अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे माँ ! परमात्मा के नाम-धन ने मेरी हरेक किस्म की चिंता खत्म कर दी है।मेरा हरेक फिक्र दूर कर दिया है। हे माँ ! परमात्मा के नाम-धन से (मैं ऐसे समझता हूँ कि) मैंने दुनिया के सारे नौ ही खजाने हासिल कर लिए हैं।(साध-संगति की कृपा से) ये सबसे कीमती नाम-धन मुझे मिल गया है। 3। ये धन स्वयं बरतो।दूसरों को बाँटो; ये धन कभी कम नहीं होता; इस लोक में परलोक में सदा साथ रहता है। हे माँ ! गुरू ने (मुझे) नानक को नाम-धन का खजाना लाद के दे दिया है।अपने मन को हरि-नाम के रंग में रंग लो। 4। 2। 3।
गूजरी महला 5 ॥ जिसु सिमरत सभि किलविख नासहि पितरी होइ उधारो ॥ सो हरि हरि तुम॑ सद ही जापहु जा का अंतु न पारो ॥1॥ पूता माता की आसीस ॥ निमख न बिसरउ तुम॑ कउ हरि हरि सदा भजहु जगदीस ॥1॥ रहाउ ॥ सतिगुरु तुम॑ कउ होइ दइआला संतसंगि तेरी प्रीति ॥ कापड़ु पति परमेसरु राखी भोजनु कीरतनु नीति ॥2॥ अंम्रितु पीवहु सदा चिरु जीवहु हरि सिमरत अनद अनंता ॥ रंग तमासा पूरन आसा कबहि न बिआपै चिंता ॥3॥ भवरु तुम॑ारा इहु मनु होवउ हरि चरणा होहु कउला ॥ नानक दासु उन संगि लपटाइओ जिउ बूंदहि चात्रिकु मउला ॥4॥3॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे पुत्र ! जिस परमात्मा का नाम सिमरने से सारे पाप नाश हो जाते हैं (सिमरन वाले के) पित्रों का भी (संसार समुंद्र से) पार-उतारा हो जाता है। जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।दूसरा छोर नहीं मिल सकता।आप सदा ही उसका नाम जपता रह। 1। हे पुत्र ! (आपको) माँ की ये आसीस (आशीर्वाद) है – आपको परमात्मा आँख झपकने जितने समय के लिए भी ना भूले।आप सदा जगत के मालिक प्रभू का नाम जपता रह। 1।रहाउ। हे पुत्र ! सतिगुरू आपके ऊपर दयावान रहे।गुरू से आपका प्यार बना रहे। (जैसे) कपड़ा (मनुष्य का पर्दा ढकता है।वैसे ही) परमात्मा आपकी इज्जत रखे।सदा परमात्मा की सिफत सालाह आपकी आत्मा की खुराक बनी रहे। 2। हे पुत्र ! आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल सदा पीता रह।सदा के लिए आपका उच्च आत्मिक जीवन बना रहे। हे पुत्र ! परमात्मा का सिमरन करने से कभी ना खत्म होने वाला आनंद बना रहता है।आत्मिक खुशियां प्राप्त रहती हैं।चिंता कभी अपना जोर नहीं डाल सकतीं। 3। हे पुत्र ! आपका ये मन भौरा बना रहे।परमात्मा के चरण (आपके मन-भौरे के वास्ते) कमल-फूल बने रहें। हे नानक ! (कह) परमात्मा का सेवक उन चरनों से यूँ लिपटा रहता है; जैसे पपीहा बरखा की बूँद पी के खिलता है। 4। 3। 4।
गूजरी महला 5 ॥ मता करै पछम कै ताई पूरब ही लै जात ॥ खिन महि थापि उथापनहारा आपन हाथि मतात ॥1॥ सिआनप काहू कामि न आत ॥ जो अनरूपिओ ठाकुरि मेरै होइ रही उह बात ॥1॥ रहाउ ॥ देसु कमावन धन जोरन की मनसा बीचे निकसे सास ॥ लसकर नेब खवास सभ तिआगे जम पुरि ऊठि सिधास ॥2॥ होइ अनंनि मनहठ की द्रिड़ता आपस कउ जानात ॥ जो अनिंदु निंदु करि छोडिओ सोई फिरि फिरि खात ॥3॥ सहज सुभाइ भए किरपाला तिसु जन की काटी फास ॥ कहु नानक गुरु पूरा भेटिआ परवाणु गिरसत उदास ॥4॥4॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! मनुष्य पश्चिम की तरफ जाने की सलाह बनाता है।परमात्मा उसे पूर्व की ओर ले जाता है। हे भाई ! परमात्मा एक छिन में पैदा करके नाश करने की ताकत रखने वाला है।हरेक फैसला उसने अपने हाथ में रखा होता है। 