हरख सोग दुहु माहि निराला करणैहारु पछाता ॥2॥
जिस का सा तिन ही रखि लीआ सगल जुगति बणि आई ॥
कहु नानक प्रभ पुरख दइआला कीमति कहणु न जाई ॥3॥1॥9॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पतित पवित्र लीए करि अपुने सगल करत नमसकारो ॥
बरनु जाति कोऊ पूछै नाही बाछहि चरन रवारो ॥1॥
ठाकुर ऐसो नामु तुम॑ारो ॥
सगल स्रिसटि को धणी कहीजै जन को अंगु निरारो ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगि नानक बुधि पाई हरि कीरतनु आधारो ॥
नामदेउ त्रिलोचनु कबीर दासरो मुकति भइओ चंमिआरो ॥2॥1॥10॥
है नाही कोऊ बूझनहारो जानै कवनु भता ॥
सिव बिरंचि अरु सगल मोनि जन गहि न सकाहि गता ॥1॥
प्रभ की अगम अगाधि कथा ॥
सुनीऐ अवर अवर बिधि बुझीऐ बकन कथन रहता ॥1॥ रहाउ ॥
आपे भगता आपि सुआमी आपन संगि रता ॥
नानक को प्रभु पूरि रहिओ है पेखिओ जत्र कता ॥2॥2॥11॥
मता मसूरति अवर सिआनप जन कउ कछू न आइओ ॥
जह जह अउसरु आइ बनिओ है तहा तहा हरि धिआइओ ॥1॥
प्रभ को भगति वछलु बिरदाइओ ॥
करे प्रतिपाल बारिक की निआई जन कउ लाड लडाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जप तप संजम करम धरम हरि कीरतनु जनि गाइओ ॥
सरनि परिओ नानक ठाकुर की अभै दानु सुखु पाइओ ॥2॥3॥12॥
दिनु राती आराधहु पिआरो निमख न कीजै ढीला ॥
संत सेवा करि भावनी लाईऐ तिआगि मानु हाठीला ॥1॥
मोहनु प्रान मान रागीला ॥
बासि रहिओ हीअरे कै संगे पेखि मोहिओ मनु लीला ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु सिमरत मनि होत अनंदा उतरै मनहु जंगीला ॥
मिलबे की महिमा बरनि न साकउ नानक परै परीला ॥2॥4॥13॥
मुनि जोगी सासत्रगि कहावत सभ कीन॑े बसि अपनही ॥
तीनि देव अरु कोड़ि तेतीसा तिन की हैरति कछु न रही ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू जी दयावान होते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।