कवल प्रगास भए साधसंगे दुरमति बुधि तिआगी ॥2॥ आठ पहर हरि के गुण गावै सिमरै दीन दैआला ॥ आपि तरै संगति सभ उधरै बिनसे सगल जंजाला ॥3॥ चरण अधारु तेरा प्रभ सुआमी ओति पोति प्रभु साथि ॥ सरनि परिओ नानक प्रभ तुमरी दे राखिओ हरि हाथ ॥4॥2॥32॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: गुरू की संगति में रहके उनके हृदय कमल-फूल की तरह खिल जाते हैं।वह खोटी मति वाली बुद्धि त्याग देते हैं। 2। हे भाई ! जो मनुष्य आठों पहर परमात्मा के गुण गाता है।दीनों पर दया करने वाले का नाम सिमरता है। वह खुद (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है।उसके सारे मायावी बंधन नाश हो जाते हैं। 3। हे प्रभू ! हे स्वामी ! जिस मनुष्य ने आपके चरनों को अपनी जिंदगी का सहारा बना लिया।आप मालिक ! ताणे-पेटे की तरह सदा उसके साथ रहता है। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी शरण आ पड़ा।हे हरी ! आप उसको अपना हाथ दे के (संसार-समुंद्र से) बचाता है। 4। 32।
गूजरी असटपदीआ महला 1 घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ एक नगरी पंच चोर बसीअले बरजत चोरी धावै ॥ त्रिहदस माल रखै जो नानक मोख मुकति सो पावै ॥1॥ चेतहु बासुदेउ बनवाली ॥ रामु रिदै जपमाली ॥1॥ रहाउ ॥ उरध मूल जिसु साख तलाहा चारि बेद जितु लागे ॥ सहज भाइ जाइ ते नानक पारब्रहम लिव जागे ॥2॥ पारजातु घरि आगनि मेरै पुहप पत्र ततु डाला ॥ सरब जोति निरंजन संभू छोडहु बहुतु जंजाला ॥3॥ सुणि सिखवंते नानकु बिनवै छोडहु माइआ जाला ॥ मनि बीचारि एक लिव लागी पुनरपि जनमु न काला ॥4॥ सो गुरू सो सिखु कथीअले सो वैदु जि जाणै रोगी ॥ तिसु कारणि कंमु न धंधा नाही धंधै गिरही जोगी ॥5॥ कामु क्रोधु अहंकारु तजीअले लोभु मोहु तिस माइआ ॥ मनि ततु अविगतु धिआइआ गुर परसादी पाइआ ॥6॥ गिआनु धिआनु सभ दाति कथीअले सेत बरन सभि दूता ॥ ब्रहम कमल मधु तासु रसादं जागत नाही सूता ॥7॥ महा गंभीर पत्र पाताला नानक सरब जुआइआ ॥ उपदेस गुरू मम पुनहि न गरभं बिखु तजि अंम्रितु पीआइआ ॥8॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: गूजरी असटपदीआ महला 1 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। इस एक ही (शरीर-) नगर में (कामादिक) पाँच चोर बसे हुए हैं।मना करते-करते भी (इनमें से हरेक इस नगर के आत्मिक गुणों को) चुराने के लिए उठ दौड़ता है। (परमात्मा को अपने हृदय में बसा के) जो मनुष्य (इन पाँचों से) माया के तीन गुणों से और दस इन्द्रियों से (अपने आत्मिक गुणों की) पूँजी बचा के रखता है।हे नानक ! वह (इनसे) सदा के लिए निजात प्राप्त कर लेता है। 1। हे भाई ! सर्व-व्यापक जगत के मालिक परमात्मा को सदा याद रखो। प्रभू को अपने हृदय में टिकाओ- (इसको अपनी) माला (बनाओ)। 1।रहाउ। जिस माया का मूल प्रभू।माया के प्रभाव से ऊपर है।जगत पसारा जिस माया के प्रभाव से नीचे है।चारों वेद जिस (माया के बल के वर्णन) में लगे रहे हैं। वह माया सहजे ही (उन लोगों से) परे हट जाती है (जो परमात्मा को अपने हृदय में बसाते हैं।क्योंकि) वह लोग।हे नानक ! परमात्मा (के चरणों) में सुरति जोड़ के (माया के हमलों से) सुचेत रहते हैं। 2। (ये सारा जगत जिस पारजात-प्रभू) फूल-पत्तियां-डालियां आदि पसारा है।जो प्रभू सारे जगत का मूल है।वह (सर्व-इच्छा-पूरक) पारजात (-प्रभू) मेरे हृदय आँगन में प्रगट हो गया है (और मेरे अंदर से माया वाले जंजाल समाप्त हो गए हैं)। जिसकी ज्योति सब जीवों में पसर रही है।जो माया के प्रभाव से परे है।जिसका प्रकाश अपने आप से है। (हे भाई ! आप भी परमात्मा को अपने हृदय में बसाओ।इस तरह) माया के बहुते जंजाल छोड़ सकोगे। 