Lulla Family

अंग 449

अंग
449
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जनु नानकु मुसकि झकोलिआ सभु जनमु धनु धंना ॥1॥
हरि प्रेम बाणी मनु मारिआ अणीआले अणीआ राम राजे ॥
जिसु लागी पीर पिरंम की सो जाणै जरीआ ॥
जीवन मुकति सो आखीऐ मरि जीवै मरीआ ॥
जन नानक सतिगुरु मेलि हरि जगु दुतरु तरीआ ॥2॥
हम मूरख मुगध सरणागती मिलु गोविंद रंगा राम राजे ॥
गुरि पूरै हरि पाइआ हरि भगति इक मंगा ॥
मेरा मनु तनु सबदि विगासिआ जपि अनत तरंगा ॥
मिलि संत जना हरि पाइआ नानक सतसंगा ॥3॥
दीन दइआल सुणि बेनती हरि प्रभ हरि राइआ राम राजे ॥
हउ मागउ सरणि हरि नाम की हरि हरि मुखि पाइआ ॥
भगति वछलु हरि बिरदु है हरि लाज रखाइआ ॥
जनु नानकु सरणागती हरि नामि तराइआ ॥4॥8॥15॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: (गुरू की कृपा से) दास नानक (प्रभू के नाम की) कस्तूरी से पूरी तरह सुगंधित हो गया है।(दास नानक का) सारा जीवन ही भाग्यशाली बन गया है। 1। प्रभू चरणों में प्रेम पैदा करने वाली गुरबाणी ने मेरा मन भेद दिया है जैसे तीखी नोक वाले तीर (किसी चीज को) भेद देते हैं। (हे भाई !) जिस मनुष्य के अंदर प्रभू प्रेम की पीड़ा उठती है वही जानता है कि उस को कैसे सहा जा सकता है। जो मनुष्य माया के मोह की ओर से अछोह हो के आत्मिक जीवन जीता है वह दुनिया की किरत-कार करता हुआ ही माया के बंधनों से आजाद रहता है। हे दास नानक ! (कह) हे हरी ! मुझे गुरू मिला।ता कि मैं मुश्किल से तैरे जाने वाले इस संसार (समुंदर) से पार लांघ सकूँ। 2। हे बेअंत करिश्मों के मालिक गोविंद ! (हमें) मिल।हममूर्ख बेसमझ आपकी शरण में आए हैं। (हे भाई !) मैं (गुरू से) परमात्मा की भक्ति (की दाति) मांगता हूँ (क्योंकि) पूरे गुरू के माध्यम से परमात्मा मिल सकता है। (हे भाई !) गुरू के शबद से बेअंत लहरों वाले (समुंद्र-प्रभू) को सिमर के मेरा मन खिल गया है।मेरा हृदय प्रफुल्लित हो गया है। हे नानक ! (कह) संत जनों को मिल के संतों की संगति में मैंने परमात्मा को पा लिया है। 3। हे दीनों पर दया करने वाले ! हे हरी ! हे प्रभू ! हे प्रभू पातशाह ! मेरी विनती सुन। हे हरी ! मैं आपके नाम का आसरा मांगता हूँ। हे हरी ! (आपकी मेहर हैं तो मैं आपका नाम) अपने मुंह में ले सकता हूँ (मुंह से जप सकता हूँ)। (हे भाई !) परमात्मा का ये मूल कदीमी स्वभाव है।बिरद है कि वह भक्ति से प्यार करता है (जो उसकी शरण पड़े।उसकी) इज्जत रख लेता है। (हे भाई !) दास नानक (भी) उस हरी की शरण आ पड़ा है (शरण आए मनुष्य को) हरी अपने नाम में जोड़ के (संसार-समुंदर से) पार लंघा लेता है। 4। 8। 15।
आसा महला 4 ॥
गुरमुखि ढूंढि ढूढेदिआ हरि सजणु लधा राम राजे ॥
कंचन काइआ कोट गड़ विचि हरि हरि सिधा ॥
हरि हरि हीरा रतनु है मेरा मनु तनु विधा ॥
धुरि भाग वडे हरि पाइआ नानक रसि गुधा ॥1॥
पंथु दसावा नित खड़ी मुंध जोबनि बाली राम राजे ॥
हरि हरि नामु चेताइ गुर हरि मारगि चाली ॥
मेरै मनि तनि नामु आधारु है हउमै बिखु जाली ॥
जन नानक सतिगुरु मेलि हरि हरि मिलिआ बनवाली ॥2॥
गुरमुखि पिआरे आइ मिलु मै चिरी विछुंने राम राजे ॥
मेरा मनु तनु बहुतु बैरागिआ हरि नैण रसि भिंने ॥
मै हरि प्रभु पिआरा दसि गुरु मिलि हरि मनु मंने ॥
हउ मूरखु कारै लाईआ नानक हरि कंमे ॥3॥
गुर अंम्रित भिंनी देहुरी अंम्रितु बुरके राम राजे ॥
जिना गुरबाणी मनि भाईआ अंम्रिति छकि छके ॥
गुर तुठै हरि पाइआ चूके धक धके ॥
