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अंग 452

अंग
452
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पिर रतिअड़े मैडे लोइण मेरे पिआरे चात्रिक बूंद जिवै ॥
मनु सीतलु होआ मेरे पिआरे हरि बूंद पीवै ॥
तनि बिरहु जगावै मेरे पिआरे नीद न पवै किवै ॥
हरि सजणु लधा मेरे पिआरे नानक गुरू लिवै ॥3॥
चड़ि चेतु बसंतु मेरे पिआरे भलीअ रुते ॥
पिर बाझड़िअहु मेरे पिआरे आंगणि धूड़ि लुते ॥
मनि आस उडीणी मेरे पिआरे दुइ नैन जुते ॥
गुरु नानकु देखि विगसी मेरे पिआरे जिउ मात सुते ॥4॥
हरि कीआ कथा कहाणीआ मेरे पिआरे सतिगुरू सुणाईआ ॥
गुर विटड़िअहु हउ घोली मेरे पिआरे जिनि हरि मेलाईआ ॥
सभि आसा हरि पूरीआ मेरे पिआरे मनि चिंदिअड़ा फलु पाइआ ॥
हरि तुठड़ा मेरे पिआरे जनु नानकु नामि समाइआ ॥5॥
पिआरे हरि बिनु प्रेमु न खेलसा ॥
किउ पाई गुरु जितु लगि पिआरा देखसा ॥
हरि दातड़े मेलि गुरू मुखि गुरमुखि मेलसा ॥
गुरु नानकु पाइआ मेरे पिआरे धुरि मसतकि लेखु सा ॥6॥14॥21॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे प्यारे ! मेरी आँखें प्रभू पति के दर्शनों में मस्त हैं जैसे पपीहा (स्वाति की बरखा की) बूँद (की चाहत रखता है)। हे मेरे प्यारे ! जब मेरा मन परमात्मा के नाम जल की बूँद पीता है तो ठंडा-ठार हो जाता है। हे मेरे प्यारे ! मेरे शरीर में उपजा हुआ विछोड़े का दर्द मुझे जगाए रखता है।किसी तरह भी मुझे नींद नहीं आती। हे नानक ! (कह) हे मेरे प्यारे ! गुरू की बख्शी लगन की बरकति से मैंने सज्जन प्रभू को (अपने अंदर ही) पा लिया है। 3। हे मेरे प्यारे ! चेत (का महीना) चढ़ता है।बसंत (का मौसम) आता है।(सारा संसार कहता है कि ये) सोहानी ऋतु (आ गई है पर) हे मेरे प्यारे ! मेरे मन में (प्रभू मिलाप की) आस उठ रही है।(मैं दुनिया वाली सोहानी बसंत ऋतु से) उदास हूँ। मेरी दोनों आँखें (बसंत की बहार को देखने की जगह प्रभू-पति के दर्शनों के इन्तजार में) जुड़ी पड़ी हैं। नानक (कहता है, अब) हे मेरे प्यारे ! गुरू नानक को देख के (मेरी जीवात्मा ऐसे) खिल पड़ी है जैसे मां अपने पुत्र को देख के खिल पड़ती है। 4। हे मेरे प्यारे ! मुझे गुरू ने परमात्मा की सिफत-सालाह की बातें सुनाई हैं। मैं उस गुरू से सदके जाती हूँ जिसने मुझे प्रभू-पति के चरणों में जोड़ दिया है। हे मेरे प्यारे ! प्रभू ने मेरी सारी आशाएं पूरी कर दी हैं।प्रभू से मैंने मन-चितवा फल पा लिया है। नानक (कहता है) हे मेरे प्यारे ! जिस (भाग्यशाली मनुष्य पे) परमात्मा दयावान होता है वह परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है। 5। हे प्यारे ! परमात्मा के बिना (किसी और से) मैं प्रेम (की खेल) नहीं खेलूँगी। (हे प्यारे ! बता) मै गुरू को कैसे ढूँढू जिससे मैं आपके दर्शन कर सकूँ। हे प्यारे दातार हरी ! मुझे गुरू मिला।गुरू के द्वारा ही मैं आपके दर्शन कर सकूँगी। नानक (कहता है) हे मेरे प्यारे ! (जिस भाग्यशाली के) माथे पे धुर दरगाह से (प्रभू-मिलाप का) लेख लिखा होता है उसे गुरू मिल जाता है। 6। 14। 21।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला 5 छंत घरु 1 ॥
अनदो अनदु घणा मै सो प्रभु डीठा राम ॥
चाखिअड़ा चाखिअड़ा मै हरि रसु मीठा राम ॥
हरि रसु मीठा मन महि वूठा सतिगुरु तूठा सहजु भइआ ॥
ग्रिहु वसि आइआ मंगलु गाइआ पंच दुसट ओइ भागि गइआ ॥
सीतल आघाणे अंम्रित बाणे साजन संत बसीठा ॥
कहु नानक हरि सिउ मनु मानिआ सो प्रभु नैणी डीठा ॥1॥
सोहिअड़े सोहिअड़े मेरे बंक दुआरे राम ॥
पाहुनड़े पाहुनड़े मेरे संत पिआरे राम ॥
