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अंग 501

अंग
501
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धंधा करत बिहानी अउधहि गुण निधि नामु न गाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
कउडी कउडी जोरत कपटे अनिक जुगति करि धाइओ ॥
बिसरत प्रभ केते दुख गनीअहि महा मोहनी खाइओ ॥1॥
करहु अनुग्रहु सुआमी मेरे गनहु न मोहि कमाइओ ॥
गोबिंद दइआल क्रिपाल सुख सागर नानक हरि सरणाइओ ॥2॥16॥25॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (माया की खातिर) दौड़-भाग करते हुए (इसकी) उम्र गुजर जाती है सारे गुणों के खजाने परमात्मा का नाम नहीं जपता। 1।रहाउ। ठॅगी से एक-एक कौड़ी करके माया एकत्र करता रहता है अनेकों ढंग-तरीके बरत के माया की खातिर दौड़ता फिरता है। परमात्मा का नाम भुलाने के कारण इसे अनेकों ही दुख आ घेरते हैं।मन को मोह लेने वाली प्रबल माया इसके आत्मिक जीवन को खा जाती है। 1। हे मेरे मालिक ! मेरे पर मेहर कर।मेरे किए कर्मों की तरफ ध्यान ना करना। हे नानक ! (कह) हे गोबिंद ! हे दयालु ! हे कृपालु ! हे सुखों के समुंद्र ! हे हरी ! मैं आपकी शरण आया हूँ।2। 16। 25।
गूजरी महला 5 ॥
रसना राम राम रवंत ॥
छोडि आन बिउहार मिथिआ भजु सदा भगवंत ॥1॥ रहाउ ॥
नामु एकु अधारु भगता ईत आगै टेक ॥
करि क्रिपा गोबिंद दीआ गुर गिआनु बुधि बिबेक ॥1॥
करण कारण संम्रथ स्रीधर सरणि ता की गही ॥
मुकति जुगति रवाल साधू नानक हरि निधि लही ॥2॥17॥26॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! अपनी जीभ से सदा परमात्मा का नाम सिमरता रह। और झूठे व्यवहारों (के मोह) को छोड़ के सदा भगवान का भजन करा कर। 1।रहाउ। आपका नाम ही भक्तों की जिंदगी का आसरा बन गया है।इसलोक और परलोक में उनको आपका ही सहारा है। हे गोबिंद ! जिन अपने भक्तों को तूने कृपा करके गुरू का ज्ञान बख्शा है।और अच्छे-बुरे की परख कर सकने वाली बुद्धि दी है। 1। उस परमात्मा की शरण ली है जो सारे जगत का मूल है।जो सब ताकतों का मालिक है।जो लक्ष्मी का पति है। हे नानक ! (कह) मायावी बंधनों से निजात पाने का तरीका (सिर्फ) गुरू की चरण-धूड़ है।गुरू की शरण पड़ने वाले ने ही परमात्मा का नाम-खजाना हासिल किया है।2। 17। 26।
गूजरी महला 5 घरु 4 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
छाडि सगल सिआणपा साध सरणी आउ ॥
पारब्रहम परमेसरो प्रभू के गुण गाउ ॥1॥
रे चित चरण कमल अराधि ॥
सरब सूख कलिआण पावहि मिटै सगल उपाधि ॥1॥ रहाउ ॥
मात पिता सुत मीत भाई तिसु बिना नही कोइ ॥
ईत ऊत जीअ नालि संगी सरब रविआ सोइ ॥2॥
कोटि जतन उपाव मिथिआ कछु न आवै कामि ॥
सरणि साधू निरमला गति होइ प्रभ कै नामि ॥3॥
अगम दइआल प्रभू ऊचा सरणि साधू जोगु ॥
तिसु परापति नानका जिसु लिखिआ धुरि संजोगु ॥4॥1॥27॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: चउपदे-चार बंदों वाले शबद। ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे मन ! जीवन-जुगति प्राप्त करने के लिए अपनी) सारी ही समझदारियां छोड़ दे। गुरू का आसरा ले (गुरू की शिक्षा पर चल के) परमेश्वर पारब्रहम प्रभू के गुण गाता रहा कर। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा के सुंदर कोमल चरणों की आराधना किया कर। सारे सुख आनंद हासिल कर लेगा।