मनु सीतलु होआ मेरे पिआरे हरि बूंद पीवै ॥
तनि बिरहु जगावै मेरे पिआरे नीद न पवै किवै ॥
हरि सजणु लधा मेरे पिआरे नानक गुरू लिवै ॥3॥
चड़ि चेतु बसंतु मेरे पिआरे भलीअ रुते ॥
पिर बाझड़िअहु मेरे पिआरे आंगणि धूड़ि लुते ॥
मनि आस उडीणी मेरे पिआरे दुइ नैन जुते ॥
गुरु नानकु देखि विगसी मेरे पिआरे जिउ मात सुते ॥4॥
हरि कीआ कथा कहाणीआ मेरे पिआरे सतिगुरू सुणाईआ ॥
गुर विटड़िअहु हउ घोली मेरे पिआरे जिनि हरि मेलाईआ ॥
सभि आसा हरि पूरीआ मेरे पिआरे मनि चिंदिअड़ा फलु पाइआ ॥
हरि तुठड़ा मेरे पिआरे जनु नानकु नामि समाइआ ॥5॥
पिआरे हरि बिनु प्रेमु न खेलसा ॥
किउ पाई गुरु जितु लगि पिआरा देखसा ॥
हरि दातड़े मेलि गुरू मुखि गुरमुखि मेलसा ॥
गुरु नानकु पाइआ मेरे पिआरे धुरि मसतकि लेखु सा ॥6॥14॥21॥
रागु आसा महला 5 छंत घरु 1 ॥
अनदो अनदु घणा मै सो प्रभु डीठा राम ॥
चाखिअड़ा चाखिअड़ा मै हरि रसु मीठा राम ॥
हरि रसु मीठा मन महि वूठा सतिगुरु तूठा सहजु भइआ ॥
ग्रिहु वसि आइआ मंगलु गाइआ पंच दुसट ओइ भागि गइआ ॥
सीतल आघाणे अंम्रित बाणे साजन संत बसीठा ॥
कहु नानक हरि सिउ मनु मानिआ सो प्रभु नैणी डीठा ॥1॥
सोहिअड़े सोहिअड़े मेरे बंक दुआरे राम ॥
पाहुनड़े पाहुनड़े मेरे संत पिआरे राम ॥
संत पिआरे कारज सारे नमसकार करि लगे सेवा ॥
आपे जाञी आपे माञी आपि सुआमी आपि देवा ॥
अपणा कारजु आपि सवारे आपे धारन धारे ॥
कहु नानक सहु घर महि बैठा सोहे बंक दुआरे ॥2॥
नव निधे नउ निधे मेरे घर महि आई राम ॥
सभु किछु मै सभु किछु पाइआ नामु धिआई राम ॥
नामु धिआई सदा सखाई सहज सुभाई गोविंदा ॥
गणत मिटाई चूकी धाई कदे न विआपै मन चिंदा ॥
गोविंद गाजे अनहद वाजे अचरज सोभ बणाई ॥
कहु नानक पिरु मेरै संगे ता मै नव निधि पाई ॥3॥
सरसिअड़े सरसिअड़े मेरे भाई सभ मीता राम ॥
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे प्यारे ! मेरी आँखें प्रभू पति के दर्शनों में मस्त हैं जैसे पपीहा (स्वाति की बरखा की) बूँद (की चाहत रखता है)।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।