मिलि सतिगुर सभु दुखु गइआ हरि सुखु वसिआ मनि आइ ॥
अंतरि जोति प्रगासीआ एकसु सिउ लिव लाइ ॥
मिलि साधू मुखु ऊजला पूरबि लिखिआ पाइ ॥
गुण गोविंद नित गावणे निरमल साचै नाइ ॥1॥
मेरे मन गुर सबदी सुखु होइ ॥
गुर पूरे की चाकरी बिरथा जाइ न कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
मन कीआ इछां पूरीआ पाइआ नामु निधानु ॥
अंतरजामी सदा संगि करणैहारु पछानु ॥
गुर परसादी मुखु ऊजला जपि नामु दानु इसनानु ॥
कामु क्रोधु लोभु बिनसिआ तजिआ सभु अभिमानु ॥2॥
पाइआ लाहा लाभु नामु पूरन होए काम ॥
करि किरपा प्रभि मेलिआ दीआ अपणा नामु ॥
आवण जाणा रहि गइआ आपि होआ मिहरवानु ॥
सचु महलु घरु पाइआ गुर का सबदु पछानु ॥3॥
भगत जना कउ राखदा आपणी किरपा धारि ॥
हलति पलति मुख ऊजले साचे के गुण सारि ॥
आठ पहर गुण सारदे रते रंगि अपार ॥
पारब्रहमु सुख सागरो नानक सद बलिहार ॥4॥11॥81॥
पूरा सतिगुरु जे मिलै पाईऐ सबदु निधानु ॥
करि किरपा प्रभ आपणी जपीऐ अंम्रित नामु ॥
जनम मरण दुखु काटीऐ लागै सहजि धिआनु ॥1॥
मेरे मन प्रभ सरणाई पाइ ॥
हरि बिनु दूजा को नही एको नामु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
कीमति कहणु न जाईऐ सागरु गुणी अथाहु ॥
वडभागी मिलु संगती सचा सबदु विसाहु ॥
करि सेवा सुख सागरै सिरि साहा पातिसाहु ॥2॥
चरण कमल का आसरा दूजा नाही ठाउ ॥
मै धर तेरी पारब्रहम तेरै ताणि रहाउ ॥
निमाणिआ प्रभु माणु तूं तेरै संगि समाउ ॥3॥
हरि जपीऐ आराधीऐ आठ पहर गोविंदु ॥
जीअ प्राण तनु धनु रखे करि किरपा राखी जिंदु ॥
नानक सगले दोख उतारिअनु प्रभु पारब्रहम बखसिंदु ॥4॥12॥82॥
प्रीति लगी तिसु सच सिउ मरै न आवै जाइ ॥
ना वेछोड़िआ विछुड़ै सभ महि रहिआ समाइ ॥
दीन दरद दुख भंजना सेवक कै सत भाइ ॥
अचरज रूपु निरंजनो गुरि मेलाइआ माइ ॥1॥
भाई रे मीतु करहु प्रभु सोइ ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्री राग महला 5 ॥ सतिगुरू को मिल के (मनुष्य का) सारा दुख दूर हो जाता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।