(सिमरन की बरकति से) हरेक रोग मिट जाता है। 1।रहाउ। हे मन ! माता-पिता-पुत्र-मित्र-भाई।परमात्मा के बिना कोई भी (साथ निभने वाला साथी) नहीं। जो परमात्मा सारी सृष्टि में व्यापक है वही इस लोक और परलोक में जीव के साथ रहने वाला साथी है। 2। (हे मन ! आत्मिक पवित्रता के वास्ते गुरू की शरण के बिना और) करोड़ों ही यतन और उपाय व्यर्थ हैं।(पवित्रता के लिए इनमें से) कोई भी काम नहीं आ सकता। गुरू की शरण पड़ने से ही मनुष्य पवित्र जीवन वाला हो सकता है।परमात्मा के नाम में जुड़ने से ही उच्च आत्मिक अवस्था बन सकती है। 3। हे नानक ! (कह) अपहुँच दयावान परमात्मा सब (व्यक्तियों) से ऊँचा है।गुरमुखों को अपनी शरण में रखने (व उपाधियों-व्याधियों से बचाने) की समर्था वाला है। पर वह परमात्मा उसी मनुष्य को मिल सकता है जिसके माथे पर धुर-दरगाह से मिलाप का संजोग लिखा होता है। 4। 1। 27।
गूजरी महला 5 ॥
आपना गुरु सेवि सद ही रमहु गुण गोबिंद ॥
सासि सासि अराधि हरि हरि लहि जाइ मन की चिंद ॥1॥
मेरे मन जापि प्रभ का नाउ ॥
सूख सहज अनंद पावहि मिली निरमल थाउ ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगि उधारि इहु मनु आठ पहर आराधि ॥
कामु क्रोधु अहंकारु बिनसै मिटै सगल उपाधि ॥2॥
अटल अछेद अभेद सुआमी सरणि ता की आउ ॥
चरण कमल अराधि हिरदै एक सिउ लिव लाउ ॥3॥
पारब्रहमि प्रभि दइआ धारी बखसि लीन॑े आपि ॥
सरब सुख हरि नामु दीआ नानक सो प्रभु जापि ॥4॥2॥28॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! अपने गुरू की शरण पड़ के सदा ही गोविंद के गुण गाता रह। अपनी हरेक सांस के साथ परमात्मा की आराधना करता रह।आपके मन की हरेक चिंता दूर हैं जाएगी। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम जपता रह (सिमरन की बरकति से) सुख।आत्मिक अडोलता। आनंद प्राप्त करेगा।आपको वह जगह मिली रहेगी जो आपको हमेशा स्वच्छ रख सके। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू की संगति में टिक के अपने इस मन को (विकारों से) बचाए रख।आठों पहर परमात्मा की आराधना करता रह। (आपके अंदर से) काम-क्रोध-अहंकार नाश हैं जाएगा।आपका हरेक रोग दूर हैं जाएगा। 2। हे भाई ! उस मालिक प्रभू की शरण में टिका रह जो सदा कायम रहने वाला है जो नाश-रहित है जिसका भेद नहीं पाया जा सकता। हे भाई ! अपने हृदय में प्रभू के सुंदर कोमल चरणों की आराधना किया कर।परमात्मा के चरणों में प्यार डाले रख। 3। हे भाई ! पारब्रहम प्रभू ने जिस मनुष्यों पर मेहर की उनको उसने स्वयं बख्श लिया (उनके पिछले पाप क्षमा कर दिए) उनको उसने सारे सुखों का खजाना अपना हरी-नाम दे दिया। हे नानक ! (कह,हे भाई !) आप भी उस प्रभू का नाम जपा कर। 4। 2। 28।
गूजरी महला 5 ॥
गुर प्रसादी प्रभु धिआइआ गई संका तूटि ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य ने गुरू की कृपा से अपने हृदय में परमात्मा का ध्यान धरा (उसके अंदर से) डावाँडोल स्थिति खतम हो गई।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(माया की खातिर) दौड़-भाग करते हुए (इसकी) उम्र गुजर जाती है सारे गुणों के खजाने परमात्मा का नाम नहीं जपता।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।