अंग
450
आसा
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जन नानक कउ हरि बखसिआ हरि भगति भंडारा ॥2॥
जन नानक कउ हरि बखसिआ हरि भगति भंडारा ॥2॥
हम किआ गुण तेरे विथरह सुआमी तूं अपर अपारो राम राजे ॥
हरि नामु सालाहह दिनु राति एहा आस आधारो ॥
हम मूरख किछूअ न जाणहा किव पावह पारो ॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि दास पनिहारो ॥3॥
जिउ भावै तिउ राखि लै हम सरणि प्रभ आए राम राजे ॥
हम भूलि विगाड़ह दिनसु राति हरि लाज रखाए ॥
हम बारिक तूं गुरु पिता है दे मति समझाए ॥
जनु नानकु दासु हरि कांढिआ हरि पैज रखाए ॥4॥10॥17॥
हम किआ गुण तेरे विथरह सुआमी तूं अपर अपारो राम राजे ॥
हरि नामु सालाहह दिनु राति एहा आस आधारो ॥
हम मूरख किछूअ न जाणहा किव पावह पारो ॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि दास पनिहारो ॥3॥
जिउ भावै तिउ राखि लै हम सरणि प्रभ आए राम राजे ॥
हम भूलि विगाड़ह दिनसु राति हरि लाज रखाए ॥
हम बारिक तूं गुरु पिता है दे मति समझाए ॥
जनु नानकु दासु हरि कांढिआ हरि पैज रखाए ॥4॥10॥17॥
हिन्दी अर्थ: हे हरी ! अपने दास नानक को भी आपने ही (मेहर कर के) अपनी भक्ति का खजाना बख्शा है। 2। हे मेरे मालिक ! (आप बेअंत गुणों के मालिक हैं) हम आपके कौन-कौन से गुण गिन-गिन के बता सकते हैं।आप बेअंत हैं।आप बेअंत हैं। हे स्वामी ! हम तो दिन-रात आपके नाम की ही वडिआई करते हैं।हमारे जीवन का यही सहारा है यही आसरा है। हे प्रभू ! हम मूर्ख हैं।हमें कोई समझ नहीं।हम आपका अंत कैसे पा सकते हैं। (हे भाई !) दास नानक तो परमात्मा का दास है।परमात्मा के दासों का दास है। 3। हे प्रभू ! हम आपकी शरण आए हैं।अब जैसे आपकी मर्जी हो वैसे हमें (बुरे कामों से) बचा ले। हम दिन-रात (जीवन-राह से) टूट के (अपने आत्मिक जीवन को) खराब करते रहते हैं।हे हरी ! हमारी इज्जत रख। हे प्रभू ! हम आपके बच्चे हैं।आप हमारे गुरु हैं आप हमारे पिता हैं।हमें मति दे के उत्तम सोच बख्श। हे हरी ! दास नानक आपका दास कहलवाता है।(मेहर कर।अपने दास की) इज्जत रख। 4। 10। 17।
जिन मसतकि धुरि हरि लिखिआ तिना सतिगुरु मिलिआ राम राजे ॥
आसा महला 4 ॥
जिन मसतकि धुरि हरि लिखिआ तिना सतिगुरु मिलिआ राम राजे ॥
अगिआनु अंधेरा कटिआ गुर गिआनु घटि बलिआ ॥
हरि लधा रतनु पदारथो फिरि बहुड़ि न चलिआ ॥
जन नानक नामु आराधिआ आराधि हरि मिलिआ ॥1॥
जिनी ऐसा हरि नामु न चेतिओ से काहे जगि आए राम राजे ॥
इहु माणस जनमु दुलंभु है नाम बिना बिरथा सभु जाए ॥
हुणि वतै हरि नामु न बीजिओ अगै भुखा किआ खाए ॥
मनमुखा नो फिरि जनमु है नानक हरि भाए ॥2॥
तूं हरि तेरा सभु को सभि तुधु उपाए राम राजे ॥
किछु हाथि किसै दै किछु नाही सभि चलहि चलाए ॥
जिन॑ तूं मेलहि पिआरे से तुधु मिलहि जो हरि मनि भाए ॥
जन नानक सतिगुरु भेटिआ हरि नामि तराए ॥3॥
कोई गावै रागी नादी बेदी बहु भाति करि नही हरि हरि भीजै राम राजे ॥
जिना अंतरि कपटु विकारु है तिना रोइ किआ कीजै ॥
हरि करता सभु किछु जाणदा सिरि रोग हथु दीजै ॥
जिना नानक गुरमुखि हिरदा सुधु है हरि भगति हरि लीजै ॥4॥11॥18॥