3। हे (मेरी) शिक्षा सुनने वाले भाई ! जो विनती नानक करता है वह सुन- (अपने हृदय में परमात्मा का नाम धारण कर।इस तरह आप) माया के बंधन त्याग सकेगा। जिस मनुष्य के मन में सोच-मण्डल में परमात्मा की लिव लग जाती है वह बार-बार जनम-मरण (के चक्कर) में नहीं आता। 4। (जिस मनुष्य ने परमात्मा को हृदय में बसा लिया है) वह गुरू कहा जा सकता है।वह (असल) सिख कहा जा सकता है।वह (असल) वैद्य कहा जा सकता है क्योंकि वह अन्य (आत्मिक) रोगियों का रोग समझ लेता है। परमात्मा के सिमरन की बरकति से दुनिया का काम-धंधा उसको व्याप नहीं सकता।(प्रभू के सिमरन के सदका) वह माया के बंधनों में नहीं (फसता)।वह गृहस्ती (होते हुए भी) जोगी है। 5। उसने काम-क्रोध और अहंकार त्याग दिया है। उसने लोभ-मोह और माया की तृष्णा त्याग दी है। जिस मनुष्य ने गुरू की मेहर से अपने मन में जगत मूल अदृश्य प्रभू को सिमरा है और उससे मिलाप हासिल कर लिया है 6। परमात्मा के साथ गहरी सांझ बननी।प्रभू-चरणों में सुरति जुड़नी -ये सब प्रभू की दाति ही कही जा सकती है।(जिसको ये दाति मिलती है उसको देख के) कामादिक वैरियों के रंग उड़ जाते हैं। (क्योंकि सिमरन की बरकति से उसके हृदय में।मानो) ब्रहम-रूपी कमल का शहद (टपकने लग जाता है) उस (नाम-अमृत शहद का) रस वह मनुष्य चखता है (इस करके वह माया के हमलों से) सुचेत रहता है।(माया के मोह की नींद में) गाफिल नहीं होता। 7। हे नानक ! जो प्रभू बड़े जिगरे वाला है।सारे पाताल (सारा संसार जिस पारजात प्रभू) की पत्तियां (पसारा) हैं।जो सब जीवों में व्यापक है। गुरू के उपदेश की बरकति से मैंने उसका नाम अमृत पीया है और माया का जहर त्यागा है।अब मेरा बार-बार गर्भवास (जनम-मरण) नहीं होंगे। 8। 1।
गूजरी महला 1 ॥ कवन कवन जाचहि प्रभ दाते ता के अंत न परहि सुमार ॥ जैसी भूख होइ अभ अंतरि तूं समरथु सचु देवणहार ॥1॥ ऐ जी जपु तपु संजमु सचु अधार ॥ हरि हरि नामु देहि सुखु पाईऐ तेरी भगति भरे भंडार ॥1॥ रहाउ ॥ सुंन समाधि रहहि लिव लागे एका एकी सबदु बीचार ॥ जलु थलु धरणि गगनु तह नाही आपे आपु कीआ करतार ॥2॥ ना तदि माइआ मगनु न छाइआ ना सूरज चंद न जोति अपार ॥ सरब द्रिसटि लोचन अभ अंतरि एका नदरि सु त्रिभवण सार ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 1 ॥ हे दातार प्रभू ! बेअंत जीव (आपके दर से दातें) मांगते हैं उनकी गिनती के अंत नहीं पड़ सकते। जैसी (किसी के) धुर अंदर (मांगने की) भूख होती है।हे देवनहार प्रभू ! आप (पूरी करता है)।आप सदा स्थिर है और दातें देने योग्य है। 1। आपका नाम ही (हमारे लिए) जप है तप है संजम है।आपका नाम ही (हमारे वास्ते) सदा स्थिर रहने वाला आसरा है हे प्रभू जी ! (हम जीवों को) अपना नाम दे (आपके नाम की बरकति से ही) आत्मिक आनंद मिलता है (इस पदार्थ की आपके घर में कोई कमी नहीं है) आपकी भक्ति के (आपके पास) खजाने भरे पड़े हैं। 1।रहाउ। तब आप खुद ही अफूर अवस्था में (अपने अंदर) सुरति जोड़ के समाधि लगाए बैठा था।आप अकेला खुद ही अपने इरादे को समझता था। हे करतार ! जब तूने अपने आप को खुद ही प्रगट किया था।तब ना पानी था।ना सूखा था।ना धरती थी।ना आकाश था। 2। तब ना ये माया थी।ना इस माया के प्रभाव में मस्त कोई जीव था।ना तब सुरज था।ना चंद्रमा था।ना ही कोई और ज्योति थी। हे प्रभू ! सारे जीवों को देख सकने वाली आपकी आँख।तीनों भवनों की सार ले सकने वाली आपकी अपनी ही नजर आपके अपने ही अंदर टिकी हुई थी। 3।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की संगति में रहके उनके हृदय कमल-फूल की तरह खिल जाते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।