निंदा के समुंद्र में से) ना इस पार आ सकते हैं ना परली तरफ जा सकते हैं। 6। (पर। हे भाई ! जीव के भी क्या वश।) ये सारा जगत-तमाशा करतार ने खुद बनाया है। करतार ने ही इसमें अपनी सत्ता टिकाई हुई है। सारे जगत में सिर्फ परमात्मा की सत्ता का धागा पसरा हुआ है। जब वह इस धागे को खींच लेता है (तो जगत-तमाशा अलोप हो जाता है। और) परमात्मा खुद ही खुद रह जाता है। 7। (हे भाई ! जो मनुष्य इस संसार समुंद्र से सही सलामत पार लांघना चाहते हैं वह) सदा ही प्रेम प्यार से परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। उनकी जीभ परमात्मा के नाम-रस को चखती रहती है। हे नानक ! (कह) मैं परमातमा के नाम के बिना और कुछ नहीं मांगता (मैं यही चाहता हूँ कि) परमात्मा के नाम-रस की प्रीति प्यारी लगती रहे। 8। 1। 7।
राजन महि तूं राजा कहीअहि भूमन महि भूमा ॥
गूजरी महला 5 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राजन महि तूं राजा कहीअहि भूमन महि भूमा ॥
ठाकुर महि ठकुराई तेरी कोमन सिरि कोमा ॥1॥
पिता मेरो बडो धनी अगमा ॥
उसतति कवन करीजै करते पेखि रहे बिसमा ॥1॥ रहाउ ॥
सुखीअन महि सुखीआ तूं कहीअहि दातन सिरि दाता ॥
तेजन महि तेजवंसी कहीअहि रसीअन महि राता ॥2॥
सूरन महि सूरा तूं कहीअहि भोगन महि भोगी ॥
ग्रसतन महि तूं बडो ग्रिहसती जोगन महि जोगी ॥3॥
करतन महि तूं करता कहीअहि आचारन महि आचारी ॥
साहन महि तूं साचा साहा वापारन महि वापारी ॥4॥
दरबारन महि तेरो दरबारा सरन पालन टीका ॥
लखिमी केतक गनी न जाईऐ गनि न सकउ सीका ॥5॥
नामन महि तेरो प्रभ नामा गिआनन महि गिआनी ॥
जुगतन महि तेरी प्रभ जुगता इसनानन महि इसनानी ॥6॥
सिधन महि तेरी प्रभ सिधा करमन सिरि करमा ॥
आगिआ महि तेरी प्रभ आगिआ हुकमन सिरि हुकमा ॥7॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राजन महि तूं राजा कहीअहि भूमन महि भूमा ॥
ठाकुर महि ठकुराई तेरी कोमन सिरि कोमा ॥1॥
पिता मेरो बडो धनी अगमा ॥
उसतति कवन करीजै करते पेखि रहे बिसमा ॥1॥ रहाउ ॥
सुखीअन महि सुखीआ तूं कहीअहि दातन सिरि दाता ॥
तेजन महि तेजवंसी कहीअहि रसीअन महि राता ॥2॥
सूरन महि सूरा तूं कहीअहि भोगन महि भोगी ॥
ग्रसतन महि तूं बडो ग्रिहसती जोगन महि जोगी ॥3॥
करतन महि तूं करता कहीअहि आचारन महि आचारी ॥
साहन महि तूं साचा साहा वापारन महि वापारी ॥4॥
दरबारन महि तेरो दरबारा सरन पालन टीका ॥
लखिमी केतक गनी न जाईऐ गनि न सकउ सीका ॥5॥
नामन महि तेरो प्रभ नामा गिआनन महि गिआनी ॥
जुगतन महि तेरी प्रभ जुगता इसनानन महि इसनानी ॥6॥
सिधन महि तेरी प्रभ सिधा करमन सिरि करमा ॥
आगिआ महि तेरी प्रभ आगिआ हुकमन सिरि हुकमा ॥7॥
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे करतार ! (दुनिया के) राजाओं में आप (शिरोमणि) राजा कहलाते हैं। जमीन के मालिकों में सबसे बड़े भूपति हैं। हे करतार ! (दुनिया के) सरदारों में आपकी सरदारी (सबसे बड़ी) है। ऊँची कुल वालों में आप शिरोमणी कुल वाले हैं। 1। हे करतार ! आप हमारे पिता हैं। आप हमारी समझ की पहुँच से परे हैं। हे करतार ! आपकी कौन-कौन सी उपमा हम करें। (आपकी लीला) देख-देख के हम हैरान हो रहे हैं। 1।रहाउ। हे करतार ! (दुनिया के) सुखी लोगों में आप (शिरोमणि) सुखी कहे जा सकते हैं। दुनिया में आप ही (शिरोमणि) तेजस्वी कहे जा सकते हैं। (दुनिया के) रस भोगने वालों में आप शिरोमणि रसिया हैं। 2। हे करतार ! सूरमों में आप शिरोमणि शूरवीर कहलाने के हकदार हैं। (दुनिया के सब जीवों में व्यापक होने के कारण) भोगियों में आप ही भोगी हैं। गृहस्थियों में आप सबसे बड़े गृहस्थी हैं (जिसका इतना बड़ा संसार-परिवार है)।जोगियों में आप शिरोमणि जोगी हैं (इतने बड़े परिवार के होते हुए भी निर्लिप हैं)। 3। हे करतार ! नए काम करने वाले समझदारों में आप शिरोमणि रचनहार हैं; धार्मिक रस्में करने वालों में भी आप ही शिरोमणि हैं। हे करतार ! (दुनिया के) शाहूकारों में आप सदा कायम रहने वाले (शिरोमणि) शाहूकार हैं। और व्यापारियों में आप बड़े व्यापारी हैं (जिन्होंने इतना बड़ा जगत-पसारा पसारा हुआ है)। 4। हे करतार ! (दुनिया के) दरबार लगाने वालों में आपका दरबार शिरोमणि है। शरण पड़ों की लाज रखने वालों का आप शिरोमणि टिॅका हैं। हे करतार ! आपके घर में कितना धन है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। मैं आपके खजाने गिन नहीं सकता। 5। हे प्रभू ! (दुनिया के) महा महिमों-नामवरों में आपकी प्रसिद्धि शिरोमणि है। और ज्ञानवानों में आप ही शिरोमणि ज्ञानी हैं। हे प्रभू ! अच्छी जीवन-जुगति वालों में आपकी श्रेष्ठ है। (दुनिया के तीर्थ-) स्नानियों में आप शिरोमणि स्नानी हैं (क्योंकि सारे जलों में आप सदा खुद ही बस रहे हैं)। 6। हे प्रभू ! करामाती ताकतें रखने वालों में आपकी करामातें शिरोमणि हैं। काम करने वालों में आप ही शिरोमणि उद्यमी हैं। हे प्रभू ! (दुनिया के) हासिल कर्ताओं में आपका इख्तियार सबसे बड़ा है। (दुनिया के) हुकम चलाने वालों में आप सबसे बड़े हाकिम हैं। 7।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 507 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।