वडा मेरा गोविंदु अगम अगोचरु आदि निरंजनु निरंकारु जीउ ॥
ता की गति कही न जाई अमिति वडिआई मेरा गोविंदु अलख अपार जीउ ॥
गोविंदु अलख अपारु अपरंपरु आपु आपणा जाणै ॥
किआ इह जंत विचारे कहीअहि जो तुधु आखि वखाणै ॥
जिस नो नदरि करहि तूं अपणी सो गुरमुखि करे वीचारु जीउ ॥
वडा मेरा गोविंदु अगम अगोचरु आदि निरंजनु निरंकारु जीउ ॥1॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता तेरा पारु न पाइआ जाइ जीउ ॥
तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि सभ महि रहिआ समाइ जीउ ॥
घट अंतरि पारब्रहमु परमेसरु ता का अंतु न पाइआ ॥
तिसु रूपु न रेख अदिसटु अगोचरु गुरमुखि अलखु लखाइआ ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती सहजे नामि समाइ जीउ ॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता तेरा पारु न पाइआ जाइ जीउ ॥2॥
तूं सति परमेसरु सदा अबिनासी हरि हरि गुणी निधानु जीउ ॥
हरि हरि प्रभु एको अवरु न कोई तूं आपे पुरखु सुजानु जीउ ॥
पुरखु सुजानु तूं परधानु तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तेरा सबदु सभु तूंहै वरतहि तूं आपे करहि सु होई ॥
हरि सभ महि रविआ एको सोई गुरमुखि लखिआ हरि नामु जीउ ॥
तूं सति परमेसरु सदा अबिनासी हरि हरि गुणी निधानु जीउ ॥3॥
सभु तूंहै करता सभ तेरी वडिआई जिउ भावै तिवै चलाइ जीउ ॥
तुधु आपे भावै तिवै चलावहि सभ तेरै सबदि समाइ जीउ ॥
सभ सबदि समावै जां तुधु भावै तेरै सबदि वडिआई ॥
गुरमुखि बुधि पाईऐ आपु गवाईऐ सबदे रहिआ समाई ॥
तेरा सबदु अगोचरु गुरमुखि पाईऐ नानक नामि समाइ जीउ ॥
सभु तूंहै करता सभ तेरी वडिआई जिउ भावै तिवै चलाइ जीउ ॥4॥7॥14॥
आसा महला 4 छंत घरु 4 ॥
हरि अंम्रित भिंने लोइणा मनु प्रेमि रतंना राम राजे ॥
मनु रामि कसवटी लाइआ कंचनु सोविंना ॥
गुरमुखि रंगि चलूलिआ मेरा मनु तनो भिंना ॥
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आसा महला 4 छंत ॥ (हे भाई !) मेरा गोबिंद (सबसे) बड़ा है (किसी भी समझदारी से उस तक मनुष्य की) पहुँच नहीं हो सकती।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।