Lulla Family

अंग 435

अंग
435
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पहिला फाहा पइआ पाधे पिछो दे गलि चाटड़िआ ॥5॥
ससै संजमु गइओ मूड़े एकु दानु तुधु कुथाइ लइआ ॥
साई पुत्री जजमान की सा तेरी एतु धानि खाधै तेरा जनमु गइआ ॥6॥
मंमै मति हिरि लई तेरी मूड़े हउमै वडा रोगु पइआ ॥
अंतर आतमै ब्रहमु न चीनि॑आ माइआ का मुहताजु भइआ ॥7॥
ककै कामि क्रोधि भरमिओहु मूड़े ममता लागे तुधु हरि विसरिआ ॥
पड़हि गुणहि तूं बहुतु पुकारहि विणु बूझे तूं डूबि मुआ ॥8॥
ततै तामसि जलिओहु मूड़े थथै थान भरिसटु होआ ॥
घघै घरि घरि फिरहि तूं मूड़े ददै दानु न तुधु लइआ ॥9॥
पपै पारि न पवही मूड़े परपंचि तूं पलचि रहिआ ॥
सचै आपि खुआइओहु मूड़े इहु सिरि तेरै लेखु पइआ ॥10॥
भभै भवजलि डुबोहु मूड़े माइआ विचि गलतानु भइआ ॥
गुर परसादी एको जाणै एक घड़ी महि पारि पइआ ॥11॥
ववै वारी आईआ मूड़े वासुदेउ तुधु वीसरिआ ॥
एह वेला न लहसहि मूड़े फिरि तूं जम कै वसि पइआ ॥12॥
झझै कदे न झूरहि मूड़े सतिगुर का उपदेसु सुणि तूं विखा ॥
सतिगुर बाझहु गुरु नही कोई निगुरे का है नाउ बुरा ॥13॥
धधै धावत वरजि रखु मूड़े अंतरि तेरै निधानु पइआ ॥
गुरमुखि होवहि ता हरि रसु पीवहि जुगा जुगंतरि खाहि पइआ ॥14॥
गगै गोबिदु चिति करि मूड़े गली किनै न पाइआ ॥
गुर के चरन हिरदै वसाइ मूड़े पिछले गुनह सभ बखसि लइआ ॥15॥
हाहै हरि कथा बूझु तूं मूड़े ता सदा सुखु होई ॥
मनमुखि पड़हि तेता दुखु लागै विणु सतिगुर मुकति न होई ॥16॥
रारै रामु चिति करि मूड़े हिरदै जिन॑ कै रवि रहिआ ॥
गुर परसादी जिन॑ी रामु पछाता निरगुण रामु तिन॑ी बूझि लहिआ ॥17॥
तेरा अंतु न जाई लखिआ अकथु न जाई हरि कथिआ ॥
नानक जिन॑ कउ सतिगुरु मिलिआ तिन॑ का लेखा निबड़िआ ॥18॥1॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: उनके तहत आप सिर्फ माया की खातिर उम्र गुजार रहा है।पर अपने आप को पण्डित समझता और पण्डित कहलवाता है।निरी माया की खातिर दौड़-भाग छोड़।और) औरों (चेलों) को भी सिर्फ माया का लेखा-पत्रा ना सिखा।(सिर्फ माया का लेखा पढ़ने वाले) पण्डित ने पहले अपने गले में (माया की) फांसी डाली हुई है।फिर वही फांसी अपने विद्यार्थियों के गले में डाल देता है। 5। (अपने आप को पण्डित समझने वाले) हे मूख ! (निरी माया की खातिर पड़ने-पढ़ाने के कारण लालच-वश हो के) आप जीवन-जुगति भी गवा बैठा है।परोहित होने के कारण आप अपने जजमान से हर दिन-दिहाड़े के दान लेता है। (पर) एक दान आप अपने जजमान से गलत जगह पर लेता है।जजमान की बेटी आपकी ही बेटी है (बेटी के विवाह पर जजमान से दान लेना बेटी का पैसा खाना है)।ये अन्न खाने से (ये पैसा खाने से) आप अपना आत्मिक जीवन गवा लेता है। 6। हे मूर्ख ! (एक तरफ माया के लालच ने) आपकी लालच मारी हुई है (आपको ‘कुथाय दान’-गलत जगह से दान लेने में भी संकोच नहीं।दूसरी तरफ) आपको ये बड़ा आत्मिक रोग चिपका हुआ है कि मैं (विद्वान) हूँ।मैं (विद्वान) हूँ। आप अपने अंदर (बसते) परमात्मा को पहचान नहीं सका।(इस वास्ते आपका स्वै) माया (के लालच) के अधीन है। 7। हेमूर्ख ! (औरों को समझाता) आप स्वयं काम वासना में।क्रोध में (फस के) गलत राह पर पड़ा हुआ है। आप (धर्म-पुस्तकें) पढ़ता है।अर्थ विचारता है।और औरों को सुनाता भी है।पर (सही जीवन राह) समझे बिना आप (लालच की बाढ़ में) डूब के आत्मिक मौत मर चुका है। 8। हेमूर्ख (पण्डित !) आप (अंदर से) क्रोध से जला हुआ है।आपका हृदय-स्थल (लालच से) गंदा हुआ पड़ा है। हे मूर्ख ! आप हरेक (जजमान के) घर में (मायावी दक्षिणा के लिए तो) चलता फिरता है।पर प्रभू के नाम की दक्षिणा तूने अभी तक किसी से नहीं ली। 9। हे मूर्ख ! आप संसार (के मोह जाल) में (इतना) उलझ रहा है कि इस में से परले पासे नहीं पहुँच सकता। हे मूर्ख ! (आपके अपने किए कर्मों के अनुसार) करतार ने आपको (उसे) गलत राह पर डाल दिया है (जिधर आपकी रुची बनी हुई है।