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अंग 494

अंग
494
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जा हरि प्रभ भावै ता गुरमुखि मेले जिन॑ वचन गुरू सतिगुर मनि भाइआ ॥
वडभागी गुर के सिख पिआरे हरि निरबाणी निरबाण पदु पाइआ ॥2॥
सतसंगति गुर की हरि पिआरी जिन हरि हरि नामु मीठा मनि भाइआ ॥
जिन सतिगुर संगति संगु न पाइआ से भागहीण पापी जमि खाइआ ॥3॥
आपि क्रिपालु क्रिपा प्रभु धारे हरि आपे गुरमुखि मिलै मिलाइआ ॥
जनु नानकु बोले गुण बाणी गुरबाणी हरि नामि समाइआ ॥4॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाईयो ! जब परमात्मा को अच्छा लगता है तब उन गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों का मिलाप कराता है जिन्हें गुरू के वचन अपने मन में प्यारे लगते हैं। गुरू के वह प्यारे सिख बहुत भाग्यशाली हैंजो निर्लिप परमात्मा को मिल के वासना-रहित आत्मिक दर्जा हासिल कर लेते हैं। 2। हे भाईयो ! जिन मनुष्यों को परमात्मा का मीठा नाम अपने मन में प्यारा लगता है उनको सतिगुरू की साध-संगति भी प्यारी लगती है। पर जिन मनुष्यों को सतिगुरू की साध-संगत का साथ पसंद नहीं आता।वह बद्-किस्मत रह जाते हैं।उन पापियों को आत्मिक मौत ने समूचा खा लिया होता है। 3। हे भाईयो ! जब दयावान परमात्मा खुद किसी मनुष्य पर दया करता है।तब वह खुद ही उस मनुष्य को मिलाया हुआ मिल जाता है। दास नानक भी परमात्मा की सिफत-सालाह वाली बाणी गुरबाणी ही (नित्य) उचारता है।गुरबाणी की बरकति से मनुष्य परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है। 4। 5।
गूजरी महला 4 ॥
जिन सतिगुरु पुरखु जिनि हरि प्रभु पाइआ मो कउ करि उपदेसु हरि मीठ लगावै ॥
मनु तनु सीतलु सभ हरिआ होआ वडभागी हरि नामु धिआवै ॥1॥
भाई रे मो कउ कोई आइ मिलै हरि नामु द्रिड़ावै ॥
मेरे प्रीतम प्रान मनु तनु सभु देवा मेरे हरि प्रभ की हरि कथा सुनावै ॥1॥ रहाउ ॥
धीरजु धरमु गुरमति हरि पाइआ नित हरि नामै हरि सिउ चितु लावै ॥
अंम्रित बचन सतिगुर की बाणी जो बोलै सो मुखि अंम्रितु पावै ॥2॥
निरमलु नामु जितु मैलु न लागै गुरमति नामु जपै लिव लावै ॥
नामु पदारथु जिन नर नही पाइआ से भागहीण मुए मरि जावै ॥3॥
आनद मूलु जगजीवन दाता सभ जन कउ अनदु करहु हरि धिआवै ॥
तूं दाता जीअ सभि तेरे जन नानक गुरमुखि बखसि मिलावै ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 4 ॥ (हे भाई ! मेरा जी करता है कि मुझे वे सज्जन मिल जाएं) जिन्होंने गुरू महापुरुख के दर्शन कर लिए हैं।(मेरा मन लोचता है कि) जिस सज्जन ने परमात्मा की प्राप्ति कर ली है वह मुझे भी शिक्षा दे के परमात्मा के साथ मेरा प्यार बना दे। (हे भाई !) जो भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है।उसका मन उसका हृदय ठंढा-ठार हो जाता है।वह आत्मिक जीवन से शरसार (भरपूर) हो जाता है। 1। हे भाई ! (मेरा मन चाहता है कि) मुझे कोई (ऐसा सज्जन) आ के मिले जो मेरे हृदय में परमात्मा का नाम पक्का कर दे। जो मुझे परमात्मा की सिफत सालाह की बात सुनाता रहे।मैं उस सज्जन को अपनी जिंद अपना मन अपना तन सब कुछ दे दूँगा। हे भाई ! जो मनुष्य सदा हरि-नाम में लीन रहता है परमात्मा से चित्त जोड़े रखता है।वह धीरज हासिल कर लेता है।वह धर्म कमाने लग जाता है।