Lulla Family

अंग 507

अंग
507
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सनक सनंदन नारद मुनि सेवहि अनदिनु जपत रहहि बनवारी ॥
सरणागति प्रहलाद जन आए तिन की पैज सवारी ॥2॥
अलख निरंजनु एको वरतै एका जोति मुरारी ॥
सभि जाचिक तू एको दाता मागहि हाथ पसारी ॥3॥
भगत जना की ऊतम बाणी गावहि अकथ कथा नित निआरी ॥
सफल जनमु भइआ तिन केरा आपि तरे कुल तारी ॥4॥
मनमुख दुबिधा दुरमति बिआपे जिन अंतरि मोह गुबारी ॥
संत जना की कथा न भावै ओइ डूबे सणु परवारी ॥5॥
निंदकु निंदा करि मलु धोवै ओहु मलभखु माइआधारी ॥
संत जना की निंदा विआपे ना उरवारि न पारी ॥6॥
एहु परपंचु खेलु कीआ सभु करतै हरि करतै सभ कल धारी ॥
हरि एको सूतु वरतै जुग अंतरि सूतु खिंचै एकंकारी ॥7॥
रसनि रसनि रसि गावहि हरि गुण रसना हरि रसु धारी ॥
नानक हरि बिनु अवरु न मागउ हरि रस प्रीति पिआरी ॥8॥1॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! इस संसार समुंद्र से पार लंघाने के लिए) सनक सनंदन (आदि ऋषि) नारद (आदि) मुनी जगत के मालिक प्रभू की ही सेवा करते (रहे) हैं।हर समय (प्रभू का नाम ही) जपते (रहे) हैं। प्रहलाद (आदि जो जो) भगत परमात्मा की शरण आए।परमात्मा उनकी इज्जत बचाता रहा। 2। हे भाई ! सारे जगत में एक अदृश्य और निर्लिप परमात्मा ही बस रहा है।सारे संसार में परमात्मा का नूर ही प्रकाश कर रहा है। हे प्रभू ! एक आप ही (सब जीवों को) दातें देने वाला है।सारे जीव (आपके दर पे) मंगते हैं (आपके आगे) हाथ पसार के मांग रहे हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति करने वाले लोगों के वचन अमोलक हो जाते हैं।वह सदा उस परमात्मा की अनोखी सिफत सालाह के गीत गाते रहते हैं जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। (सिफत सलाह की बरकति से) उनका मानस जनम कामयाब हो जाता है।वह खुद (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं।अपनी कुलों को भी लंघा लेते हैं। 4। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य दुचित्ता-पन में और बुरी मति (के प्रभाव) में फंसे रहते हैं।क्योंकि उनके हृदय में (माया के) मोह का अंधेरा पड़ा रहता है। (अपने मन के पीछे चलने वाले लोगों को) संत जनों की (की हुई परमात्मा की सिफत सालाह की) बात नहीं भाती (इस वास्ते) वह अपने परिवार समेत (विकार भरे संसार समुंद्र में) डूब जाते हैं। 5। हे भाई ! निंदा करने वाला मनुष्य (दूसरों की) निंदा कर करके (उनके किए बुरे कर्मों की) मैल तो धो देता है।पर वह खुद माया-ग्रसित मनुष्य पराई मैल खाने का आदी बन जाता है। हे भाई ! जो मनुष्य संत जनों की निंदा करने में फंसे रहते हैं वह (इस निंदा के समुंद्र में से) ना इस पार आ सकते हैं ना परली तरफ जा सकते हैं। 6। (पर। हे भाई ! जीव के भी क्या वश।) ये सारा जगत-तमाशा करतार ने खुद बनाया है।करतार ने ही इसमें अपनी सत्ता टिकाई हुई है। सारे जगत में सिर्फ परमात्मा की सत्ता का धागा पसरा हुआ है।जब वह इस धागे को खींच लेता है (तो जगत-तमाशा अलोप हो जाता है।और) परमात्मा खुद ही खुद रह जाता है। 7। (हे भाई ! जो मनुष्य इस संसार समुंद्र से सही सलामत पार लांघना चाहते हैं वह) सदा ही प्रेम प्यार से परमात्मा के गुण गाते रहते हैं।उनकी जीभ परमात्मा के नाम-रस को चखती रहती है। हे नानक ! (कह) मैं परमातमा के नाम के बिना और कुछ नहीं मांगता (मैं यही चाहता हूँ कि) परमात्मा के नाम-रस की प्रीति प्यारी लगती रहे। 8। 1। 7।
