करि किरपा अपना दरसु दीजै जसु गावउ निसि अरु भोर ॥
केस संगि दास पग झारउ इहै मनोरथ मोर ॥1॥
ठाकुर तुझ बिनु बीआ न होर ॥
चिति चितवउ हरि रसन अराधउ निरखउ तुमरी ओर ॥1॥ रहाउ ॥
दइआल पुरख सरब के ठाकुर बिनउ करउ कर जोरि ॥
नामु जपै नानकु दासु तुमरो उधरसि आखी फोर ॥2॥11॥20॥
ब्रहम लोक अरु रुद्र लोक आई इंद्र लोक ते धाइ ॥
साधसंगति कउ जोहि न साकै मलि मलि धोवै पाइ ॥1॥
अब मोहि आइ परिओ सरनाइ ॥
गुहज पावको बहुतु प्रजारै मो कउ सतिगुरि दीओ है बताइ ॥1॥ रहाउ ॥
सिध साधिक अरु जख्य किंनर नर रही कंठि उरझाइ ॥
जन नानक अंगु कीआ प्रभि करतै जा कै कोटि ऐसी दासाइ ॥2॥12॥21॥
अपजसु मिटै होवै जगि कीरति दरगह बैसणु पाईऐ ॥
जम की त्रास नास होइ खिन महि सुख अनद सेती घरि जाईऐ ॥1॥
जा ते घाल न बिरथी जाईऐ ॥
आठ पहर सिमरहु प्रभु अपना मनि तनि सदा धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि सरनि दीन दुख भंजन तूं देहि सोई प्रभ पाईऐ ॥
चरण कमल नानक रंगि राते हरि दासह पैज रखाईऐ ॥2॥13॥22॥
बिस्वंभर जीअन को दाता भगति भरे भंडार ॥
जा की सेवा निफल न होवत खिन महि करे उधार ॥1॥
मन मेरे चरन कमल संगि राचु ॥
सगल जीअ जा कउ आराधहि ताहू कउ तूं जाचु ॥1॥ रहाउ ॥
नानक सरणि तुम॑ारी करते तूं प्रभ प्रान अधार ॥
होइ सहाई जिसु तूं राखहि तिसु कहा करे संसारु ॥2॥14॥23॥
जन की पैज सवारी आप ॥
हरि हरि नामु दीओ गुरि अवखधु उतरि गइओ सभु ताप ॥1॥ रहाउ ॥
हरिगोबिंदु रखिओ परमेसरि अपुनी किरपा धारि ॥
मिटी बिआधि सरब सुख होए हरि गुण सदा बीचारि ॥1॥
अंगीकारु कीओ मेरै करतै गुर पूरे की वडिआई ॥
अबिचल नीव धरी गुर नानक नित नित चड़ै सवाई ॥2॥15॥24॥
कबहू हरि सिउ चीतु न लाइओ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गूजरी महला 5 ॥ हे मेरे मालिक ! मेहर कर।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।