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अंग 499

अंग
499
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बलवंति बिआपि रही सभ मही ॥
अवरु न जानसि कोऊ मरमा गुर किरपा ते लही ॥1॥ रहाउ ॥
जीति जीति जीते सभि थाना सगल भवन लपटही ॥
कहु नानक साध ते भागी होइ चेरी चरन गही ॥2॥5॥14॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! प्रबल माया सारी धरती पर अपना जोर डाल रही है। कोई और मनुष्य (इससे बचने का) भेद नहीं जानता।(ये भेद) गुरू की कृपा से मिलता है। 1।रहाउ। हे भाई ! यह प्रबल माया सदा ही हर जगह जीतती आ रही है।यह सारे भवनों (के जीवों) को चिपकी हुई है। हे नानक ! कह,यह प्रबल माया गुरू से दूर भागी है।(गुरू की) दासी बन के (गुरू के) चरण पकड़ती है। 2। 5। 14।
गूजरी महला 5 ॥
दुइ कर जोड़ि करी बेनंती ठाकुरु अपना धिआइआ ॥
हाथ देइ राखे परमेसरि सगला दुरतु मिटाइआ ॥1॥
ठाकुर होए आपि दइआल ॥
भई कलिआण आनंद रूप हुई है उबरे बाल गुपाल ॥1॥ रहाउ ॥
मिलि वर नारी मंगलु गाइआ ठाकुर का जैकारु ॥
कहु नानक तिसु गुर बलिहारी जिनि सभ का कीआ उधारु ॥2॥6॥15॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! मैं (मालिक प्रभू के आगे) दोनों हाथ जोड़ के आरजू करता रहता हूँ। उस मालिक परमेश्वर प्रभू ने हमारी हाथ दे के रक्षा की है और सारे कष्ट और पाप निर्वित कर दिए हैं। ॥ 1॥ हे भाई ! जिन जीवों पर प्रभू जी खुद दयावान होते हैं उनके अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो जाता है। गोपाल-प्रभू के (दर से आए हुए वह जीव-) बच्चे (संसार समुंद्र में डूबने से) बच गए (प्रभू के दयाल होने से) आनंद-भरपूर हो जाते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! प्रभू-पति को मिल के मेरी ज्ञानेन्द्रियों ने प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाने आरम्भ कर दिए हैं। हे नानक ! कह, (ये सारी बरकति गुरू की ही है) मैं उस गुरू से कुर्बान जाता हूँ जिसने (शरण आए) सब जीवों का पार उतारा कर दिया है। 2। 6। 15
गूजरी महला 5 ॥
मात पिता भाई सुत बंधप तिन का बलु है थोरा ॥
अनिक रंग माइआ के पेखे किछु साथि न चालै भोरा ॥1॥
ठाकुर तुझ बिनु आहि न मोरा ॥
मोहि अनाथ निरगुन गुणु नाही मै आहिओ तुम॑रा धोरा ॥1॥ रहाउ ॥
बलि बलि बलि बलि चरण तुम॑ारे ईहा ऊहा तुम॑ारा जोरा ॥
साधसंगि नानक दरसु पाइओ बिनसिओ सगल निहोरा ॥2॥7॥16॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! माता।पिता।भाई।पुत्र।रिश्तेदार- इनका आसरा कमजोर आसरा है। मैंने माया के भी अनेकों रंग-तमाशे देख लिए हैं (इनमें से भी) कुछ भी थोड़ा सा भी (जीव के) साथ नहीं जाता। 1। हे मालिक प्रभू ! आपके बिना मेरा (और कोई आसरा) नहीं। मैं निआसरे गुण-हीन में कोई गुण नहीं।मैंने आपका ही आसरा देखा है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मैं आपके चरणों से कुर्बान कुर्बान कुर्बान जाता हूँ।इस लोक में और परलोक में मुझे आपका ही सहारा है। हे नानक ! (कह, जिस मनुष्य ने) साध-संगति में टिक के प्रभू के दर्शन कर लिए।उसकी मुथाजगी खत्म हो गई। 2। 7। 16।
गूजरी महला 5 ॥
आल जाल भ्रम मोह तजावै प्रभ सेती रंगु लाई ॥
मन कउ इह उपदेसु द्रिड़ावै सहजि सहजि गुण गाई ॥1॥
साजन ऐसो संतु सहाई ॥
जिसु भेटे तूटहि माइआ बंध बिसरि न कबहूं जाई ॥1॥ रहाउ ॥
करत करत अनिक बहु भाती नीकी इह ठहराई ॥
