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अंग 447

अंग
447
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि हरि नामु जपिआ आराधिआ मुखि मसतकि भागु सभागा ॥
जन नानक हरि किरपा धारी मनि हरि हरि मीठा लाइ जीउ ॥
हरि दइआ प्रभ धारहु पाखण हम तारहु कढि लेवहु सबदि सुभाइ जीउ ॥4॥5॥12॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हरि-नाम सिमरने लग पड़ा।उसके मुंह पे उसके माथे पे सौभाग्य जाग गए। हे दास नानक ! (कह) जिस मनुष्य पे प्रभू ने मेहर की उसके मन को परमात्मा का नाम मधुर लगने लगता है। हे हरी ! हे प्रभू ! मेहर कर।हम कठोर दिलों को (संसार-समुंदर से) पार लंघा ले।गुरू के शबद में जोड़ के।अपने प्रेम में जोड़ के हमें (मोह के कीचड़ में से) निकाल ले। 4। 5। 12।
आसा महला 4 ॥
मनि नामु जपाना हरि हरि मनि भाना हरि भगत जना मनि चाउ जीउ ॥
जो जन मरि जीवे तिन॑ अंम्रितु पीवे मनि लागा गुरमति भाउ जीउ ॥
मनि हरि हरि भाउ गुरु करे पसाउ जीवन मुकतु सुखु होई ॥
जीवणि मरणि हरि नामि सुहेले मनि हरि हरि हिरदै सोई ॥
मनि हरि हरि वसिआ गुरमति हरि रसिआ हरि हरि रस गटाक पीआउ जीउ ॥
मनि नामु जपाना हरि हरि मनि भाना हरि भगत जना मनि चाउ जीउ ॥1॥
जगि मरणु न भाइआ नित आपु लुकाइआ मत जमु पकरै लै जाइ जीउ ॥
हरि अंतरि बाहरि हरि प्रभु एको इहु जीअड़ा रखिआ न जाइ जीउ ॥
किउ जीउ रखीजै हरि वसतु लोड़ीजै जिस की वसतु सो लै जाइ जीउ ॥
मनमुख करण पलाव करि भरमे सभि अउखध दारू लाइ जीउ ॥
जिस की वसतु प्रभु लए सुआमी जन उबरे सबदु कमाइ जीउ ॥
जगि मरणु न भाइआ नित आपु लुकाइआ मत जमु पकरै लै जाइ जीउ ॥2॥
धुरि मरणु लिखाइआ गुरमुखि सोहाइआ जन उबरे हरि हरि धिआनि जीउ ॥
हरि सोभा पाई हरि नामि वडिआई हरि दरगह पैधे जानि जीउ ॥
हरि दरगह पैधे हरि नामै सीधे हरि नामै ते सुखु पाइआ ॥
जनम मरण दोवै दुख मेटे हरि रामै नामि समाइआ ॥
हरि जन प्रभु रलि एको होए हरि जन प्रभु एक समानि जीउ ॥
धुरि मरणु लिखाइआ गुरमुखि सोहाइआ जन उबरे हरि हरि धिआनि जीउ ॥3॥
जगु उपजै बिनसै बिनसि बिनासै लगि गुरमुखि असथिरु होइ जीउ ॥
गुरु मंत्रु द्रिड़ाए हरि रसकि रसाए हरि अंम्रितु हरि मुखि चोइ जीउ ॥
हरि अंम्रित रसु पाइआ मुआ जीवाइआ फिरि बाहुड़ि मरणु न होई ॥
हरि हरि नामु अमर पदु पाइआ हरि नामि समावै सोई ॥
जन नानक नामु अधारु टेक है बिनु नावै अवरु न कोइ जीउ ॥
जगु उपजै बिनसै बिनसि बिनासै लगि गुरमुखि असथिरु होइ जीउ ॥4॥6॥13॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ हे भाई ! भक्तजन अपने मन में सदा हरि-नाम जपते हैं।हरि-नाम उन्हें मन में प्यारा लगता है।नाम जपने का उनके मन में चाव बना रहता है। जो मनुष्य स्वैभाव मिटा के आत्मिक जीवन जीते हैं वे सदा आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते रहते हैं।गुरू के उपदेश की बरकति से उनके मन में प्रभू के वास्ते प्यार बना रहता है। हे भाई ! जिस मनुष्य पे गुरू कृपा करता है उसके मन में प्रभू चरणों के लिए प्यार पैदा होजाता है वह मनुष्य दुनिया की किरत-कार करता हुआ ही माया के बंधनों से छूट जाता है।वह आत्मिक आनंद भोगता है। हे भाई ! आत्मिक जीवन जीने के कारण और स्वैभाव को मारने के कारण।परमात्मा के नाम में जुड़े रहने वाले मनुष्य सदैव सुखी रहते हैं।उनके मन में उनके हृदय में सदा वह परमात्मा ही बसा रहता है। गुरू की मति के सदका उनके मन में सदा परमात्मा का नाम बसा रहता है।हरि-नाम उनके अंदर रच जाता है।वह हरि-नाम-जल।मानो।गट-गट-गट करके पीते रहते हैं। हे भाई ! भक्त जन अपने मन में सदा हरि-नाम जपते हैं।हरि-नाम उन्हें मन में प्यारा लगता है।