हरि जनु हरि हरि होइआ नानकु हरि इके ॥4॥9॥16॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ के तलाश करते-करते मैंने मित्र प्रभू को (अपने अंदर ही) पा लिया है। मेरा ये शरीर किला (जैसे) सोने का बन गया है (क्योंकि गुरू की कृपा से) इसमें परमात्मा प्रगट हो गया है। (हे भाई ! मुझे अपने अंदर ही) परमात्मा का नाम-रत्न।परमात्मा का नाम-हीरा (मिल गया) है (जिससे मेरा कठोर) मन (मेरा कठोर) हृदय भेदित हो गया है (नर्म पड़ गया है)। हे नानक ! (कह, हे भाई !) धुर प्रभू की हजूरी से बड़े भाग्यों से मुझे परमात्मा मिल गया है।मेरा स्वै उसकेप्रेम-रस में भीग गया है। 1। हे सतिगुरू ! मैं जोबन वंती अंजान जीव-स्त्री (आपके दर से) सदा खड़ी हुई (आपसे पति-प्रभू के देश का) राह पूछती हूँ। हे सतिगुरू ! मुझे प्रभू-पति का नाम याद कराता रह (मेहर कर) मैं परमात्मा के (देस पहुँचने वाले) रास्ते पर चलूँ। मेरे मन में हृदय में प्रभू का नाम ही सहारा है (अगर आपकी कृपा हैं तो इस नाम की बरकति से अपने अंदर से) मैं अहंकार के जहर को जला दूँ। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू ! मुझे) गुरू मिला।जो भी कोई परमातमा को मिला है गुरू के द्वारा ही मिला है। 2। हे प्यारे हरी ! मुझे चिरों से विछुड़े हुए को गुरू के द्वारा आ मिल। हे हरी ! मेरा मन मेरा हृदय बहुत ही विरक्त हुआ है (वैराग में आ गया है)।मेरी आँखें (विछोड़े के कारण आपके) प्रेम जाल में भीगी हुई हैं। हे हरी ! मुझे प्यारे गुरू का पता बता।गुरू को मिल के मेरा मन आपकी याद में लीन हैं जाए। हे नानक ! (कह) हे हरी ! मैं मूर्ख हूँ।मुझे अपने (नाम सिमरन के) काम में जोड़। 3। (हे भाई !) गुरू का सुंदर हृदय सदा आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से भीगा रहता है।वह (गुरू औरों के हिरदै में भी यह) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल छिड़कता रहता है। जिन मनुष्यों को अपने मन में सतिगुरू की बाणी प्यारी लगने लग जाती है।बाणी का रस ले ले के उनके हृदय भी आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल में भीग जाते हैं। नानक (कहता है गुरू की कृपा से) परमात्मा और परमात्मा का सेवक एक-रूप हो जाते हैं। सेवक परमात्मा में लीन हो जाता है। 4। 9। 16।
आसा महला 4 ॥
हरि अंम्रित भगति भंडार है गुर सतिगुर पासे राम राजे ॥
गुरु सतिगुरु सचा साहु है सिख देइ हरि रासे ॥
धनु धंनु वणजारा वणजु है गुरु साहु साबासे ॥
जनु नानकु गुरु तिन॑ी पाइआ जिन धुरि लिखतु लिलाटि लिखासे ॥1॥
सचु साहु हमारा तूं धणी सभु जगतु वणजारा राम राजे ॥
सभ भांडे तुधै साजिआ विचि वसतु हरि थारा ॥
जो पावहि भांडे विचि वसतु सा निकलै किआ कोई करे वेचारा ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे भाई !) आत्मिक जीवन देने वाली प्रभू भक्ति के खजाने गुरू सतिगुरू के पास ही हैं। इस सदा-स्थिर हरि-भक्ति के खजाने का शाहूकार गुरू-सतिगुरू ही है।वह अपने सिखों को ये भक्ति का सरमाया देता है। (हे भाई !) (प्रभू-भक्ति का व्यापार) श्रेष्ठ व्यापार है।भाग्यशाली है वह मनुष्य जो ये व्यापार करता है।नाम-धन का शाह गुरू उस मनुष्य को शाबाश देता है। दास नानक (कहता है, हे भाई !) जिन मनुष्यों के माथे पर धुर से ही प्रभू की हजूरी से (इस सरमाए की प्राप्ति का) लेख लिखा है उनको ही मिलता है। 1। हे प्रभू ! आप हमारा मालिक है आप हमारा सदा कायम रहने वाला शाह है (आपका पैदा किया हुआ यह) सारा जगत यहाँ आपके दिए नाम-पूँजी से नाम का व्यापार करने आया हुआ है। हे प्रभू ! ये सारे जीव-जंतु तूने ही पैदा किए हैं।इनके अंदर भी आपकी ही दी हुई जीवात्मा मौजूद है। कोई बिचारा जीव (अपने प्रयासों से) कुछ भी नहीं कर सकता।जो कोई (गुण-अवगुण) पदार्थ आप इन शरीरों में डालता है वही उघड़ के सामने आता है।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(गुरू की कृपा से) दास नानक (प्रभू के नाम की) कस्तूरी से पूरी तरह सुगंधित हो गया है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।