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अंग 500

अंग
500
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गूजरी महला 5 ॥
करि किरपा अपना दरसु दीजै जसु गावउ निसि अरु भोर ॥
केस संगि दास पग झारउ इहै मनोरथ मोर ॥1॥
ठाकुर तुझ बिनु बीआ न होर ॥
चिति चितवउ हरि रसन अराधउ निरखउ तुमरी ओर ॥1॥ रहाउ ॥
दइआल पुरख सरब के ठाकुर बिनउ करउ कर जोरि ॥
नामु जपै नानकु दासु तुमरो उधरसि आखी फोर ॥2॥11॥20॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे मेरे मालिक ! मेहर कर।मुझे अपना दर्शन दे।मैं दिन-रात आपकी सिफत सालाह के गीत गाता रहूँ। अपने केशों से आपके सेवकों के पैर झाड़ता रहूँ- बस ! यही है मेरे मन की तमन्ना। 1। हे मेरे मालिक ! आपके बिना मेरा और कोई आसरा नहीं। हे हरी ! मैं अपने चित्त में आपको ही याद करता हूँ।जीभ से आपकी ही आराधना करता हूँ।(और सदा सहायता के लिए) आपकी ओर ही ताकता रहता हूँ। 1।रहाउ। हे दया के घर ! हे सर्व-व्यापक ! हे सबके मालिक ! मैं दोनों हाथ जोड़ के आपके आगे विनती करता हूँ (मेहर कर) आपका दास नानक (सदा आपका) नाम जपता रहे।(जो) मनुष्य आपका नाम जपता रहेगा वह (संसार समुंद्र में से) आँख झपकने जितने समय में बच निकलेगा। 2। 11। 20।
गूजरी महला 5 ॥
ब्रहम लोक अरु रुद्र लोक आई इंद्र लोक ते धाइ ॥
साधसंगति कउ जोहि न साकै मलि मलि धोवै पाइ ॥1॥
अब मोहि आइ परिओ सरनाइ ॥
गुहज पावको बहुतु प्रजारै मो कउ सतिगुरि दीओ है बताइ ॥1॥ रहाउ ॥
सिध साधिक अरु जख्य किंनर नर रही कंठि उरझाइ ॥
जन नानक अंगु कीआ प्रभि करतै जा कै कोटि ऐसी दासाइ ॥2॥12॥21॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ (हे भाई !) माया ब्रहमा।शिव।इन्द्र आदि देवताओं पर भी अपना (प्रभाव डाल के) ब्रहमपुरी।शिवपुरी और इन्द्रपुरी पर हमला करती हुई (सांसारिक जीवों की तरफ) आई है। (पर) साध-संगति की ओर (तो ये माया) ताक भी नहीं सकती।(ये माया सत्संगियों के) पैर मल-मल के धोती है। 1। (हे भाई ! संसार को माया की तृष्णा की आग में जलता देख के) अब मैं (अपने सतिगुरू की) शरण आ पड़ा हूँ। (तृष्णा की) गुझी आग (संसार को) बहुत बुरी तरह जला रही है (इससे बचने के लिए) गुरू ने मुझे (तरीका) बता दिया है। 1।रहाउ। योग-साधना में पहुँचे हुए जोगी।योग-साधन करने वाले साधू।जख।किन्नर।मनुष्य – इन सबके गले में माया चिपकी हुई है।पर- हे नानक ! अपने दासों का पक्ष उस प्रभू ने उस करतार ने किया हुआ है जिसके दर पर इस तरह की (इस माया जैसी) करोड़ों ही दासियां हैं। 2। 12। 21।
गूजरी महला 5 ॥
अपजसु मिटै होवै जगि कीरति दरगह बैसणु पाईऐ ॥
जम की त्रास नास होइ खिन महि सुख अनद सेती घरि जाईऐ ॥1॥
जा ते घाल न बिरथी जाईऐ ॥
आठ पहर सिमरहु प्रभु अपना मनि तनि सदा धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि सरनि दीन दुख भंजन तूं देहि सोई प्रभ पाईऐ ॥
