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अंग 504

अंग
504
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पवणु पाणी अगनि तिनि कीआ ब्रहमा बिसनु महेस अकार ॥
सरबे जाचिक तूं प्रभु दाता दाति करे अपुनै बीचार ॥4॥
कोटि तेतीस जाचहि प्रभ नाइक देदे तोटि नाही भंडार ॥
ऊंधै भांडै कछु न समावै सीधै अंम्रितु परै निहार ॥5॥
सिध समाधी अंतरि जाचहि रिधि सिधि जाचि करहि जैकार ॥
जैसी पिआस होइ मन अंतरि तैसो जलु देवहि परकार ॥6॥
बडे भाग गुरु सेवहि अपुना भेदु नाही गुरदेव मुरार ॥
ता कउ कालु नाही जमु जोहै बूझहि अंतरि सबदु बीचार ॥7॥
अब तब अवरु न मागउ हरि पहि नामु निरंजन दीजै पिआरि ॥
नानक चात्रिकु अंम्रित जलु मागै हरि जसु दीजै किरपा धारि ॥8॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: जब उस परमात्मा ने हवा-पानी-आग (आदि तत्व) रचे।तो ब्रहमा-विष्णु-शिव आदि के वजूद रचे। हे प्रभू ! हे प्रभू ! (ये ब्रहमा-विष्णु-शिव आदि) सारे ही (आपके पैदा किए हुए जीव आपके दर के) मंगते हैं आप सबको दातें देने वाला है।(समर्थ प्रभू) अपनी विचार अनुसार (सबको) दातें देता है। 4। हे सबकी अगुवाई करने वाले नायक प्रभू ! तैंतीस करोड़ देवते (भी आपके दर के) मंगते हैं।(उनको दातें) दे दे के आपके खजानों में घाटा नहीं पड़ता। (मायावी पदार्थ तो सबको मिलते हैं।पर) श्रद्धाहीन हृदय में (आपके नाम-अमृत की दाति में से) कुछ भी नहीं टिकता।और श्रद्धा-भरपूर हृदय में आपकी मेहर की निगाह से आत्मिक जीवन देने वाला आपका नाम टिकता है। 5। योग-साधना में पहुँचे हुए जोगी भी समाधि में टिक के आपसे ही माँगते हैं।करामाती ताकतें मांग-मांग के आपकी जै-जैकार करते हैं। (यही कहते हैं,आपकी जय हैं।आपकी जय हो) जैसी किसी के मन में (मांगने की) प्यास होती है।तू।हे प्रभू ! उसी किस्म का जल दे देता है। 6। पर असली बड़े भाग्य उन लोगों के हैं जो अपने गुरू की बताई हुई सेवा करते हैं।गुरू और परमातमा में कोई फर्क नहीं होता। जो लोग अपने विचार-मण्डल में (मायावी पदार्थों की मांग की जगह) गुरू के शबद को समझते हैं।आत्मिक मौत उनके नजदीक भी नहीं फटक सकती। 7। (इस वास्ते) मैं कभी भी परमात्मा से और कुछ नहीं मांगता।(मैं यही अरदास करता हूँ-) हे निरंजन प्रभू ! प्यार की निगाह से मुझे अपना नाम बख्श। नानक पपीहा आत्मिक-जीवन देने वाला नाम-जल मांगता है।हे हरी ! कृपा करके अपनी सिफत-सालाह दे। 8। 2।
गूजरी महला 1 ॥
ऐ जी जनमि मरै आवै फुनि जावै बिनु गुर गति नही काई ॥
गुरमुखि प्राणी नामे राते नामे गति पति पाई ॥1॥
भाई रे राम नामि चितु लाई ॥
गुर परसादी हरि प्रभ जाचे ऐसी नाम बडाई ॥1॥ रहाउ ॥
ऐ जी बहुते भेख करहि भिखिआ कउ केते उदरु भरन कै ताई ॥
बिनु हरि भगति नाही सुखु प्रानी बिनु गुर गरबु न जाई ॥2॥
ऐ जी कालु सदा सिर ऊपरि ठाढे जनमि जनमि वैराई ॥
साचै सबदि रते से बाचे सतिगुर बूझ बुझाई ॥3॥
गुर सरणाई जोहि न साकै दूतु न सकै संताई ॥
अविगत नाथ निरंजनि राते निरभउ सिउ लिव लाई ॥4॥
ऐ जीउ नामु दिड़हु नामे लिव लावहु सतिगुर टेक टिकाई ॥
जो तिसु भावै सोई करसी किरतु न मेटिआ जाई ॥5॥
ऐ जी भागि परे गुर सरणि तुम॑ारी मै अवर न दूजी भाई ॥
अब तब एको एकु पुकारउ आदि जुगादि सखाई ॥6॥
ऐ जी राखहु पैज नाम अपुने की तुझ ही सिउ बनि आई ॥
करि किरपा गुर दरसु दिखावहु हउमै सबदि जलाई ॥7॥
ऐ जी किआ मागउ किछु रहै न दीसै इसु जग महि आइआ जाई ॥
