कउडी कउडी जोरत कपटे अनिक जुगति करि धाइओ ॥
बिसरत प्रभ केते दुख गनीअहि महा मोहनी खाइओ ॥1॥
करहु अनुग्रहु सुआमी मेरे गनहु न मोहि कमाइओ ॥
गोबिंद दइआल क्रिपाल सुख सागर नानक हरि सरणाइओ ॥2॥16॥25॥
रसना राम राम रवंत ॥
छोडि आन बिउहार मिथिआ भजु सदा भगवंत ॥1॥ रहाउ ॥
नामु एकु अधारु भगता ईत आगै टेक ॥
करि क्रिपा गोबिंद दीआ गुर गिआनु बुधि बिबेक ॥1॥
करण कारण संम्रथ स्रीधर सरणि ता की गही ॥
मुकति जुगति रवाल साधू नानक हरि निधि लही ॥2॥17॥26॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
छाडि सगल सिआणपा साध सरणी आउ ॥
पारब्रहम परमेसरो प्रभू के गुण गाउ ॥1॥
रे चित चरण कमल अराधि ॥
सरब सूख कलिआण पावहि मिटै सगल उपाधि ॥1॥ रहाउ ॥
मात पिता सुत मीत भाई तिसु बिना नही कोइ ॥
ईत ऊत जीअ नालि संगी सरब रविआ सोइ ॥2॥
कोटि जतन उपाव मिथिआ कछु न आवै कामि ॥
सरणि साधू निरमला गति होइ प्रभ कै नामि ॥3॥
अगम दइआल प्रभू ऊचा सरणि साधू जोगु ॥
तिसु परापति नानका जिसु लिखिआ धुरि संजोगु ॥4॥1॥27॥
आपना गुरु सेवि सद ही रमहु गुण गोबिंद ॥
सासि सासि अराधि हरि हरि लहि जाइ मन की चिंद ॥1॥
मेरे मन जापि प्रभ का नाउ ॥
सूख सहज अनंद पावहि मिली निरमल थाउ ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगि उधारि इहु मनु आठ पहर आराधि ॥
कामु क्रोधु अहंकारु बिनसै मिटै सगल उपाधि ॥2॥
अटल अछेद अभेद सुआमी सरणि ता की आउ ॥
चरण कमल अराधि हिरदै एक सिउ लिव लाउ ॥3॥
पारब्रहमि प्रभि दइआ धारी बखसि लीन॑े आपि ॥
सरब सुख हरि नामु दीआ नानक सो प्रभु जापि ॥4॥2॥28॥
गुर प्रसादी प्रभु धिआइआ गई संका तूटि ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(माया की खातिर) दौड़-भाग करते हुए (इसकी) उम्र गुजर जाती है सारे गुणों के खजाने परमात्मा का नाम नहीं जपता।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।