Lulla Family

अंग ४४८ · आसा

अंग
448
आसा
अंग बदलें या अंश चुनें · २ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. वडा मेरा गोविंदु अगम अगोचरु आदि निरंजनु निरंकारु जीउ ॥
  2. हरि अंम्रित भिंने लोइणा मनु प्रेमि रतंना राम राजे ॥

वडा मेरा गोविंदु अगम अगोचरु आदि निरंजनु निरंकारु जीउ ॥

आसा महला 4 छंत ॥
वडा मेरा गोविंदु अगम अगोचरु आदि निरंजनु निरंकारु जीउ ॥
ता की गति कही न जाई अमिति वडिआई मेरा गोविंदु अलख अपार जीउ ॥
गोविंदु अलख अपारु अपरंपरु आपु आपणा जाणै ॥
किआ इह जंत विचारे कहीअहि जो तुधु आखि वखाणै ॥
जिस नो नदरि करहि तूं अपणी सो गुरमुखि करे वीचारु जीउ ॥
वडा मेरा गोविंदु अगम अगोचरु आदि निरंजनु निरंकारु जीउ ॥1॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता तेरा पारु न पाइआ जाइ जीउ ॥
तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि सभ महि रहिआ समाइ जीउ ॥
घट अंतरि पारब्रहमु परमेसरु ता का अंतु न पाइआ ॥
तिसु रूपु न रेख अदिसटु अगोचरु गुरमुखि अलखु लखाइआ ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती सहजे नामि समाइ जीउ ॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता तेरा पारु न पाइआ जाइ जीउ ॥2॥
तूं सति परमेसरु सदा अबिनासी हरि हरि गुणी निधानु जीउ ॥
हरि हरि प्रभु एको अवरु न कोई तूं आपे पुरखु सुजानु जीउ ॥
पुरखु सुजानु तूं परधानु तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तेरा सबदु सभु तूंहै वरतहि तूं आपे करहि सु होई ॥
हरि सभ महि रविआ एको सोई गुरमुखि लखिआ हरि नामु जीउ ॥
तूं सति परमेसरु सदा अबिनासी हरि हरि गुणी निधानु जीउ ॥3॥
सभु तूंहै करता सभ तेरी वडिआई जिउ भावै तिवै चलाइ जीउ ॥
तुधु आपे भावै तिवै चलावहि सभ तेरै सबदि समाइ जीउ ॥
सभ सबदि समावै जां तुधु भावै तेरै सबदि वडिआई ॥
गुरमुखि बुधि पाईऐ आपु गवाईऐ सबदे रहिआ समाई ॥
तेरा सबदु अगोचरु गुरमुखि पाईऐ नानक नामि समाइ जीउ ॥
सभु तूंहै करता सभ तेरी वडिआई जिउ भावै तिवै चलाइ जीउ ॥4॥7॥14॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 छंत ॥ (हे भाई !) मेरा गोबिंद (सबसे) बड़ा है (किसी भी समझदारी से उस तक मनुष्य की) पहुँच नहीं हो सकती।वह ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।(सारे जगत का) मूल है।उसे माया की कालिख नहीं लग सकती।उसकी कोई खास शक्ल नहीं बताई जा सकती। (हे भाई !) ये नहीं बताया जा सकता कि परमात्मा कैसा है।उसका बड़प्पन भी पैमायश से परे है (हे भाई !) मेरा वह गोबिंद बयान से बाहर है बेअंत है।परे से परे है। अपने आप को वह ही जानता है। इन जीव विचारों की भी क्या बिसात (कि वे उसका रूप बता सकें) ।(हे प्रभू ! कोई भी ऐसा जीव नहीं है) जो आपकी हस्ती को बयान करके समझा सके। हे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप अपनी मेहर की निगाह करते हैं।वह गुरू की शरण पड़ कर (आपके गुणों की) विचार करता है। (हे भाई !) मेरा गोबिंद (सबसे) बड़ा है (किसी भी समझदारी से उस तक मनुष्य की) पहुँच नहीं हो सकती।वह ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।(सारे जगत का) मूल है।उसे माया की कालिख नहीं लग सकती।उसकी कोई खास शक्ल नहीं बताई जा सकती। 1। हे प्रभू ! आप सारे जगत का मूल हैं और सर्व-व्यापक हैं।आप परे से परे हैं और सारी रचना के रचनहार हैं।आपकी हस्ती का दूसरा छोर (किसी को) नहीं मिल सकता। आप हरेक शरीर में मौजूद हैं।