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492
गूजरी
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एको नामु निधानु पंडित सुणि सिखु सचु सोई ॥
गूजरी महला 3 तीजा ॥
एको नामु निधानु पंडित सुणि सिखु सचु सोई ॥
दूजै भाइ जेता पड़हि पड़त गुणत सदा दुखु होई ॥1॥
हरि चरणी तूं लागि रहु गुर सबदि सोझी होई ॥
हरि रसु रसना चाखु तूं तां मनु निरमलु होई ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुर मिलिऐ मनु संतोखीऐ ता फिरि त्रिसना भूख न होइ ॥
नामु निधानु पाइआ पर घरि जाइ न कोइ ॥2॥
कथनी बदनी जे करे मनमुखि बूझ न होइ ॥
गुरमती घटि चानणा हरि नामु पावै सोइ ॥3॥
सुणि सासत्र तूं न बुझही ता फिरहि बारो बार ॥
सो मूरखु जो आपु न पछाणई सचि न धरे पिआरु ॥4॥
सचै जगतु डहकाइआ कहणा कछू न जाइ ॥
नानक जो तिसु भावै सो करे जिउ तिस की रजाइ ॥5॥7॥9॥
एको नामु निधानु पंडित सुणि सिखु सचु सोई ॥
दूजै भाइ जेता पड़हि पड़त गुणत सदा दुखु होई ॥1॥
हरि चरणी तूं लागि रहु गुर सबदि सोझी होई ॥
हरि रसु रसना चाखु तूं तां मनु निरमलु होई ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुर मिलिऐ मनु संतोखीऐ ता फिरि त्रिसना भूख न होइ ॥
नामु निधानु पाइआ पर घरि जाइ न कोइ ॥2॥
कथनी बदनी जे करे मनमुखि बूझ न होइ ॥
गुरमती घटि चानणा हरि नामु पावै सोइ ॥3॥
सुणि सासत्र तूं न बुझही ता फिरहि बारो बार ॥
सो मूरखु जो आपु न पछाणई सचि न धरे पिआरु ॥4॥
सचै जगतु डहकाइआ कहणा कछू न जाइ ॥
नानक जो तिसु भावै सो करे जिउ तिस की रजाइ ॥5॥7॥9॥
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 3 तीजा ॥ हे पंडित ! एक हरि नाम ही (सारे गुणों का। सारे पदार्थों का) खजाना है। इस हरि नाम को सुना कर। इस हरि नाम को जपने की जाच सीख। हे पंडित ! वह हरी ही सदा कायम रहने वाला है। आप माया के प्यार में (फँसे रह के) जितना कुछ (जितनी भी धार्मिक पुस्तकें) पढ़ते हैं। उनको पढ़ते और विचारते आपको सदा दुख ही लगा रहता है। 1। हे पण्डित ! गुरू के शबद में जुड़ के आप परमात्मा के चरणों में टिका रह। तो आपको (सुचॅजे आत्मिक जीवन की) समझ पड़ेगी। हे पंडित ! परमात्मा के नाम का रस अपनी जीभ से चखता रह। तो आपका मन पवित्र हो जाएगा। 1।रहाउ। हे पण्डित ! गुरू को मिल के मन संतोख प्राप्त कर लेता है। फिर मनुष्य को माया की प्यास। माया की भूख नहीं व्यापती। (जिस मनुष्य को गुरू से) परमात्मा का नाम-खजाना मिल जाता है वह (आसरे के वास्ते) किसी और घर में नहीं जाता (वह किसी और देवी-देवते आदि का आसरा नहीं ढूँढता)। 2। पर अगर कोई मनुष्य निरी मुंह की बातें ही करता रहे। और वैसे अपने मन के पीछे ही चलता रहे उसको आत्मिक जीवन की समझ नहीं पड़ती। हे पंडित ! गुरू की मति पर चलने से ही हृदय में (सदाचारी जीवन का) प्रकाश पैदा होता है। गुरमति लेने वाला मनुष्य परमात्मा का नाम हासिल कर लेता है। 