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अंग 45

अंग
45
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मेरे मन हरि हरि नामु धिआइ ॥
नामु सहाई सदा संगि आगै लए छडाइ ॥1॥ रहाउ ॥
दुनीआ कीआ वडिआईआ कवनै आवहि कामि ॥
माइआ का रंगु सभु फिका जातो बिनसि निदानि ॥
जा कै हिरदै हरि वसै सो पूरा परधानु ॥2॥
साधू की होहु रेणुका अपणा आपु तिआगि ॥
उपाव सिआणप सगल छडि गुर की चरणी लागु ॥
तिसहि परापति रतनु होइ जिसु मसतकि होवै भागु ॥3॥
तिसै परापति भाईहो जिसु देवै प्रभु आपि ॥
सतिगुर की सेवा सो करे जिसु बिनसै हउमै तापु ॥
नानक कउ गुरु भेटिआ बिनसे सगल संताप ॥4॥8॥78॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का नाम सिमर। परमात्मा का नाम (जीवात्मा की) सहायता करने वाला है। (सदा जीवात्मा के) साथ रहता है, और परलोक में (किये हुए कर्मों का लेखा होने के वक्त) छुड़ा लेता है।1।रहाउ। (हे मेरे मन!) दुनिया के बड़प्पन किसी काम नहीं आते। माया के कारण (मुंह पे दिखता) रंग फीका पड़ जाता है क्योंकि, ये रंग आखिर नाश हो जाता है। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा (का नाम) बसता है, वह सभ गुणों वाला हो जाता है तथा (हर जगह) जाना माना जाता है।2। (हे मेरे मन!) गुरू के चरणों की धूल बन और अपना अहं भाव छोड़ दे। (हे मन! और) सारे तरीके व चतुराईयां छोड़ के गुरू की शरण पड़ा रह। जिस मनुष्य के माथे पे (पूर्बले) भाग्य जागते हैं (वही गुरू की शरण पड़ता है तथा उसको) परमात्मा का नाम-रतन मिल जाता है।3। हे भाईयो ! प्रभु का नाम उसी मनुष्य को मिलता है जिसको (गुरू के द्वारा) प्रभु खुद देता है। गुरू की सेवा भी वही मनुष्य करता है जिसके अंदर अहम् का ताप नाश हो जाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को गुरू मिलता है उसके सारे कलेश दूर हो जाते हैं।4।8।78।
सिरीरागु महला 5 ॥
इकु पछाणू जीअ का इको रखणहारु ॥
इकस का मनि आसरा इको प्राण अधारु ॥
तिसु सरणाई सदा सुखु पारब्रहमु करतारु ॥1॥
मन मेरे सगल उपाव तिआगु ॥
गुरु पूरा आराधि नित इकसु की लिव लागु ॥1॥ रहाउ ॥
इको भाई मितु इकु इको मात पिता ॥
इकस की मनि टेक है जिनि जीउ पिंडु दिता ॥
सो प्रभु मनहु न विसरै जिनि सभु किछु वसि कीता ॥2॥
घरि इको बाहरि इको थान थनंतरि आपि ॥
जीअ जंत सभि जिनि कीए आठ पहर तिसु जापि ॥
इकसु सेती रतिआ न होवी सोग संतापु ॥3॥
पारब्रहमु प्रभु एकु है दूजा नाही कोइ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का जो तिसु भावै सु होइ ॥
गुरि पूरै पूरा भइआ जपि नानक सचा सोइ ॥4॥9॥79॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ (हे भाई!) जीवात्मा का मित्र सिर्फ परमात्मा ही है। परमात्मा ही जीवात्मा को (विकार आदि से) बचाने वाला है। (इस वास्ते) अपने मन में सिर्फ परमात्मा का आसरा रख, सिर्फ परमात्मा ही जीवात्मा का सहारा है। वह पारब्रहम करतार (ही सहारा है) उसकी शरण पड़ने से सदा सुख मिलता है।1। हे मेरे मन! और सारे उपाय त्याग दे। सिर्फ पूरे गुरू को हमेशा याद रख। (सिर्फ गुरू के शबद का आसरा ले, और) एक परमात्मा (के चरणों) की लगन (अपने अंदर) लगा के रख।1।