आप एक-रस सब में समा रहे हैं। हे भाई ! पारब्रहम परमेश्वर हरेक शरीर के अंदर मौजूद है उसके गुणों का अंत (कोई जीव) नहीं पा सकता। उस प्रभू का कोई खास रूप।कोई खास चक्र-चिन्ह नहीं बयान किया जा सकता।वह प्रभू (इन आँखों से) दिखता नहीं वह ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।गुरू के द्वारा ही ये समझ पड़ती है कि उस परमात्मा का स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह) दिन-रात हर समय आत्मिक आनंद में मगन रहता है।परमात्मा के नाम में लीन रहता है। हे प्रभू ! आप सारे जगत का मूल हैं और सर्व-व्यापक हैं।आप परे से परे हैं और सारी रचना के रचनहार हैं।आपकी हस्ती का दूसरा छोर (किसी को) नहीं मिल सकता। 2। हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाले हैं आप सबसे बड़े हैं।आप कभी भी नाश होने वाले नहीं।आप सारे गुणों का खजाना हैं। हे हरी ! आप ही ऐकमेव मालिक हैं।आपके बराबर का और कोई नहीं है आप स्वयं ही सबके अंदर मौजूद हैं।आप स्वयं ही सबके दिल की जानने वाले हैं।हे हरी ! आप सब में व्यापक हैं। आप घट-घट की जानने वाले हैं।आप सबसे शिरोमणी हैं।आपके जितना और कोई नहीं। हर जगह आपका ही हुकम चल रहा है।हर जगह आप ही आप मौजूद हैं।जगत में वही होता है जो आप स्वयं ही करते हैं। हे भाई ! सारी सृष्टि में एक वह परमात्मा ही रम रहा है।गुरू की शरण पड़ के उस परमात्मा के नाम की समझ पड़ती है। हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाले हैं आप सबसे बड़े हैं।आप कभी भी नाश होने वाले नहीं।आप सारे गुणों का खजाना हैं। 3। हे करतार ! हर जगह आप ही आप हैं।सारी सृष्टि आपके ही तेज प्रताप का प्रकाश है।हे करतार ! जैसे आपको ठीक लगे।वैसे।(अपनी इस रचना को अपने हुकम में) चला। हे करतार ! जैसे आपको खुद को अच्छा लगता है वैसे आप सृष्टि को काम में लगाए हुए हैं।सारी दुनिया आपके ही हुकम के अनुसार हो के चलती है। सारी दुनिया आपके ही हुकम में ही टिकी रहती है।जब आपको ठीक लगता है।तो आपके हुकम मुताबिक ही (जीवों को) आदर-माण मिलता है। हे भाई ! अगर गुरू की शरण पड़ के सद्-बुद्धि हासिल कर लें।अगर (अपने अंदर से) अहंम्-अहंकार दूर कर लें।तो गुरू शबद की बरकति से वह करतार हर जगह व्यापक दिखाई देता है। हे नानक ! (कह, हे करतार !) तूरा हुकम जीवों की ज्ञानेंन्द्रियों की पहुँच से परे है (आपके हुकम की समझ) गुरू की शरण पड़ने से प्राप्त होती है।(जिस मनुष्य को प्राप्त होती है वह आपके) नाम में लीन हो जाता है। हे करतार ! हर जगह आप ही आप हैं।सारी सृष्टि आपके ही तेज प्रताप का प्रकाश है।हे करतार ! जैसे आपको ठीक लगे।वैसे।(अपनी इस सृष्टि को अपने हुकम में) चला। 4। 7। 14।

हरि अंम्रित भिंने लोइणा मनु प्रेमि रतंना राम राजे ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा महला 4 छंत घरु 4 ॥
हरि अंम्रित भिंने लोइणा मनु प्रेमि रतंना राम राजे ॥
मनु रामि कसवटी लाइआ कंचनु सोविंना ॥
गुरमुखि रंगि चलूलिआ मेरा मनु तनो भिंना ॥

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा महला 4 छंत घरु 4 ॥ हे भाई ! मेरी आँखें आत्मिक जीवन देने वाले हरि-नाम-जल से सरूर में आ गई हैं।मेरा मन प्रभू के प्रेम रंग में रंगा गया है। परमात्मा ने मेरे मन को (अपने नाम की) कसवटी पर घिसाया है।और ये शुद्ध सोना बन गया है। गुरू की शरण पड़ने से मेरा मन प्रभू के प्रेम रंग में गाढ़ा लाल हो गया है।मेरा मन तरो-तर हो गया है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४४८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English