जिन मसतकि धुरि हरि लिखिआ तिना सतिगुरु मिलिआ राम राजे ॥
अगिआनु अंधेरा कटिआ गुर गिआनु घटि बलिआ ॥
हरि लधा रतनु पदारथो फिरि बहुड़ि न चलिआ ॥
जन नानक नामु आराधिआ आराधि हरि मिलिआ ॥1॥
जिनी ऐसा हरि नामु न चेतिओ से काहे जगि आए राम राजे ॥
इहु माणस जनमु दुलंभु है नाम बिना बिरथा सभु जाए ॥
हुणि वतै हरि नामु न बीजिओ अगै भुखा किआ खाए ॥
मनमुखा नो फिरि जनमु है नानक हरि भाए ॥2॥
तूं हरि तेरा सभु को सभि तुधु उपाए राम राजे ॥
किछु हाथि किसै दै किछु नाही सभि चलहि चलाए ॥
जिन॑ तूं मेलहि पिआरे से तुधु मिलहि जो हरि मनि भाए ॥
जन नानक सतिगुरु भेटिआ हरि नामि तराए ॥3॥
कोई गावै रागी नादी बेदी बहु भाति करि नही हरि हरि भीजै राम राजे ॥
जिना अंतरि कपटु विकारु है तिना रोइ किआ कीजै ॥
हरि करता सभु किछु जाणदा सिरि रोग हथु दीजै ॥
जिना नानक गुरमुखि हिरदा सुधु है हरि भगति हरि लीजै ॥4॥11॥18॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे भाई !) जिन मनुष्यों के माथे पर धुर दरगाह से परमात्मा (गुरू-मिलाप का लेख) लिख देता है उन्हें गुरू मिल जाता है (उनके मन में से गुरू की मेहर से) आत्मिक जीवन से अज्ञानता का अंधकार दूर हो जाता है।और।उनके हृदय में गुरू के बख्शे हुए आत्मिक जीवन के ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। उन्हें परमात्मा के नाम का कीमती रत्न मिल जाता है जो दुबारा (उनसे कभी) गायब नहीं होता। हे दास नानक ! (कह, हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं।नाम सिमर के वह परमात्मा में ही लीन हो जाते हैं। 1। (हे भाई ! आत्मिक जीवन की सूझ देने वाला) ऐसा कीमती नाम जिन मनुष्यों ने नहीं सिमरा।वे जगत में पैदा ही क्यूँ हुए।(उनका मानस जनम किसी काम ना आया)। ये मानस जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है।नाम सिमरन के बिना सारे का सारा व्यर्थ चला जाता है। (हे भाई ! जो किसान ठीक वक्त पर बोवाई के समय खेत को नहीं बीजता वह समय बीत जाने पर भूखा मरता है।वैसे ही) जो मानस जनम में ठीक समय में (अपने हृदय की खेती में) परमात्मा का नाम नहीं बीजता। वह परलोक में तब कौन सी खुराक बरतेगा जब आत्मिक जीवन के फलने-फूलने के लिए नाम-भोजन की जरूरत पड़ेगी।हे नानक ! (कह) अपने मन के पीछे चलने वालों को बारंबार जन्मों का चक्कर मिलता है (उनके वास्ते) परमात्मा को यही ठीक लगता है। 2। हे हरी ! आप सब जीवों के मालिक हैं।हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ है)।सारे जीव आपके ही पैदा किए हुए हैं। किसी जीव के अपने वश में कुछ भी नहीं।जैसे आप चलाते हैं वैसे ही सारे जीव चलते हैं। हे प्यारे ! जिन जीवों को आप अपने साथ मिलाते हैं।जो आपके अपने मन को भाते हैं वही आपके चरणों में जुड़े रहते हैं। हे दास नानक ! (कह, हे भाई !) जिन मनुष्यों को गुरू मिल जाता है।गुरू उनको परमात्मा के नाम में जोड़ के (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 3। (हे भाई !) कोई मनुष्य राग गा-गा के।कोई शंख आदि बजा के।