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अंग 498

अंग
498
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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आठ पहर हरि के गुन गावै भगति प्रेम रसि माता ॥
हरख सोग दुहु माहि निराला करणैहारु पछाता ॥2॥
जिस का सा तिन ही रखि लीआ सगल जुगति बणि आई ॥
कहु नानक प्रभ पुरख दइआला कीमति कहणु न जाई ॥3॥1॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू जी दयावान होते हैं।वह) परमात्मा की भक्ति और प्यार के स्वाद में मस्त हो के आठों पहर परमात्मा के गुण गाता रहता है। (इस तरह) वह खुशी और ग़मी दोनों से निर्लिप रहता है।वह सदा सृजनहार-प्रभू के साथ सांझ डाले रखता है। 2। (हे भाई ! प्रभू की दया से) जो मनुष्य उस प्रभू का ही सेवक बन जाता है।वह प्रभू ही उसको माया के बंधनों से बचा लेता है।उस मनुष्य की सारी जीवन-मर्यादा सदाचारी बन जाती है। हे नानक ! कह, सर्व-व्यापक प्रभू जी (अपने सेवकों पर सदैव) दयावान रहते हैं।प्रभू की दयालता का मूल्य नहीं बताया जा सकता। 3। 1। 9।
गूजरी महला 5 दुपदे घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पतित पवित्र लीए करि अपुने सगल करत नमसकारो ॥
बरनु जाति कोऊ पूछै नाही बाछहि चरन रवारो ॥1॥
ठाकुर ऐसो नामु तुम॑ारो ॥
सगल स्रिसटि को धणी कहीजै जन को अंगु निरारो ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगि नानक बुधि पाई हरि कीरतनु आधारो ॥
नामदेउ त्रिलोचनु कबीर दासरो मुकति भइओ चंमिआरो ॥2॥1॥10॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 दुपदे घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! विकारों में गिरे हुए जिन लोगों को पवित्र करके परमात्मा अपने (दास) बना लेता है।सारी दुनिया उनके आगे सिर झुकाती है। कोई नहीं पूछता उनका वर्ण कौन सा है उनकी जाति क्या है।सब लोग उनके चरणों की धूड़ मांगते हैं। 1। हे मालिक प्रभू ! आप अपने येवक का अनोखा ही पक्ष करता है। आपका नाम आश्चर्यजनक शक्ति वाला है (आपके नाम की बरकति से आपका सेवक) सारी दुनिया का मालिक कहलवाने लग पड़ता है। 1।रहाउ। हे नानक ! जो मनुष्य साध-संगति में आ के (सद्) बुद्धि प्राप्त कर लेता है।परमात्मा की सिफत सालाह उसकी जिंदगी का आसरा बन जाती है। (सिफत-सालाह की बरकति से ही) नामदेव।त्रिलोचन।कबीर।रविदास चमार- हरेक ने (माया के बंधनों से) निजात प्राप्त कर ली। 2। 1। 10।
गूजरी महला 5 ॥
है नाही कोऊ बूझनहारो जानै कवनु भता ॥
सिव बिरंचि अरु सगल मोनि जन गहि न सकाहि गता ॥1॥
प्रभ की अगम अगाधि कथा ॥
सुनीऐ अवर अवर बिधि बुझीऐ बकन कथन रहता ॥1॥ रहाउ ॥
आपे भगता आपि सुआमी आपन संगि रता ॥
नानक को प्रभु पूरि रहिओ है पेखिओ जत्र कता ॥2॥2॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 हे भाई ! कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है जो परमात्मा के सही रूप को समझने की ताकत रखता हैं।कौन जान सकता है कि वह कैसा है। शिव। ब्रहमा और सारे ऋषी मुनी भी उस परमात्मा के स्वरूप को नहीं समझ सकते। 1। हे भाई ! परमात्मा कैसा है, इस बात की समझ मनुष्य (की समझ) से परे है (मनुष्यी समझ के लिए) बहुत गहरी है। (उसके स्वरूप के बारे में लोगों से) सुनते कुछ और हैं।और समझते किसी और तरह हैं।क्योंकि (उसका स्वरूप) बताने से बयान करने से बाहर है। 1।रहाउ ॥ हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही (अपना) भक्त है।खुद ही मालिक हैं।खुद ही अपने आप में मस्त है (क्योंकि। हे भाई !) नानक का परमात्मा सारे संसार में व्यापक है।(नानक ने) उसको हर जगह देखा है। 2। 2। 11।