1। (हे भाई ! मनुष्य की अपनी) चतुराई किसी काम नहीं आती। जो बात मेरे ठाकुर ने मिथी होती है वही हो के रहती है। 1।रहाउ। (देख। हे भाई !) और देशों पर कब्जा करने और धन एकत्र करने की लालसा में ही मनुष्य के प्राण निकल जाते हैं। फौजें।अहिलकार। चौबदार आदि सब को छोड़ कर वह परलोक चला जाता है।(उसकी अपनी सियानप धरी की धरी रह जाती है)। 2। (दूसरी तरफ देखो उसका हाल जो अपनी तरफ से दुनिया छोड़ चुका है) अपने मन के हठ की मजबूती के आसरे माया वाला पासा छोड़ के (गृहस्थ त्याग के।इसको बड़ा श्रेष्ठ काम समझ कर त्यागी बना हुआ वह मनुष्य) अपने आप को बड़ा जतलाता है। ये गृहस्थ निंदनीय नहीं था।पर इसे निंदनीय मान के इसे त्याग देता है।(त्याग के भी) बार-बार (गृहस्तियों से ही ले ले कर) खाता है। 3। (सो। ना धन-पदार्थ एकत्र करने वाली चतुराई किसी काम की है और ना ही त्याग को गुमान कोई लाभ पहुँचाता है) वह परमात्मा अपने स्वाभाविक प्यार की प्रेरणा से जिस मनुष्य पर दयावान होता है उस मनुष्य की (माया के मोह की) फाही काट देता है। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है वह गृहस्थ में रहता हुआ माया से निर्मोह हो के परमात्मा की हजूरी में कबूल हो जाता है। 4। 4। 5।
गूजरी महला 5 ॥ नामु निधानु जिनि जनि जपिओ तिन के बंधन काटे ॥ काम क्रोध माइआ बिखु ममता इह बिआधि ते हाटे ॥1॥ हरि जसु साधसंगि मिलि गाइओ ॥ गुर परसादि भइओ मनु निरमलु सरब सुखा सुख पाइअउ ॥1॥ रहाउ ॥ जो किछु कीओ सोई भल मानै ऐसी भगति कमानी ॥ मित्र सत्रु सभ एक समाने जोग जुगति नीसानी ॥2॥ पूरन पूरि रहिओ स्रब थाई आन न कतहूं जाता ॥ घट घट अंतरि सरब निरंतरि रंगि रविओ रंगि राता ॥3॥ भए क्रिपाल दइआल गुपाला ता निरभै कै घरि आइआ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 5 ॥ हे भाई ! जिस जिस मनुष्य ने सारे सुखों के खजाने हरी-नाम को सिमरा।उन सबके माया के बंधन काटे गए। काम।क्रोध। आत्मिक मौत लाने वाली माया की ममता -इन सारे रोगों से वह बच जाते हैं। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य ने साध-संगति में मिल के परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए। गुरू की कृपा से उसका मन पवित्र हो गया।उसने सारे सुख प्राप्त कर लिए। 1।रहाउ। हे भाई ! वह मनुष्य ऐसी भक्ती की कार करता है कि जो कुछ परमात्मा करता है वह उसको (सब जीवों के वास्ते) भला मानता है। उसे मित्र व वैरी सारे एक जैसे (मित्र ही) दिखाई देते हैं।हे भाई ! यही है परमात्मा के मिलाप का तरीका।और यही है प्रभू के मिलाप की निशानी। 2। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने साध-संगति में मिल के परमात्मा की सिफत सलाह का गीत गाया।उस ने) पहचान लिया कि सर्व-व्यापक प्रभू सब जगहों में मौजूद है।उस मनुष्य ने परमात्मा के बिना किसी और को (सब जगहों पर बसता) नहीं समझा। उस को वह प्रभू हरेक शरीर में।एक-रस सबमें बसता दिखता है।वह मनुष्य उस परमात्मा के प्रेम-रंग में आनंद लेता है उसके प्रेम में मस्त रहता है। 3। हे नानक ! (कह, जब किसी मनुष्य पर) गोपाल प्रभू कृपालु होता है।दयावान होता है।तब वह मनुष्य उस निर्भय प्रभू के चरणों में लीन हो जाता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे माँ ! परमात्मा के नाम-धन ने मेरी हरेक किस्म की चिंता खत्म कर दी है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।