चरण कमल नानक रंगि राते हरि दासह पैज रखाईऐ ॥2॥13॥22॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ (हे भाई ! सिमरन की बरकति से मनुष्य की पहली) बदनामी मिट जाती है।जगत में शोभा होने लगती है।और परमात्मा की दरगाह में बैठने के लिए जगह मिल जाती है। (हे भाई ! सिमरन की सहायता से) मौत का सहम एक पल में खत्म हो जाता है।सुख आनंद से प्रभू-चरणों में पहुँच जाते हैं। 1। इसलिए उसकी नाम-सिमरन की सेवा व्यर्थ नहीं जाती। हे भाई ! आठों पहर अपने प्रभू का सिमरन करते रहो।हे भाई ! मन में हृदय में सदा प्रभू का ध्यान करना चाहिए। 1।रहाउ। हे नानक ! (कह) हे दीनों के दुख नाश करने वाले प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ।जो कुछ आप खुद देता है जीवों को वही कुछ मिल सकता है। आपके दास आपके सुंदर कोमल चरणों के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं।आप अपने दासों की इज्जत स्वयं रखता है। 2। 13। 22।
गूजरी महला 5 ॥
बिस्वंभर जीअन को दाता भगति भरे भंडार ॥
जा की सेवा निफल न होवत खिन महि करे उधार ॥1॥
मन मेरे चरन कमल संगि राचु ॥
सगल जीअ जा कउ आराधहि ताहू कउ तूं जाचु ॥1॥ रहाउ ॥
नानक सरणि तुम॑ारी करते तूं प्रभ प्रान अधार ॥
होइ सहाई जिसु तूं राखहि तिसु कहा करे संसारु ॥2॥14॥23॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे मन ! वह परमात्मा सारे जगत को पालने वाला है।वह सारे जीवों को दातें देने वाला है।उसके खजाने भगती (के धन) से भरे पड़े हैं। उस परमात्मा की की हुई सेवा भक्ति व्यर्थ नहीं जाती।(सेवा-भक्ति करने वाले का) वह एक छिन में (संसार-समुंद्र से) पार-उतारा कर देता है। हे मेरे मन !आप उस सुंदर कोमल चरणों से प्यार किया कर जिस को (संसार के) सारे जीव आराधते हैं।आप उसके ही दर से मांगा कर। 1।रहाउ। हे नानक ! (कह) हे करतार ! हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ।आप ही मेरी जिंद का आसरा है। मददगार बन के जिस मनुष्य की आप रक्षा करता है।सारा जगत (भी अगर उसका वैरी बन जाए तो) उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। 2। 14। 23।
गूजरी महला 5 ॥
जन की पैज सवारी आप ॥
हरि हरि नामु दीओ गुरि अवखधु उतरि गइओ सभु ताप ॥1॥ रहाउ ॥
हरिगोबिंदु रखिओ परमेसरि अपुनी किरपा धारि ॥
मिटी बिआधि सरब सुख होए हरि गुण सदा बीचारि ॥1॥
अंगीकारु कीओ मेरै करतै गुर पूरे की वडिआई ॥
अबिचल नीव धरी गुर नानक नित नित चड़ै सवाई ॥2॥15॥24॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक की इज्जत स्वयं बढ़ाता है। (परमात्मा का नाम दवा है) गुरू ने जिस मनुष्य को हरि-नाम की दवाई दे दी।उसका हरेक किस्म का ताप (दुख-कलेश) दूर हो गया। 1।रहाउ। (कमजोर-दिल लोग देवी की पूजा को चल पड़ते हैं) पर देखो ! (परमात्मा ने) मेहर करके हरि गोबिंद (जी) को स्वयं (चेचक के ताप से) बचा लिया। परमात्मा के गुणों को मन में टिका के हरेक रोग दूर हो जाता है।सारे सुख ही सुख प्राप्त हो जाते हैं। 1। हे नानक ! (कह) मेरे करतार ने (डोलने से बचा के मुझे) अपने चरणों में जोड़े रखा- यह सारी पूरे गुरू की महानता (के सदका) था। गुरू की रखी हुई हरि-नाम सिमरन की नींव कभी डोलने वाली नहीं।(ये नींव जिस हृदय-धरा पर रखी जाती है।वहाँ) सदा ही बढ़ती जाती है। 2। 15। 24।
गूजरी महला 5 ॥
कबहू हरि सिउ चीतु न लाइओ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ (हे भाई ! माया के मोह में फंसा जीव) कभी अपना मन परमात्मा (के चरनों) से नहीं जोड़ता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गूजरी महला 5 ॥ हे मेरे मालिक ! मेहर कर।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।