गुरसिखा की भुख सभ गई तिन पिछै होर खाइ घनेरी ॥
जन नानक हरि पुंनु बीजिआ फिरि तोटि न आवै हरि पुंन केरी ॥3॥
गुरसिखा मनि वाधाईआ जिन मेरा सतिगुरू डिठा राम राजे ॥
कोई करि गल सुणावै हरि नाम की सो लगै गुरसिखा मनि मिठा ॥
हरि दरगह गुरसिख पैनाईअहि जिन॑ा मेरा सतिगुरु तुठा ॥
जन नानकु हरि हरि होइआ हरि हरि मनि वुठा ॥4॥12॥19॥
जिन॑ा भेटिआ मेरा पूरा सतिगुरू तिन हरि नामु द्रिड़ावै राम राजे ॥
तिस की त्रिसना भुख सभ उतरै जो हरि नामु धिआवै ॥
जो हरि हरि नामु धिआइदे तिन॑ जमु नेड़ि न आवै ॥
जन नानक कउ हरि क्रिपा करि नित जपै हरि नामु हरि नामि तरावै ॥1॥
जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ तिना फिरि बिघनु न होई राम राजे ॥
जिनी सतिगुरु पुरखु मनाइआ तिन पूजे सभु कोई ॥
जिन॑ी सतिगुरु पिआरा सेविआ तिन॑ा सुखु सद होई ॥
जिन॑ा नानकु सतिगुरु भेटिआ तिन॑ा मिलिआ हरि सोई ॥2॥
जिन॑ा अंतरि गुरमुखि प्रीति है तिन॑ हरि रखणहारा राम राजे ॥
तिन॑ की निंदा कोई किआ करे जिन॑ हरि नामु पिआरा ॥
जिन हरि सेती मनु मानिआ सभ दुसट झख मारा ॥
जन नानक नामु धिआइआ हरि रखणहारा ॥3॥
हरि जुगु जुगु भगत उपाइआ पैज रखदा आइआ राम राजे ॥
हरणाखसु दुसटु हरि मारिआ प्रहलादु तराइआ ॥
अहंकारीआ निंदका पिठि देइ नामदेउ मुखि लाइआ ॥
जन नानक ऐसा हरि सेविआ अंति लए छडाइआ ॥4॥13॥20॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन परदेसी वे पिआरे आउ घरे ॥
हरि गुरू मिलावहु मेरे पिआरे घरि वसै हरे ॥
रंगि रलीआ माणहु मेरे पिआरे हरि किरपा करे ॥
गुरु नानकु तुठा मेरे पिआरे मेले हरे ॥1॥
मै प्रेमु न चाखिआ मेरे पिआरे भाउ करे ॥
मनि त्रिसना न बुझी मेरे पिआरे नित आस करे ॥
नित जोबनु जावै मेरे पिआरे जमु सास हिरे ॥
भाग मणी सोहागणि मेरे पिआरे नानक हरि उरि धारे ॥2॥
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वे अपने गुरू को अभॅुल जान के उसकी बताई हुई सेवा करते रहते हैं (जिसकी बरकति से उनके मन में से) माया की भूख दूर हो जाती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।