अंग
442
आसा
अंग बदलें या अंश चुनें · ३ अंश
सचे मेरे साहिबा सची तेरी वडिआई ॥
सचे मेरे साहिबा सची तेरी वडिआई ॥
तूं पारब्रहमु बेअंतु सुआमी तेरी कुदरति कहणु न जाई ॥
सची तेरी वडिआई जा कउ तुधु मंनि वसाई सदा तेरे गुण गावहे ॥
तेरे गुण गावहि जा तुधु भावहि सचे सिउ चितु लावहे ॥
जिस नो तूं आपे मेलहि सु गुरमुखि रहै समाई ॥
इउ कहै नानकु सचे मेरे साहिबा सची तेरी वडिआई ॥10॥2॥7॥5॥2॥7॥
तूं पारब्रहमु बेअंतु सुआमी तेरी कुदरति कहणु न जाई ॥
सची तेरी वडिआई जा कउ तुधु मंनि वसाई सदा तेरे गुण गावहे ॥
तेरे गुण गावहि जा तुधु भावहि सचे सिउ चितु लावहे ॥
जिस नो तूं आपे मेलहि सु गुरमुखि रहै समाई ॥
इउ कहै नानकु सचे मेरे साहिबा सची तेरी वडिआई ॥10॥2॥7॥5॥2॥7॥
हिन्दी अर्थ: हे मेरे सदा स्थिर मालिक ! आपका बड़प्पन भी सदा कायम रहने वाला है। आप बेअंत मालिक हैं।आप पारब्रहम हैं।आपकी ताकत बयान नहीं की जा सकती। हे प्रभू ! आपकी वडिआई सदा कायम रहने वाली है।जिन मनुष्यों के मन में आपने ये वडिआई बसा दी है।वे सदा आपकी सिफत सालाह के गीत गाते हैं। पर तभी आपकी सिफत सालाह के गीत गाते हैं जबवह आपको अच्छे लगते हैं।फिर वे आपके सदा स्थिर स्वरूप में अपना चित्त जोड़े रखते हैं। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप स्वयं ही अपने चरणों में जोड़ते हैं वह गुरू की शरण पड़ के आपकी याद में लीन रहता है। (आपका दास) नानक ऐसे कहता है, हे मेरे सदा कायम रहने वाले मालिक ! आपकी वडिआई भी सदा कायम रहने वाली है। 10। 2। 7। 5। 2। 7।
जीवनो मै जीवनु पाइआ गुरमुखि भाए राम ॥
रागु आसा छंत महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जीवनो मै जीवनु पाइआ गुरमुखि भाए राम ॥
हरि नामो हरि नामु देवै मेरै प्रानि वसाए राम ॥
हरि हरि नामु मेरै प्रानि वसाए सभु संसा दूखु गवाइआ ॥
अदिसटु अगोचरु गुर बचनि धिआइआ पवित्र परम पदु पाइआ ॥
अनहद धुनि वाजहि नित वाजे गाई सतिगुर बाणी ॥
नानक दाति करी प्रभि दातै जोती जोति समाणी ॥1॥
मनमुखा मनमुखि मुए मेरी करि माइआ राम ॥
खिनु आवै खिनु जावै दुरगंध मड़ै चितु लाइआ राम ॥
लाइआ दुरगंध मड़ै चितु लागा जिउ रंगु कसुंभ दिखाइआ ॥
खिनु पूरबि खिनु पछमि छाए जिउ चकु कुमि॑आरि भवाइआ ॥
दुखु खावहि दुखु संचहि भोगहि दुख की बिरधि वधाई ॥
नानक बिखमु सुहेला तरीऐ जा आवै गुर सरणाई ॥2॥
मेरा ठाकुरो ठाकुरु नीका अगम अथाहा राम ॥
हरि पूजी हरि पूजी चाही मेरे सतिगुर साहा राम ॥
हरि पूजी चाही नामु बिसाही गुण गावै गुण भावै ॥
नीद भूख सभ परहरि तिआगी सुंने सुंनि समावै ॥
वणजारे इक भाती आवहि लाहा हरि नामु लै जाहे ॥
नानक मनु तनु अरपि गुर आगै जिसु प्रापति सो पाए ॥3॥
रतना रतन पदारथ बहु सागरु भरिआ राम ॥
बाणी गुरबाणी लागे तिन॑ हथि चड़िआ राम ॥
गुरबाणी लागे तिन॑ हथि चड़िआ निरमोलकु रतनु अपारा ॥
हरि हरि नामु अतोलकु पाइआ तेरी भगति भरे भंडारा ॥
समुंदु विरोलि सरीरु हम देखिआ इक वसतु अनूप दिखाई ॥
गुर गोविंदु गोुविंदु गुरू है नानक भेदु न भाई ॥4॥1॥8॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जीवनो मै जीवनु पाइआ गुरमुखि भाए राम ॥
