पिरु संगि कामणि जाणिआ गुरि मेलि मिलाई राम ॥ अंतरि सबदि मिली सहजे तपति बुझाई राम ॥ सबदि तपति बुझाई अंतरि सांति आई सहजे हरि रसु चाखिआ ॥ मिलि प्रीतम अपणे सदा रंगु माणे सचै सबदि सुभाखिआ ॥ पड़ि पड़ि पंडित मोनी थाके भेखी मुकति न पाई ॥ नानक बिनु भगती जगु बउराना सचै सबदि मिलाई ॥3॥ सा धन मनि अनदु भइआ हरि जीउ मेलि पिआरे राम ॥ सा धन हरि कै रसि रसी गुर कै सबदि अपारे राम ॥ सबदि अपारे मिले पिआरे सदा गुण सारे मनि वसे ॥ सेज सुहावी जा पिरि रावी मिलि प्रीतम अवगण नसे ॥ जितु घरि नामु हरि सदा धिआईऐ सोहिलड़ा जुग चारे ॥ नानक नामि रते सदा अनदु है हरि मिलिआ कारज सारे ॥4॥1॥6॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: (हे सखी !) जिस जीव-स्त्री को गुरू ने प्रभू चरणों में जोड़ दिया उसने प्रभू-पति को अपने अंग-संग बसता पहचान लिया। वह अंतरात्मे गुरू के शबद की बरकति से प्रभू के साथ एक-मेक हो गई।आत्मिक अडोलता में टिक के उसने (अपने अंदर से विकारों वाली) तपश बुझा ली। (हे सखी ! जिस जीव-स्त्री ने) गुरू के शबद की सहायता से अपने अंदर से विकारों वाली तपश बुझा ली।उसके अंदर ठंड पड़ गई।आत्मिक अडोलता में टिक के उसने हरि नाम का स्वाद चख लिया। अपने प्रभू-प्रीतम को मिल के वह सदा प्रेम-रंग भोगती है।सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले गुर-शबद में जुड़ के उसकी बोली मीठी हो जाती है। (हे सखी !) पण्डित (धार्मिक पुस्तकें) पढ़-पढ़ के।मौनधारी (समाधियां लगा लगा के) (जोगी जंगम आदि साधु) भेष धार-धार के थक गए (इन तरीकों से किसी ने माया के बंधनों से) निजात हासिल नहीं की। हे नानक ! परमात्मा की भक्ति के बिना जगत (माया के मोह में) झल्ला हुआ फिरता है।सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले गुर-शबद की बरकति से प्रभू चरणों में मिलाप हासिल कर लेता है। 3। (हे सखी !) जिस जीव-स्त्री को प्यारे हरी प्रभू ने अपने चरणों में जोड़ लिया उसके मन में उमंग पैदा हो जाती है। वह जीव-स्त्री अपार प्रभू की सिफत सालाह वाले गुरू-शबद के द्वारा परमात्मा के प्रेम-रस में भीगी रहती है। अपार प्रभू की सिफत सालाह वाले शबद की बरकति से वह जीव-स्त्री प्यारे प्रभू को मिल जाती है।सदा उसके गुण अपने हृदय में संभाल के रखती है।प्रभू के गुण उसके मन में टिके रहते हैं। जब से प्रभू-पति ने उसे अपने चरणों से जोड़ लिया उस (के हृदय) की सेज सुंदर बन गई।प्रीतम प्रभू को मिल के उसके सारे अवगुण दूर हो गए। (हे सखी !) जिस (हृदय-) घर में परमात्मा का नाम सदा सिमरा जाता है वहाँ सदा ही (जैसे) खुशियों के गीत गाए जा रहे होते हैं। हे नानक ! जो जीव परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं उनके अंदर सदा आनंद बना रहता है।प्रभू-चरणों में मिल के वह अपने सारे काम संवार लेते हैं। 4। 1। 6।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ आसा महला 3 छंत घरु 3 ॥ साजन मेरे प्रीतमहु तुम सह की भगति करेहो ॥ गुरु सेवहु सदा आपणा नामु पदारथु लेहो ॥ भगति करहु तुम सहै केरी जो सह पिआरे भावए ॥ आपणा भाणा तुम करहु ता फिरि सह खुसी न आवए ॥ भगति भाव इहु मारगु बिखड़ा गुर दुआरै को पावए ॥ कहै नानकु जिसु करे किरपा सो हरि भगती चितु लावए ॥1॥ मेरे मन बैरागीआ तूं बैरागु करि किसु दिखावहि ॥ हरि सोहिला तिन॑ सद सदा जो हरि गुण गावहि ॥ करि बैरागु तूं छोडि पाखंडु सो सहु सभु किछु जाणए ॥ जलि थलि महीअलि एको सोई गुरमुखि हुकमु पछाणए ॥ जिनि हुकमु पछाता हरी केरा सोई सरब सुख पावए ॥ इव कहै नानकु सो बैरागी अनदिनु हरि लिव लावए ॥2॥ जह जह मन तूं धावदा तह तह हरि तेरै नाले ॥ मन सिआणप छोडीऐ गुर का सबदु समाले ॥ साथि तेरै सो सहु सदा है इकु खिनु हरि नामु समालहे ॥ जनम जनम के तेरे पाप कटे अंति परम पदु पावहे ॥ साचे नालि तेरा गंढु लागै गुरमुखि सदा समाले ॥ इउ कहै नानकु जह मन तूं धावदा तह हरि तेरै सदा नाले ॥3॥ सतिगुर मिलिऐ धावतु थंमि॑आ निज घरि वसिआ आए ॥ नामु विहाझे नामु लए नामि रहे समाए ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा महला 3 छंत घरु 3 ॥ हे मेरे (सत्संगी) सज्जनो प्यारो ! आप प्रभू पति की भक्ति सदा करते रहा करो। सदा अपने गुरू की शरण पड़े रहो (और गुरू से) सबसे कीमती चीज हरि नाम हासिल करो। (हे सज्जनो !) आप प्रभू-पति की ही भगती करते रहो।ये भगती प्यारे प्रभू-पति को पसंद आती है। अगर (इस जीवन सफर में) आप अपनी ही मर्जी करते रहोगे तो प्रभू-पति की प्रसन्नता आपको नहीं मिलेगी।(पर। हे प्यारो !) भक्ति का और प्रेम का ये रास्ता बहुत मुश्किलों भरा है।कोई विरला मनुष्य ही ये रास्ता ढूँढता है जो गुरू के दर पर आ गिरता है। नानक कहता है,जिस मनुष्य पर प्रभू (खुद) कृपा करता है वह मनुष्य अपना मन प्रभू की भक्ति में जोड़ता है। 1। हे वैराग में आए हुए मेरे मन ! आप वैराग करके किसे दिखाता है।(इस ऊपर-ऊपर से दिखाए वैराग से आपके अंदर आत्मिक आनंद नहीं बन सकेगा)। हे मन ! जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाते रहते हैं।उनके अंदर सदा ही उमंग व चाव बना रहता है। हे मेरे मन ! (बाहरी दिखावे वाले वैराग का) पाखण्ड छोड़ के (और।अपने अंदर) मिलने की चाहत पैदा कर (क्योंकि) वह पति प्रभू (अंदर की) हरेक बात जानता है। वह प्रभू खुद ही जल में धरती में आकाश में (हर जगह समाया हुआ है) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह उस प्रभू की रजा को समझता है। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की रजा समझ ली वही सारे आनंद प्राप्त करता है। नानक (आपको) ऐसे बताता है कि इस तरह के मिलाप की चाहत रखने वाला मनुष्य हर समय प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखता है। 2। हे मेरे मन ! जहाँ-जहाँ आप दौड़ता-फिरता है वहाँ-वहाँ ही परमात्मा आपके साथ ही रहता है (अगर आप उसे अपने साथ बसा हुआ देखना चाहता है तो) हे मन ! अपनी चतुराई (का आसरा) छोड़ देना चाहिए।हे मन ! गुरू का शबद अपने अंदर संभाल के रख (फिर आपको दिख जाएगा कि) वह पति-प्रभू सदा आपके साथ रहता है।(हे मन !) अगर आप एक छिन के वास्ते भी परमात्मा का नाम अपने अंदर बसाए। तो आपके अनेकों जन्मों के पाप काटे जाएं।और अंत में आप सबसे ऊँचा दर्जा हासिल कर ले। (हे मन !) गुरू की शरण पड़ के आप सदा परमात्मा को अपने अंदर बसाए रख।(इस तरह उस) सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ आपका पक्का प्यार बन जाएगा। नानक आपको ये बताता है कि हे मन ! जहाँ-जहाँ आप भटकता फिरता है वहाँ-वहाँ परमात्मा सदा आपके साथ ही रहता है। 3। (हे भाई !) अगर गुरू मिल जाए तो ये भटकता मन (भटकने से) रुक जाता है।ये प्रभू-चरणों में आ टिकता है। (फिर ये) परमात्मा के नाम का सौदा करता है (भाव) परमात्मा का नाम जपता रहता है।नाम में लीन रहता है।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे सखी !) जिस जीव-स्त्री को गुरू ने प्रभू चरणों में जोड़ दिया उसने प्रभू-पति को अपने अंग-संग बसता पहचान लिया।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।