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गूजरी
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करि किरपा अपना दरसु दीजै जसु गावउ निसि अरु भोर ॥
गूजरी महला 5 ॥
करि किरपा अपना दरसु दीजै जसु गावउ निसि अरु भोर ॥
केस संगि दास पग झारउ इहै मनोरथ मोर ॥1॥
ठाकुर तुझ बिनु बीआ न होर ॥
चिति चितवउ हरि रसन अराधउ निरखउ तुमरी ओर ॥1॥ रहाउ ॥
दइआल पुरख सरब के ठाकुर बिनउ करउ कर जोरि ॥
नामु जपै नानकु दासु तुमरो उधरसि आखी फोर ॥2॥11॥20॥
करि किरपा अपना दरसु दीजै जसु गावउ निसि अरु भोर ॥
केस संगि दास पग झारउ इहै मनोरथ मोर ॥1॥
ठाकुर तुझ बिनु बीआ न होर ॥
चिति चितवउ हरि रसन अराधउ निरखउ तुमरी ओर ॥1॥ रहाउ ॥
दइआल पुरख सरब के ठाकुर बिनउ करउ कर जोरि ॥
नामु जपै नानकु दासु तुमरो उधरसि आखी फोर ॥2॥11॥20॥
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे मेरे मालिक ! मेहर कर। मुझे अपना दर्शन दे। मैं दिन-रात आपकी सिफत सालाह के गीत गाता रहूँ। अपने केशों से आपके सेवकों के पैर झाड़ता रहूँ- बस ! यही है मेरे मन की तमन्ना। 1। हे मेरे मालिक ! आपके बिना मेरा और कोई आसरा नहीं। हे हरी ! मैं अपने चित्त में आपको ही याद करता हूँ। जीभ से आपकी ही आराधना करता हूँ। (और सदा सहायता के लिए) आपकी ओर ही ताकता रहता हूँ। 1।रहाउ। हे दया के घर ! हे सर्व-व्यापक ! हे सबके मालिक ! मैं दोनों हाथ जोड़ के आपके आगे विनती करता हूँ (मेहर कर) आपका दास नानक (सदा आपका) नाम जपता रहे। (जो) मनुष्य आपका नाम जपता रहेगा वह (संसार समुंद्र में से) आँख झपकने जितने समय में बच निकलेगा। 2। 11। 20।
ब्रहम लोक अरु रुद्र लोक आई इंद्र लोक ते धाइ ॥
गूजरी महला 5 ॥
ब्रहम लोक अरु रुद्र लोक आई इंद्र लोक ते धाइ ॥
साधसंगति कउ जोहि न साकै मलि मलि धोवै पाइ ॥1॥
अब मोहि आइ परिओ सरनाइ ॥
गुहज पावको बहुतु प्रजारै मो कउ सतिगुरि दीओ है बताइ ॥1॥ रहाउ ॥
सिध साधिक अरु जख्य किंनर नर रही कंठि उरझाइ ॥
जन नानक अंगु कीआ प्रभि करतै जा कै कोटि ऐसी दासाइ ॥2॥12॥21॥
ब्रहम लोक अरु रुद्र लोक आई इंद्र लोक ते धाइ ॥
साधसंगति कउ जोहि न साकै मलि मलि धोवै पाइ ॥1॥
अब मोहि आइ परिओ सरनाइ ॥
गुहज पावको बहुतु प्रजारै मो कउ सतिगुरि दीओ है बताइ ॥1॥ रहाउ ॥
सिध साधिक अरु जख्य किंनर नर रही कंठि उरझाइ ॥
जन नानक अंगु कीआ प्रभि करतै जा कै कोटि ऐसी दासाइ ॥2॥12॥21॥
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ (हे भाई !) माया ब्रहमा, शिव, इन्द्र आदि देवताओं पर भी अपना (प्रभाव डाल के) ब्रहमपुरी, शिवपुरी और इन्द्रपुरी पर हमला करती हुई (सांसारिक जीवों की तरफ) आई है। (पर) साध-संगति की ओर (तो ये माया) ताक भी नहीं सकती। (ये माया सत्संगियों के) पैर मल-मल के धोती है। 