Lulla Family

अंग 46

अंग
46
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सिरीरागु महला 5 ॥
मिलि सतिगुर सभु दुखु गइआ हरि सुखु वसिआ मनि आइ ॥
अंतरि जोति प्रगासीआ एकसु सिउ लिव लाइ ॥
मिलि साधू मुखु ऊजला पूरबि लिखिआ पाइ ॥
गुण गोविंद नित गावणे निरमल साचै नाइ ॥1॥
मेरे मन गुर सबदी सुखु होइ ॥
गुर पूरे की चाकरी बिरथा जाइ न कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
मन कीआ इछां पूरीआ पाइआ नामु निधानु ॥
अंतरजामी सदा संगि करणैहारु पछानु ॥
गुर परसादी मुखु ऊजला जपि नामु दानु इसनानु ॥
कामु क्रोधु लोभु बिनसिआ तजिआ सभु अभिमानु ॥2॥
पाइआ लाहा लाभु नामु पूरन होए काम ॥
करि किरपा प्रभि मेलिआ दीआ अपणा नामु ॥
आवण जाणा रहि गइआ आपि होआ मिहरवानु ॥
सचु महलु घरु पाइआ गुर का सबदु पछानु ॥3॥
भगत जना कउ राखदा आपणी किरपा धारि ॥
हलति पलति मुख ऊजले साचे के गुण सारि ॥
आठ पहर गुण सारदे रते रंगि अपार ॥
पारब्रहमु सुख सागरो नानक सद बलिहार ॥4॥11॥81॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ सतिगुरू को मिल के (मनुष्य का) सारा दुख दूर हो जाता है। परमात्मा के (चरणों) में सुरति जोड़ के मनुष्य के मन में परमात्मा की ज्योति का प्रकाश हो जाता है। गुरू को मिल के मनुष्य का मुंह रोशन हो जाता है (चेहरे पर अंदर के आत्मिक जीवन की लाली आ जाती है), पहिले जनम में की गई नेक कमाई के लिखे हुए लेख सामने आ जाते हैं। सदा स्थिर प्रभु के पवित्र नाम में (जुड़ के) मनुष्य सदा गोविंद के गुण गाने की उत्सुक्ता रखता है।1। हे मेरे मन ! गुरू के शबद में जुड़ने से आत्मिक आनंद मिलता है जो भी कोई मनुष्य पूरे गुरू की सेवा करता है (भाव, पूरे गुरू के शबद अनुसार चलता है) वह (गुरू के दर से) खाली नहीं जाता।1।रहाउ। (गुरू के शबद में जुड़ के जो मनुष्य) परमात्मा के नाम का खजाना ढूंढ लेता है, उसके मन की सारी ख्वाहिशें पूरी हो जाती हैं। (अर्थात, उसका मन दुनियावी वासनाओं पीछे दौड़ने से हट जाता है)। हरेक के दिल की जानने वाला परमात्मा उस मनुष्य को सदा अपने अंग-संग दिखता है, सृजनहार प्रभु उसको अपना मित्र प्रतीत होता है। गुरू की कृपा से परमात्मा का नाम जपके (दूसरों की) सेवा (कर के) पवित्र आचरण (बना के) उसका मुंह चमक उठता है। उस मनुष्य के अंदर से काम-क्रोध-लोभ का नाश हो जाता है। वह मनुष्य अहंकार तो बिल्कुल ही त्याग देता है।2। (जब) परमात्मा का नाम (जीवन के व्यापार में) बतौर लाभ हासिल कर लिया, तो उस के सारे काम सफल हो गए (तृष्णा अधीन हो रही दौड़ भाग खत्म हो गई)। प्रभु ने कृपा करके जिस मनुष्य को (अपने चरणों में) जोड़ लिया और अपना नाम बख्शा । जिस मनुष्य पर परमात्मा खुद मेहर करता है, उसके जन्म मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। गुरू का शबद उस मनुष्य का (जीवन-) साथी बन जाता है। सदा स्थिर प्रभु के चरण उस को ऐसा ठिकाना मिल जाता है, जिस को वह अपना (आत्मिक) घर बना लेता है।3। अपनी कृपा करके परमात्मा अपने भक्तों को (काम-क्रोध-लोभ आदि विकारों से) बचा के रखता है। सदा स्थिर प्रभु के गुण (हृदय में) संभाल के उन (भक्तों) के मुंह इस लोक में और परलोक में रोशन हो जाते हैं। वह (भक्त) बेअंत प्रभु के (प्यार-) रंग में रंगे रहते हैं और आठों पहर उस के गुण (अपने दिल में) संभालते हैं। हे नानक! पारब्रहम परमात्मा उनको सारे सुखों का समुंद्र दिखता है, और वो उससे सदा सदके होते रहते हैं।4।11।81।
सिरीरागु महला 5 ॥
पूरा सतिगुरु जे मिलै पाईऐ सबदु निधानु ॥
करि किरपा प्रभ आपणी जपीऐ अंम्रित नामु ॥
