Lulla Family

अंग 441

अंग
441
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धावतु थंमि॑आ सतिगुरि मिलिऐ दसवा दुआरु पाइआ ॥
तिथै अंम्रित भोजनु सहज धुनि उपजै जितु सबदि जगतु थंमि॑ रहाइआ ॥
तह अनेक वाजे सदा अनदु है सचे रहिआ समाए ॥
इउ कहै नानकु सतिगुरि मिलिऐ धावतु थंमि॑आ निज घरि वसिआ आए ॥4॥
मन तूं जोति सरूपु है आपणा मूलु पछाणु ॥
मन हरि जी तेरै नालि है गुरमती रंगु माणु ॥
मूलु पछाणहि तां सहु जाणहि मरण जीवण की सोझी होई ॥
गुर परसादी एको जाणहि तां दूजा भाउ न होई ॥
मनि सांति आई वजी वधाई ता होआ परवाणु ॥
इउ कहै नानकु मन तूं जोति सरूपु है अपणा मूलु पछाणु ॥5॥
मन तूं गारबि अटिआ गारबि लदिआ जाहि ॥
माइआ मोहणी मोहिआ फिरि फिरि जूनी भवाहि ॥
गारबि लागा जाहि मुगध मन अंति गइआ पछुतावहे ॥
अहंकारु तिसना रोगु लगा बिरथा जनमु गवावहे ॥
मनमुख मुगध चेतहि नाही अगै गइआ पछुतावहे ॥
इउ कहै नानकु मन तूं गारबि अटिआ गारबि लदिआ जावहे ॥6॥
मन तूं मत माणु करहि जि हउ किछु जाणदा गुरमुखि निमाणा होहु ॥
अंतरि अगिआनु हउ बुधि है सचि सबदि मलु खोहु ॥
होहु निमाणा सतिगुरू अगै मत किछु आपु लखावहे ॥
आपणै अहंकारि जगतु जलिआ मत तूं आपणा आपु गवावहे ॥
सतिगुर कै भाणै करहि कार सतिगुर कै भाणै लागि रहु ॥
इउ कहै नानकु आपु छडि सुख पावहि मन निमाणा होइ रहु ॥7॥
धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ सो सहु चिति आइआ ॥
महा अनंदु सहजु भइआ मनि तनि सुखु पाइआ ॥
सो सहु चिति आइआ मंनि वसाइआ अवगण सभि विसारे ॥
जा तिसु भाणा गुण परगट होए सतिगुर आपि सवारे ॥
से जन परवाणु होए जिन॑ी इकु नामु दिड़िआ दुतीआ भाउ चुकाइआ ॥
इउ कहै नानकु धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ सो सहु चिति आइआ ॥8॥
इकि जंत भरमि भुले तिनि सहि आपि भुलाए ॥
दूजै भाइ फिरहि हउमै करम कमाए ॥
तिनि सहि आपि भुलाए कुमारगि पाए तिन का किछु न वसाई ॥
तिन की गति अवगति तूंहै जाणहि जिनि इह रचन रचाई ॥
हुकमु तेरा खरा भारा गुरमुखि किसै बुझाए ॥
इउ कहै नानकु किआ जंत विचारे जा तुधु भरमि भुलाए ॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! यदि गुरू मिल जाए तो) भटकता मन (भटकने से) रुक जाता है (यही आत्मिक अवस्था है वह) दसवाँ दरवाजा जो इसे मिल जाता है (जो ज्ञानेंद्रियों और कर्म इन्द्रियों से ऊँचा रहता है)। उस आत्मिक अवस्था में (पहुँच के ये मन) आत्मिक जीवन देने वाले नाम की खुराक खाता है; (इसके अंदर) आत्मिक अडोलता की रौंअचल पड़ती है।उस आत्मिक अवस्था में (ये मन) गुरू शबद की बरकति से दुनिया के मोह को रोक के रखता है। (जैसे अनेक किसम के साज बजने से बड़ा सुंदर राग पैदा होता है।वैसे ही) उस आत्मिक अवस्था में (मन के अंदर।मानो) अनेको संगीतमयी साज बनजे लग पड़ते हैं।इसके अंदर सदा आनंद बना रहता है। मन सदा-स्थिर परमात्मा में लीन रहता है।(हे भाई ! आपको) नानक ऐसे बताता है कि गुरू मिल जाए तो ये भटकता मन (भटकने से) रुक जाता है।और प्रभू-चरणों में आ टिकता है। 4। हे मेरे मन ! आप उस परमात्मा की अंश है जो निरा नूर ही नूर है (हे मन !) अपनी उस अस्लियत से सांझ बना। हे मन ! वह परमात्मा सदा आपके अंग-संग बसता है।गुरू की मति ले के उसके मिलाप का स्वाद ले। हे मन ! अगर आप अपनी अस्लियत समझ ले तो उस पति-प्रभू से आपकी गहरी जान-पहचान बन जाएगी।तब आपको ये समझ भी आ जाएगा कि आत्मिक मौत क्या चीज है और आत्मिक जिंदगी क्या है। हे मन ! अगर गुरू की कृपा से एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ले।तो आपके अंदर (परमात्मा के बिना) कोई और मोह प्रबल नहीं हैं सकेगा। जब मनुष्य के मन में शांति पैदा हो जाती है जब इसके अंदर चढ़दीकला प्रबल हो जाती तब ये प्रभू की हजूरी में कबूल हो जाता है। नानक ऐसे बताता है,हे मेरे मन ! आप उस परमात्मा की अंश है जो निरा प्रकाश ही प्रकाश है (हे मन ! अपने उस असल से सांझ बना।