हरि नामो हरि नामु देवै मेरै प्रानि वसाए राम ॥
हरि हरि नामु मेरै प्रानि वसाए सभु संसा दूखु गवाइआ ॥
अदिसटु अगोचरु गुर बचनि धिआइआ पवित्र परम पदु पाइआ ॥
अनहद धुनि वाजहि नित वाजे गाई सतिगुर बाणी ॥
नानक दाति करी प्रभि दातै जोती जोति समाणी ॥1॥
मनमुखा मनमुखि मुए मेरी करि माइआ राम ॥
खिनु आवै खिनु जावै दुरगंध मड़ै चितु लाइआ राम ॥
लाइआ दुरगंध मड़ै चितु लागा जिउ रंगु कसुंभ दिखाइआ ॥
खिनु पूरबि खिनु पछमि छाए जिउ चकु कुमि॑आरि भवाइआ ॥
दुखु खावहि दुखु संचहि भोगहि दुख की बिरधि वधाई ॥
नानक बिखमु सुहेला तरीऐ जा आवै गुर सरणाई ॥2॥
मेरा ठाकुरो ठाकुरु नीका अगम अथाहा राम ॥
हरि पूजी हरि पूजी चाही मेरे सतिगुर साहा राम ॥
हरि पूजी चाही नामु बिसाही गुण गावै गुण भावै ॥
नीद भूख सभ परहरि तिआगी सुंने सुंनि समावै ॥
वणजारे इक भाती आवहि लाहा हरि नामु लै जाहे ॥
नानक मनु तनु अरपि गुर आगै जिसु प्रापति सो पाए ॥3॥
रतना रतन पदारथ बहु सागरु भरिआ राम ॥
बाणी गुरबाणी लागे तिन॑ हथि चड़िआ राम ॥
गुरबाणी लागे तिन॑ हथि चड़िआ निरमोलकु रतनु अपारा ॥
हरि हरि नामु अतोलकु पाइआ तेरी भगति भरे भंडारा ॥
समुंदु विरोलि सरीरु हम देखिआ इक वसतु अनूप दिखाई ॥
गुर गोविंदु गोुविंदु गुरू है नानक भेदु न भाई ॥4॥1॥8॥
हिन्दी अर्थ: रागु आसा छंत महला 4 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) मुझे आत्मिक जीवन मिल गया।मुझे आत्मिक जीवन प्राप्त हो गया।जब गुरू की शरण में आ के प्रभू जी प्यारे लगने लगे। अब गुरू मुझे हर समय हरी का नाम ही दिये जाता है।गुरू ने मेरे हरेक स्वास में हरी नाम बसा दिया है (जब से गुरू ने) मेरी हरेक सांस में हरी-नाम बसाया है मैं अपना हरेक सहम हरेक दुख दूर कर बैठा हूँ। गुरू के शबद की बरकति से मैंने उस परमात्मा को सिमरा है (जो इन आँखों से) नहीं दिखता।जो मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। (सिमरन के सदका) मैंने सबसे ऊँचा और पवित्र आत्मिक रुतबा हासिल कर लिया है। जब से मैंने सतिगुरू की बाणी गानी शुरू की है(मेरे अंदर आत्मिक आनंद की अटॅुट लहर चल पड़ी है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मेरे अंदर) कभी ना खत्म होने वाले सुर से संगीतक साज सदा बजते रहते हैं। हे नानक ! दातार प्रभू ने ये बख्शिश की है अब मेरी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में टिकी रहती है। 1। (हे भाई !) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य मन मर्जी करने वाले मनुष्य ‘मेरी माया मेरी माया’ कह कह के ही आत्मिक मौत मर गए। उनका मन (माया के लाभ के समय) एक छिन में चढ़ जाता है (माया की हानि के समय) एक छिन में ही धराशाही हो जाता है।वे अपने मन को सदा इस बदबू भरे शरीर के मोह में जोड़े रखते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सदा दुर्गंध भरे शरीर के मोह में अपने चित्त को लगाए रखते हैं।उनका ध्यान शारीरिक मोह में लगा रहता है (पर ये शारीरिक दुख-सुख यूँ है) जैसे कुसंभ के फूल का रंग देखते हैं (देखने में शौख।पर जल्द ही फीका पड़ जाने वाला)। जैसे परछाई (सूरज के चढ़ने और ढलने के साथ-साथ) कभी पूरब की ओर हो जाती है और कभी पश्चिम की ओर खिसक जाती है।