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अंग 47

अंग
47
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
माइआ मोह परीति ध्रिगु सुखी न दीसै कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
दाना दाता सीलवंतु निरमलु रूपु अपारु ॥
सखा सहाई अति वडा ऊचा वडा अपारु ॥
बालकु बिरधि न जाणीऐ निहचलु तिसु दरवारु ॥
जो मंगीऐ सोई पाईऐ निधारा आधारु ॥2॥
जिसु पेखत किलविख हिरहि मनि तनि होवै सांति ॥
इक मनि एकु धिआईऐ मन की लाहि भरांति ॥
गुण निधानु नवतनु सदा पूरन जा की दाति ॥
सदा सदा आराधीऐ दिनु विसरहु नही राति ॥3॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन का सखा गोविंदु ॥
तनु मनु धनु अरपी सभो सगल वारीऐ इह जिंदु ॥
देखै सुणै हदूरि सद घटि घटि ब्रहमु रविंदु ॥
अकिरतघणा नो पालदा प्रभ नानक सद बखसिंदु ॥4॥13॥83॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माया का मोह माया की प्रीत धिक्कारयोग्य है (इसे त्याग के, माया के मोह में फंसा हुआ) कोई भी आदमी सुखी नहीं दिखता।1।रहाउ। (हे भाई !) वह परमात्मा सब के दिलों की जानने वाला है, सब को दातें देने वाला है। मीठे स्वभाव वाला है। पवित्र स्वरूप है, बेअंत सुंदर रूप वाला है, वही सभसे बड़ा मित्र है और सहायता करने वाला है, ऊँचा है, बड़ा है, बेअंत है। न वह कभी बाल उम्र वाला होता है, ना वह कभी बुड्ढा होता है। (भाव, जीवों की तरह उसकी अवस्था घटती-बढ़ती नहीं)। उस प्रभु का दरबार अटल है। (उसका हुकम मोड़ा नहीं जा सकता)। (उस परमात्मा के दर से) जो कुछ मांगते हैं वही कुछ मिल जाता है। परमात्मा निआसरों का आसरा है।2। (हे भाई!) जिस परमात्मा का दर्शन करने से (सारे) पाप नाश हो जाते हैं, (जिसके दर्शनों से) मन में और शरीर में (आत्मिक) ठंड पड़ जाती है, अपने मन की (माया के ओर की) भटकन दूर करके उस परमात्मा को मन लगा के सिमरना चाहिए। जो प्रभु गुणों का खजना है व् सदैव अरोगी है जिस के दिए पदार्थ सम्पूर्ण है ना दिन में, ना रात को, कभी भी उसको ना भुलाओ।3। (हे भाई!) जिन लोगों के माथे पे पहिले जन्म में की नेक कमाई के लेख उघड़ते हैं, परमात्मा उनका मित्र बन जाता है। मैं तो अपना शरीर, अपना मन, अपना धन (सब कुछ उसका प्यार हासिल करने के लिए) अर्पण करने को तैयार हूं। (हे भाई! प्रभु का प्रेम प्राप्त करने के लिए) ये सारी जीवात्मा कुर्बान कर देनी चाहिए। वह परमात्मा अंग-संग रह कर (हरेक जीव के किये कर्मों को) देखता है (हरेक जीव की अरदासें) सुनता है, परमात्मा हरेक शरीर में व्यापक है। हे नानक ! (अरदास कर और कह) हे प्रभु ! आप उनको भी पालता है, जो आपके किए उपकारों को भुला देते हैं। आप सदा ही (जीवों की भूलें) बख्शने वाला है।4।13।83।
सिरीरागु महला 5 ॥
मनु तनु धनु जिनि प्रभि दीआ रखिआ सहजि सवारि ॥
सरब कला करि थापिआ अंतरि जोति अपार ॥
सदा सदा प्रभु सिमरीऐ अंतरि रखु उर धारि ॥1॥
मेरे मन हरि बिनु अवरु न कोइ ॥
प्रभ सरणाई सदा रहु दूखु न विआपै कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
रतन पदारथ माणका सुइना रुपा खाकु ॥
मात पिता सुत बंधपा कूड़े सभे साक ॥
जिनि कीता तिसहि न जाणई मनमुख पसु नापाक ॥2॥
अंतरि बाहरि रवि रहिआ तिस नो जाणै दूरि ॥
त्रिसना लागी रचि रहिआ अंतरि हउमै कूरि ॥
भगती नाम विहूणिआ आवहि वंञहि पूर ॥3॥
राखि लेहु प्रभु करणहार जीअ जंत करि दइआ ॥
बिनु प्रभ कोइ न रखनहारु महा बिकट जम भइआ ॥
