दुख अनेरा भै बिनासे पाप गए निखूटि ॥1॥ हरि हरि नाम की मनि प्रीति ॥ मिलि साध बचन गोबिंद धिआए महा निरमल रीति ॥1॥ रहाउ ॥ जाप ताप अनेक करणी सफल सिमरत नाम ॥ करि अनुग्रहु आपि राखे भए पूरन काम ॥2॥ सासि सासि न बिसरु कबहूं ब्रहम प्रभ समरथ ॥ गुण अनिक रसना किआ बखानै अगनत सदा अकथ ॥3॥ दीन दरद निवारि तारण दइआल किरपा करण ॥ अटल पदवी नाम सिमरण द्रिड़ु नानक हरि हरि सरण ॥4॥3॥29॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: उसके सारे दुख।उसका माया के मोह का अंधकार।उसके सारे डर दूर हो गए।उसके सारे पाप समाप्त हो गए। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा के नाम का प्यार पैदा हो जाता है। जो मनुष्य गुरू को मिल के गुरू की बाणी के द्वारा गोबिंद का ध्यान करता है।उसकी जीवन-जुगति बहुत पवित्र हो जाती है। 1।रहाउ। (हे भाई ! जीवन में सफलता देने वाला हरि-नाम ही है) जीवन-सफलता देने वाला प्रभू का नाम सिमरने से सारे जप-तप और अनेकों ही निहित धार्मिक कर्म अपने आप हुए समझो (इनकी आवश्यक्ता ही नहीं पड़ती।सबसे श्रेष्ठ नाम-सिमरन ही है)। हे भाई ! परमात्मा मेहर करके जिन मनुष्यों को (अपने चरणों में टिकाए) रखता है उनके सारे काम सिरे चढ़ जाते हैं। 2। हे भाई ! अपनी हरेक सांस के साथ समर्थ ब्रहम परमात्मा को याद करता रह।उसे कभी ना बिसार। उस परमात्मा के बेअंत गुण हैं।गिने नहीं जा सकते।मनुष्य की जीभ उनको बयान नहीं कर सकती।उस परमात्मा का स्वरूप सदा ही बयान से परे है। 3। हे भाई ! परमात्मा गरीबों के दुख दूर करके उनको संसार-समुंद्र से पार लंघाने के समर्थ है।दया का घर है।वह हरेक पर कृपा करने वाला है उसका नाम सिमरते ही अटल आत्मिक जीवन का दर्जा मिल जाता है।हे नानक ! (कह,हे भाई !) हरी-नाम को अपने दिल में पक्का टिकाए रख।परमात्मा की शरण पड़ा रह। 4। 3। 29।
गूजरी महला 5 ॥ अहंबुधि बहु सघन माइआ महा दीरघ रोगु ॥ हरि नामु अउखधु गुरि नामु दीनो करण कारण जोगु ॥1॥ मनि तनि बाछीऐ जन धूरि ॥ कोटि जनम के लहहि पातिक गोबिंद लोचा पूरि ॥1॥ रहाउ ॥ आदि अंते मधि आसा कूकरी बिकराल ॥ गुर गिआन कीरतन गोबिंद रमणं काटीऐ जम जाल ॥2॥ काम क्रोध लोभ मोह मूठे सदा आवा गवण ॥ प्रभ प्रेम भगति गुपाल सिमरण मिटत जोनी भवण ॥3॥ मित्र पुत्र कलत्र सुर रिद तीनि ताप जलंत ॥ जपि राम रामा दुख निवारे मिलै हरि जन संत ॥4॥ सरब बिधि भ्रमते पुकारहि कतहि नाही छोटि ॥ हरि चरण सरण अपार प्रभ के द्रिड़ु गही नानक ओट ॥5॥4॥30॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! अहंकार एक बड़ा लंबा रोग है।माया से गहरा प्यार बड़ा पुराना रोग है (इस रोग से उस भाग्यशाली मनुष्य की खलासी होती है जिसे) गुरू ने परमात्मा का नाम-औषधी दे दिया। (हे भाई !) प्रभू का नाम जगत के मूल-प्रभू से मिलाने की स्मर्था रखता हैं1। हे भाई ! अपने मन में अपने हृदय में परमात्मा के सेवकों की चरण-धूड़ (की प्राप्ति की) चाहत करते रहना चाहिए (और। प्रभू-चरणों में अरदास करनी चाहिए-) हे गोबिंद ! (मेरी यह) तमन्ना पूरी कर (क्योंकि ‘जन धूरि’ की बरकति से) करोड़ों जन्मों के पाप उतर जाते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! (मायावी पदार्थों की) आसा (एक) डरावनी कुत्ती (जैसी) है जो हर समय (जीवों के मन में और-और पदार्थों के लिए भौकती रहती है।