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अंग 506

अंग
506
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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हरि नामु हिरदै पवित्रु पावनु इहु सरीरु तउ सरणी ॥7॥
लब लोभ लहरि निवारणं हरि नाम रासि मनं ॥
मनु मारि तुही निरंजना कहु नानका सरनं ॥8॥1॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) परमात्मा का पवित्र नाम अपने हृदय में (रख और प्रभू के आगे यूँ अरदास कर- हे प्रभू !) मेरा ये शरीर आपकी शरण है (भाव।मैं आपकी शरण आया हूँ)। 7। हे नानक ! परमात्मा का नाम (आत्मिक जीवन की राशि है।इस) सरमाए को अपने मन में संभाल के रख।ये लब और लोभ की लहरों को दूर करने के समर्थ है। अपने मन को (लोभ-लालच की ओर से) काबू कर के रख।और कह, हे निरंजन ! मैं आपकी शरण आया हूँ। 8। 1। 5।
गूजरी महला 3 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
निरति करी इहु मनु नचाई ॥
गुर परसादी आपु गवाई ॥
चितु थिरु राखै सो मुकति होवै जो इछी सोई फलु पाई ॥1॥
नाचु रे मन गुर कै आगै ॥
गुर कै भाणै नाचहि ता सुखु पावहि अंते जम भउ भागै ॥ रहाउ ॥
आपि नचाए सो भगतु कहीऐ आपणा पिआरु आपि लाए ॥
आपे गावै आपि सुणावै इसु मन अंधे कउ मारगि पाए ॥2॥
अनदिनु नाचै सकति निवारै सिव घरि नीद न होई ॥
सकती घरि जगतु सूता नाचै टापै अवरो गावै मनमुखि भगति न होई ॥3॥
सुरि नर विरति पखि करमी नाचे मुनि जन गिआन बीचारी ॥
सिध साधिक लिव लागी नाचे जिन गुरमुखि बुधि वीचारी ॥4॥
खंड ब्रहमंड त्रै गुण नाचे जिन लागी हरि लिव तुमारी ॥
जीअ जंत सभे ही नाचे नाचहि खाणी चारी ॥5॥
जो तुधु भावहि सेई नाचहि जिन गुरमुखि सबदि लिव लाए ॥
से भगत से ततु गिआनी जिन कउ हुकमु मनाए ॥6॥
एहा भगति सचे सिउ लिव लागै बिनु सेवा भगति न होई ॥
जीवतु मरै ता सबदु बीचारै ता सचु पावै कोई ॥7॥
माइआ कै अरथि बहुतु लोक नाचे को विरला ततु बीचारी ॥
गुर परसादी सोई जनु पाए जिन कउ क्रिपा तुमारी ॥8॥
इकु दमु साचा वीसरै सा वेला बिरथा जाइ ॥
साहि साहि सदा समालीऐ आपे बखसे करे रजाइ ॥9॥
सेई नाचहि जो तुधु भावहि जि गुरमुखि सबदु वीचारी ॥
कहु नानक से सहज सुखु पावहि जिन कउ नदरि तुमारी ॥10॥1॥6॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 3 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई ! रास-धारिए रास डाल-डाल के नाचते हैं और भगत कहलवाते हैं) मैं भी नाचता हूँ (पर शरीर को नचाने की जगह) मैं (अपने) इस मन को नचाता हूँ (भाव।) गुरू की कृपा से (अपने अंदर से) मैं स्वैभाव दूर करता हूँ। (और इस तरह) मैं जो भी इच्छा करता हूँ (परमात्मा के दर से) वही फल पा लेता हूँ।(हे भाई ! रासों में नाचने कूदने से मुक्ति नहीं मिलती।ना ही कोई भगत बन सकता है) जो मनुष्य चित्त को (प्रभू-चरणों में) अडोल रखता है वह माया के बंधनों से खलासी (का आशावान) हो जाता है। 1। हे मन ! गुरू की हजूरी में नाच (गुरू के हुकम में चल)। हे मन ! अगर आप वैसे नाचेगा जैसे गुरू नचाएगा (अगर आप गुरू के हुकम में चलेगा) तो आनंद पाएगा।आखिरी वक्त पर मौत का डर (भी आपसे दूर) भाग जाएगा। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा अपने इशारों पर चलाता है जिस मनुष्य को अपने चरणों का प्यार बख्शता है वह मनुष्य (दरअसल) भगत कहा जा सकता है। परमात्मा खुद ही (उस मनुष्य के वास्ते।रजा में चलने का गीत) गाता है।खुद ही (यह गीत उस मनुष्य को) सुनाता है।और।माया के मोह में अंधे हुए इस मन को सही जीवन राह पर लाता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य हर वक्त परमात्मा की रजा में चलता है वह (अपने अंदर से) माया (का प्रभाव) दूर कर लेता है।(हे भाई !) कल्याण-स्वरूप प्रभू के चरणों में जुड़ने से माया के मोह की नींद हावी नहीं हो सकती। जगत माया के मोह में सोया हुआ (माया के हाथों पे) नाचता-कूदता है (दुनियावी दौड़-भाग करता रहता है)।(हे भाई !) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य से परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। 