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अंग 451

अंग
451
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
करि सेवहि पूरा सतिगुरू भुख जाइ लहि मेरी ॥
गुरसिखा की भुख सभ गई तिन पिछै होर खाइ घनेरी ॥
जन नानक हरि पुंनु बीजिआ फिरि तोटि न आवै हरि पुंन केरी ॥3॥
गुरसिखा मनि वाधाईआ जिन मेरा सतिगुरू डिठा राम राजे ॥
कोई करि गल सुणावै हरि नाम की सो लगै गुरसिखा मनि मिठा ॥
हरि दरगह गुरसिख पैनाईअहि जिन॑ा मेरा सतिगुरु तुठा ॥
जन नानकु हरि हरि होइआ हरि हरि मनि वुठा ॥4॥12॥19॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: वे अपने गुरू को अभॅुल जान के उसकी बताई हुई सेवा करते रहते हैं (जिसकी बरकति से उनके मन में से) माया की भूख दूर हो जाती है। उनकी संगति करके और बहुत सारी दुनिया (नाम-सिमरन की आत्मिक खुराक) खाती है। हे दास नानक ! जो मनुष्य (अपने हृदय-खेत में) हरि-नाम का भला बीज बीजते हैं।उनके अंदर इस भले कर्म की कभी भी कमी नहीं होती। 3। (हे भाई !) जिन गुरसिखों ने प्यारे गुरू के दर्शन कर लिए।उनके मन में सदा चढ़दीकला बनी रहती है। यदि कोई मनुष्य परमात्मा की सिफतसालाह की बात आ के सुनाए तो वह मनुष्य गुरसिखों को प्यारा लगने लग जाता है। (हे भाई !) जिन गुरसिखों पे प्यारा सतिगुरू मेहरबान होता है उन्हें परमात्मा की दरगाह में आदर-मान मिलता है। नानक कहता है कि गुरसिख परमात्मा का रूप हो जाते हैं परमात्मा उनके मन में सदा बसारहता है। 4। 12। 19।
आसा महला 4 ॥
जिन॑ा भेटिआ मेरा पूरा सतिगुरू तिन हरि नामु द्रिड़ावै राम राजे ॥
तिस की त्रिसना भुख सभ उतरै जो हरि नामु धिआवै ॥
जो हरि हरि नामु धिआइदे तिन॑ जमु नेड़ि न आवै ॥
जन नानक कउ हरि क्रिपा करि नित जपै हरि नामु हरि नामि तरावै ॥1॥
जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ तिना फिरि बिघनु न होई राम राजे ॥
जिनी सतिगुरु पुरखु मनाइआ तिन पूजे सभु कोई ॥
जिन॑ी सतिगुरु पिआरा सेविआ तिन॑ा सुखु सद होई ॥
जिन॑ा नानकु सतिगुरु भेटिआ तिन॑ा मिलिआ हरि सोई ॥2॥
जिन॑ा अंतरि गुरमुखि प्रीति है तिन॑ हरि रखणहारा राम राजे ॥
तिन॑ की निंदा कोई किआ करे जिन॑ हरि नामु पिआरा ॥
जिन हरि सेती मनु मानिआ सभ दुसट झख मारा ॥
जन नानक नामु धिआइआ हरि रखणहारा ॥3॥
हरि जुगु जुगु भगत उपाइआ पैज रखदा आइआ राम राजे ॥
हरणाखसु दुसटु हरि मारिआ प्रहलादु तराइआ ॥
अहंकारीआ निंदका पिठि देइ नामदेउ मुखि लाइआ ॥
जन नानक ऐसा हरि सेविआ अंति लए छडाइआ ॥4॥13॥20॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे भाई !) जिन मनुष्यों ने प्यारे गुरू का पल्ला पकड़ लिया।गुरू उनके हृदय में परमात्मा का नाम पक्का कर देता है। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है उस मनुष्य की माया वाली भूख-प्याससारी दूर हो जाती है। जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरते रहते हैं।जम उनके नजदीक नहीं फटकता (आत्मिक मौत उनके ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती)। हे दास नानक ! (कह जिस मनुष्य पे) परमात्मा कृपा करता है।वह सदा उसका नाम जपता है।और।परमात्मा उसको अपने नाम में जोड़ के (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम सिमरते हैं।उनके जीवन सफर में दुबारा (विकारों आदि की) कोई रुकावट नहीं पड़ती। जो मनुष्य (अपना जीवन स्वच्छ बना के) समर्थ गुरू को प्रसन्न कर लेते हैं।