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अंग 497

अंग
497
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कलि कलेस मिटे खिन भीतरि नानक सहजि समाइआ ॥4॥5॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: एक छिन में उसके अंदर से दुख-कलेश मिट जाते हैं।वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 4। 5। 6।
गूजरी महला 5 ॥
जिसु मानुख पहि करउ बेनती सो अपनै दुखि भरिआ ॥
पारब्रहमु जिनि रिदै अराधिआ तिनि भउ सागरु तरिआ ॥1॥
गुर हरि बिनु को न ब्रिथा दुखु काटै ॥
प्रभु तजि अवर सेवकु जे होई है तितु मानु महतु जसु घाटै ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ के सनबंध सैन साक कित ही कामि न आइआ ॥
हरि का दासु नीच कुलु ऊचा तिसु संगि मन बांछत फल पाइआ ॥2॥
लाख कोटि बिखिआ के बिंजन ता महि त्रिसन न बूझी ॥
सिमरत नामु कोटि उजीआरा बसतु अगोचर सूझी ॥3॥
फिरत फिरत तुम॑रै दुआरि आइआ भै भंजन हरि राइआ ॥
साध के चरन धूरि जनु बाछै सुखु नानक इहु पाइआ ॥4॥6॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! मैं जिस भी मनुष्य के पास (अपने दुख की) बात करता हूँ।वह (पहले ही) अपने दुख से भरा हुआ दिखता है (वह मेरा दुख क्या निर्वित करे।)। हे भाई ! जिस मनुष्य ने अपने हृदय में परमात्मा को आराधा है।उस ने ही ये डर (-भरा संसार-) समुंद्र पार किया है। 1। हे भाई ! गुरू के बिना परमात्मा के बिना कोई और (किसी का) दुख-दर्द नहीं काट सकता। परमात्मा (का विभाग) छोड़ के अगर किसी और के सेवक बनें तो इस काम में इज्जत वडिआई और शोभा कम हो जाती है। 1।रहाउ। हे भाई ! माया के कारण बने हुए ये साक-सज्जन-रिश्तेदार (दुखों की निर्वित्ती के लिए) कोई भी काम नहीं आ सकते। परमात्मा का भगत अगर नीच कुल का भी हो।उसको श्रेष्ठ जानो।उसकी संगति में रहने से मन-इच्छित फल हासिल कर लेते हैं। 2। हे भाई ! अगर माया के लाखों-करोड़ों स्वादिष्ट व्यंजन हों।उनमें लगने (खाने की) तृष्णा नहीं खत्म होती। परमात्मा का नाम सिमरने से (अंदर।जैसे) करोड़ों (सूरजों का) प्रकाश हो जाता है।और अंदर वह कीमती पदार्थ दिखाई दे जाता है जिस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। 3। हे नानक ! (कह) हे प्रभू पातशाह ! हे जीवों के सारे डर नाश करने वाले हरी ! जो मनुष्य भटकता-भटकता (आखिर) आपके दर पर आ पहुँचता है वह (आपके दर से) गुरू के चरणों की धूड़ मांगता है।(और आपके दर से) ये सुख प्राप्त करता है। 4। 6। 7।
गूजरी महला 5 पंचपदा घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रथमे गरभ माता कै वासा ऊहा छोडि धरनि महि आइआ ॥
चित्र साल सुंदर बाग मंदर संगि न कछहू जाइआ ॥1॥
अवर सभ मिथिआ लोभ लबी ॥
गुरि पूरै दीओ हरि नामा जीअ कउ एहा वसतु फबी ॥1॥ रहाउ ॥
इसट मीत बंधप सुत भाई संगि बनिता रचि हसिआ ॥
जब अंती अउसरु आइ बनिओ है उन॑ पेखत ही कालि ग्रसिआ ॥2॥
करि करि अनरथ बिहाझी संपै सुइना रूपा दामा ॥
भाड़ी कउ ओहु भाड़ा मिलिआ होरु सगल भइओ बिराना ॥3॥
हैवर गैवर रथ संबाहे गहु करि कीने मेरे ॥
जब ते होई लांमी धाई चलहि नाही इक पैरे ॥4॥
नामु धनु नामु सुख राजा नामु कुटंब सहाई ॥
नामु संपति गुरि नानक कउ दीई ओह मरै न आवै जाई ॥5॥1॥8॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पंचपदा-पाँच बंदों वाले शबद। ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! जीव पहले माँ के पेट में आ के निवास करता है।(फिर) वह जगह छोड़ के धरती पर आता है। (यहाँ) चित्रित सुंदर महल-माढ़ियां और सुंदर बाग़ (देख-देख के खुश होता है।पर इनमें से) कोई भी चीज (अंत समय में जीव के) साथ नहीं जाती। 1। हे भाई ! और सारे लोभ-लालच झूठे हैं। (यदि किसी मनुष्य को) पूरे गुरू ने परमात्मा का नाम दे दिया।तो ये नाम ही (उसकी) जीवात्मा के लिए सुखद वस्तु है। 1।रहाउ। हे भाई ! प्यारे मित्र।रिश्तेदार।पुत्र।भाई।स्त्री- इनके साथ गाढ़ा प्यार डाल के जीव हसता-खेलता रहता है। पर जिस समय अंत समय आ जाता है।उन सबके देखते-देखते मौत ने आ जकड़ना होता है। 2। (हे भाई ! सारी उम्र) धक्के जुल्म कर करके मनुष्य दौलत सोना चाँदी रुपए इकट्ठे करता रहता है (जैसे किसी) मजदूर को मजदूरी (मिल जाती है। वैसे ही दौलत एकत्र करने वाले को) वह (हर रोज का खाना-पीना) मजदूरी मिलती रही।बाकी सारा धन (मरने के वक्त) बेगाना हो जाता है। 3। हे भाई ! मनुष्य सुंदर घोड़े बढ़िया हाथी रथ (आदि) इकट्ठे करता रहता है।पूरे ध्यान से इन्हें अपनी मल्कियत बनाता रहता है। पर जब लंबे राह पड़ता है (ये घोड़े आदि) एक पैर भी (मनुष्य के साथ) नहीं चलते। 4। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही मनुष्य का असल धन है।नाम ही सुखदाता है।नाम ही परिवार है।नाम ही साथी है। गुरू ने (मुझे) नानक को यह हरि-नाम-दौलत ही दी है।यह दौलत कभी खत्म नहीं होती।कभी ग़ायब नहीं होती। 5। 1। 8।
गूजरी महला 5 तिपदे घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख बिनसे सुख कीआ निवासा त्रिसना जलनि बुझाई ॥
नामु निधानु सतिगुरू द्रिड़ाइआ बिनसि न आवै जाई ॥1॥
हरि जपि माइआ बंधन तूटे ॥
भए क्रिपाल दइआल प्रभ मेरे साधसंगति मिलि छूटे ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 तिपदे घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई !उसके सारे दुख नाश हो जाते हैं।उसके अंदर सुख आ निवास करते हैं।परमात्मा का नाम उसकी तृष्णा की जलन बुझा देता है। गुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में (सारे सुखों का) खजाना हरी-नाम पक्का कर दिया है।वह आत्मिक मौत नहीं सहता।वह ना (बार-बार) पैदा होता है ना मरता है। 1। परमात्मा का नाम जप के उसके माया के बंधन टूट जाते हैं। हे भाई ! मेरे प्रभू जी जिस मनुष्य पर कृपाल होते हैं।वह मनुष्य साध-संगति में मिल के माया के बंधनों से आजाद हो जाता है। 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “एक छिन में उसके अंदर से दुख-कलेश मिट जाते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।