राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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सिरीरागु महला 5 ॥ भलके उठि पपोलीऐ विणु बुझे मुगध अजाणि ॥ सो प्रभु चिति न आइओ छुटैगी बेबाणि ॥ सतिगुर सेती चितु लाइ सदा सदा रंगु माणि ॥1॥ प्राणी तूं आइआ लाहा लैणि ॥ लगा कितु कुफकड़े सभ मुकदी चली रैणि ॥1॥ रहाउ ॥ कुदम करे पसु पंखीआ दिसै नाही कालु ॥ ओतै साथि मनुखु है फाथा माइआ जालि ॥ मुकते सेई भालीअहि जि सचा नामु समालि ॥2॥ जो घरु छडि गवावणा सो लगा मन माहि ॥ जिथै जाइ तुधु वरतणा तिस की चिंता नाहि ॥ फाथे सेई निकले जि गुर की पैरी पाहि ॥3॥ कोई रखि न सकई दूजा को न दिखाइ ॥ चारे कुंडा भालि कै आइ पइआ सरणाइ ॥ नानक सचै पातिसाहि डुबदा लइआ कढाइ ॥4॥3॥73॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ हर रोज उद्यम से इस शरीर को पालते पोसते हैं, (जिंदगी का मनोरथ) समझे बगैर यह मूर्ख ही रह जाता है। इसे कभी उस परमात्मा (जिसने इसे पैदा किया है) याद नहीं आता, और आखिर में इसे मसाणों में फेक दिया जाएगा। (हे प्राणी! अभी भी वक्त है, अपने) गुरू के साथ चित्त जोड़ ले, और (परमात्मा का नाम सिमर के) सदा कायम रहने वाला आत्मिक आनंद ले।1। हे प्राणी ! आप (जगत में परमात्मा के नाम का) लाभ लेने के लिए आया है। आप किस खुआरी वाले काम में उलझा हुआ है? आपकी जिंदगी की सारी रात खत्म होती जा रही है।1।रहाउ। पशु कलोल करते हैं, पंक्षी कलोल करते हैं। (पशु और पंक्षी को) मौत नहीं दिखती।और यह) माया के जाल में फंसा हुआ है। माया के जाल से बचे हुए वही लोग दिखते हैं जो परमात्मा का सदा कायम रहने वाला नाम हृदय में बसाते हैं।2। (हे प्राणी!) जो (ये) घर छोड़ के सदा के लिए चले जाना है, वह आपको अपने मन में (प्यारा) लग रहा है। और जहां जा के आपका वास्ता पड़ना है, उसका तूझे (रॅक्ती भर भी) फिक्र नहीं। (सभ जीव माया के मोह में फंसे हुए हैं, इस मोह में) फंसे हुए वही बंदे निकलते हैं जो गुरू के चरणों में पड़ जाते हैं।3। (पर, माया का मोह है ही बड़ा प्रबल, इस में से गुरू के बिना) और कोई बचा नहीं सकता। (गुरू के बिना ऐसी स्मर्था वाला) कोई दिखाई नहीं देता। मैं तो सारी सृष्टि ढूंढ के गुरू की शरण आ पड़ा हूँ। हे नानक (कह) सॅचे पातशाह ने, गुरू ने मुझे (माया के मोह समुंद्र में) डूब रहे को निकाल लिया है।4।3।73।
सिरीरागु महला 5 ॥ घड़ी मुहत का पाहुणा काज सवारणहारु ॥ माइआ कामि विआपिआ समझै नाही गावारु ॥ उठि चलिआ पछुताइआ परिआ वसि जंदार ॥1॥ अंधे तूं बैठा कंधी पाहि ॥ जे होवी पूरबि लिखिआ ता गुर का बचनु कमाहि ॥1॥ रहाउ ॥ हरी नाही नह डडुरी पकी वढणहार ॥ लै लै दात पहुतिआ लावे करि तईआरु ॥ जा होआ हुकमु किरसाण दा ता लुणि मिणिआ खेतारु ॥2॥ पहिला पहरु धंधै गइआ दूजै भरि सोइआ ॥ तीजै झाख झखाइआ चउथै भोरु भइआ ॥ कद ही चिति न आइओ जिनि जीउ पिंडु दीआ ॥3॥ साधसंगति कउ वारिआ जीउ कीआ कुरबाणु ॥ जिस ते सोझी मनि पई मिलिआ पुरखु सुजाणु ॥ नानक डिठा सदा नालि हरि अंतरजामी जाणु ॥4॥4॥74॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ (किसी के घर घड़ी दो घड़ी के लिये गया हुआ मेहमान उस घर के काम संवारने वाला बन बैठे तो हास्यास्पद ही होता है, उसी तरह से जीव इस जगत में) घड़ी दो घड़ियों का मेहमान ही है, पर इस के ही काम-धंधे निपटाने वाला बन जाता है। मूर्ख (जीवन का सही रास्ता) नहीं समझता, माया के मोह में और कामवासना में फंसा रहता है। जब (यहां से) उठ के चल पड़ता है तो पछताता है (पर, उस वक्त पछताने से क्या होता है?) यमों के तो बस पड़ जाता है।