नाम जपने का उनके मन में उत्साह बना रहता है। 1। जगत में (किसी को भी) मौत पसंद नहीं आती।(हर कोई) सदा अपनी जिंद का छुपाता फिरता है कि कहीं जम इसे पकड़ केही ना ले जाए।पर। परमात्मा हरेक के अंदर और बाहर सारे जगत में भी बसता है।उससे छुपा के यह जीवात्मा (मौत से) बचाई नहीं जा सकती। ये जिंद किसी तरह भी (मौत से) बचा के नहीं रखी जा सकती।हरि-प्रभू इस (जिंद-) वस्तु को ढूँढ ही लेता है।परमात्मा की ये चीजवह इसे ले ही जाता है। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे तरले कर-करके हरेक किस्म के दवा दारू बरत के भटकते फिरते हैं। पर जिस परमात्मा की दी हुई ये चीज है वह मालिक प्रभू इसे ले ही लेता है।परमात्मा के सेवक गुरू का शबद कमा के (शबद के अनुसार अपना आत्मिक जीवन बना के।मौत के सहम से) बच जाते हैं। (हे भाई !) जगत में (किसी को भी) मौत अच्छी नहीं लगती (हरेक जीव) सदा अपनी जीवात्मा को छुपाता है कि कहीं जम इसे पकड़ के ना ले जाए। 2। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े रहने वाले मनुष्यों को ये धुर दरगाह से लिखी हुई मौत भी सुंदर लगती है।वे गुरसिख जन परमात्मा के चरणों के ध्यान में जुड़ के (मौत के सहम से) बचे रहते हैं। परमात्मा के नाम में जुड़ केवे गुरसिख (लोक परलोक में) शोभा और महिमा कमाते हैं।जगत से इज्जत और मान ले के वे परमात्मा की दरगाह में जाते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य परमात्मा की हजूरी में इज्जत हासिल करते हैं।हरि-नाम की बरकति से वे अपना जीवन कामयाब बना लेते हैं।परमात्मा के नाम से वे आत्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। गुरू के दर पे टिके रहने वाले मनुष्य परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं।और इस तरह वे जूनियों के चक्कर और मौत- इन दोनों दुखों को मिटा लेते हैं। (हे भाई !) परमात्मा के भगत और परमात्मा मिल के एक रूप हो जाते हैं।परमात्मा के भगत और परमात्मा एक जैसे ही हो जाते हैं। (हे भाई !) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों को ये धुर-दरगाह से मिली हुई मौत भी सुंदर लगती है।वे गुरमुख लोग परमात्मा के ध्यान में लीन हो के (मौत के सहम से) बचे रहते हैं। 3। (हे भाई ! माया-ग्रसित) जगत (बार-बार) पैदा होता है मरता है।आत्मिक मौत मरता रहता है।गुरू के द्वारा (प्रभू चरणों में) लग के (माया के मोह की ओर से) अडोल-चित्त हो जाता है। गुरू जिस मनुष्य के हृदय में नाम-मंत्र पक्का करता है जिस मनुष्य के मुंह में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल टपकाता है वह मनुष्य हरि-नाम-रस को स्वाद से (अपने अंदर) रचाता है। जबवह मनुष्य गुरू से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस हासिल करता है (पहले आत्मिक मौत) मरा हुआ वह मनुष्य आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है।दुबारा उसे ये मौत नहीं व्यापती। जो मनुष्य गुरू के माध्यम से परमात्मा का नाम प्राप्त कर लेता है वह मनुष्य वह दर्जा हासिल कर लेता है जहाँ आत्मिक मौत छू नहीं सकती।वह मनुष्य परमात्मा के नाम में लीन रहता है। हे दास नानक ! परमात्मा का नाम (उस मनुष्य की जिंदगी का) आसरा सहारा बन जाता है।परमात्मा के नाम के बिना कोई और पदार्थ उसके आत्मिक जीवन का सहारा नहीं बन सकता। (हे भाई ! माया-ग्रसित) जगत (बार-बार) पैदा होता है मरता है आत्मिक मौत मरता रहता है।गुरू के द्वारा (प्रभू चरणों में) लग के (माया के मोह से) अडोल-चित्त हो जाता है। 4। 6। 13।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।