जैसी चात्रिक पिआस खिनु खिनु बूंद चवै बरसु सुहावे मेहु ॥ हरि प्रीति करीजै इहु मनु दीजै अति लाईऐ चितु मुरारी ॥ मानु न कीजै सरणि परीजै दरसन कउ बलिहारी ॥ गुर सुप्रसंने मिलु नाह विछुंने धन देदी साचु सनेहा ॥ कहु नानक छंत अनंत ठाकुर के हरि सिउ कीजै नेहा मन ऐसा नेहु करेहु ॥2॥ चकवी सूर सनेहु चितवै आस घणी कदि दिनीअरु देखीऐ ॥ कोकिल अंब परीति चवै सुहावीआ मन हरि रंगु कीजीऐ ॥ हरि प्रीति करीजै मानु न कीजै इक राती के हभि पाहुणिआ ॥ अब किआ रंगु लाइओ मोहु रचाइओ नागे आवण जावणिआ ॥ थिरु साधू सरणी पड़ीऐ चरणी अब टूटसि मोहु जु कितीऐ ॥ कहु नानक छंत दइआल पुरख के मन हरि लाइ परीति कब दिनीअरु देखीऐ ॥3॥ निसि कुरंक जैसे नाद सुणि स्रवणी हीउ डिवै मन ऐसी प्रीति कीजै ॥ जैसी तरुणि भतार उरझी पिरहि सिवै इहु मनु लाल दीजै ॥ मनु लालहि दीजै भोग करीजै हभि खुसीआ रंग माणे ॥ पिरु अपना पाइआ रंगु लालु बणाइआ अति मिलिओ मित्र चिराणे ॥ गुरु थीआ साखी ता डिठमु आखी पिर जेहा अवरु न दीसै ॥ कहु नानक छंत दइआल मोहन के मन हरि चरण गहीजै ऐसी मन प्रीति कीजै ॥4॥1॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: जैसा (पपीहे का प्रेम-बरखा बूँद से है)। पपीहा प्यासा है (पर और पानी नहीं पीता।वह) बार-बार बरखा की बूँद मांगता है।और बादलों को कहता है, हे सोहाने (मेघा) ! बरखा कर। हे भाई ! परमात्मा से प्यार डालना चाहिए (प्यार के बदले अपना) ये मन उसके हवाले करना चाहिए (और इस तरह) मन को परमात्मा के चरणों में जोड़ना चाहिए; अहंकार नहीं करना चाहिए। परमात्मा की शरण पड़ना चाहिए।उसके दर्शनों की खातिर अपना-आप सदके करना चाहिए। हे भाई ! जिस जीव-स्त्री पे गुरू दयावान होता है वह सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन करती है और उसके दर से अरजोई करती है, हे विछुड़े हुए प्रभू-पति ! मुझे (आ के) मिल। हे नानक ! आप भी बेअंत मालिक प्रभू की सिफत सालाह के गीत गा।हे (मेरे) मन ! परमात्मा से प्यार बना।ऐसा प्यार (जैसा मछली का पानी के साथ है जैसा पपीहे का बरखा की बूँद के साथ है)। 2। चकवी का सूर्य से प्यार है।वह (सारी रात सूर्य को ही) याद करती रहती है।बड़ी तमन्ना करती है कि कब सूरज के दीदार होंगे। कोयल का आम से प्यार है (वह आम के वृक्ष पर बैठ के) मधुर बोलती है। हे (मेरे) मन ! (आपको) परमात्मा के साथ प्यार करना चाहिए (ऐसा प्यार जैसा चकवी सूरज से करती है और कोयल आम से करती है)। हे भाई ! परमात्मा से प्यार डालना चाहिए (अपने किसी धन-पदार्थ आदि का) अहंकार नहीं करना चाहिए (यहाँ हम) सभी एक रात के मेहमान ही तो हैं। फिर भी तूने क्यों (जगत से) प्यार डाला हुआ है। माया से मोह बनाया हुआ है।(यहाँ सब) नंगे (ख़ाली हाथ) आते हैं और (यहाँ से) नंगे (ख़ाली हाथ) ही चले जाते हैं। हे भाई ! गुरू का आसरा लेना चाहिए।गुरू के चरणों में पड़ना चाहिए (गुरू की शरण पड़ने से ही मन) अडोल हो सकता है।और तब ही ये मोह टूटेगा जो तूने (माया के साथ) बनाया हुआ है। हे नानक ! दया के घर सर्व-व्यापक प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाया कर।अपने मन में परमात्मा का प्यार बना (ठीक उसी तरह जैसे चकवी सारी रात चाहत करती है कि) कब सूर्य के दर्शन होंगे। 3। हे (मेरे) मन ! परमात्मा के साथ ऐसा प्यार डालना चाहिए जैसा प्यार हिरन डालता है।रात के समय घंडे हेड़े की आवाज सुन के अपना हृदय (उस आवाज के) हवाले कर देता है। जैसे जवान स्त्री अपने पति के प्यार में बंधी हुई पति की सेवा करती है।