3। हे पण्डित ! शास्त्रों को सुन-सुन के भी आप (आत्मिक जीवन को) नहीं समझते। तभी तो आप बार-बार भटकते फिरते हैं। हे पण्डित ! जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को नहीं पड़तालता वह (स्मृतियां-शास्त्र पढ़ के भी) मूर्ख (ही) है। वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा में कभी प्यार नहीं डाल सकता। 4। (पर। हे पंडित ! परमात्मा की रजा के बारे में) कुछ कहा नहीं जा सकता। उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू ने खुद ही जगत को माया की भटकना में डाला हुआ है। हे नानक ! जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है वह वही कुछ करता है। जैसे परमात्मा की रजा है (वैसे ही जगत लगा हुआ है)। 5। 7। 9।
हरि के जन सतिगुर सत पुरखा हउ बिनउ करउ गुर पासि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गूजरी महला 4 चउपदे घरु 1 ॥
हरि के जन सतिगुर सत पुरखा हउ बिनउ करउ गुर पासि ॥
हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइआ नामु परगासि ॥1॥
मेरे मीत गुरदेव मो कउ राम नामु परगासि ॥
गुरमति नामु मेरा प्रान सखाई हरि कीरति हमरी रहरासि ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जन के वडभाग वडेरे जिन हरि हरि सरधा हरि पिआस ॥
हरि हरि नामु मिलै त्रिपतासहि मिलि संगति गुण परगासि ॥2॥
जिन॑ हरि हरि हरि रसु नामु न पाइआ ते भागहीण जम पासि ॥
जो सतिगुर सरणि संगति नही आए ध्रिगु जीवे ध्रिगु जीवासि ॥3॥
जिन हरि जन सतिगुर संगति पाई तिन धुरि मसतकि लिखिआ लिखासि ॥
धंनु धंनु सतसंगति जितु हरि रसु पाइआ मिलि नानक नामु परगासि ॥4॥1॥
रागु गूजरी महला 4 चउपदे घरु 1 ॥
हरि के जन सतिगुर सत पुरखा हउ बिनउ करउ गुर पासि ॥
हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइआ नामु परगासि ॥1॥
मेरे मीत गुरदेव मो कउ राम नामु परगासि ॥
गुरमति नामु मेरा प्रान सखाई हरि कीरति हमरी रहरासि ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जन के वडभाग वडेरे जिन हरि हरि सरधा हरि पिआस ॥
हरि हरि नामु मिलै त्रिपतासहि मिलि संगति गुण परगासि ॥2॥
जिन॑ हरि हरि हरि रसु नामु न पाइआ ते भागहीण जम पासि ॥
जो सतिगुर सरणि संगति नही आए ध्रिगु जीवे ध्रिगु जीवासि ॥3॥
जिन हरि जन सतिगुर संगति पाई तिन धुरि मसतकि लिखिआ लिखासि ॥
धंनु धंनु सतसंगति जितु हरि रसु पाइआ मिलि नानक नामु परगासि ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु गूजरी महला 4 चउपदे घरु 1 ॥ हे सतिगुरू ! हे परमात्मा के भगत ! हे महा पुरुख गुरू ! मैं आपके पास विनती करता हूँ। हे सतिगुरु ! मैं एक कीड़ा हूँ। छोटा सा कीड़ा हूँ। आपकी शरण आया हूँ। मेहर कर। मुझे परमात्मा के नाम का प्रकाश दे। 1। हे मेरे मित्र सतिगुरू ! मुझे परमात्मा का नाम (-रूप) प्रकाश दे। (मेहर कर) गुरमति द्वारा मिला हरि नाम मेरी जीवात्मा का साथी बना रहे। परमात्मा की सिफत सालाह मेरे वास्ते मेरे जीवन राह की पूँजी बनी रहे। 1।