कोई धर्म-पुस्तकें पढ़ के कई ढंगों-तरीकों से परमात्मा के गुण गाता है।पर।परमात्मा इस तरह प्रसन्न नहीं होता जिनके मन में छल-कपट एवं विकार हैं, उनके विलाप करने का क्या अभिप्राय है ? (क्योंकि) करतार (हरेक मनुष्य के दिल की) हरेक बात जानता है अंदरूनी रोगों पर बेशक हाथ दिया जाए (अर्थात।अंदरूनी विकारों को छिपाने का चाहे जितना भी यतन किया जाए।तो भी परमात्मा से छुपा नहीं रह सकता)। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जिन मनुष्यों का हृदय पवित्र हो जाता है।वही परमात्मा की भक्ति करते हैं।वही हरी का नाम लेते हैं। 4। 11। 18।
जिन अंतरि हरि हरि प्रीति है ते जन सुघड़ सिआणे राम राजे ॥
आसा महला 4 ॥
जिन अंतरि हरि हरि प्रीति है ते जन सुघड़ सिआणे राम राजे ॥
जे बाहरहु भुलि चुकि बोलदे भी खरे हरि भाणे ॥
हरि संता नो होरु थाउ नाही हरि माणु निमाणे ॥
जन नानक नामु दीबाणु है हरि ताणु सताणे ॥1॥
जिथै जाइ बहै मेरा सतिगुरू सो थानु सुहावा राम राजे ॥
गुरसिखंी सो थानु भालिआ लै धूरि मुखि लावा ॥
गुरसिखा की घाल थाइ पई जिन हरि नामु धिआवा ॥
जिन॑ नानकु सतिगुरु पूजिआ तिन हरि पूज करावा ॥2॥
गुरसिखा मनि हरि प्रीति है हरि नाम हरि तेरी राम राजे ॥
जिन अंतरि हरि हरि प्रीति है ते जन सुघड़ सिआणे राम राजे ॥
जे बाहरहु भुलि चुकि बोलदे भी खरे हरि भाणे ॥
हरि संता नो होरु थाउ नाही हरि माणु निमाणे ॥
जन नानक नामु दीबाणु है हरि ताणु सताणे ॥1॥
जिथै जाइ बहै मेरा सतिगुरू सो थानु सुहावा राम राजे ॥
गुरसिखंी सो थानु भालिआ लै धूरि मुखि लावा ॥
गुरसिखा की घाल थाइ पई जिन हरि नामु धिआवा ॥
जिन॑ नानकु सतिगुरु पूजिआ तिन हरि पूज करावा ॥2॥
गुरसिखा मनि हरि प्रीति है हरि नाम हरि तेरी राम राजे ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे भाई !) जिन लोगों के हृदय में परमात्मा का प्यार मौजूद है (परमात्मा की नजरों में) वह लोग सुघड़ हैं।सियाने हैं। अगर वे कभी गलती से भी बाहर लोगों में (कच्चे बोल) बोल बैठते हैं तो भी परमात्मा को वे प्यारे लगते हैं। (हे भाई !) परमात्मा के संतों को (परमात्मा के बिना) और कोई आसरा नहीं होता (वे जानते हैं कि) परमातमा ही निमाणों का माण है। हे नानक ! (कह) परमात्मा के सेवकों के वास्ते परमात्मा का नाम ही सहारा है।परमात्मा ही उनका बाहुबल है (जिसके आसरे वे विकारों के मुकाबले में) बलवान रहते हैं। 1। (हे भाई !) जिस जगह पर प्यारा गुरू जा बैठता है (गुरू के सिखों के वास्ते) वह स्थान सोहाना बन जाता है। गुरसिख उस स्थान को पा लेते हैं।और उसकी धूड़ ले के अपने माथे पर लगा लेते हैं। जो गुरसिख परमात्मा का नाम सिमरते हैं उनकी (गुरू-स्थान तलाशने की) मेहनत परमात्मा के दर पर कबूल हो जाती है। नानक (कहता है) जो मनुष्य (अपने हृदय में) गुरू का आदर-सत्कार बैठाते हैं।परमात्मा (जगत में उनका) आदर करवाता है। 2। हे हरी ! गुरू के सिखों के मन में आपकी प्रीति बनी रहती है आपके नाम का प्यार टिका रहता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४५० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।