नामु सहाई सदा संगि आगै लए छडाइ ॥1॥ रहाउ ॥
दुनीआ कीआ वडिआईआ कवनै आवहि कामि ॥
माइआ का रंगु सभु फिका जातो बिनसि निदानि ॥
जा कै हिरदै हरि वसै सो पूरा परधानु ॥2॥
साधू की होहु रेणुका अपणा आपु तिआगि ॥
उपाव सिआणप सगल छडि गुर की चरणी लागु ॥
तिसहि परापति रतनु होइ जिसु मसतकि होवै भागु ॥3॥
तिसै परापति भाईहो जिसु देवै प्रभु आपि ॥
सतिगुर की सेवा सो करे जिसु बिनसै हउमै तापु ॥
नानक कउ गुरु भेटिआ बिनसे सगल संताप ॥4॥8॥78॥
इकु पछाणू जीअ का इको रखणहारु ॥
इकस का मनि आसरा इको प्राण अधारु ॥
तिसु सरणाई सदा सुखु पारब्रहमु करतारु ॥1॥
मन मेरे सगल उपाव तिआगु ॥
गुरु पूरा आराधि नित इकसु की लिव लागु ॥1॥ रहाउ ॥
इको भाई मितु इकु इको मात पिता ॥
इकस की मनि टेक है जिनि जीउ पिंडु दिता ॥
सो प्रभु मनहु न विसरै जिनि सभु किछु वसि कीता ॥2॥
घरि इको बाहरि इको थान थनंतरि आपि ॥
जीअ जंत सभि जिनि कीए आठ पहर तिसु जापि ॥
इकसु सेती रतिआ न होवी सोग संतापु ॥3॥
पारब्रहमु प्रभु एकु है दूजा नाही कोइ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का जो तिसु भावै सु होइ ॥
गुरि पूरै पूरा भइआ जपि नानक सचा सोइ ॥4॥9॥79॥
जिना सतिगुर सिउ चितु लाइआ से पूरे परधान ॥
जिन कउ आपि दइआलु होइ तिन उपजै मनि गिआनु ॥
जिन कउ मसतकि लिखिआ तिन पाइआ हरि नामु ॥1॥
मन मेरे एको नामु धिआइ ॥
सरब सुखा सुख ऊपजहि दरगह पैधा जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जनम मरण का भउ गइआ भाउ भगति गोपाल ॥
साधू संगति निरमला आपि करे प्रतिपाल ॥
जनम मरण की मलु कटीऐ गुर दरसनु देखि निहाल ॥2॥
थान थनंतरि रवि रहिआ पारब्रहमु प्रभु सोइ ॥
सभना दाता एकु है दूजा नाही कोइ ॥
तिसु सरणाई छुटीऐ कीता लोड़े सु होइ ॥3॥
जिन मनि वसिआ पारब्रहमु से पूरे परधान ॥
तिन की सोभा निरमली परगटु भई जहान ॥
जिनी मेरा प्रभु धिआइआ नानक तिन कुरबान ॥4॥10॥80॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का नाम सिमर।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।