1। (हे भाई ! संसार को माया की तृष्णा की आग में जलता देख के) अब मैं (अपने सतिगुरू की) शरण आ पड़ा हूँ। (तृष्णा की) गुझी आग (संसार को) बहुत बुरी तरह जला रही है (इससे बचने के लिए) गुरू ने मुझे (तरीका) बता दिया है। 1।रहाउ। योग-साधना में पहुँचे हुए जोगी। योग-साधन करने वाले साधू। जख, किन्नर। मनुष्य - इन सबके गले में माया चिपकी हुई है। पर- हे नानक ! अपने दासों का पक्ष उस प्रभू ने उस करतार ने किया हुआ है जिसके दर पर इस तरह की (इस माया जैसी) करोड़ों ही दासियां हैं। 2। 12। 21।
अपजसु मिटै होवै जगि कीरति दरगह बैसणु पाईऐ ॥
गूजरी महला 5 ॥
अपजसु मिटै होवै जगि कीरति दरगह बैसणु पाईऐ ॥
जम की त्रास नास होइ खिन महि सुख अनद सेती घरि जाईऐ ॥1॥
जा ते घाल न बिरथी जाईऐ ॥
आठ पहर सिमरहु प्रभु अपना मनि तनि सदा धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि सरनि दीन दुख भंजन तूं देहि सोई प्रभ पाईऐ ॥
चरण कमल नानक रंगि राते हरि दासह पैज रखाईऐ ॥2॥13॥22॥
अपजसु मिटै होवै जगि कीरति दरगह बैसणु पाईऐ ॥
जम की त्रास नास होइ खिन महि सुख अनद सेती घरि जाईऐ ॥1॥
जा ते घाल न बिरथी जाईऐ ॥
आठ पहर सिमरहु प्रभु अपना मनि तनि सदा धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि सरनि दीन दुख भंजन तूं देहि सोई प्रभ पाईऐ ॥
चरण कमल नानक रंगि राते हरि दासह पैज रखाईऐ ॥2॥13॥22॥
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ (हे भाई ! सिमरन की बरकति से मनुष्य की पहली) बदनामी मिट जाती है। जगत में शोभा होने लगती है। और परमात्मा की दरगाह में बैठने के लिए जगह मिल जाती है। (हे भाई ! सिमरन की सहायता से) मौत का सहम एक पल में खत्म हो जाता है। सुख आनंद से प्रभू-चरणों में पहुँच जाते हैं। 1। इसलिए उसकी नाम-सिमरन की सेवा व्यर्थ नहीं जाती। हे भाई ! आठों पहर अपने प्रभू का सिमरन करते रहो। हे भाई ! मन में हृदय में सदा प्रभू का ध्यान करना चाहिए। 1।रहाउ। हे नानक ! (कह) हे दीनों के दुख नाश करने वाले प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। जो कुछ आप खुद देते हैं जीवों को वही कुछ मिल सकता है। आपके दास आपके सुंदर कोमल चरणों के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। आप अपने दासों की इज्जत स्वयं रखते हैं। 2। 13। 22।
बिस्वंभर जीअन को दाता भगति भरे भंडार ॥
गूजरी महला 5 ॥
बिस्वंभर जीअन को दाता भगति भरे भंडार ॥
जा की सेवा निफल न होवत खिन महि करे उधार ॥1॥
मन मेरे चरन कमल संगि राचु ॥
सगल जीअ जा कउ आराधहि ताहू कउ तूं जाचु ॥1॥ रहाउ ॥
नानक सरणि तुम॑ारी करते तूं प्रभ प्रान अधार ॥
होइ सहाई जिसु तूं राखहि तिसु कहा करे संसारु ॥2॥14॥23॥
बिस्वंभर जीअन को दाता भगति भरे भंडार ॥
जा की सेवा निफल न होवत खिन महि करे उधार ॥1॥
मन मेरे चरन कमल संगि राचु ॥
सगल जीअ जा कउ आराधहि ताहू कउ तूं जाचु ॥1॥ रहाउ ॥
नानक सरणि तुम॑ारी करते तूं प्रभ प्रान अधार ॥