मिलि साधू हरि जसु गावै नानक भवजलु पारि पराई ॥2॥8॥17॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे मित्र ! (गुरू शरण आए मनुष्य से) घर के जंजाल।भटकना व मोह छुड़वा देता है।और परमात्मा के साथ उसका प्यार बना देता है। (शरण आए मनुष्य के) मन को ये शिक्षा पक्की कर देता है कि सदा आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के गुण गाता रह। 1। हे मित्र ! गुरू ऐसा मददगार है कि जिस मनुष्य को (गुरू) मिल जाता है। उसके माया के बंधन टूट जाते हैं।उसको परमात्मा कभी नहीं भूलता। 1।रहाउ। हे नानक ! (कह) अनेकों।और कई किस्म की सोचें-विचारें करते-करते आखिर मैंने दिल में ये निश्चय टिका लिया है कि जो मनुष्य गुरू को मिल के परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता रहता है वह संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। 2। 8। 17।
गूजरी महला 5 ॥
खिन महि थापि उथापनहारा कीमति जाइ न करी ॥
राजा रंकु करै खिन भीतरि नीचह जोति धरी ॥1॥
धिआईऐ अपनो सदा हरी ॥
सोच अंदेसा ता का कहा करीऐ जा महि एक घरी ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑री टेक पूरे मेरे सतिगुर मन सरनि तुम॑ारै परी ॥
अचेत इआने बारिक नानक हम तुम राखहु धारि करी ॥2॥9॥18॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा (संसारिक पदार्थों को) छिन में पैदा करके छिन में विनाश कर देने की समर्था रखने वाला है।उस परमात्मा के बराबर की कद्र वाला और कोई कहा नहीं जा सकता। परमात्मा राजे को एक छिन में कंगाल बना देता है और नीच कहलवाने वाले के अंदर अपनी ज्योति का प्रकाश कर देता है (जिस करके वह राजाओं वाला आदर-मान प्राप्त कर लेता है)। 1। हे भाई ! अपने सदा कायम रहने वाले परमात्मा का ही ध्यान धरे रखना चाहिए। (संसार की) उस चीज का क्या चिंता-फिक्र करना हुआ।जो जल्दी ही नाश हो जाने वाली है। 1।रहाउ। हे नानक ! (कह) हे मेरे सतिगुरू-प्रभू ! मुझे आपका ही आसरा है।मेरा मन आपकी शरण आ पड़ा है। हे प्रभू ! हम आपके बेसमझ अंजान बच्चे हैं।आप अपना हाथ (हमारे सिर पर) रख के (हमें संसारिक पदार्थों के मोह से) बचा ले। 2। 9। 19।
गूजरी महला 5 ॥
तूं दाता जीआ सभना का बसहु मेरे मन माही ॥
चरण कमल रिद माहि समाए तह भरमु अंधेरा नाही ॥1॥
ठाकुर जा सिमरा तूं ताही ॥
करि किरपा सरब प्रतिपालक प्रभ कउ सदा सलाही ॥1॥ रहाउ ॥
सासि सासि तेरा नामु समारउ तुम ही कउ प्रभ आही ॥
नानक टेक भई करते की होर आस बिडाणी लाही ॥2॥10॥19॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप सारे जीवों को दातें देने वाला है (मेहर कर) मेरे मन में (सदा) बसा रह। (हे प्रभू !) आपके सुंदर कोमल चरण जिस हृदय में टिके रहते हैं।उसमें भटकना नहीं रहती।उसमें माया के मोह का अंधकार नहीं रहता। 1। हे मेरे मालिक ! मैं जब (जहाँ) आपको याद करता हूँ वहीं आप (आ पहुँचता है)। हे सब जीवों की पालना करने वाले ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं सदा आपकी ही सिफत सालाह करता रहूँ। 1।रहाउ। हे प्रभू ! (मेहर कर) मैं हरेक सांस से आपका नाम (अपने हृदय में) संभाल के रखूँ।मैं सदा आपके ही मिलाप की तमन्ना करता रहूँ। हे नानक ! (कह, हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में) करतार का सहारा बन गया।उसने और बेगानी आस दूर कर दी। 2। 10। 19।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! प्रबल माया सारी धरती पर अपना जोर डाल रही है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।