प्रेम की जेवरी बाधिओ तेरो जन ॥
कहि रविदास छूटिबो कवन गुन ॥3॥4॥
हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे ॥
हरि सिमरत जन गए निसतरि तरे ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के नाम कबीर उजागर ॥
जनम जनम के काटे कागर ॥1॥
निमत नामदेउ दूधु पीआइआ ॥
तउ जग जनम संकट नही आइआ ॥2॥
जन रविदास राम रंगि राता ॥
इउ गुर परसादि नरक नही जाता ॥3॥5॥
माटी को पुतरा कैसे नचतु है ॥
देखै देखै सुनै बोलै दउरिओ फिरतु है ॥1॥ रहाउ ॥
जब कछु पावै तब गरबु करतु है ॥
माइआ गई तब रोवनु लगतु है ॥1॥
मन बच क्रम रस कसहि लुभाना ॥
बिनसि गइआ जाइ कहूं समाना ॥2॥
कहि रविदास बाजी जगु भाई ॥
बाजीगर सउ मोुहि प्रीति बनि आई ॥3॥6॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भ्रमत फिरत बहु जनम बिलाने तनु मनु धनु नही धीरे ॥
लालच बिखु काम लुबध राता मनि बिसरे प्रभ हीरे ॥1॥ रहाउ ॥
बिखु फल मीठ लगे मन बउरे चार बिचार न जानिआ ॥
गुन ते प्रीति बढी अन भांती जनम मरन फिरि तानिआ ॥1॥
जुगति जानि नही रिदै निवासी जलत जाल जम फंध परे ॥
बिखु फल संचि भरे मन ऐसे परम पुरख प्रभ मन बिसरे ॥2॥
गिआन प्रवेसु गुरहि धनु दीआ धिआनु मानु मन एक मए ॥
प्रेम भगति मानी सुखु जानिआ त्रिपति अघाने मुकति भए ॥3॥
जोति समाइ समानी जा कै अछली प्रभु पहिचानिआ ॥
धंनै धनु पाइआ धरणीधरु मिलि जन संत समानिआ ॥4॥1॥
गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा ॥
आढ दाम को छीपरो होइओ लाखीणा ॥1॥ रहाउ ॥
बुनना तनना तिआगि कै प्रीति चरन कबीरा ॥
नीच कुला जोलाहरा भइओ गुनीय गहीरा ॥1॥
रविदासु ढुवंता ढोर नीति तिनि तिआगी माइआ ॥
परगटु होआ साधसंगि हरि दरसनु पाइआ ॥2॥
सैनु नाई बुतकारीआ ओहु घरि घरि सुनिआ ॥
हिरदे वसिआ पारब्रहमु भगता महि गनिआ ॥3॥
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पन्द्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी रविदासी परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आपका सेवक ! (माया के) इन पर्दों में (अब) नहीं फसता।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।