जिसु मानुख पहि करउ बेनती सो अपनै दुखि भरिआ ॥
पारब्रहमु जिनि रिदै अराधिआ तिनि भउ सागरु तरिआ ॥1॥
गुर हरि बिनु को न ब्रिथा दुखु काटै ॥
प्रभु तजि अवर सेवकु जे होई है तितु मानु महतु जसु घाटै ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ के सनबंध सैन साक कित ही कामि न आइआ ॥
हरि का दासु नीच कुलु ऊचा तिसु संगि मन बांछत फल पाइआ ॥2॥
लाख कोटि बिखिआ के बिंजन ता महि त्रिसन न बूझी ॥
सिमरत नामु कोटि उजीआरा बसतु अगोचर सूझी ॥3॥
फिरत फिरत तुम॑रै दुआरि आइआ भै भंजन हरि राइआ ॥
साध के चरन धूरि जनु बाछै सुखु नानक इहु पाइआ ॥4॥6॥7॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रथमे गरभ माता कै वासा ऊहा छोडि धरनि महि आइआ ॥
चित्र साल सुंदर बाग मंदर संगि न कछहू जाइआ ॥1॥
अवर सभ मिथिआ लोभ लबी ॥
गुरि पूरै दीओ हरि नामा जीअ कउ एहा वसतु फबी ॥1॥ रहाउ ॥
इसट मीत बंधप सुत भाई संगि बनिता रचि हसिआ ॥
जब अंती अउसरु आइ बनिओ है उन॑ पेखत ही कालि ग्रसिआ ॥2॥
करि करि अनरथ बिहाझी संपै सुइना रूपा दामा ॥
भाड़ी कउ ओहु भाड़ा मिलिआ होरु सगल भइओ बिराना ॥3॥
हैवर गैवर रथ संबाहे गहु करि कीने मेरे ॥
जब ते होई लांमी धाई चलहि नाही इक पैरे ॥4॥
नामु धनु नामु सुख राजा नामु कुटंब सहाई ॥
नामु संपति गुरि नानक कउ दीई ओह मरै न आवै जाई ॥5॥1॥8॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख बिनसे सुख कीआ निवासा त्रिसना जलनि बुझाई ॥
नामु निधानु सतिगुरू द्रिड़ाइआ बिनसि न आवै जाई ॥1॥
हरि जपि माइआ बंधन तूटे ॥
भए क्रिपाल दइआल प्रभ मेरे साधसंगति मिलि छूटे ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “एक छिन में उसके अंदर से दुख-कलेश मिट जाते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।