(उसी तरह हे भाई !) अपना ये मन सोहाने प्रभू को देना चाहिए।और उसके मिलाप का आनंद पाना चाहिए। (जो जीव-स्त्री अपना मन प्रभू-पति के हवाले करती हैवह उस) के मिलाप की सभी खुशियां मिलाप के सारे आनंद पाती है। वह अपने प्रभू-पति को (अपने अंदर ही) ढूँढ लेती है।वह अपनी आत्मा को गाढ़ा प्रेम रंग चढ़ा लेती है (जैसे सुहागन लाल कपड़ा पहनती है) वह बहु चिराणे (आदि समय) के मित्र प्रभू-पति को मिल पड़ती है। (हे सखी ! जब से) गुरू मेरा विचोला बना है।मैंने प्रभू-पति को अपनी आँखों से देख लिया है।मुझे प्रभू-पति जैसा और कोई नजर नहीं आता। हे नानक ! (कह) हे मेरे मन ! दया के घर।और मन को मोह लेने वाले परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता रह।हे मन ! परमात्मा से ऐसा प्रेम करना चाहिए (जैसा हिरन नाद से करता है।जैसा युवती अपने पति से करती है)। 4। 1। 4।
आसा महला 5 ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥
सलोकु ॥ बनु बनु फिरती खोजती हारी बहु अवगाहि ॥ नानक भेटे साध जब हरि पाइआ मन माहि ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (सारी दुनिया परमात्मा की प्राप्ति के वास्ते) जंगल-जंगल खोजती फिरी।(जंगलों में) तलाश कर करके थक गई (पर परमात्मा ना मिला)। हे नानक ! (जिस भाग्यशाली को) जब गुरू मिल गया।उसने अपने मन में (परमात्मा को) पा लिया। 1।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: छंत। (हे भाई !) जिस परमात्मा को बेअंत समाधि लीन ऋषि और अनेकों धुनी तपाने वाले तपस्वी साधू ढूँढते फिरते हैं। करोड़ों ही ब्रहमा और धर्म-पुस्तकों के विद्वान जिसका जाप जप के आराधना करते हैं। (हे भाई !) जिस निर्लिप प्रभू को मिलने के लिए लोग कई किसम के जप-तप करते हैं।इन्द्रियों को वश में करने का यत्न करते हैं।अनेकों (निहित) धार्मिक रस्में और पूजा करते हैं।अपने शरीर को पवित्र करने के साधन (शोधन) और (डंडवत्) वंदना करते हैं। (त्यागी बन के) सारी धरती का चक्र लगाते हैं (सारे) तीर्थों के स्नान करते हैं (वह परमात्मा गुरू की कृपा से साध-संगति में मिल जाता है)। हे दया के श्रोत गोबिंद ! हे मेरे प्यारे प्रभू ! मनुष्य।जंगल।बनस्पति।पशु।पक्षी- ये सारे ही आपकी आराधना करते हैं। (मुझ नानक पर दया कर।मुझे) नानक को गुरू की संगति में मिला।ता कि मुझे ऊँची आत्मि्क अवस्था प्राप्त हो जाए। 1। हे दयालु हरी ! विष्णु के करोड़ों अवतार और करोड़ों जटाधारी शिव आपको (मिलना) चाहते हैं। उनके मन में उनके हृदय में (आपके मिलने की) चाहत रहती है। हे बेअंत प्रभू ! हे अपहुँच प्रभू ! हे गोबिंद ! हे ठाकुर ! हे सबकी कामना पूरी करने वाले प्रभू ! हे सबके मालिक ! देवते जोग-साधाना में सिद्ध जोगी।शिव के गण।देवताओं के रागी।जॅख।किन्नर (आदि सारे) आपका सिमरन करते हैं।और गुण उच्चारते हैं। हे भाई ! करोड़ों इन्द्र।अनेकों देवते।मालिक प्रभू की जै-जैकार जपते रहते हैं। हे नानक ! उस जिनका कोई मालिक नहीं।के मालिक प्रभू को।दया के श्रोत प्रभू को साध-संगति के द्वारा (ही) मिल के (संसार समुंद्र से) बेड़ा पार होता है। 2। (हे भाई !) करोड़ो देवियां जिस परमात्मा की सेवा भक्ति करती हैं।धन की देवी लक्ष्मी अनेकों ढंगों से जिसकी सेवा करती है।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैसा (पपीहे का प्रेम-बरखा बूँद से है)।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।