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अंग 448

अंग
448
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आसा महला 4 छंत ॥
वडा मेरा गोविंदु अगम अगोचरु आदि निरंजनु निरंकारु जीउ ॥
ता की गति कही न जाई अमिति वडिआई मेरा गोविंदु अलख अपार जीउ ॥
गोविंदु अलख अपारु अपरंपरु आपु आपणा जाणै ॥
किआ इह जंत विचारे कहीअहि जो तुधु आखि वखाणै ॥
जिस नो नदरि करहि तूं अपणी सो गुरमुखि करे वीचारु जीउ ॥
वडा मेरा गोविंदु अगम अगोचरु आदि निरंजनु निरंकारु जीउ ॥1॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता तेरा पारु न पाइआ जाइ जीउ ॥
तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि सभ महि रहिआ समाइ जीउ ॥
घट अंतरि पारब्रहमु परमेसरु ता का अंतु न पाइआ ॥
तिसु रूपु न रेख अदिसटु अगोचरु गुरमुखि अलखु लखाइआ ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती सहजे नामि समाइ जीउ ॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता तेरा पारु न पाइआ जाइ जीउ ॥2॥
तूं सति परमेसरु सदा अबिनासी हरि हरि गुणी निधानु जीउ ॥
हरि हरि प्रभु एको अवरु न कोई तूं आपे पुरखु सुजानु जीउ ॥
पुरखु सुजानु तूं परधानु तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तेरा सबदु सभु तूंहै वरतहि तूं आपे करहि सु होई ॥
हरि सभ महि रविआ एको सोई गुरमुखि लखिआ हरि नामु जीउ ॥
तूं सति परमेसरु सदा अबिनासी हरि हरि गुणी निधानु जीउ ॥3॥
सभु तूंहै करता सभ तेरी वडिआई जिउ भावै तिवै चलाइ जीउ ॥
तुधु आपे भावै तिवै चलावहि सभ तेरै सबदि समाइ जीउ ॥
सभ सबदि समावै जां तुधु भावै तेरै सबदि वडिआई ॥
गुरमुखि बुधि पाईऐ आपु गवाईऐ सबदे रहिआ समाई ॥
तेरा सबदु अगोचरु गुरमुखि पाईऐ नानक नामि समाइ जीउ ॥
सभु तूंहै करता सभ तेरी वडिआई जिउ भावै तिवै चलाइ जीउ ॥4॥7॥14॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 छंत ॥ (हे भाई !) मेरा गोबिंद (सबसे) बड़ा है (किसी भी समझदारी से उस तक मनुष्य की) पहुँच नहीं हो सकती।वह ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।(सारे जगत का) मूल है।उसे माया की कालिख नहीं लग सकती।उसकी कोई खास शक्ल नहीं बताई जा सकती। (हे भाई !) ये नहीं बताया जा सकता कि परमात्मा कैसा है।उसका बड़प्पन भी पैमायश से परे है (हे भाई !) मेरा वह गोबिंद बयान से बाहर है बेअंत है।परे से परे है। अपने आप को वह ही जानता है। इन जीव विचारों की भी क्या बिसात (कि वे उसका रूप बता सकें) ।(हे प्रभू ! कोई भी ऐसा जीव नहीं है) जो आपकी हस्ती को बयान करके समझा सके। हे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप अपनी मेहर की निगाह करता है।वह गुरू की शरण पड़ कर (आपके गुणों की) विचार करता है। (हे भाई !) मेरा गोबिंद (सबसे) बड़ा है (किसी भी समझदारी से उस तक मनुष्य की) पहुँच नहीं हो सकती।वह ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।(सारे जगत का) मूल है।उसे माया की कालिख नहीं लग सकती।उसकी कोई खास शक्ल नहीं बताई जा सकती। 1। हे प्रभू ! आप सारे जगत का मूल है और सर्व-व्यापक है।आप परे से परे है और सारी रचना का रचनहार है।आपकी हस्ती का दूसरा छोर (किसी को) नहीं मिल सकता। आप हरेक शरीर में मौजूद है।आप एक-रस सब में समा रहा है। हे भाई ! पारब्रहम परमेश्वर हरेक शरीर के अंदर मौजूद है उसके गुणों का अंत (कोई जीव) नहीं पा सकता। उस प्रभू का कोई खास रूप।