और।जीवों के वास्ते आत्मिक मौत का जाल बिखेरे रखती है)। आत्मिक मौत का (ये) जाल गुरू के दिए ज्ञान (आत्मिक जीवन के बारे में सही सूझ) और परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने से काटा जाता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य काम-क्रोध-लोभ (आदि चोरों) से (अपना आत्मिक जीवन) लुटवाते रहते हैं।उनके वास्ते जनम-मरन का चक्कर सदा बना रहता है। हे भाई ! परमात्मा से प्यार डालने पर।गोपाल की भक्ति करने से।हरि-नाम का सिमरन करने से अनेकों जूनियों में भटकन समाप्त हो जाती है। 3। हे भाई ! मित्र।पुत्र।स्त्री।रिश्तेदार (आदि के मोह में फसने से आधि।व्याधि।उपाधि) तीनों ताप मनुष्य (के आत्मिक जीवन) को जलाते रहते हैं। जो मनुष्य परमात्मा के सेवकों को संत जनों को मिल लेता है वह परमात्मा का नाम सदा जप के (अपने सारे) दुख दूर कर लेता है। 4। (हे भाई ! ‘विकराल आसा कूकरी’ के पँजे में फंस के जीव) अनेकों तरीकों से भटकते फिरते हैं (और।दुखी हो के) पुकारते हें।किसी भी तरीके से उनकी (इस ‘बिकराल आसा कूकरी’ से) खलासी नहीं होती। हे नानक ! (कह, मैंने इससे बचने के लिए) बेअंत प्रभू के चरणों की शरण चरणों की ओट पक्की तरह पकड़ ली है। 5। 4। 30।
गूजरी महला 5 घरु 4 दुपदे ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ आराधि स्रीधर सफल मूरति करण कारण जोगु ॥ गुण रमण स्रवण अपार महिमा फिरि न होत बिओगु ॥1॥ मन चरणारबिंद उपास ॥ कलि कलेस मिटंत सिमरणि काटि जमदूत फास ॥1॥ रहाउ ॥ सत्रु दहन हरि नाम कहन अवर कछु न उपाउ ॥ करि अनुग्रहु प्रभू मेरे नानक नाम सुआउ ॥2॥1॥31॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 घरु 4 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मन ! उस लक्ष्मी-पति प्रभू की आराधना किया कर।जिसके स्वरूप का दर्शन जीवन को कामयाब कर देता है।और।जो जगत का समर्थ मूल है। उस बेअंत परमात्मा की महानता के गुण गाने से सुनने से दुबारा कभी उसके चरणों से विछोड़ा नहीं होता। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा के सुंदर कोमल चरणों की उपासना करता रहा कर। (हरि नाम-) सिमरन की बरकति से सारे दुख-कलेश मिट जाते हैं (सिमरन से) आप जमदूतों की मोह की संगलियां काट दे (क्योंकि वही आत्मिक मौत लाती हैं)। 1।रहाउ। हे मन ! परमात्मा का नाम सिमरना ही कामादिक वैरियों को जलाने का वसीला है (इसके बिना इनसे बचने का) और कोई तरीका नहीं। हे नानक ! (कह) हे मेरे प्रभू ! मेहर कर।आपका नाम सिमरना ही मेरे जीवन का मनोरथ बना रहे। 2। 1। 31।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप सारी ही ताकतों का मालिक है।आप शरण आए को सहारा देने वाला है।आप (जीवों के) दुख दूर करने वाला है।और सुख देने वाला है। आपके पवित्र गुण गा-गा के जीवों के दुख दूर हैं जाते हैं।सारे डर-भरम मिट जाते हैं। 1। हे मेरे गोविंद ! आपके बिना मेरा और कोई आसरा नहीं। हे पारब्रहम ! हे स्वामी ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं (सदा) आपका नाम जपता रहूँ। 1।रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य बड़ी किस्मत से गुरू की शरण पड़ कर प्रभू चरणों में जुड़ते हैं।उनकी लगन (परमात्मा के साथ) लग जाती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।