सतिगुर वाकि हिरदै हरि निरमलु ना जम काणि न जम की बाकी ॥1॥ रहाउ ॥ हरि गुण रसन रवहि प्रभ संगे जो तिसु भावै सहजि हरी ॥ बिनु हरि नाम ब्रिथा जगि जीवनु हरि बिनु निहफल मेक घरी ॥2॥ ऐ जी खोटे ठउर नाही घरि बाहरि निंदक गति नही काई ॥ रोसु करै प्रभु बखस न मेटै नित नित चड़ै सवाई ॥3॥ ऐ जी गुर की दाति न मेटै कोई मेरै ठाकुरि आपि दिवाई ॥ निंदक नर काले मुख निंदा जिन॑ गुर की दाति न भाई ॥4॥ ऐ जी सरणि परे प्रभु बखसि मिलावै बिलम न अधूआ राई ॥ आनद मूलु नाथु सिरि नाथा सतिगुरु मेलि मिलाई ॥5॥ ऐ जी सदा दइआलु दइआ करि रविआ गुरमति भ्रमनि चुकाई ॥ पारसु भेटि कंचनु धातु होई सतसंगति की वडिआई ॥6॥ हरि जलु निरमलु मनु इसनानी मजनु सतिगुरु भाई ॥ पुनरपि जनमु नाही जन संगति जोती जोति मिलाई ॥7॥ तूं वड पुरखु अगंम तरोवरु हम पंखी तुझ माही ॥ नानक नामु निरंजन दीजै जुगि जुगि सबदि सलाही ॥8॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने सतिगुरू के शबद के द्वारा अपने हृदय में परमात्मा का पवित्र नाम बसा लिया है।उसको जम की मुथाजी नहीं रहती।उसके जिम्मे पिछले किए कर्मों का कोई ऐसा बाकी लेखा नहीं रह जाता जिसके कारण जमराज उस पर कोई जोर डाल सके। 1।रहाउ। (परमात्मा के भगत) परमात्मा की संगति में टिक के अपनी जीभ से परमात्मा के गुण गाते हैं (वे यही समझते हैं कि) सहज ही (जगत में वही घटित होता है) जो उस परमात्मा का भाता है। परमात्मा के नाम के बिना जगत में जीना उन्हें व्यर्थ दिखाई देता है।परमात्मा की भक्ति के बिना उन्हें एक भी घड़ी निष्फल प्रतीत होती है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के भक्तों के वास्ते अपने मन में खोट रखता है और उनकी निंदा करता है उसे ना घर में ना ही बाहर कहीं भी आत्मिक शांति की जगह नहीं मिलती क्योंकि उसकी अपनी आत्मक अवस्था ठीक नहीं। (परमात्मा अपने भक्तों पर सदा बख्शिशें करता है) अगर निंदक (ये बख्शिशें देख के) खिझे।तो भी परमात्मा अपनी बख्शिशें बंद नहीं करता।वह बल्कि सदा ही बढ़ती जाती है। 3। हे भाई ! (प्रभू की सिफत सालाह) गुरू की दी हुई दाति है।इसको कोई मिटा नहीं सकता; ठाकुर प्रभू ने खुद ही ये (नाम की) दाति दिलवाई होती है। जिन निंदकों को (भक्त-जनों को दी हुई) गुरू की दाति पसंद नहीं आती (और वह भक्तों की निंदा करते हैं) निंदा के कारण उन निंदकों के मुंह काले (दिखते हैं)। 4। हे भाई ! जो मनुष्य (प्रभू की) शरण पड़ते हैं।प्रभू मेहर करके उन्हें अपने चरणों में जोड़ लेता है।रत्ती भर भी ढील नहीं करता। वह प्रभू आत्मिक आनंद का श्रोत है।सबसे बड़ा नाथ है।गुरू (की शरण पड़े मनुष्य को) परमात्मा के मेल में मिला देता है। 5। हे भाई ! परमात्मा दया का श्रोत है (सब जीवों पे) सदा दया करता है।जो मनुष्य गुरू की मति ले के उसको सिमरता है।प्रभू उसकी भटकना मिटा देता है। जैसे (लोहा आदि) धात पारस को छू के सोना बन जाती है वैसे ही साध-संगति में भी यही बरकति है। 6। परमात्मा (मानो) पवित्र जल है (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है।