गूजरी महला 5 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राजन महि तूं राजा कहीअहि भूमन महि भूमा ॥
ठाकुर महि ठकुराई तेरी कोमन सिरि कोमा ॥1॥
पिता मेरो बडो धनी अगमा ॥
उसतति कवन करीजै करते पेखि रहे बिसमा ॥1॥ रहाउ ॥
सुखीअन महि सुखीआ तूं कहीअहि दातन सिरि दाता ॥
तेजन महि तेजवंसी कहीअहि रसीअन महि राता ॥2॥
सूरन महि सूरा तूं कहीअहि भोगन महि भोगी ॥
ग्रसतन महि तूं बडो ग्रिहसती जोगन महि जोगी ॥3॥
करतन महि तूं करता कहीअहि आचारन महि आचारी ॥
साहन महि तूं साचा साहा वापारन महि वापारी ॥4॥
दरबारन महि तेरो दरबारा सरन पालन टीका ॥
लखिमी केतक गनी न जाईऐ गनि न सकउ सीका ॥5॥
नामन महि तेरो प्रभ नामा गिआनन महि गिआनी ॥
जुगतन महि तेरी प्रभ जुगता इसनानन महि इसनानी ॥6॥
सिधन महि तेरी प्रभ सिधा करमन सिरि करमा ॥
आगिआ महि तेरी प्रभ आगिआ हुकमन सिरि हुकमा ॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे करतार ! (दुनिया के) राजाओं में आप (शिरोमणि) राजा कहलवाता है।जमीन के मालिकों में (सबसे बड़ा) भूपति है। हे करतार ! (दुनिया के) सरदारों में आपकी सरदारी (सबसे बड़ी) है।ऊँची कुल वालों में आप शिरोमणी कुल वाला है। 1। हे करतार ! आप मेरा पिता है।आप हमारी समझदारी की पहुँच से परे है। हे करतार ! आपकी कौन-कौन सी उपमा हम करें।(आपकी लीला) देख-देख के हम हैरान हैं रहे हैं। 1।रहाउ। हे करतार ! (दुनिया के) सुखी लोगों में तूं (शिरोमणि) सुखी कहा जा सकता है। दुनिया में आप ही (शिरोमणि) तेजस्वी कहा जा सकता है (दुनिया के) रस भोगने वालों में आप शिरोमणि रसिया है। 2। हे करतार ! सूरमों में आप शिरोमणि शूरवीर कहलवाने का हकदार है।(दुनिया के सब जीवों में व्यापक होने के कारण) भोगियों में आप ही भोगी है। गृहस्थियों में आप सबसे बड़ा गृहस्थी है (जिसका इतना बड़ा संसार-परिवार है)।जोगियों में आप शिरोमणि जोगी है (इतने बड़े परिवार के होते हुए भी निर्लिप है)। 3। हे करतार ! नए काम करने वाले समझदारों में आप शिरोमणि रचनहार है; धार्मिक रस्में करने वालों में भी आप ही शिरोमणि है। हे करतार ! (दुनिया के) शाहूकारों में आप सदा कायम रहने वाला (शिरोमणि) शाहूकार है।और व्यापारियों में आप बड़ा व्यापारी है (जिसने इतना बड़ा जगत-पसारा पसारा हुआ है)। 4। हे करतार ! (दुनिया के) दरबार लगाने वालों में आपका दरबार शिरोमणि है।शरण पड़ों की लाज रखने वालों का आप शिरोमणि टिॅका है। हे करतार ! आपके घर में कितना धन है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।मैं आपके खजाने गिन नहीं सकता। 5। हे प्रभू ! (दुनिया के) महा महिमों-नामवरों में आपकी प्रसिद्धि शिरोमणि है।और ज्ञानवानों में आप ही शिरोमणि ज्ञानी है। हे प्रभू ! अच्छी जीवन-जुगति वालों में आपकी श्रेष्ठ है।(दुनिया के तीर्थ-) स्नानियों में आप शिरोमणि स्नानी है (क्योंकि सारे जलों में आप सदा खुद ही बस रहा है)। 6। हे प्रभू ! करामाती ताकतें रखने वालों में आपकी करामातें शिरोमणि हैं।काम करने वालों में आप ही शिरोमणि उद्यमी है। हे प्रभू ! (दुनिया के) हासिल कर्ताओं में आपका इख्तियार सबसे बड़ा है।(दुनिया के) हुकम चलाने वालों में आप सबसे बड़ा हाकिम है। 7।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! इस संसार समुंद्र से पार लंघाने के लिए) सनक सनंदन (आदि ऋषि) नारद (आदि) मुनी जगत के मालिक प्रभू की ही सेवा करते (रहे) हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।