संत पिआरे कारज सारे नमसकार करि लगे सेवा ॥
आपे जाञी आपे माञी आपि सुआमी आपि देवा ॥
अपणा कारजु आपि सवारे आपे धारन धारे ॥
कहु नानक सहु घर महि बैठा सोहे बंक दुआरे ॥2॥
नव निधे नउ निधे मेरे घर महि आई राम ॥
सभु किछु मै सभु किछु पाइआ नामु धिआई राम ॥
नामु धिआई सदा सखाई सहज सुभाई गोविंदा ॥
गणत मिटाई चूकी धाई कदे न विआपै मन चिंदा ॥
गोविंद गाजे अनहद वाजे अचरज सोभ बणाई ॥
कहु नानक पिरु मेरै संगे ता मै नव निधि पाई ॥3॥
सरसिअड़े सरसिअड़े मेरे भाई सभ मीता राम ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा महला 5 छंत घरु 1 ॥ (हे भाई ! मेरे हृदय-घर में) आनंद ही आनंद बन गया है (क्योंकि) मैंने उस प्रभू के दर्शन कर लिए हैं (जो आनंद का श्रोत है)। और मैंने परमात्मा के नाम का मीठा रस चख लिया है। (हे भाई !) परमात्मा के नाम का मीठा रस मेरे मन में आ बसा है (क्योंकि) सतिगुरू (मेरे पर) दयावान हो गया है (गुरू की मेहर से मेरे अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा हो गई है। अब मेरा (हृदय) घर बस गया है (मेरी ज्ञानेन्द्रियां) खुशी के गीत गा रही हैं (मेरे हृदय-घर में से) वह (कामादिक) पाँचों वैरी भाग गए हैं। (हे भाई ! जब का) मित्र गुरू (परमात्मा से मिलाने के लिए) वकील बना है विचौला बना है।उसकी आत्मिक जीवन देने वाली बाणी की बरकति से मेरी ज्ञानेन्द्रियां ठंडी-ठार हो गई हैं (मायावी पदार्थों की ओर से) तृप्त हो गई हैं। हे नानक ! कह, मेरा मन अब परमात्मा के साथ रच-मिच गया है।मैंने उस परमात्मा को (अपनी) आँखों से देख लिया है। 1। (हे सखी ! मेरे हृदय घर के सारे दरवाजे) मेरे ज्ञानेन्द्रियां सुंदर हो गई हैं शोभनीय हो गई हैं (क्योंकि मेरे हृदय-घर में) मेरी जिंद के साई मेरे संत-प्रभू जी आ बिराजे हैं। मेरे प्यारे संत-प्रभू जी मेरे सारे काम सँवार रहे हैं (मेरी सारी ज्ञानेन्द्रियां उस संत-प्रभू को) नमस्कार कर के उसकी सेवा-भक्ति में लग गई हैं। वह स्वयं ही जांजी वह स्वयं ही मेल है वह स्वयं ही मालिक है स्वयं ही ईष्ट देव है। (मेरी जीवात्मा का मालिक प्रभू मेरी जीवात्मा को अपने चरनों में जोड़ने का ये) अपना काम खुद समपन्न करता है। हे नानक ! कह, मेरा पति-प्रभू मेरे हृदय-घर में आ बैठता है।मेरी सारी ज्ञानेन्द्रियां सुंदर बन गई हैं। 2। सृष्टि के सारे ही नौ खजाने मेरे हृदय-घर में आ टिके हैं। हे भाई ! अब मैं परमात्मा का नाम सिमरता हूँ, मुझे हरेक पदार्थ मिल गया है, मैंने सब कुछ पा लिया है, मैं उस गोविंद का नाम सदा सिमरता हूँ जो मेरा सदा के लिए साथी बन गया है, जिसके सदका मेरे अंदर आत्मिक अडोलता और प्रेम पैदा हो गए हैं। मैंने अपने अंदर से चिंता-फिक्र मिटा ली है, मेरी भटकन खत्म हो गई है, कोई चिंता मेरे मन पर कभी जोर नहीं डाल सकती। मेरे अंदर गोविंद गरज रहा है (प्रभू के सिमरन का आनंद पूरे यौवन में है।इस तरह आनंद बना हुआ है, मानो, सारे संगीतक साज) एक-रस (मेरे अंदर) बज रहे हैं। (परमात्मा ने मेरे अंदर) हैरान कर देने वाली आत्मिक सुंदरता पैदा कर दी। हे नानक ! कह, प्रभू पति मेरे अंग-संग बस रहा है, तभी तो मुझे प्रतीत हो रहा है कि मैंने सृष्टि के नौ ही खजाने पा लिए हैं।3। अब मेरे सारे मित्र-भाई (सारी ही ज्ञानेन्द्रियां) आनंद-पूरित हो रहे हैं।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे प्यारे ! मेरी आँखें प्रभू पति के दर्शनों में मस्त हैं जैसे पपीहा (स्वाति की बरखा की) बूँद (की चाहत रखता है)।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।