1। हे (माया के मोह में) अंधे हुए जीव! (जैसे कोई पेड़ नदी के किनारे पर उगा हुआ हो तो किसी भी समय नदी के किनारे के टूटने से वृक्ष नदी में बह सकता है, ठीक उसी तरह) आप (मौत रूपी नदी के) किनारे पर बैठा हुआ है (पता नहीं किस वक्त मौत आ जाए)। अगर (आपके माथे पर) पूर्व जन्म में (की हुई कमाई के अच्छे लेख) लिखे हुए हों तो आप गुरू का उपदेश कमा ले (गुरू के उपदेश मुताबक अपना जीवन बनाए, और आत्मिक मौत से बच जाए)।1।रहाउ। यह जरूरी नहीं कि हरी खेती ना काटी जाए, डोडियों पर आई अधपकी फसल ना काटी जाए, और सिर्फ पकी हुई ही काटी जाए। जब खेत के मालिक का हुकम होता है, वह काटने वाले तैयार करता है जो हसिए ले ले के (खेत में) आ पहुंचते हैं। (वह काटने वाले खेत को) काट के सारा खेत नाप लेते हैं। (इस तरह जगत का मालिक प्रभु जब हुकम करता है जम आ के जीवों को ले जाते हैं, चाहे बाल उम्र हो, चाहे जवान हो और चाहे बुजुर्ग हो चुके हों)।2। (माया में ग्रसे मूर्ख मनुष्य की जीवन की रात का) पहिला पहर दुनिया के धंधों में बीत जाता है। दूसरे पहर (मोह की नींद में) जी भर के सोता रहता है, तीसरे पहर विषय भोगता रहता है। और चौथे पहर (आखिर) दिन चढ़ जाता है (बुढ़ापा आ के मौत आ पुकारती है)। जिस प्रभु ने ये जीवात्मा और शरीर दिया है वह कभी भी इसके चित्त में नहीं आता (उसे कभी भी याद नहीं करता)।3। हे नानक! (कह) मैं साध-संगति पर सदके जाता हूं, साध-संगति के ऊपर अपनी जीवात्मा कुर्बान करता हूं। क्योंकि, साध-संगति से ही मन में (प्रभु के सिमरन की) सूझ पैदा होती है, (साध-संगति द्वारा ही) सभ के दिल की जानने वाला अकाल-पुरख मिलता है। अंतरयामी सुजान प्रभु को (साध-संगति की कृपा से ही) मैंने सदा अपने अंग-संग देखा है।4।4।74।
सिरीरागु महला 5 ॥ सभे गला विसरनु इको विसरि न जाउ ॥ धंधा सभु जलाइ कै गुरि नामु दीआ सचु सुआउ ॥ आसा सभे लाहि कै इका आस कमाउ ॥ जिनी सतिगुरु सेविआ तिन अगै मिलिआ थाउ ॥1॥ मन मेरे करते नो सालाहि ॥ सभे छडि सिआणपा गुर की पैरी पाहि ॥1॥ रहाउ ॥ दुख भुख नह विआपई जे सुखदाता मनि होइ ॥ कित ही कंमि न छिजीऐ जा हिरदै सचा सोइ ॥ जिसु तूं रखहि हथ दे तिसु मारि न सकै कोइ ॥ सुखदाता गुरु सेवीऐ सभि अवगण कढै धोइ ॥2॥ सेवा मंगै सेवको लाईआं अपुनी सेव ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ (मेरी तो सदा यही अरदास है कि) और सारी बातें बेशक भूल जाएं, पर एक परमात्मा का नाम मुझे (कभी) ना भूले। गुरू ने (दुनिया के) धंधों से मेरा सारा मोह जला के मुझे प्रभु का नाम दिया है। यह सदा स्थिर नाम ही अब मेरा (जीवन) मनोरथ है। मैं (दुनिया की) सारी आशाएं मन से दूर करके एक परमात्मा की आस (अपने अंदर) पक्की करता हूं। जिन लोगों ने सतिगुरू का आसरा लिया है उनको परलोक में (प्रभु की दरगाह में) आदर मिलता है।1। हे मेरे मन ! करतार की सिफत सलाह कर। (पर, यह सिफत सलाह की दात गुरू से ही मिलती है, सो आप) सभी चतुराईयां छोड़ के गुरू के चरणों पर गिर जा।1।रहाउ। अगर, सुख देने वाला परमात्मा मन में बस जाए, तो ना दुनिया के दुख जोर डाल सकते हैं, ना माया की तृष्णा ही कमजोर कर सकती है। जब, हृदय में वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा बसता हो, तो किसी भी काम में लगें आत्मिक जीवन कमजोर नहीं होता। हे प्रभु ! जिस मनुष्य को आप अपना हाथ दे के (विकारों से) बचाता है, कोई (विकार) उसे (आत्मिक मौत) मार नहीं सकते। (हे भाई!) आत्मिक आनंद देने वाले सतिगुरू की शरण लेनी चाहिए, सत्गुरू (मन में से) सारे अवगुण निकाल के धो देता है।2। हे प्रकाश स्वरूप प्रभु! मैं सेवक (आपके से) उन (जीव-सि्त्रयों) की सेवा (का दान) मांगता हूं, जिनको तूने अपनी सेवा में लगाया हुआ है।
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्री राग महला 5 ॥ हर रोज उद्यम से इस शरीर को पालते पोसते हैं, (जिंदगी का मनोरथ) समझे बगैर यह मूर्ख ही रह जाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।