रहाउ। (हे मन!) सिर्फ परमात्मा ही (असल) भाई है मित्र है। सिर्फ परमात्मा ही (असल) माता-पिता है। (भाव, माता पिता की तरह पालणहार है)। (मुझे तो) उस परमात्मा का ही मन में सहारा है, जिसने यह जीवात्मा दी है, जिसने यह शरीर दिया है। (मेरी सदा यही अरदास है कि) जिस प्रभु ने सभ कुछ अपने बस में रखा हुआ है वह कभी मेरे मन से ना बिसरे।2। (हे भाई ! आपके) हृदय में भी और बाहर हर जगह पर भी सिर्फ परमात्मा ही बस रहा है। (हे भाई!) आठों पहर उस प्रभु को सिमर, जिस ने सारे जीव-जन्तु पैदा किए हैं। अगर सिर्फ परमात्मा के (प्यार रंग) में रंगे रहें, तो कभी कोई दुख कलेश नहीं आता।3। पारब्रहम परमात्मा ही (सारे संसार का मालिक) है, कोई और उसके बराबर का नहीं। (सभ जीवों का) शरीर उस परमात्मा का ही दिया हुआ है, (जगत में) वही कुछ होता है जो उस को अच्छा लगता है। हे नानक ! जो मनुष्य पूरे गुरू के द्वारा उस सदा स्थिर प्रभु को सिमरता है, वह (सभ गुणों से) मुकम्मल हो जाता है।4।9।79।
सिरीरागु महला 5 ॥
जिना सतिगुर सिउ चितु लाइआ से पूरे परधान ॥
जिन कउ आपि दइआलु होइ तिन उपजै मनि गिआनु ॥
जिन कउ मसतकि लिखिआ तिन पाइआ हरि नामु ॥1॥
मन मेरे एको नामु धिआइ ॥
सरब सुखा सुख ऊपजहि दरगह पैधा जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जनम मरण का भउ गइआ भाउ भगति गोपाल ॥
साधू संगति निरमला आपि करे प्रतिपाल ॥
जनम मरण की मलु कटीऐ गुर दरसनु देखि निहाल ॥2॥
थान थनंतरि रवि रहिआ पारब्रहमु प्रभु सोइ ॥
सभना दाता एकु है दूजा नाही कोइ ॥
तिसु सरणाई छुटीऐ कीता लोड़े सु होइ ॥3॥
जिन मनि वसिआ पारब्रहमु से पूरे परधान ॥
तिन की सोभा निरमली परगटु भई जहान ॥
जिनी मेरा प्रभु धिआइआ नानक तिन कुरबान ॥4॥10॥80॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ जिन लोगों ने सत्गुरू के साथ अपना मन जोड़ा है, वह सारे गुणों वाले हो जाते हैं। वह (लोक परलोक में) जाने माने जाते हैं। जिन पे परमात्मा खुद दयाल होता है, उनके मन में परमात्मा के साथ गहरी सांझ पैदा हो जाती है। जिनके माथे पे (धुर से ही बख्शिश का लेख) लिखा हुआ उघड़ता है, वह परमात्मा का नाम प्राप्त कर लेते हैं।1। हे मेरे मन ! सिर्फ परमात्मा का नाम सिमर। (जो मनुष्य सिमरता है, उसके अंदर) सारे श्रेष्ठ सुख पैदा हो जाते हैं। वह परमात्मा की दरगाह में आदर के साथ जाता है।1।रहाउ। जो मनुष्य गोपाल प्रभु की भक्ति करता है, प्रभु से प्र्रेम करता है, उसका जनम-मरन (के चक्कर में पड़ने का) डर दूर हो जाता है। साध-संगति में रहके वह पवित्र हो जाता है। परमात्मा खुद (विकारों से उसकी) रखवाली करता है। गुरू के दर्शन करके (उसका तन मन) खिल जाता है, जनम मरन के चक्कर में डालने वाली उसकी विकारों की मैल काटी जाती है।2। (हे मेरे मन!) वह पारब्रहम परमात्मा हरेक जगह व्यापक है। वह खुद ही सब जीवों को दातें देने वाला है, उस के बराबर और कोई नहीं। (जगत में वही कुछ होता है जो वह करना चाहता है, उसकी शरण पड़ने से (विकारों से) खलासी होती है।3। (हे भाई!) जिन मनुष्यों के मन में पारब्रहम परमेश्वर का नाम बस जाता है, उनके अंदर सारे गुण पैदा हो जाते हैं। वह हर जगह आदर पाते हैं। उनकी बे-दाग शोभा-बड़प्पन सारे जगत में जाहिर हो जाती है। हे नानक! (कह) जिन मनुष्यों ने प्रभु का सिमरन किया है, मैं उनसे सदके जाता हूं।4।10।80।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का नाम सिमर।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।