रे बउरे तुहि घरी न राखै कोई ॥
तूं राम नामु जपि सोई ॥1॥ रहाउ ॥
का की मात पिता कहु का को कवन पुरख की जोई ॥
घट फूटे कोऊ बात न पूछै काढहु काढहु होई ॥2॥
देहुरी बैठी माता रोवै खटीआ ले गए भाई ॥
लट छिटकाए तिरीआ रोवै हंसु इकेला जाई ॥3॥
कहत कबीर सुनहु रे संतहु भै सागर कै ताई ॥
इसु बंदे सिरि जुलमु होत है जमु नही हटै गुसाई ॥4॥9॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा स्री कबीर जीउ के चउपदे इकतुके ॥
सनक सनंद अंतु नही पाइआ ॥
बेद पड़े पड़ि ब्रहमे जनमु गवाइआ ॥1॥
हरि का बिलोवना बिलोवहु मेरे भाई ॥
सहजि बिलोवहु जैसे ततु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
तनु करि मटुकी मन माहि बिलोई ॥
इसु मटुकी महि सबदु संजोई ॥2॥
हरि का बिलोवना मन का बीचारा ॥
गुर प्रसादि पावै अंम्रित धारा ॥3॥
कहु कबीर नदरि करे जे मंीरा ॥
राम नाम लगि उतरे तीरा ॥4॥1॥10॥
बाती सूकी तेलु निखूटा ॥
मंदलु न बाजै नटु पै सूता ॥1॥
बुझि गई अगनि न निकसिओ धूंआ ॥
रवि रहिआ एकु अवरु नही दूआ ॥1॥ रहाउ ॥
टूटी तंतु न बजै रबाबु ॥
भूलि बिगारिओ अपना काजु ॥2॥
कथनी बदनी कहनु कहावनु ॥ समझि परी तउ बिसरिओ गावनु ॥3॥
कहत कबीर पंच जो चूरे ॥ तिन ते नाहि परम पदु दूरे ॥4॥2॥11॥
सुतु अपराध करत है जेते ॥
जननी चीति न राखसि तेते ॥1॥
रामईआ हउ बारिकु तेरा ॥
काहे न खंडसि अवगनु मेरा ॥1॥ रहाउ ॥
जे अति क्रोप करे करि धाइआ ॥
ता भी चीति न राखसि माइआ ॥2॥
चिंत भवनि मनु परिओ हमारा ॥
नाम बिना कैसे उतरसि पारा ॥3॥
देहि बिमल मति सदा सरीरा ॥
सहजि सहजि गुन रवै कबीरा ॥4॥3॥12॥
हज हमारी गोमती तीर ॥
जहा बसहि पीतंबर पीर ॥1॥
वाहु वाहु किआ खूबु गावता है ॥
हरि का नामु मेरै मनि भावता है ॥1॥ रहाउ ॥
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।