वह गुरू की मति पर चल के परमात्मा को मिल जाता है। हे भाई ! सतिगुरू की बाणी आत्मिक जीवन देने वाले बचन हैं।जो मनुष्य ये बाणी उचारता है।वह मनुष्य अपने मुंह में आत्मिक जीवन देने वाला जल डालता है। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम पवित्र करने वाला है।इस नाम में जुड़ने से (मन को विकारों की) मैल नहीं लगती।जो मनुष्य गुरू की शिक्षा पर चल के हरी-नाम जपता है वह प्रभू-चरणों में प्रीति डाल लेता है। परमात्मा का नाम कीमती वस्तु है।जिन मनुष्यों ने यह नाम हासिल नहीं किया।वह भाग्यहीन हैं।वे आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं।(जो भी मनुष्य नाम से वंचित रहता है वह) आत्मिक मौत मर जाता है। 3। हे जगत के जीवन प्रभू ! आप आनंद का श्रोत है।आप सब दातें देने वाला है।आप सब सेवकों को (आत्मिक) आनंद देता है। (जो भी मनुष्य आपका) नाम सिमरता है (उसको आप आनंद की दाति देता है)।हे प्रभू ! सारे जीव आपके पैदा किए हुए हैं।आप सभी को दातें देता है। हे नानक ! परमात्मा गुरू की शरण में डाल के (भाग्यशाली मनुष्य को) अपनी मेहर से अपने चरणों में जोड़ लेता है। 4। 6।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गूजरी महला 4 घरु 3 ॥
माई बाप पुत्र सभि हरि के कीए ॥
सभना कउ सनबंधु हरि करि दीए ॥1॥
हमरा जोरु सभु रहिओ मेरे बीर ॥
हरि का तनु मनु सभु हरि कै वसि है सरीर ॥1॥ रहाउ ॥
भगत जना कउ सरधा आपि हरि लाई ॥
विचे ग्रिसत उदास रहाई ॥2॥
जब अंतरि प्रीति हरि सिउ बनि आई ॥
तब जो किछु करे सु मेरे हरि प्रभ भाई ॥3॥
जितु कारै कंमि हम हरि लाए ॥
सो हम करह जु आपि कराए ॥4॥
जिन की भगति मेरे प्रभ भाई ॥
ते जन नानक राम नाम लिव लाई ॥5॥1॥7॥16॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। गूजरी महला 4 घरु 3 ॥ हे भाई ! माता।पिता।पुत्र -ये सारे परमात्मा के बनाए हुए हैं। इन सबके वास्ते आपस में बीच का रिश्ता परमात्मा ने खुद ही बनाया हुआ है (सो।ये सही जीवन राह में रुकावट नहीं हैं)। 1। हे मेरे भाई ! (परमात्मा के मुकाबले में) हमारा कोई जोर नहीं चल सकता। हमारा ये शरीर हमारा ये मन सब कुछ परमात्मा का बनाया हुआ है।हमारा शरीर परमात्मा के वश में है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा खुद ही अपने भक्तों को अपने चरणों की प्रीति बख्शता है। उन भगत-जनों को गृहस्थ में ही (माता-पिता-पुत्र-स्त्री आदि संबंधियों के बीच में रहते हुए ही) माया से निर्लिप रखता है। 2। हे भाई ! जब मनुष्य के हृदय में परमात्मा से प्यार बन जाता है। तब मनुष्य जो कुछ करता है (रजा में ही करता है।और) मेरे परमात्मा को अच्छा लगता है। 3। हे भाई ! जिस काम में।परमात्मा हमें लगाता है। जो काम-काज परमात्मा हमसे करवाता है।हम वही काम-काज करते हैं। 4। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जिन मनुष्यों की भक्ति परमात्मा को पसंद आती है। वह मनुष्य परमात्मा के नाम के साथ प्यार डाल लेते हैं। 5। 1। 7। 16

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाईयो ! जब परमात्मा को अच्छा लगता है तब उन गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों का मिलाप कराता है जिन्हें गुरू के वचन अपने मन में प्यारे लगते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।