रहाउ। हे भाई ! जिन हरी-भक्तों के हृदय में परमात्मा के नाम की श्रद्धा है। नाम जपने की खींच है। वह बड़े भाग्यशाली हैं। जब उन्हें प्रभू का नाम प्राप्त होता है वह (वह माया की तृष्णा से) तृप्त हो जाते हैं। साध-संगति में मिल के उनके अंदर गुण प्रगट हो जाते हैं। 2। पर। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम-रस हासिल नहीं किया। वे बद-किस्मत हैं। वे आत्मिक मौत के काबू में आए रहते हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण नहीं आते। साध-संगति में नहीं आते। उन का अब तक जीवन और आगे का जीवन धिक्कारयोग्य है। 3। हे भाई ! जिन हरी-भक्तों ने गुरू की संगति प्राप्त कर ली। उनके माथे पर धुर दरगाह से लिखे लेख उघड़ पड़े। हे नानक ! (कह) साध-संगति धन्य है जिसके द्वारा मनुष्य परमात्मा का नाम-रस हासिल करता है। जिसमें मिलने से मनुष्य के अंदर परमात्मा का नाम रौशन हो जाता है। 4। 1।
गोविंदु गोविंदु प्रीतमु मनि प्रीतमु मिलि सतसंगति सबदि मनु मोहै ॥
गूजरी महला 4 ॥
गोविंदु गोविंदु प्रीतमु मनि प्रीतमु मिलि सतसंगति सबदि मनु मोहै ॥
जपि गोविंदु गोविंदु धिआईऐ सभ कउ दानु देइ प्रभु ओहै ॥1॥
मेरे भाई जना मो कउ गोविंदु गोविंदु गोविंदु मनु मोहै ॥
गोविंद गोविंद गोविंद गुण गावा मिलि गुर साधसंगति जनु सोहै ॥1॥ रहाउ ॥
सुख सागर हरि भगति है गुरमति कउला रिधि सिधि लागै पगि ओहै ॥
जन कउ राम नामु आधारा हरि नामु जपत हरि नामे सोहै ॥2॥
गोविंदु गोविंदु प्रीतमु मनि प्रीतमु मिलि सतसंगति सबदि मनु मोहै ॥
जपि गोविंदु गोविंदु धिआईऐ सभ कउ दानु देइ प्रभु ओहै ॥1॥
मेरे भाई जना मो कउ गोविंदु गोविंदु गोविंदु मनु मोहै ॥
गोविंद गोविंद गोविंद गुण गावा मिलि गुर साधसंगति जनु सोहै ॥1॥ रहाउ ॥
सुख सागर हरि भगति है गुरमति कउला रिधि सिधि लागै पगि ओहै ॥
जन कउ राम नामु आधारा हरि नामु जपत हरि नामे सोहै ॥2॥
हिन्दी अर्थ: गूजरी महला 4 ॥ हे मेरे भाईयो ! साध-संगति में मिल के। गुरू के शबद में जुड़ने के कारण प्रीतम गोविंद (मेरे) मन में (आ बसा है। और। मेरे) मन को आकर्षित कर रहा है। हे भाई ! गोविंद भजन करो। हे भाई ! गोविंद का ध्यान धरना चाहिए। वही गोविंद सब जीवों को दातें देता है। 1। हे मेरे भाईयो ! मुझे पृथ्वी का मालिक प्रभू मिल गया है। गोविंद मेरे मन को आकर्षित कर रहा है। मैं अब हर वक्त गोविंद के गुण गा रहा हूँ। (हे भाई !) गुरू को मिल के साध-संगति में मिल के (और। गोविंद के गुण गा के) मनुष्य सुंदर आत्मिक जीवन वाला बन जाता है। 1।रहाउ। हे भाईयो ! जिस मनुष्य को गुरू की मति की बरकति से सुखों के समुंद्र परमात्मा की भक्ति प्राप्त हो जाती है। लक्ष्मी उसके चरनों में आ लगती है। हरेक सिद्धी उसके पैरों में आ पड़ती है। हे भाई ! हरी के भगत को हरी के नाम का सहारा बना रहता है। परमात्मा का नाम जपते। परमात्मा के नाम में जुड़ के उसका आत्मिक जीवन सुंदर बन जाता है। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 492 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।