अवरु न जानसि कोऊ मरमा गुर किरपा ते लही ॥1॥ रहाउ ॥
जीति जीति जीते सभि थाना सगल भवन लपटही ॥
कहु नानक साध ते भागी होइ चेरी चरन गही ॥2॥5॥14॥
दुइ कर जोड़ि करी बेनंती ठाकुरु अपना धिआइआ ॥
हाथ देइ राखे परमेसरि सगला दुरतु मिटाइआ ॥1॥
ठाकुर होए आपि दइआल ॥
भई कलिआण आनंद रूप हुई है उबरे बाल गुपाल ॥1॥ रहाउ ॥
मिलि वर नारी मंगलु गाइआ ठाकुर का जैकारु ॥
कहु नानक तिसु गुर बलिहारी जिनि सभ का कीआ उधारु ॥2॥6॥15॥
मात पिता भाई सुत बंधप तिन का बलु है थोरा ॥
अनिक रंग माइआ के पेखे किछु साथि न चालै भोरा ॥1॥
ठाकुर तुझ बिनु आहि न मोरा ॥
मोहि अनाथ निरगुन गुणु नाही मै आहिओ तुम॑रा धोरा ॥1॥ रहाउ ॥
बलि बलि बलि बलि चरण तुम॑ारे ईहा ऊहा तुम॑ारा जोरा ॥
साधसंगि नानक दरसु पाइओ बिनसिओ सगल निहोरा ॥2॥7॥16॥
आल जाल भ्रम मोह तजावै प्रभ सेती रंगु लाई ॥
मन कउ इह उपदेसु द्रिड़ावै सहजि सहजि गुण गाई ॥1॥
साजन ऐसो संतु सहाई ॥
जिसु भेटे तूटहि माइआ बंध बिसरि न कबहूं जाई ॥1॥ रहाउ ॥
करत करत अनिक बहु भाती नीकी इह ठहराई ॥
मिलि साधू हरि जसु गावै नानक भवजलु पारि पराई ॥2॥8॥17॥
खिन महि थापि उथापनहारा कीमति जाइ न करी ॥
राजा रंकु करै खिन भीतरि नीचह जोति धरी ॥1॥
धिआईऐ अपनो सदा हरी ॥
सोच अंदेसा ता का कहा करीऐ जा महि एक घरी ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑री टेक पूरे मेरे सतिगुर मन सरनि तुम॑ारै परी ॥
अचेत इआने बारिक नानक हम तुम राखहु धारि करी ॥2॥9॥18॥
तूं दाता जीआ सभना का बसहु मेरे मन माही ॥
चरण कमल रिद माहि समाए तह भरमु अंधेरा नाही ॥1॥
ठाकुर जा सिमरा तूं ताही ॥
करि किरपा सरब प्रतिपालक प्रभ कउ सदा सलाही ॥1॥ रहाउ ॥
सासि सासि तेरा नामु समारउ तुम ही कउ प्रभ आही ॥
नानक टेक भई करते की होर आस बिडाणी लाही ॥2॥10॥19॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! प्रबल माया सारी धरती पर अपना जोर डाल रही है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।