नानक नामु पदारथु दीजै हिरदै कंठि बणाई ॥8॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 1 ॥ हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की शरण नहीं पड़ता।वह) पैदा होता है मरता है फिर पैदा होता है मरता है।उस का ये चक्कर बना रहता है।(क्योंकि) गुरू (की शरण) के बिना ऊँची आत्मिक अवस्था नहीं बनती। जो प्राणी गुरू की शरण पड़ते हैं वह (परमात्मा के) नाम में ही रंगे रहते हैं।और नाम में ही रंगे रहने के कारण वे उच्च आत्मिक अवस्था और इज्जत प्राप्त कर लेते हैं। 1। हे भाई ! आप भी परमात्मा के नाम में चित जोड़। (गुरू की शरण पड़ के) गुरू की मेहर से (भाव।गुरू की मेहर का पात्र बन के) आप हरी प्रभू से (नाम की दाति ही) मांग।परमात्मा का नाम जपने की ऐसी बरकति होती है (कि जनम-मरन का चक्कर समाप्त हो जाता है)। 1।रहाउ। हे भाई ! (आप प्रभू को विसर के) पेट भरने की खातिर (दर दर से) भिक्षा लेने के लिए कई तरह के (धार्मिक) भेष बना रहा है।पर। हे प्राणी ! परमात्मा की भक्ति के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिलता।गुरू की शरण के बिना अहंकार दूर नहीं होता। 2। हे भाई ! (सिमरन के बिना) आत्मिक मौत सदा आपके सिर पर खड़ी हुई है।यही हरेक जनम में आपकी वैरी चली आ रही है। जो मनुष्य गुरू के सच्चे शबद में रंगे रहते हैं वह (इस आत्मिक मौत से) बच जाते हैं।(क्योंकि) गुरू (उनको) (आत्मिक जीवन की) समझ दे देता है। 3। गुरू की शरण पड़े लोगों को आत्मिक मौत देख भी नहीं सकती।उनको सता नहीं सकती (क्योंकि गुरू की कृपा से) वह अदृष्य जगत नाथ निरंजन प्रभू में रमे रहते हैं।वे निर्भय परमात्मा (के चरणों) से अपनी सुरति जोड़े रखते हैं। 4। (इस वास्ते) गुरू का आसरा ले के आप परमात्मा के नाम को अपने अंदर पक्की तरह टिका। परमात्मा के नाम में ही अपनी सुरत जोड़े रख। हे (मेरी) जिंदे ! (ये याद रख) परमात्मा को यही अच्छा लगता है कि (जीवों के) किए कर्मों के संस्कारों का समूह (मन में से सिमरन के बिना) मिटाया नहीं जा सकता 5। हे सतिगुरू ! मैं भाग के आपकी शरण आया हूँ।मुझे कोई और आसरा अच्छा नहीं लगता। मैं सदा एक ही परमात्मा का नाम पुकारता हूँ।वह आदि से युगों के आरम्भ से (जीवों का) साथी मित्र चला । 6। हे प्रभू जी ! (आपको लोग शरण-पाल कहते हैं।मैं आपकी शरण आया हूँ) अपने (शरण-पाल) नाम की लाज पाल।मेरी प्रीति सदा आपके साथ बनी रहे। मेहर कर मुझे गुरू के दर्शन करा ता कि गुरू अपने शबद के द्वारा (मेरे अंदर से) अहंकार को जला दे। 7। हे प्रभू जी ! (आपके नाम के बिना) मैं (आपसे) और क्या मांगूँ।मुझे कोई चीज ऐसी नहीं दिखाई देती जो सदा टिकी रह सके।इस जगत में जो भी आया है।वह नाशवंत ही है। मुझे नानक को अपना नाम-पदार्थ ही दे।मैं (इस नाम को) अपने हृदय की माला बना लूँ। 8। 3।
गूजरी महला 1 ॥
ऐ जी ना हम उतम नीच न मधिम हरि सरणागति हरि के लोग ॥
नाम रते केवल बैरागी सोग बिजोग बिसरजित रोग ॥1॥
भाई रे गुर किरपा ते भगति ठाकुर की ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 1 ॥ हे भाई ! जो लोग परमात्मा की भक्ति करते हैं जो परमात्मा की शरण आते हैं उन्हें ना ये गुमान होता है कि हम सबसे ऊँची या बीच की जाति के हैं।ना ये सहम होता है कि हम नीच जाति के हैं। सिर्फ प्रभू नाम में रंगे रहने के कारण वह (इस ऊँच नीच आदि से) निर्मोह रहते हैं।चिंता।विछोड़ा रोग आदि वह सब भुला चुके होते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति गुरू की मेहर से ही हो सकती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब उस परमात्मा ने हवा-पानी-आग (आदि तत्व) रचे।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।