जैसे वह चॅक है जिसे कुम्हार ने चक्कर दिया हुआ है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य दुख सहते हैं।दुख संचित करते रहते हैं।उन्होंने अपने जीवन में दुखों की ही बढ़ोक्तरी की हुई होती है।पर हे नानक ! जब मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ता है।तब ये मुश्किल से पार होने वाला संसार-समुंद्र आसानी से तैरा जा सकता है। 2। (हे भाई !) मेरा मालिक सोहणा है।मेरा मालिक प्रभू सुंदर है।(पर।मेरी समझ-सियानप से परे है) पहुँच से परे है।वह एक ऐसा समुंद्र है जिसका थाह नहीं पाया जा सकता। (तभी तो) हे मेरे शाह ! हे मेरे सतिगूरू ! मैं (आपसे) हरी-नाम की पूँजी मांगता हूँ। जो मनुष्य हरी-नाम-सरमाए की तलाश करता है।हरि-नाम का व्यापार करता है।वह सदा हरी के गुण गाता रहता है।गुणों के कारण वह हरी को प्यारा लगता है। वह मनुष्य माया के मोह की नींद माया की भूख बिल्कुल ही त्याग देता है।वह तो सदा उस परमात्मा में लीन रहता है जिसके अंदर कभी माया के फुरने उठते ही नहीं। जब एक हरि-नाम का व्यापार करने वाले सत्संगी मिल बैठते हैं।तो वे परमात्मा के नाम की कमाई कमा के (जगत से) चले जाते हैं। हे नानक ! आप भी अपना मन।अपना शरीर गुरू के हवाले कर दे (और हरी-नाम का सौदा गुरू से हासिल कर) पर ये हरी नाम का सौदा वही मनुष्य हासिल करता है जिसके भाग्यों में धुर से लिखा होता है। 3। हे भाई ! (ये मनुष्य का शरीर।मानो।एक) समुंदर (है जो आत्मि्क जीवन के श्रेष्ठ गुण-रूपी) अनेकों रत्नों से नाको-नाक भरा हुआ है। जो मनुष्य हर समय सतिगुरू की बाणी में अपना मन जोड़े रखते हैं।उन्हें ये रत्न मिल जाते हैं। (हे भाई !) जो लोग हर समय सतिगुरू की बाणी में जुड़े रहते हैं उनको बेअंत परमात्मा का वह नाम रत्न मिल जाता है जिसके बराबर की कीमत का और कोई पदार्थ नहीं। हे प्रभू ! उन मनुष्यों के हृदय में आपकी भक्ति के खजाने भर जाते हैं वह मनुष्य आपका वह नाम-रत्न प्राप्त कर लेते हैं जिसके बराबर की और कोई चीज नहीं। हे भाई ! गुरू की कृपा से जब मैंने अपने शरीर-समुंद्र को खोज के देखा तो गुरू ने मुझे (शरीर के अंदर बसता हुआ परमात्मा का नाम-रूप) सुंदर कीमती पदार्थ दिखा दिया। हे नानक ! (कह) हे भाई ! गुरू परमात्मा है परमात्मा गुरू है दोनों में कोई फर्क नहीं। 4। 1। 8।
झिमि झिमे झिमि झिमि वरसै अंम्रित धारा राम ॥
आसा महला 4 ॥
झिमि झिमे झिमि झिमि वरसै अंम्रित धारा राम ॥
झिमि झिमे झिमि झिमि वरसै अंम्रित धारा राम ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे भाई ! जैसे वर्षा ऋतु में जब मीठी मीठी फुहार पड़ती है तो बड़ी सुहावनी ठंड महसूस होती है।वैसे ही अगर मनुष्य को गुरू मिल जाए तो उसके हृदय की धरती पर) आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की धार आहिस्ता-आहिस्ता बरखा करती है (और उसको आत्मिक शांति बख्शती है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ४: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४४२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।