जनम मरण दुखु काटीऐ लागै सहजि धिआनु ॥1॥
मेरे मन प्रभ सरणाई पाइ ॥
हरि बिनु दूजा को नही एको नामु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
कीमति कहणु न जाईऐ सागरु गुणी अथाहु ॥
वडभागी मिलु संगती सचा सबदु विसाहु ॥
करि सेवा सुख सागरै सिरि साहा पातिसाहु ॥2॥
चरण कमल का आसरा दूजा नाही ठाउ ॥
मै धर तेरी पारब्रहम तेरै ताणि रहाउ ॥
निमाणिआ प्रभु माणु तूं तेरै संगि समाउ ॥3॥
हरि जपीऐ आराधीऐ आठ पहर गोविंदु ॥
जीअ प्राण तनु धनु रखे करि किरपा राखी जिंदु ॥
नानक सगले दोख उतारिअनु प्रभु पारब्रहम बखसिंदु ॥4॥12॥82॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ (हे मन !) अगर पूरा गुरू मिल जाए, तो (उससे) परमात्मा की सिफत सलाह का खजाना मिल जाता है। हे प्रभु ! अपनी मेहर कर (गुरू मिला, ता कि) आत्मिक जीवन देने वाला (आपका) नाम (हम) जप सकें। जनम मरन के चक्कर में पड़ने का हम अपना दुख दूर कर सकें और हमारी सुरति आत्मिक अडोलता में टिक जाए।1। हे मेरे मन ! प्रभु की शरण पड़। प्रभु के बिना कोई और (रक्षक) नहीं। (हे मन !) प्रभु का नाम सिमर।1।रहाउ। परमात्मा (सारे) गुणों का समुंद्र है, (ऐसा समुंद्र है जिसकी) गहराई का अंत नहीं मिल सकता। उसका मुल्य ही नहीं बताया जा सकता (अर्थात, कीमती से कीमती कोई ऐसी चीज नहीं जिसके बदले परमात्मा मिल सके)। हे (मेरे) भाग्यशाली (मन !) साध-संगति में मिल बैठ, (और वहां) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की सिफत सलाह की बाणी (का सौदा) खरीद। (साध-संगति में विधि, तरीका सीख के) सुखों के सागर प्रभु की सेवा भक्ति कर। वह प्रभु (दुनिया के) शाहों के सिर पर बादशाह है।2। (हे पारब्रह्म! मुझे आपके ही) सुंदर चरणों का आसरा है। (आपके बिना) मेरे लिए और कोई जगह नहीं है, मुझे आपकी ही ओट है, मैं आपके (दिये) बल से ही जीता हूँ। हे प्रभु ! जिनको जगत में कोई आदर-सत्कार नहीं देता, तूं उनका भी सम्मान (का जरीआ) है। (मेहर कर) मैं आपके चरणों में लीन रहूँ।3। (हे मेरे मन !) आठों प्रहर परमात्मा का नाम जपना चाहिए, गोबिंद को आराधना चाहिए। परमात्मा (शरण आए) जीवों के प्राणों को (विकारों से) बचाता है। ज्ञान इन्द्रियों को (विकारों से) बचाता है, उनके नाम-धन की रक्षा करता है। (शरण आए जीव की) जीवात्मा को मेहर करके (विकारों से) बचाता है। हे नानक! प्रभु पारब्रह्म बख्शणहार (क्षमाशील) है, वह (शरण में आए के) सारे पाप दूर कर देता है।4।12।82।
सिरीरागु महला 5 ॥
प्रीति लगी तिसु सच सिउ मरै न आवै जाइ ॥
ना वेछोड़िआ विछुड़ै सभ महि रहिआ समाइ ॥
दीन दरद दुख भंजना सेवक कै सत भाइ ॥
अचरज रूपु निरंजनो गुरि मेलाइआ माइ ॥1॥
भाई रे मीतु करहु प्रभु सोइ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ हे मां ! मेरी प्रीति (अब) उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभु के साथ लग गई है,जो ना पैदा होता है ना मरता है। वह विछुड़ने से नहीं विछुड़ता। (हे मां !) वह परमात्मा सभ जीवों में समा रहा है। (हे मां !) गरीबों के दुख नाश करने वाला वह प्रभु सेवक को उसकी भली भावना के साथ मिलता है। उस प्रभु का सुंदर रूप है, उसपे माया का प्रभाव नहीं पड़ता। हे मां ! वह परमात्मा मुझे मेरे गुरू ने मिला दिया है।1। हे भाई ! (आप भी) उसी परमात्मा को अपना मित्र बना।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्री राग महला 5 ॥ सतिगुरू को मिल के (मनुष्य का) सारा दुख दूर हो जाता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।