होइ सहाई जिसु तूं राखहि तिसु कहा करे संसारु ॥2॥14॥23॥
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे मन ! वह परमात्मा सारे जगत को पालने वाला है। वह सारे जीवों को दातें देने वाला है। उसके खजाने भगती (के धन) से भरे पड़े हैं। उस परमात्मा की की हुई सेवा भक्ति व्यर्थ नहीं जाती। (सेवा-भक्ति करने वाले का) वह एक छिन में (संसार-समुंद्र से) पार-उतारा कर देता है। हे मेरे मन !आप उसके सुंदर कोमल चरणों से प्यार किया करें जिस को (संसार के) सारे जीव आराधते हैं। आप उसके ही दर से माँगा करें। 1।रहाउ। हे नानक ! (कहें) हे करतार ! हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। आप ही मेरी जिंद का आसरा हैं। मददगार बन के जिस मनुष्य की आप रक्षा करते हैं। सारा जगत (भी अगर उसका वैरी बन जाए तो) उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। 2। 14। 23।
जन की पैज सवारी आप ॥
गूजरी महला 5 ॥
जन की पैज सवारी आप ॥
हरि हरि नामु दीओ गुरि अवखधु उतरि गइओ सभु ताप ॥1॥ रहाउ ॥
हरिगोबिंदु रखिओ परमेसरि अपुनी किरपा धारि ॥
मिटी बिआधि सरब सुख होए हरि गुण सदा बीचारि ॥1॥
अंगीकारु कीओ मेरै करतै गुर पूरे की वडिआई ॥
अबिचल नीव धरी गुर नानक नित नित चड़ै सवाई ॥2॥15॥24॥
जन की पैज सवारी आप ॥
हरि हरि नामु दीओ गुरि अवखधु उतरि गइओ सभु ताप ॥1॥ रहाउ ॥
हरिगोबिंदु रखिओ परमेसरि अपुनी किरपा धारि ॥
मिटी बिआधि सरब सुख होए हरि गुण सदा बीचारि ॥1॥
अंगीकारु कीओ मेरै करतै गुर पूरे की वडिआई ॥
अबिचल नीव धरी गुर नानक नित नित चड़ै सवाई ॥2॥15॥24॥
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक की इज्जत स्वयं बढ़ाता है। (परमात्मा का नाम दवा है) गुरू ने जिस मनुष्य को हरि-नाम की दवाई दे दी। उसका हरेक किस्म का ताप (दुख-कलेश) दूर हो गया। 1।रहाउ। (कमजोर-दिल लोग देवी की पूजा को चल पड़ते हैं) पर देखो ! (परमात्मा ने) मेहर करके हरि गोबिंद (जी) को स्वयं (चेचक के ताप से) बचा लिया। परमात्मा के गुणों को मन में टिका के हरेक रोग दूर हो जाता है। सारे सुख ही सुख प्राप्त हो जाते हैं। 1। हे नानक ! (कह) मेरे करतार ने (डोलने से बचा के मुझे) अपने चरणों में जोड़े रखा- यह सारी पूरे गुरू की महानता (के सदका) था। गुरू की रखी हुई हरि-नाम सिमरन की नींव कभी डोलने वाली नहीं। (ये नींव जिस हृदय-धरा पर रखी जाती है। वहाँ) सदा ही बढ़ती जाती है। 2। 15। 24।
कबहू हरि सिउ चीतु न लाइओ ॥
गूजरी महला 5 ॥
कबहू हरि सिउ चीतु न लाइओ ॥
कबहू हरि सिउ चीतु न लाइओ ॥
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ (हे भाई ! माया के मोह में फंसा जीव) कभी अपना मन परमात्मा (के चरनों) से नहीं जोड़ता।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 500 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।