नानक नामु न वीसरउ करि अपुनी हरि मइआ ॥4॥14॥84॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ जिस प्रभु ने यह मन दिया है, (बरतनें के लिए) धन दिया है, जिस प्रभु ने मनुष्य के शरीर को सवार बना के रखा है, जिस ने (शरीर में) सारी (शारीरिक) ताकतें पैदा करके शरीर रचा है, और शरीर में अपनी बेअंत ज्योति टिका दी है। (हे भाई!) उस प्रभू को सदा ही सिमरते रहना चाहिए। (हे भाई !) अपने हृदय में उसकी याद टिका रख।1। हे मेरे मन ! परमात्मा के बिना और कोई (असल रक्षक) नहीं। आप सदा परमात्मा की शरण पड़ा रह, कोई भी दुख आपके पर जोर नहीं डाल सकेगा।1।रहाउ। रतन, मोती आदि कीमती पदार्थ, सोना चांदी (ये सभ) मिट्टी के समान ही हैं (क्योंकि यहीं पड़े रह जाएंगे)। माता-पिता-पु़त्र व और संबंधी – ये सारे साक-संबंधी भी साथ छोड़ जाने वाले हैं। (ये देख के भी) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य, गंदे जीवन का पशु स्वभाव मनुष्य, उस परमात्मा के साथ सांझ नहीं डालता जिसने इसको पैदा किया है।2। (मूर्ख मनुष्य) उस परमात्मा को कहीं दूर बसता समझता है, जो इसके अंदर और बाहर हर जगह मौजूद है। जीव को माया की तृष्णा चिपकी हुई है। (माया के मोह में) जीव मस्त हो रहा है, (माया के कारण) इसके अंदर झूठा अहंकार टिका हुआ है। परमात्मा की भक्ति से परमात्मा के नाम से विहीन भर भरके नावों में जीव (इस संसार समुंद्र में) आते हैं और खाली चले जाते हैं।3। (पर, जीवों के भी क्या बस? माया के सामने ये बे-बस हैं) हे जीवों को पैदा करने वाले प्रभू! आप खुद ही मेहर करके सारे जीव-जन्तुओं को (इस तृष्णा से) बचा ले। हे प्रभु! आपके बगैर कोई रक्षा करने वाला नहीं। यम राज जीवों के वास्ते बड़ा डरावना बन रहा है। हे नानक! (अरदास कर और कह) हे हरि ! अपनी मेहर कर, मैं आपका नाम कभी भी ना भुलाऊँ।4।14।84।
सिरीरागु महला 5 ॥
मेरा तनु अरु धनु मेरा राज रूप मै देसु ॥
सुत दारा बनिता अनेक बहुतु रंग अरु वेस ॥
हरि नामु रिदै न वसई कारजि कितै न लेखि ॥1॥
मेरे मन हरि हरि नामु धिआइ ॥
करि संगति नित साध की गुर चरणी चितु लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
नामु निधानु धिआईऐ मसतकि होवै भागु ॥
कारज सभि सवारीअहि गुर की चरणी लागु ॥
हउमै रोगु भ्रमु कटीऐ ना आवै ना जागु ॥2॥
करि संगति तू साध की अठसठि तीरथ नाउ ॥
जीउ प्राण मनु तनु हरे साचा एहु सुआउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ (मनुष्य गर्व करता है और कहता है कि) ये शरीर मेरा है, यह राज मेरा है, यह देश मेरा है, मैं रूपवान हूँ, मेरे पुत्र हैं, मेरी सि्त्रयां हैं, मुझे बड़ी मौजें हैं और मेरे पास कई पोशाकें हैं। अगर, उसके हृदय में परमात्मा का नाम नहीं बसता तो (ये सभ पदार्थ जिनपे मनुष्य घमण्ड करता है) किसी भी काम के ना समझो।1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का नाम सिमर। सदा गुरू की संगति कर और गुरू के चरणों में चित्त जोड़।1।रहाउ। परमात्मा का नाम (जो सब पदार्थों का) खजाना है, सिमरना चाहिए। (पर, वही मनुष्य सिमर सकता है जिस के) माथे पे बढ़िया किस्मत उघड़ आए। (हे भाई!) सतिगुरू के चरणों में टिका रह, आपके सारे काम भी संवर जाएंगे। (जो मनुष्य गुरू शरण रह के नाम सिमरता है उस का) अहम् रोग काटा जाता है, उसकी भटकना दूर हो जाती है, वह ना (बार-बार) पैदा होता है ना मरता है।2। (हे भाई!) गुरू की संगति कर- यही अढ़सठ तीर्तों का स्नान है। (गुरू की शरण में रहने से) जीवात्मा, प्राण, मन, शरीर सभ आत्मिक जीवन वाले हो जाते हैं। और मानस जीवन का असल मनोरथ भी यही है।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माया का मोह माया की प्रीत धिक्कारयोग्य है (इसे त्याग के, माया के मोह में फंसा हुआ) कोई भी आदमी सुखी नहीं दिखता।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।