3। हे भाई ! दैवी स्वभाव वाले मनुष्य दुनियावी काम-कार करते हुए भी।ऋषि मुनि लोग आत्मिक जीवन की सूझ से विचारवान हो के।परमात्मा की कृपा से (परमात्मा की रजा में चलने वाला) नाच नाचते हैं। आत्मिक जीवन की तलाश के वास्ते साधन करने के समय जो मनुष्य गुरू के द्वारा श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त करके विचारवान हो जाते हैं उनकी सुरति प्रभू-चरणों में जुड़ी रहती है।वह (भी रजा में चलने वाला) नाच नाचते हैं। 4। हे प्रभू !खण्डों-ब्रहमण्डों के सारे जीव त्रिगुणी माया के प्रभाव में नाच रहे हैं; पर।हे प्रभू ! जिन्हें आपके चरणों की लगन लगी है वह आपकी रजा में चलने का नाच नाचते हैं। सारे जीव-जंतु (माया के हाथों पर) नाच रहे हैं।चारों खाणियों के जीव नाच रहे हैं। 5। हे प्रभू ! जो मनुष्य आपको प्यारे लगते हैं वही आपके इशारे पर चलते हैं।हे भाई ! जिन मनुष्यों को गुरू के सन्मुख करके।गुरू के शबद में जोड़ के अपने चरणों की प्रीति बख्शता है। जिन्हें अपना भाणा मीठा करके मनाता है वही मनुष्य असल भगत हैं (रासों में नाचने वाले भगत नहीं हैं)।वही मनुष्य सारे जगत के मूल परमात्मा के साथ गहरी समीपता बनाए रखते हैं। 6। हे भाई ! वही उत्तम भक्ति कहलवा सकती है जिसके द्वारा सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा सें प्यार बना रहे।ऐसी भक्ति (गुरू की बताई) सेवा करे बिना नहीं हो सकती। जब मनुष्य दुनिया की किरत-कार करता हुआ ही माया के मोह की ओर से अछोह हो जाता है तब वह गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिकाए रखता है।तब ही मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा का मिलाप हासल करता है। 7। हे भाई ! माया कमाने की खातिर तो बहुत सी दुनिया (माया के हाथों पर) नाच रही है।कोई विरला मनुष्य है जो असल आत्मिक जीवन को पहचानता है। हे प्रभू ! वही वही मनुष्य गुरू की कृपा से आपका मिलाप हासिल करता है जिन पर आपकी मेहर होती है। 8। हे भाई ! जो भी एक सांस सदा कायम रहने वाले परमात्मा को भूला रहे वह समय व्यर्थ चला जाता है।हरेक सांस के साथ परमात्मा को अपने दिल में बसा के रखना चाहिए। (पर ये उद्यम वही मनुष्य कर सकता है जिस पर) परमात्मा खुद ही मेहर करके बख्शिश करे। 9। हे प्रभू ! जो मनुष्य आपको अच्छे लगते हैं वही आपकी रजा में चलते हैं क्योंकि वे गुरू की शरण पड़ कर गुरू के शबद को अपनी सोच-मण्डल में टिका लेते हैं। हे नानक ! कह, (हे प्रभू !) जिन पर आपकी मेहर की नजर पड़ती है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता का आनंद पाते हैं। 10। 1। 6।
गूजरी महला 4 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि बिनु जीअरा रहि न सकै जिउ बालकु खीर अधारी ॥
अगम अगोचर प्रभु गुरमुखि पाईऐ अपुने सतिगुर कै बलिहारी ॥1॥
मन रे हरि कीरति तरु तारी ॥
गुरमुखि नामु अंम्रित जलु पाईऐ जिन कउ क्रिपा तुमारी ॥ रहाउ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 4 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! मेरी कमजोर जिंद परमात्मा (के मिलाप) के बिना धैर्य नहीं धर सकती।जैसा छोटा बच्चा दूध के सहारे ही जीता है। हे भाई ! वह प्रभू ! जो अपहुँच है (जिस तक जीव अपनी समझदारी के बल पर नहीं पहुँच सकता)।जिस तक मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती।गुरू की शरण पड़ने से ही मिलता है।(इस वास्ते) मैं अपने गुरू से सदा सदके जाता हूँ। 1। हे (मेरे) मन ! परमात्मा की सिफत सालाह के द्वारा (संसार समुंद्र से) पार लांघने का यत्न किया कर। हे मन ! आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम-जल गुरू की शरण पड़ने से मिलता है।(पर।हे प्रभू ! आपका नाम-जल उनको ही मिलता है) जिनपे आपकी कृपा हैं।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) परमात्मा का पवित्र नाम अपने हृदय में (रख और प्रभू के आगे यूँ अरदास कर- हे प्रभू !) मेरा ये शरीर आपकी शरण है (भाव।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।