प्रिउ सहज सुभाई छोडि न जाई मनि लागा रंगु मजीठा ॥ हरि नानक बेधे चरन कमल किछु आन न मीठा ॥1॥ जिउ राती जलि माछुली तिउ राम रसि माते राम राजे ॥ गुर पूरै उपदेसिआ जीवन गति भाते राम राजे ॥ जीवन गति सुआमी अंतरजामी आपि लीए लड़ि लाए ॥ हरि रतन पदारथो परगटो पूरनो छोडि न कतहू जाए ॥ प्रभु सुघरु सरूपु सुजानु सुआमी ता की मिटै न दाते ॥ जल संगि राती माछुली नानक हरि माते ॥2॥ चात्रिकु जाचै बूंद जिउ हरि प्रान अधारा राम राजे ॥ मालु खजीना सुत भ्रात मीत सभहूं ते पिआरा राम राजे ॥ सभहूं ते पिआरा पुरखु निरारा ता की गति नही जाणीऐ ॥ हरि सासि गिरासि न बिसरै कबहूं गुर सबदी रंगु माणीऐ ॥ प्रभु पुरखु जगजीवनो संत रसु पीवनो जपि भरम मोह दुख डारा ॥ चात्रिकु जाचै बूंद जिउ नानक हरि पिआरा ॥3॥ मिले नराइण आपणे मानोरथो पूरा राम राजे ॥ ढाठी भीति भरंम की भेटत गुरु सूरा राम राजे ॥ पूरन गुर पाए पुरबि लिखाए सभ निधि दीन दइआला ॥ आदि मधि अंति प्रभु सोई सुंदर गुर गोपाला ॥ सूख सहज आनंद घनेरे पतित पावन साधू धूरा ॥ हरि मिले नराइण नानका मानोरथोु पूरा ॥4॥1॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आत्मिक अडोलता को प्यार करने वाला प्रभू उसे छोड़ नहीं जाता।उसके मन में (प्रभू प्रेम का पक्का) रंग चढ़ जाता है (जैसे) मजीठ (का पक्का रंग)। हे नानक ! जिस मनुष्य का मन प्रभू के सोहाने कोमल चरणों में बेधा गया।उसको (प्रभू की याद के बिना) और कोई चीज अच्छी नहीं लगती। 1। वह परमात्मा के नाम के स्वाद में ऐसे मस्त रहते हैं जैसे (गहरे) पानी में मछली खुश रहती है- (हे भाई ! जिन मनुष्यों को) पूरे गुरू ने (हरि-नाम-सिमरन का) उपदेश दे दिया। वे मनुष्य आत्मिक जीवन के दाते प्रभू को प्यारे लगते हैं। हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाला मालिक प्रभू हरेक के दिल की जानने वाला है वह उन मनुष्यों को खुद ही अपने पल्ले से लगा लेता है। वह सर्व-व्यापक प्रभू उनके अंदर अपने श्रेष्ठ नाम-रत्न प्रगट कर देता है उन्हें फिर छोड़ के कहीं नहीं जाता। हे नानक ! परमात्मा सुंदर आत्मिक घाड़त वाला है।सुंदर रूप वाला है।सियाना है।(जिन मनुष्यों को पूरा गुरू उपदेश देता है उन पर हुई हुई) उस परमात्मा की बख्शिश कभी मिटती नहीं (इस वास्ते वह मनुष्य) हरि-नाम में यूँ मस्त रहते हैं जैसे मछली (गहरे) पानी की संगति में। 2। हे भाई ! जैसे पपीहा (स्वाति नक्षत्र की बरखा की) बूँद मांगता है (वैसे ही संत-जन परमात्मा के नाम-जल की बूँद मांगते हैं। वैसे ही संत-जनों के लिए) परमात्मा का नाम-जल जिंदगी का सहारा; दुनिया का धन-पदार्थ।खजाने।पुत्र।भाई।मित्र- इन सबसे उनको परमात्मा प्यारा लगता है। हे भाई ! जिस परमात्मा की ऊँची अवस्था जानी नहीं जा सकती वह (सारे संसार से) निराला और सर्व-व्यापक प्रभू उनको प्यारा लगता है; हरेक सांस के साथ हरेक ग्रास के साथ- कभी भी परमात्मा उनको भूलता नहीं।(पर। हे भाई !) उस परमात्मा के मिलाप का आनंद गुरू के शबद की बरकति से ही पाया जा सकता है। हे भाई ! जो परमात्मा सर्व-प्यापक है सारे जगत की जिंदगी (का सहारा) है।संत जन उस के नाम-जल का रस पीते हैं।उसका नाम जप-जपके वह (अपने अंदर से) भटकना और मोह के दुख दूर कर लेते हैं। हे भाई ! जैसे पपीहा (बरखा की) बूँद मांगता है वैसे ही संत-जनों के लिए परमात्मा का नाम-जल जीवन का आसरा है। 