उसका) मन (इस पवित्र जल में) स्नान करने के लायक बन जाता है। जिस मनुष्य को अपने मन में सतिगुरू प्यारा लगता है उसका मन (इस पवित्र जल में) चॅुभी लगाता है। साध-संगति में रह के उसका बार-बार जन्म नहीं होता।(क्योंकि गुरू) उसकी ज्योति प्रभू की ज्योति में मिला देता है। 7। हे प्रभू ! आप सबसे बड़ा है।आप सर्व-व्यापक है।आप अपहुँच है।आप (मानो) एक श्रेष्ठ वृक्ष है जिसके आसरे रहने वाले हम सभी जीव पक्षी हैं। हे निरंजन प्रभू ! मुझ नानक को अपना नाम बख्श।ता कि मैं सदा ही गुरू के शबद में (जुड़ के) आपकी सिफत सालाह करता रहूँ। 8। 4।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 1 घरु 4 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति करते हैं।सदा स्थिर प्रभू को प्रेम से आराधते हैं।उनके अंदर प्रेमा-भक्ति की तीव्र कसक बनी रहती है। वह (प्रभू के दर पर ही) मिन्नत-तरले करते हैं विनतियां करते हैं।उनके चित्त प्रभू के प्रेम-प्यार में (मगन रहते हैं) और वह आत्मिक आनंद पाते हैं। 1। हे मन ! परमात्मा का नाम जप।परमात्मा की ओट पकड़। परमात्मा के नाम को जीवन का उद्देश्य बना।यह नाम संसार-समुंद्र से पार लंघाने के लिए जहाज है। 1।रहाउ। हे मन ! गुरू के शबद में (टिक के) परमात्मा का सिमरन कर।और (विकारों की ओर से उपराम हो)।विकारों की ओर से मौत (जीवन के लिए) सुखद है। जो मनुष्य परमात्मा का नाम मन में सिमरते हैं उनकी मति जगत-मूल प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेती है।उनको सुखों का खजाना प्रभू मिल जाता है। 2। (दुनिया का) धन (मनुष्य के) मन को चंचल बनाता है और भटकना पैदा करता है।(पर) जगत (इस धन के) मोह में प्रेम में मस्त रहता है। परमात्मा के भगत (अपनी) समझ में (यह निश्चय) पक्का कर लेते हैं कि परमात्मा का नाम (ही) सदा कायम रहने वाला है।वह गुरू के शबद में टिक के सिफत सालाह में रंगे रहते हैं। 3। जगत (माया के मोह के कारण) जनम-मरण के रोग में ख्वार होता रहता है।भटकता रहता है।(इस की माया वाली) भटकना खत्म नहीं होती। हे मन ! परमात्मा की शरण ही ऐसी जगह है जो माया के मोह से उपराम करता है।परमात्मा के नाम का जप ही सही समझ है। 4। यह जगत माया के मोह में फंसा हुआ है।इस वास्ते इसे जनम-मरण का बहुत दुख लगा रहता है। (हे भाई !) आप परमात्मा का नाम हृदय में सिमर।सतिगुरू की शरण पड़।(तब ही) आप (जनम-मरन के चक्कर से) बच सकेगा। 5। जो मनुष्य अपने मन में गुरू की शिक्षा पक्के तौर पर धारण कर लेता है।उसका मन अडोल आत्मिक अवस्था की विचार में रम जाता है (भाव।वह सदा ये ख्याल रखता है कि मन माया की भटकना की ओर से हट के प्रभू के नाम की एकाग्रता में टिका रहे)। जिस मन में सदा-स्थिर प्रभू टिक जाए वह मन पवित्र हो जाता है।उसके अंदर प्रभू-ज्ञान का श्रेष्ठ रतन मौजूद रहता है। 6। हे (मेरे) मन ! परमात्मा के डर-अदब में रह।प्रभू के प्यार में रह।प्रभू की भक्ति कर।प्रभू के चरणों में सुरति जोड़।इस तरह संसार-समुंद्र से पार लांघ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य ने सतिगुरू के शबद के द्वारा अपने हृदय में परमात्मा का पवित्र नाम बसा लिया है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।