और) उनके किए कर्मों के संस्कारों के संचय का लेख आपके माथे पे (इतना) करा पड़ा है (कि आपको सही रास्ते की समझ नहीं रहती।पर आप औरों को सलाहें देता फिरता है)। 10। हे मूर्ख ! आप माया (के मोह) में इतना मस्त है कि आपको और कुछ सूझता ही नहीं।आप संसार समुंद्र (की मोह की लहरों) में गोते खा रहा है (अपने बचाव के लिए आप कोई उद्यम नहीं करता)। (गुरू की शरण पड़ कर) गुरू की कृपा से जो मनुष्य परमात्मा से सांझ डालता है।वह इस संसार समुंद्र से एक पल में पार लांघ जाता है। 11। हेमूर्ख ! (सौभाग्य से) मानस जन्म (मिलने) की बारी आई थी।पर (इस अमोलक जनम में भी) आपको परमात्मा भूला ही रहा। हे मूर्ख ! (अगर भटकता ही रहा तो) ये समय दुबारा नहीं मिलेगा (और माया के मोह में फसा रह के) आप जम के वश में पड़ जाएगा (जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाएगा)। 12। हे मूर्ख ! आप पूरे गुरू का उपदेश धारण करके देख ले।(माया आदि की खातिर) आपको कभी झुरना नहीं पड़ेगा (क्योंकि माया-मोह का जाल टूट जाएगा) पर अगर पूरे गुरू की शरण नहीं पड़ेगा तो कोई (रस्मी) गुरू (इन चिंताओं से सिसकियों से बचा) नहीं (सकता)। जो मनुष्य पूरे गुरू के बताए रास्ते पर नहीं चलता।(गलत रास्ते पर पड़ने के कारण) वह बदनामी ही कमाता है। 13। हेमूर्ख ! आत्मिक सुख का खजाना परमात्मा आपके अंदर बस रहा है (पर।आप सुख की तलाश में बाहर भटकता फिरता है) बाहर भटकते मन को रोक के रख। अगर आप गुरू के बताए रास्ते पर चले तो (अंदर बसते) परमात्मा के नाम का रस पीएगा।सदा के लिए ये नाम रस बरसता रहेगा (कभी खत्म नहीं होगा)। 14। हे मूर्ख ! परमात्मा (के नाम) को अपने चित्त में बसा ले (तभी उससे मिलाप होगा)।सिर्फ बातों से किसी ने प्रभू को नहीं पाया। हे मूर्ख ! गुरू के चरण हृदय में टिकाए रख।पिछले किए हुए सारे पाप बख्शे जाएंगे। 15। हे मूर्ख ! अगर आप परमात्मा की सिफत सालाह करनी सीख ले तो आपको सदा आत्मिक आनंद मिला रहे। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे जितना ही (प्रभू की सिफत सालाह से टूट के माया संबंधी और ही लेखे) पढ़ते रहते हैं।उतनी ही ज्यादा अशांति कमाते हैं।और गुरू की शरण के बिना (इस अशांति से) खलासी नहीं मिलती। 16। हे मूर्ख ! परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रख।जिन लोगों के दिल में परमात्मा सदा बसता रहता है (जिन्हें प्रभू सदा याद है। उनकी संगति में रह के) गुरू की कृपा से जिन (और) लोगों ने परमात्मा के साथ सांझ डाली।उन्होंने माया से निर्लिप प्रभू (की अस्लियत) समझ के उस से मिलाप प्राप्त कर लिया। 17। हे प्रभू ! आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।परमात्मा का स्वरूप बयान से परे है।बयान नहीं किया जा सकता। हे नानक ! जिन्हें सतिगुरू मिल जाए (वह निरी माया के लेखे लिखने-पढ़ने की जगह परमात्मा की सिफत सालाह करने लग पड़ते हैं।इस तरह) उनके अंदर से माया के मोह के संस्कारों का हिसाब समाप्त हो जाता है। 18। 1। 2।
रागु आसा महला 1 छंत घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध जोबनि बालड़ीए मेरा पिरु रलीआला राम ॥
धन पिर नेहु घणा रसि प्रीति दइआला राम ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 1 छंत घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे जोबन में मतवाली हुई अंजान युवती ! (अपने पति प्रभू को हृदय में बसा ले) प्यारा प्रभू ही आनंद का श्रोत है। जिस जीव-स्त्री से प्रभू-पति का ज्यादा प्रेम होता है वह बड़े चाव से दयालु प्रभू को प्यार करती है।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उनके तहत आप सिर्फ माया की खातिर उम्र गुजार रहा है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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