असल को पहचान)। 5। हे मन ! आप (अब) अहंकार से लिबड़ा पड़ा है।अहंकार से लादा हुआ ही (जगत से) चला जाएगा। (देखने को) सुंदर माया ने आपको (अपने) मोह में फसाया हुआ है (इसका नतीजा ये निकलेगा कि) आपको बार-बार अनेकों जूनियों में डाला जाएगा। हे मूर्ख मन ! जब आप अहंकार में फंसा हुआ ही (यहाँ से) चलेगा तो चलने के वक्त हाथ मलेगा। तूझे अहंकार चिपका हुआ है। आपको तृष्णा का रोग लगा हुआ है आप (ये मानस) जन्म व्यर्थ गवा रहा है। हे मन-मर्जियां करने वाले मूर्ख मन ! आप परमात्मा को नहीं सिमरता।परलोक पहुँच के अफसोस करेगा। (आपको) नानक इस तरह बताता है कि आप यहाँ अहंकार से भरा हुआ है (जगत से चलने के वक्त भी) अहंकार से लदा हुआ ही जाएगा। 6। हे मन ! देखना।कहीं ये गुमान ना कर बैठना कि मैं (बहुत) समझदार हूँ।गुरू की शरण पड़ के माण त्याग के रख। (हे मन !) आपके अंदर परमात्मा से दूरी है।आपके अंदर ‘मैं मैं’ करने वाली बुद्धि है।इस मैल को सदा-स्थिर हरि नाम में जुड़ के गुरू के शबद में टिक के दूर कर। हे मन ! विनम्र हो के गुरू के चरणों में गिर पड़ो।देखना।कहीं अपना आप जताने मत लग पड़ना। जगत अपने ही अहंकार में जल रहा है।देखना।कहीं आप भी (अहंकार में पड़ कर) अपने आपका नाश मत कर लेना। (इस खतरे से तभी बचेगा।अगर) आप गुरू के हुकम में चल के काम करेगा।(सो।हे मन !) गुरू के हुकम मे टिका रह। (हे मन ! आपको) नानक इस प्रकार समझाता है, हे मन अहंकार त्याग दे।अहंकार छोड़ के ही सुख पाएगा। 7। वह वक्त सौभाग्यपूर्ण था जब मुझे गुरू मिल गया था (और।गुरू की किरपा से) वह पति-प्रभू मेरे चित्त में आ बसा। मेरेअंदर बहुत आनंद पैदा हुआ।मेरे अंदर आत्मिक अडोलता पैदा हो गई।मेरे मन ने मेरे दिल ने सुख अनुभव किया। (गुरू की कृपा से) वह पति-प्रभू मेरे चित्त में आ बसा।(गुरू ने प्रभू को) मेरे मन में बसा दिया।और मेरे ही अवगुण भुला दिए। (हे भाई !) जब उस मालिक को ठीक लगता है उसके गुण मनुष्य के अंदर रौशन हो जाते हैं।गुरू स्वयं उस मनुष्य के जीवन को सुंदर बना देता है। जो मनुष्य सिर्फ हरि-नाम को अपने दिल में पक्का कर लेते हैं।और माया का मोह अंदर से दूर कर लेते हैं। वे परमात्मा की दरगाह में कबूल हो जाते हैं। नानक इस प्रकार कहता है, भाग्यशाली था वह समय जब मुझे गुरू मिला था और (गुरू की कृपा से) वह पति-प्रभू मेरे चित्त में आ बसा था। 8। (हे भाई !) अनेकों जीव माया की भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर पड़े हुए हैं।(उस पैदा करने वाले) पति प्रभू ने खुद ही उन्हें गलत राह पर डाला हुआ है। ऐसे जीव अहंकार के आसरे काम कर कर के माया के मोह में भटकते हैं। उस पति प्रभू ने स्वयं (उन्हें) सही रास्ते से तोड़ा हुआ है और गलत राह पर डाला हुआ है।उन जीवों का कोई जोर नहीं चलता (कि अपने उद्यम से गलत रास्ता छोड़ दें)। हे प्रभू ! जिस आप ने ये जगत रचना रची हुई है आप स्वयं ही (गलत राह पर पड़े हुए) उन जीवों की अच्छी-बुरी आत्मिक हालत जानता है (जिसके मुताबिक तूने उन्हें गलत रास्ते पर डाला है)। आपका हुकम बहुत दमदार है (जिसके कारण जीव गलत रास्ते पर पड़े हुए हैं)।(हे भाई !) किसी विरले भाग्यशाली को पति प्रभू गुरू की शरण डाल के अपना हुकम समझाता है। नानक ऐसे कहता है, हे प्रभू ! अगर तूने खुद ही जीवों का माया की भटकना में डाल के जिंदगी के बुरे रास्ते डाला हुआ है।तो ये बिचारे जीव क्या कर सकते हैं। 9।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “(हे भाई ! यदि गुरू मिल जाए तो) भटकता मन (भटकने से) रुक जाता है (यही आत्मिक अवस्था है वह) दसवाँ दरवाजा जो इसे मिल जाता है (जो ज्ञानेंद्रियों और कर्म इन्द्रियों से ऊँचा रहता है)।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English