हरेक जीव उनका आदर-सत्कार करता है। जो मनुष्य प्यारे गुरू की बताई सेवा करते हैं (गुरू का आसरा लेते हैं) उनको सदा ही आत्मिक आनन्द प्राप्त रहता है। नानक (कहता है) जो मनुष्य गुरू का पल्ला पकड़ते हैं उन्हे परमात्मा खुद आ के मिलता है। 2। (हे भाई !) गुरू के बताए रास्ते पर चल के जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा की प्रीति पैदा हो जाती है।बचाने की समर्था वाला परमात्मा (उन्हें विकारों से बचा लेता है)। जिन मनुष्यों को परमात्मा का नाम प्यारा लगने लग पड़ता है।कोई मनुष्य उनकी निंदा नहीं कर सकता क्योंकि कोई निंदनेयोग्य बुराई उनके जीवन में रह ही नहीं जाती।सो। जिन मनुष्यों का मन परमात्मा के साथ रम जाता है।बुरे मनुष्य (उन्हें बदनाम करने के लिए ऐसे ही) व्यर्थ की टक्करें मारते रहते हैं। हे दास नानक ! (कह) जो मनुष्य हरि-नाम सिमरते हैं।बचाने की समर्था वाला हरी (उनको विकारों से बचा लेता है)। 3। परमात्मा हरेक युग में ही भगत पैदा करता है।और।(बुरे समय में) उनकी इज्जत रखता (जैसे कि। प्रहलाद के जालिम पिता) चंदरे हरणाक्षस को परमात्मा ने (आखिर जान से) मार दिया (और अपने भगत) प्रहलाद को (पिता के दिए कष्टों से) सही सलामत बचा लिया (जैसे कि मंदिर में धक्के देने वाले) निंदकों और (जाति-) अभिमानियों को (परमात्मा ने) पीठ दे के (मात दे के) (अपने भक्त) नामदेव को दर्शन दिए। हे दास नानक ! जो भी मनुष्य ऐसे समर्था वाले परमात्मा की सेवा भक्ति करता है परमात्मा उसे (दोखियों द्वारा दिए जा रहे सब कष्टों से) आखिर बचा लेता है। 4। 13। 20।
आसा महला 4 छंत घरु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन परदेसी वे पिआरे आउ घरे ॥
हरि गुरू मिलावहु मेरे पिआरे घरि वसै हरे ॥
रंगि रलीआ माणहु मेरे पिआरे हरि किरपा करे ॥
गुरु नानकु तुठा मेरे पिआरे मेले हरे ॥1॥
मै प्रेमु न चाखिआ मेरे पिआरे भाउ करे ॥
मनि त्रिसना न बुझी मेरे पिआरे नित आस करे ॥
नित जोबनु जावै मेरे पिआरे जमु सास हिरे ॥
भाग मणी सोहागणि मेरे पिआरे नानक हरि उरि धारे ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 छंत घरु 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे जगह-जगह भटकने वाले मन ! हे प्यारे मन ! कभी तो प्रभू चरणों में जुड़। हे मेरे प्यारे मन ! हरि-रूप गुरू को मिल (आपको समझ आ जाएगी कि सब सुखों का दाता) परमात्मा आपके अंदर ही बस रहा है। हेमेरे प्यारे मन ! प्रभू के प्रेम में टिक के आत्मिक आनंद ले (अरदास करता रह कि आपके पर) प्रभू ये मेहर (की दाति) करे। नानक (कहता है) हे मेरे प्यारे मन ! जिस मनुष्य पे गुरू दयावान होता है उसे परमात्मा से मिला देता है। 1। हे मेरे प्यारे ! मैंने (प्रभू चरणों में) प्रेम जोड़ के उसके प्यार का स्वाद (कभी भी) नहीं चखा। (क्योंकि) हे मेरे प्यारे ! मेरे मन में (बस रही माया की) तृष्णा कभी खत्म ही नहीं हुई।(मेरा मन) सदा (माया की ही) आशाएं बनाता रहता है। हे मेरे प्यारे ! सदा (इसी हालत में ही) मेरी जवानी गुजरती जा रही है।और मौत का देवता मेरी सांसों को (ध्यान से) ताक रहा है (कि सांसें पूरी हों और इसे आ पकड़ूँ)। हे नानक ! (कह) हे मेरे प्यारे ! वही जीव स्त्री भाग्यशाली बनती है उसी के माथे पे भाग्यों की मणि चमकती है जो परमात्मा (की याद) अपने हृदय में टिकाए रखती है। 2।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वे अपने गुरू को अभॅुल जान के उसकी बताई हुई सेवा करते रहते हैं (जिसकी बरकति से उनके मन में से) माया की भूख दूर हो जाती है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।