कोई खास चक्र-चिन्ह नहीं बयान किया जा सकता।वह प्रभू (इन आँखों से) दिखता नहीं वह ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।गुरू के द्वारा ही ये समझ पड़ती है कि उस परमात्मा का स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह) दिन-रात हर समय आत्मिक आनंद में मगन रहता है।परमात्मा के नाम में लीन रहता है। हे प्रभू ! आप सारे जगत का मूल है और सर्व-व्यापक है।आप परे से परे है और सारी रचना का रचनहार है।आपकी हस्ती का दूसरा छोर (किसी को) नहीं मिल सकता। 2। हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला है आप सबसे बड़ा है।आप कभी भी नाश होने वाला नहीं।आप सारे गुणों का खजाना है। हे हरी ! आप ही ऐकमेव मालिक है।आपके बराबर का और कोई नहीं है आप स्वयं ही सबके अंदर मौजूद है।आप स्वयं ही सबके दिल की जानने वाला है।हे हरी ! आप सब में व्यापक है। आप घट-घट की जानने वाला है।आप सबसे शिरोमणी है।आपके जितना और कोई नहीं। हर जगह आपका ही हुकम चल रहा है।हर जगह आप ही आप मौजूद है।जगत में वही होता है जो आप स्वयं ही करता है। हे भाई ! सारी सृष्टि में एक वह परमात्मा ही रम रहा है।गुरू की शरण पड़ के उस परमात्मा के नाम की समझ पड़ती है। हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला है आप सबसे बड़ा है।आप कभी भी नाश होने वाला नहीं।आप सारे गुणों का खजाना है। 3। हे करतार ! हर जगह आप ही आप है।सारी सृष्टि आपके ही तेज प्रताप का प्रकाश है।हे करतार ! जैसे आपको ठीक लगे।वैसे।(अपनी इस रचना को अपने हुकम में) चला। हे करतार ! जैसे तूझे खुद को अच्छा लगता है वैसे आप सृष्टि को काम में लगाए हुए है।सारी दुनिया आपके ही हुकम के अनुसार हैं के चलती है। सारी दुनिया आपके ही हुकम में ही टिकी रहती है।जब आपको ठीक लगता है।तो आपके हुकम मुताबिक ही (जीवों को) आदर-माण मिलता है। हे भाई ! अगर गुरू की शरण पड़ के सद्-बुद्धि हासिल कर लें।अगर (अपने अंदर से) अहंम्-अहंकार दूर कर लें।तो गुरू शबद की बरकति से वह करतार हर जगह व्यापक दिखाई देता है। हे नानक ! (कह, हे करतार !) तूरा हुकम जीवों की ज्ञानेंन्द्रियों की पहुँच से परे है (आपके हुकम की समझ) गुरू की शरण पड़ने से प्राप्त होती है।(जिस मनुष्य को प्राप्त होती है वह आपके) नाम में लीन हैं जाता है। हे करतार ! हर जगह आप ही आप है।सारी सृष्टि आपके ही तेज प्रताप का प्रकाश है।हे करतार ! जैसे आपको ठीक लगे।वैसे।(अपनी इस सृष्टि को अपने हुकम में) चला। 4। 7। 14।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा महला 4 छंत घरु 4 ॥
हरि अंम्रित भिंने लोइणा मनु प्रेमि रतंना राम राजे ॥
मनु रामि कसवटी लाइआ कंचनु सोविंना ॥
गुरमुखि रंगि चलूलिआ मेरा मनु तनो भिंना ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा महला 4 छंत घरु 4 ॥ हे भाई ! मेरी आँखें आत्मिक जीवन देने वाले हरि-नाम-जल से सरूर में आ गई हैं।मेरा मन प्रभू के प्रेम रंग में रंगा गया है। परमात्मा ने मेरे मन को (अपने नाम की) कसवटी पर घिसाया है।और ये शुद्ध सोना बन गया है। गुरू की शरण पड़ने से मेरा मन प्रभू के प्रेम रंग में गाढ़ा लाल हो गया है।मेरा मन तरो-तर हो गया है।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आसा महला 4 छंत ॥ (हे भाई !) मेरा गोबिंद (सबसे) बड़ा है (किसी भी समझदारी से उस तक मनुष्य की) पहुँच नहीं हो सकती।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।