गूजरी महला 5 ॥
मता मसूरति अवर सिआनप जन कउ कछू न आइओ ॥
जह जह अउसरु आइ बनिओ है तहा तहा हरि धिआइओ ॥1॥
प्रभ को भगति वछलु बिरदाइओ ॥
करे प्रतिपाल बारिक की निआई जन कउ लाड लडाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जप तप संजम करम धरम हरि कीरतनु जनि गाइओ ॥
सरनि परिओ नानक ठाकुर की अभै दानु सुखु पाइओ ॥2॥3॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के सेवक को कोई सलाह मश्वरा।कोई समझदारी वाली बात- यह सब कुछ भी नहीं जरूरत। जहाँ-जहाँ (कोई मुश्किल) आ बनती है।वहाँ वहाँ (परमात्मा का सेवक) परमात्मा का ही ध्यान धरता है। 1। हे भाई ! परमात्मा का मूल-कदीमी स्वभाव है कि वह भगती (करने वालों) का प्यारा है। वह (सबकी) बच्चों की तरह पालना करता है।और अपने सेवक को लाड लडाता है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के सेवक ने (सदा) परमात्मा के सिफत-सालाह का ही गीत गाया है।(सेवक के लिए ये सिफत सालाह ही) जप-तप है।संजम है।और (निहित) धार्मिक कर्म है। हे नानक ! परमात्मा का सेवक परमात्मा की ही शरण पड़ा रहता है।(प्रभू के दर से ही वह) निडरता की दाति प्राप्त करता है।आत्मिक आनंद हासिल करता है। 2। 3। 12।
गूजरी महला 5 ॥
दिनु राती आराधहु पिआरो निमख न कीजै ढीला ॥
संत सेवा करि भावनी लाईऐ तिआगि मानु हाठीला ॥1॥
मोहनु प्रान मान रागीला ॥
बासि रहिओ हीअरे कै संगे पेखि मोहिओ मनु लीला ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु सिमरत मनि होत अनंदा उतरै मनहु जंगीला ॥
मिलबे की महिमा बरनि न साकउ नानक परै परीला ॥2॥4॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! उस प्यारे हरी को हर समय दिन-रात सिमरते रहा करो।आँख झपकने जितने समय के लिए भी (इस काम में) ढील नहीं करनी चाहिए। (हे भाई ! अपने मन में से) अहंकार और हॅठ त्याग के।गुरू की बताई हुई सेवा करके (परमात्मा के चरणों में) श्रद्धा बनानी चाहिए। 1। हे भाई ! सुंदर हरी सदा खुश स्वभाव वाला है।मेरे प्राणों का माण है। वह सुंदर हरी (सदा) मेरे हृदय के साथ बस रहा है।मेरा मन उसके करिश्में देख-देख के मस्त हो रहा है। 1।रहाउ। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जिस परमात्मा का सिमरन करने से मन में आनंद पैदा होता है।और मन में से (विकारों की) मैल उतर जाती है। उसके चरणों में जुड़ने की महानता मैं बयान नहीं कर सकता।महानता परे से परे है (परला छोर नहीं ढूँढ सकता)। 2। 4। 13।
गूजरी महला 5 ॥
मुनि जोगी सासत्रगि कहावत सभ कीन॑े बसि अपनही ॥
तीनि देव अरु कोड़ि तेतीसा तिन की हैरति कछु न रही ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ कोई अपने आप को मुनि कहलवाते हैं।कोई शास्त्र-वेत्ता कहलवाते हैं,इन सभी को प्रबल माया ने अपने वश में किया हुआ है। (ब्रहमा-विष्णु-शिव ये बड़े) तीन देवते और (बाकी के) तैंतीस करोड़ देवते- (माया का इतना बल देख के) इन सब की हैरानगी की कोई सीमा ना रह गई। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू जी दयावान होते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।