3। (हे भाई !) जो मनुष्य अपने परमात्मा (के चरणों) में लीन हो जाते हैं उनकी जिंदगी का निशाना पूरा हो जाता है (प्रभू चरणों में लीन होना ही इन्सानी जीवन का मनोरथ है)। शूरवीर गुरू को मिल के (उनके अंदर से) भटकना की दीवार गिर जाती है (जो परमात्मा से विछोड़े रखती थी)।(पर। हे भाई !) पूर्ण गुरू भी उनको ही मिलता है जिनके माथे पर पूर्बले जीवन के मुताबिक सारे-सारे गुणों के खजाने दीनों पर दया करने वाले परमात्मा ने (गुरू मिलाप का लेख) लिखा हुआ है। (ऐसे भाग्यशालियों को ये निष्चय बन जाता है कि) वह सबसे बड़ा और सृष्टि का पालनहार प्रभू ही जगत के आरम्भ में (अटल) था।जगत रचना के बीच में (अटल) है।और आखिर में (अटॅल) रहेगा। हे भाई ! विकारों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाले गुरू की चरण-धूड़ जिस मनुष्य को प्राप्त हो जाती है उसे आत्मिक अडोलता के अनेकों सुख आनंद मिल जाते हैं। हे नानक ! (कह) जो मनुष्य प्रभू चरणों में मिल जाता है उसका जीवन-मनोरथ सफल हो जाता है। 4। 1। 3।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 छंत घरु 6 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। सलोकु; जिन मनुष्यों पर प्रभू जी दयावान होते हैं वही मनुष्य परमात्मा का नाम सदा जपते हैं।पर। हे नानक ! गुरू की संगति में मिल के ही उनकी प्रीति परमात्मा के साथ बनती है। 1।
छंतु ॥ जल दुध निआई रीति अब दुध आच नही मन ऐसी प्रीति हरे ॥ अब उरझिओ अलि कमलेह बासन माहि मगन इकु खिनु भी नाहि टरै ॥ खिनु नाहि टरीऐ प्रीति हरीऐ सीगार हभि रस अरपीऐ ॥ जह दूखु सुणीऐ जम पंथु भणीऐ तह साधसंगि न डरपीऐ ॥ करि कीरति गोविंद गुणीऐ सगल प्राछत दुख हरे ॥ कहु नानक छंत गोविंद हरि के मन हरि सिउ नेहु करेहु ऐसी मन प्रीति हरे ॥1॥ जैसी मछुली नीर इकु खिनु भी ना धीरे मन ऐसा नेहु करेहु ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: छंतु। हे भाई ! परमात्मा और जीवात्मा के प्यार की मर्यादा पानी और दूध के प्यार जैसी है।(जब पानी दूध से एक-रूप हो जाता है) तब (पानी) दूध को सेक नहीं लगने देता।हे मन ! परमात्मा का प्यार ऐसा ही है (वह जीव को विकारों का सेक नहीं लगने देता)। (जब कमल-फूल खिलता है अपनी सुगंधि बिखेरता है) तब भौरा कमल-फूल की सुगंधि में मस्त हो जाता है (कमल-फूल से) एक पल वास्ते भी परे नहीं हटता (फूल की पंखुड़ियों में) फस जाता है। (इसी तरह हे भाई !) परमात्मा की प्रीति से एक छिन के लिए भी परे नहीं हटना चाहिए।सारे शारीरिक सुख।सारे मायावी स्वाद (उस प्रीति से) सदके कर देने चाहिए। (इसका नतीजा ये निकलता है कि) जहां जमों (के देश) का रास्ता बताया जाता है जहाँ सुनते हैं (कि जमों से) दुख (मिलता है) वहाँ गुरू की संगति करने की बरकति से कोई डर नहीं आता। सो। हे मन ! परमात्मा की सिफत-सालाह करता रह।वह परमात्मा सारे पछतावे सारे दुख दूर कर देता है। हे नानक ! कह, (हे मन !) गोबिंद हरी की सिफतों के गीत गाता रह।परमात्मा से प्यार बनाए रख।हे मन ! परमात्मा की प्रीति ऐसी है (कि विकारों का सेक नहीं लगने देती।और जमों के वश नहीं पड़ने देती)। 1। हे (मेरे) मन ! आप (परमात्मा के साथ) ऐसा प्रेम बना जैसा मछली का पानी के साथ है (मछली पानी के बिना) एक छिण भी नहीं जी सकती;
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आत्मिक अडोलता को प्यार करने वाला प्रभू उसे छोड़ नहीं जाता।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।