सभु किछु वसगति साहिबै आपे करण करेव ॥
सतिगुर कै बलिहारणै मनसा सभ पूरेव ॥3॥
इको दिसै सजणो इको भाई मीतु ॥
इकसै दी सामगरी इकसै दी है रीति ॥
इकस सिउ मनु मानिआ ता होआ निहचलु चीतु ॥
सचु खाणा सचु पैनणा टेक नानक सचु कीतु ॥4॥5॥75॥
सभे थोक परापते जे आवै इकु हथि ॥
जनमु पदारथु सफलु है जे सचा सबदु कथि ॥
गुर ते महलु परापते जिसु लिखिआ होवै मथि ॥1॥
मेरे मन एकस सिउ चितु लाइ ॥
एकस बिनु सभ धंधु है सभ मिथिआ मोहु माइ ॥1॥ रहाउ ॥
लख खुसीआ पातिसाहीआ जे सतिगुरु नदरि करेइ ॥
निमख एक हरि नामु देइ मेरा मनु तनु सीतलु होइ ॥
जिस कउ पूरबि लिखिआ तिनि सतिगुर चरन गहे ॥2॥
सफल मूरतु सफला घड़ी जितु सचे नालि पिआरु ॥
दूखु संतापु न लगई जिसु हरि का नामु अधारु ॥
बाह पकड़ि गुरि काढिआ सोई उतरिआ पारि ॥3॥
थानु सुहावा पवितु है जिथै संत सभा ॥
ढोई तिस ही नो मिलै जिनि पूरा गुरू लभा ॥
नानक बधा घरु तहां जिथै मिरतु न जनमु जरा ॥4॥6॥76॥
सोई धिआईऐ जीअड़े सिरि साहां पातिसाहु ॥
तिस ही की करि आस मन जिस का सभसु वेसाहु ॥
सभि सिआणपा छडि कै गुर की चरणी पाहु ॥1॥
मन मेरे सुख सहज सेती जपि नाउ ॥
आठ पहर प्रभु धिआइ तूं गुण गोइंद नित गाउ ॥1॥ रहाउ ॥
तिस की सरनी परु मना जिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥
जिसु सिमरत सुखु होइ घणा दुखु दरदु न मूले होइ ॥
सदा सदा करि चाकरी प्रभु साहिबु सचा सोइ ॥2॥
साधसंगति होइ निरमला कटीऐ जम की फास ॥
सुखदाता भै भंजनो तिसु आगै करि अरदासि ॥
मिहर करे जिसु मिहरवानु तां कारजु आवै रासि ॥3॥
बहुतो बहुतु वखाणीऐ ऊचो ऊचा थाउ ॥
वरना चिहना बाहरा कीमति कहि न सकाउ ॥
नानक कउ प्रभ मइआ करि सचु देवहु अपुणा नाउ ॥4॥7॥77॥
नामु धिआए सो सुखी तिसु मुखु ऊजलु होइ ॥
पूरे गुर ते पाईऐ परगटु सभनी लोइ ॥
साधसंगति कै घरि वसै एको सचा सोइ ॥1॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभु ! अगर, आप ही मेहर करे, तो मुझे साध-संगति की प्राप्ति हो और सेवा की दात मिले।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।